साधु सन्त के तुम रखवारे।
तुम रक्षक रघुवर के द्वारे ।।
राघवने की प्रबल प्रतिज्ञा भुजा उठाकर । धरती पर ना रहने दूँगा एक निशाचर ।।
किन्तु अकेले महायज्ञ यह कैसे सरता। रावणजैसा बली सहज ही कैसे मरता ।।
भक्तों के रक्षक रघुवर के परम पियारे । साधु सन्त भक्तों के हो सच्चे रखवारे ।।
राघव के सुत आप दण्ड देते दुष्टों को । एकपुकार में हरलेते जन के कष्टों को ।।
हनुमतकी हर कथा राम राघवको प्यारी। निजमुख से भी यशगाथा वो कहेंतुम्हारी।
कालनेमि से कपटीको तुमकरते दण्डित। भक्तविभीषणको करतेहो महिमामण्डित।
सच्चे सन्तोंको प्रभु तुमहो अवढर दानी। वंचककी चलसके नहीं तुमपर मनमानी।
रघुनायकके आपसहायक हे कपिनायक। राम काज केलिये आप रघुवर के सायक।
तपसी,सन्त,गृही,जन जनके भाग्यसँवारे। साधुसंत सज्जनके पलप्रतिपल रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे ।।
राम सिया प्राणों से प्यारे ।।
सज्जनताहै तत्व दिव्यजो रहता मन में ।
कितने चन्दनलेप लगालो अपने तन में।।
मन में भरा कलुष हो पर चेहरा वैरागी । ऐसी झूठीभक्ति आपसे मीलों भागी।।
सुर द्रोही धरतीपर पटक पटक देमारे । असुरविनाशक रामदूत तुम राम दुलारे।।
सज्जन को हैनमन दुष्ट दलका हैखण्डन। रामभक्त पशु भीहै तोउसका अभिनन्दन।
भक्तविभीषण का घर देख उसे पहचाना। साधलिया था लक्ष्य रामसे उन्हें मिलाना।
सन्तवेश का कपटी खुदसे दूर भगाया। दानवतन का भक्त स्वयंबढ़करअपनाया।
राघवका उद्देश्य धर्म की जग में रक्षा । हनुमत देते उचित होय जो ऐसी शिक्षा।।
हठ करके हनुमानभक्त कोहैं अपनाते। भटक नजाए उसको प्रभुकी शरण गहाते
जग में फैले भक्त एक से एक तुम्हारे । असुर विरोधी हनुमत हैं श्रीराम दुलारे।।
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