दीपोत्सव की हार्दिक शुभ कामनाएं..!! आज का चिंतन..!!
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एक दिन लक्ष्मी जी इंद्र के दरवाजे पर पहुंची और बोली," हे इंद्र मैं तुम्हारे यहां निवास करना चाहती हूं।💐 इंद्र ने आश्चर्य से कहा,"हे कमले..!! आप तो असुरों के यहां बड़े आनंद पूर्वक रहती थी, वहां आपको कुछ कष्ट नहीं था मैंने कितनी ही बार आपको अपने यहां बुलाने का महान प्रयत्न किया परंतु तब आप ना आईं और आज बिना बुलाए मेरे द्वार पर पधारी हैं? सो देवी इसका कारण मुझे समझा कर कहिए।
लक्ष्मी जी ने प्रसन्न मुख उत्तर दिया, "इंद्र! कुछ समय पूर्व असुर बड़े धर्मात्मा थे। वे कर्तव्य परायण रहते थे, अपना सब काम नियमित रूप से करते थे परंतु उनके यह सद्गुण धीरे-धीरे नष्ट होने लगे। प्रेम के स्थान पर ईर्ष्या द्वेष और क्रोध का उनके परिवारों में निवास रहने लगा। अधर्म दुर्गुण और तरह-तरह के व्यसन मद्यपान और मांस भक्षण की वृद्धि होने लगी। इन दुर्गुणों में भला में कैसे रह सकती हूं।
मैंने सोचा कि इस दूषित वातावरण में अब मेरा निर्वाह नहीं हो सकता इसलिए दुराचारी असुरों को छोड़कर मैं तुम्हारे यहां सद्गुणों में निवास करने चली आई हूं।💐
इंद्र चकित रह गए... लक्ष्मी जी के निवास करने का रहस्य उन्हें मालूम होने लगा। उन्होंने कहा," हे भगवती, और कौन कौन से दोष हैं? जिनके कारण आपने असुरों को छोड़ा है..?? कृपा करके मेरे तथा आने वाली संतानो के लिए उन कमियों को विस्तार पूर्वक मुझे बतलाइए जिससे मैं भविष्य में सावधान रहूं। लक्ष्मी जी इंद्र पर विशेष कृपालु हुईं, उन्होंने ऐसे दोष बता दिए जिनके कारण उन्होंने असुरों का परित्याग किया था।
लक्ष्मी जी ने कहा, हे इंद्र..!
💐जब कोई वयोवृद्ध सत्पुरुष ज्ञान विवेक का उपदेश करते थे तो असुर लोग उनका उपहास करते थे या उपेक्षा से निर्णय लेने लगते थे यह मुझे बहुत बुरा लगा।
💐वृद्ध और गुरुजनों के सम्मान का विचार न करके उनकी बराबरी के आसन पर बैठते थे, सत्कार शिष्टाचार और अभिवादन की बात वे भूल गए थे।
💐लड़के माता-पिता से मुंह-जोरी करने लगे थे, वह बहुत रात तक घूमते फिरते आवारागर्दी करते चिल्लाते रहते न स्वयं सोते ना दूसरों को सोने देते थे। वह अकारण ही वाद विवाद मोल लेते थे। यह मुझे अनुचित लगा अतः मैं वहां से बुरा मान कर चली आई।
💐असुरों की स्त्रियों ने पतियों की आज्ञा मानना छोड़ दिया था,पुत्र को पिता की परवाह नहीं रही थी।
💐शिष्य आचार्यों की तरफ मुंह मटकाने में लगे रहते थे। समाज की समस्त मान मर्यादायें जाती रही थीं। 💐वे लोग सत पात्रों को दान और लंगड़े लूले अधिकारियों को भिक्षा न देकर धन को विलासिता में खर्च करने लगे थे।
💐घर के बच्चों की परवाह न करके बड़े बूढ़े पुरुष चुपचाप मधुर मिष्ठान अकेले ही खा जाते थे।
जहां ऐसे निर्लज्जापूर्ण आचरण होते हैं उनके यहां मैं भला किस प्रकार रह सकती हूं?
💐यह असुर लोग फलदार और छायादार हरे-भरे वृक्षों को काटने लगे थे व दिन चढ़े तक सोते रहते थे। 💐वह रात्रि गए तक खाते रहते थे व भक्तों और गोरक्षण का विचार नहीं करते थे।
💐सत्कर्म करना तो दूर दूसरों को करता देखते तो उसमें भी विघ्न उपस्थित करते थे।
💐स्त्रियां आत्म प्रदर्शन, आलस्य और व्यसनों में व्यस्त रहने लगी थीं। 💐घर में अनाज का अनादर होने लगा व चूहे खाकर अन्न को नष्ट करने लगे। खाद्य पदार्थ खुले पड़े रहते थे जिन्हें कुत्ते बिल्ली चाटते थे 💐घर में ही पापाचार स्वार्थ व पक्षपात बढ़ गया था व असुरों की वृत्ति मादक द्रव्यों में जुए शराब मांस में नाच और तमाशा में बढ़ने लगीथी 💐लापरवाही का हर जगह राज्य हो गया था ऐसी दशा में नौकरों की खूब बन आई थी। वह चुरा चुरा कर अपना घर भरने लगे।
उनके ऐसे आचरण देखकर मेरा हृदय अत्यंत कष्ट पाने लगा व दुखी होकर एक दिन मैं चुपचाप असुरों के घर से चली आई। अब वहां सदैव दरिद्रता का ही निवास होगा।
💐 हे इंद्र...!! तुम ध्यानपूर्वक सुनो मैं सदैव परिश्रमी, कर्तव्य परायण विचारवंत, सदाचारी, संयमित, जागरूक और नियमित योग करते रहने वाले के यहां निवास करती हूं।
जब तक तुम्हारा आचरण धर्म परायण रहेगा, तब तक तुम्हारे यहां में बनी रहूंगी। लक्ष्मी जी के इस कथन ने इंद्र को एक नई शक्ति दी। उन्होंने बड़ी श्रद्धा और आदर पूर्वक लक्ष्मी जी का अभिवादन किया और कहा," हे कमलासिनी आप मेरे यहां सुख पूर्वक रहिये।
मैं ऐसा कोई अधर्ममय आचरण नहीं करूंगा जिससे नाराज होकर आपको मेरे घर से जाना पड़े।💐💐 इस बोधकथा से शिक्षा ग्रहण करके इस दीपावली के पावन पर्व पर आइए हम सब संकल्प करें कि अपने अंदर दैवीय गुणों की वृद्धि करेंगे और वातावरण एवं युग के प्रभाव से जो आसुरी वृत्ति संचित हो गई हैं उन से अधिक से अधिक दूरी बनाए रखने का प्रयास करेंगे।
सभी मित्र बंधुओं व उनके परिवारी जनों को दीप-पर्व की हार्दिक बधाई💐💐💐☺️☺️ शुभ दीपावली-मंगलमय दीपावली।
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