अरे! इखलाक तेरा शोक मनाऊ या अफ्सोस करुँ !
| सुभाष कुमार नौहवार |
तू तो इस दीन दुनिया से स्वर्ग सिंधार गया,
कब से दादरी में रहता था किसी ने नहीं जाना,
पर आज हर नेता की जुबान पर छा गया.
तुझे नहीं पता था कि मरने के बाद तू प्रसिद्ध हो जायेगा.
घडियाली आँसू के साथ नोंचने के लिए हर नेता गिद्ध हो जाएगा.
पर तेरा बलिदान खाली नहीं गया...
राजनैतिक चाटुकार बने साहित्यकारो को उजागर कर गया.
तेरे मातम का सहारा लेकर कोई यूनाइटेड नेशन को चिट्ठी लिख,
सहायता की गुहार लगाता है,
तो कोई बेलगान जुबान से समाज के सहमे होने की बात करता है.
जरा पूछो कि कहाँ थी इन साहित्याकारो की संवेदना
जब सिखोँ को जिंदा जलाया !!!
कहाँ थी उनकी संवेदनशीलता जब कश्मीरी ब्राह्मणोँ का
सब कुछ छीन उन्हे उनकी सर जमीँ से भगाया.
जब मौका मिला तो सम्मान लिया और उसे खूब भुनाया,
अरे! कुछ तो सोचो किसके कहने पर तुम्हारी सोच में ये बद्लाव आया?
अरे चाटुकार साहित्याकारो! इस समाज को कहाँ लिए जा रहे हो?
आम का रस चूस कर छिल्का और गुठली लौटा रहे हो?
मुझे नहीं पता इखलाक कि तुमने कभी कोई कविता भी लिखी होगी,
पर मरने के बाद तुम साहित्यकार जरूर बन गए,
हर टी वी चैनल और हर अखबार में छप गए.
आज तुम्हारे सम्मान में कुछ साहित्यकार पुराने सम्मान लौटा रहे हैं,
राजनेता तो आगामी चुनाव में
तुम्हारे परिवार को टिकिट देने की पेशकश कर रहे हैं.
तेरा शोक भी शानो-शोकत से मना रहे हैं
बाहर लोग धड्ल्ले से बीफ़ पार्टियाँ दे रहे है.
जन्नते हिंदुस्तान “कश्मीर” को लहूलुहान किया
तब किसी एन जी ओ और इन दोगले साहित्यकारो का कलेजा नहीं फ़टा?
सिखोँ का बेरहमी से कत्ल कर, उनके घर जलाए गए
तब इनमें से किसी का एक आँसू तक नहीं टपका??
इस समाज को बर्बाद करने के लिए तो कुछ दोगले राजनेता ही बहुत हैं!
साहित्यकार अपने दर्पण में समाज को न दिखा कर
कुछ और दिखाए तो ये उनके सरोकार नहीं, कुकृत्य हैं.
Subhash Kumar Nauhvar Ka Sandesh... Bahrin Se
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