हिंदुओं में 108 दानों के पीछे अंक विज्ञान है। सबसे ऊपर के दाने को 'सुमेरु' कहते हैं। सनातन ऋषि-मुनियों ने 108 दानों का गणित प्रकृति के कई सिद्धांतों को ध्यान में रखकर निश्चित किया था। इस अंक का विज्ञान पूरे ब्रह्मांड को अपने में समाए हुए है। यह अंक संख्या नौ ग्रहों और बारह राशियों का गुणनफल है (9× 12 = 108), जो पूरे ब्रह्मांड को अपने में समाहित किए हुए है। नक्षत्र संख्या में सत्ताईस हैं और हर नक्षत्र के चार-चार चरण हैं, जिनका गुणनफलभी 108 है (27x 4= 108 ) ।
वैज्ञानिक दृष्टि से तीन आयामों की इस दुनिया से परे जो चौथा आयाम है, उसी को अपने में समाए जो अंक बनता है, उसी से सत्ताईस नक्षत्रों की गणना को गुणा करने से भी 108 का अंक बनता है । इस प्रकार मंत्र ध्वनि उस चौथे आयाम तक पहुँचती है, जो इन आयामों की दुनिया से परे है। एक और कारण से भी 108 का अंक महत्त्वपूर्ण है। एक दिवस में चौबीस घंटे होते हैं, पल, घड़ी और हर घड़ी में साठ पल व हर घंटे में साठ, हर पल में साठ प्रतिपल, इस प्रकार एक दिन में ( 60 x 60 x 60 = 216000) विपल होते हैं, जब हम इसे दो से भाग देते हैं तो 108000 संख्या आती है, जिसके मूल में 108 की संख्या है।
हिंदू धर्म में मालाएँ भी कई प्रकार की हैं, जिनका उपयोग अलग-अलग कार्यसिद्धि और देवताओं के लिए होता है। आमतौर पर तुलसी, चंदन व रुद्राक्ष की माल होती है । पर विशेष मंत्र साधना के लिए मुक्ता माला (मोती), प्रवाल माला (मूँगे), हलदी की माला, कमलगट्टे की मालाएँ भी होती हैं। इन सबके पीछे जो विज्ञान है, वह मंत्र विशेष या देवी-देवता की 'तंरगों' को ध्यान में रखकर किया गया है । उदाहरण के लिए, मोती की माला का प्रयोग चंद्रमा ग्रह और लक्ष्मी देवी से संबंधित है। इसी प्रकार हलदी की माला माँ दुर्गा से संबंध रखती है। परंतु रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ है और किसी मंत्र या देवता की पूजा-आराधना में प्रयोग की जा सकती है। अभिप्राय यह है कि माला का चयन वैज्ञानिक कारण से है, किसी काल्पनिक या अंधविश्वास के कारण नहीं।
जपमाला के विषय में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जपमाला हर व्यक्ति की अपनी अलग होनी चाहिए। किसी दूसरे व्यक्ति की जपमाला का प्रयोग नहीं करना चाहिए और न ही अपनी माला जपने के लिए किसी को देनी चाहिए। आपकी माला आपके आध्यात्मिक 'लॉकर' की तरह होती है, जिस पर आपने मंत्रों की जमापूँजी सूक्ष्म रूप से सँजोई होती है। इसलिए जप करते समय आप को अपनी माला गोमुखी में रखकर जाप करना चाहिए, ताकिकोई आप को जप करते समय देखे नहीं ।
माला द्वारा मंत्र जाप किए जाने के पीछे वैज्ञानिक पक्ष यह है कि अंगुष्ठ (अँगूठा ) और मध्यमा अंगुली द्वारा जब माला का दाना फेरा जाता है तब इन तीनों के संघर्ष से एक विलक्षण मानव - विद्युत् उत्पन्न होती है, जो सीधी हमारे हृदय-चक्र को प्रभावित करती है। इससे मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है।
सनातन चिंतन के अनुसार हमारे शरीर में अंगुष्ठ का संबंध आत्मा से और मध्यमा अंगुली का हृदय प्रदेश से सीधा संबंध है, इसीलिए मंत्रजाप माला द्वारा ही करना चाहिए ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें