यदि इतिहास से हमारा अर्थ किसी देश के तथ्यात्मक एवं तिथि क्रम से आने वाले सही-सही भूतकाल के वर्णन से हो तो हमें वर्तमान समय में प्रचलित भारतीय इतिहास को काल्पनिक 'अरेबियन नाइट्स' अर्थात अलिफ-लैला की कहानियों की श्रेणी में रखना होगा।
लेख माला में आपके साथ उन भ्रामक मान्यताओं पर चर्चा की जाएगी जोकि काल-क्रम में हमारे इतिहास का अभिन्न हिस्सा बना दी गई है।
इसका प्रारंभ हम राजधानी दिल्ली की प्रसिद्ध इमारतों से कर रहे हैं ।
अधिकांश आलेख प्रख्यात इतिहासकार श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक की शोध परक पुस्तकों से संदर्भित हैं। आशा है, आप इस श्रृंखला को स्वीकार करेंगे। धन्यवाद..💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐☺️☺️
दिल्ली के स्मारक (एक सुप्त-सत्य) 1-:
अनेक शताब्दियों से यह विश्वास दिला कर की दिल्ली के मध्यकालीन स्मारक उनके मुस्लिम बादशाहों ने बनवाए थे इतिहास बताओ और उनके द्वारा सामान्य जनता की अनेक चिड़ियों को पूर्ण रूप से ठगा गया है मुस्लिमों ने यह स्मारक निश्चित ही नहीं बनाए थे यह सभी स्मारक मुस्लिम पूर्व युग से संबंध रखते हैं और दिल्ली के मुस्लिम पूर्व क्षत्रिय राजाओं द्वारा बनाए गए थे मुस्लिम शासकों और फकीरों की कपड़ों को समेटे हुए मकबरे और दरगाह में भी पूर्वकालिक हिंदू राजप्रासाद और मंदिर ही हैं जो छद्म रूप में कब्रिस्तान में बदल दिए गए हैं इन स्मारकों का श्रेय मध्यकालीन मुस्लिम शासकों को देने में इतिहास लेता कानों सुनी बातों या अनुमान के आधार पर पक्षियों का निर्माण करने वाले ब्रिटिश अधिकारियों अथवा अन्य राज्य आश्रय प्राप्त मुस्लिम इतिहास लेखकों के द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करते रहे हैं यदि इन कथनों को परिस्थिति के साक्ष्य के आधार पर सत्यापित कर लेने की सामान्य सावधानी भी बढ़ती गई होती तो इतिहास में यह घोटाला नहीं मिलता जो सरकारी अभिलेखों और इतिहास के पाठ्यक्रमों में बहुत गहरे तक घुस चुका है इस लेख माला का प्रारंभ हम प्रसिद्ध लाल किले से करते हैं।
लाल किला या लाल कोट भाग 1-:
पृथ्वीराज रासो नामक समकालीन ग्रंथ से यह ज्ञात होता है की पृथ्वीराज चौहान यमुना नदी के तट पर बने एक राज महल में रहता था । परंपरागत लेखे भी यही बताते हैं कि पृथ्वीराज का महल लालकोट अर्थात लाल दीवारों की संरचना के नाम से विख्यात था।
इन दोनों विवरणों की पूर्ण समानता हमें दिल्ली के यमुना तट स्थित एकमात्र उस भवन से मिलती है जो आज लाल किला कहलाता है अतः मुगल बादशाह शाहजहां को दिल्ली का लाल किला बनाने का संपूर्ण यश व्यर्थ ही दिया जाता रहा है।
1.शाहजहां से लगभग 250 वर्ष पूर्व सन 1938 में दिल्ली निवासियों का नरसंहार करने वाले क्रूर आक्रमणकारी तैमूर लंग ने अपने इतिहास वृत्तों में पुरानी दिल्ली का स्पष्ट उल्लेख किया है तो पुरानी दिल्ली को शाहजहां के द्वारा स्थापित बताया जाना कैसे तर्कसंगत हो सकता है?
2. दिल्ली में लाल किला पुरानी दिल्ली का नाभि स्थल है।तथ्यात्मक रूप में पुरानी दिल्ली, केंद्रीय मार्ग चांदनी चौक, जो कि लाल किले को उस भवन से जोड़ता है जो आज फतेहपुरी मस्जिद कहलाता है, किंतु जो कभी दिल्ली के हिंदू शासकों के कुल देवता का मंदिर था, के चारों ओर बसी है। इस प्रकार शाहजहां के 400 वर्ष पहले भी लाल किला और अपने प्रमुख बाजार चांदनी चौक सहित पुरानी दिल्ली निश्चित रूप से अस्तित्व में थी।
3.किले के पिछले भाग में बहने वाली यमुना का किनारा राजघाट पुकारा जाता है, यह एक संस्कृत शब्द है। यदि हिंदू राजाओं की अनेक पीढ़ियों द्वारा शाहजहां और उसके बाद होने वाले मुस्लिम शासकों से पूर्व लाल किले में अपना आवास ना रखा गया होता तो यह नाम अभी तक प्रचलित न रहता।
शाहजहां के द्वारा अगर यह किला बनाया गया होता तो स्वाभाविक ही यह राजघाट ना होकर बादशाह घाट या जहांपनाह घाट के नाम से पुकारा गया होता।
4.किले के एक द्वार पर बाहर की ओर एक हाथी की मूर्ति चित्रित है जबकि इस्लाम किसी भी प्रकार के मूर्ति करण को कठोरता पूर्वक मना करता है, जबकि राजपूत सम्राटों का हाथियों के प्रति प्रेम सुविख्यात रहा है।
5.किले के मेहराबों के दोनों ओर पत्थर के पुष्प बने हैं जो लगभग सभी मध्यकालीन हिंदू भवनों की विशिष्ट शैली है।
6.इसके अलावा लाल किले में बहने वाली नहर, जिनसे यमुना का जल सारे किले में बहता रहा होगा, इस किले के राजपूती निर्माण की पुष्टि करते हैं,क्योंकि रेगिस्तानी परंपरा वाले मुगल शासकों ने इन प्रवाह मान नहरों की कभी कल्पना भी न की होगी।
7. किले में स्थित श्रावण भादों दर्शक मंडप और दीवानेखास में बना केशर-कुंड, हिंदू शब्दावली का हिस्सा है क्योंकि राजपूत क्षत्राणियों के द्वारा केसर के जल से स्नान किये जाने का उल्लेख आता है।
8. दीवाने खास और दीवाने आम में एक भी गुम्बद या मीनार नहीं है जोकि मुस्लिम स्थापत्य का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। दीवाने आम की संगमरमर की व्यासपीठ, जिस पर बादशाह बैठा करता था, में मंदिर के आकार की छत है जोकि अंबर (पुराने जयपुर) के राजमहलों के भीतर के भाग से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाता है।
9. विभिन्न स्मृति ग्रंथ और ऐतिहासिक वृत्त इस बात का उल्लेख करते हैं कि मुगल शासकों के हरम में 2-3सौ से लेकर 5000 तक भी स्त्रियां रहती थीं।
विचारणीय विषय यह है कि वह सब स्त्रियां, स्वयं शासक उनके अनेक बाल बच्चे, सहयोगी सेवक सेविकाएं और रिश्तेदार आदि उस दीवानेखास से जुड़े हुए दो तीन कमरों में किस प्रकार समा सकते थे? निश्चय ही इतने अभिजात वर्ग के लोग, नगर में आम इंसानों की तरह तो रखे नहीं जाते होंगे।
10. दीवाने खास के निकट संगमरमर के एक जंगले पर राजा की न्याय तुला का चित्र अंकित है।
अपनी प्रजा के अधिकांश हिंदू भाग को निम्न स्तर का समझने वाले मुगल शासक अपने राजमहल में न्याय के चिन्ह को तुला के रूप में अंकित करने की कभी कल्पना भी करते होंगे यह हास्यास्पद लगता है किंतु ब्राह्मण एवं विद्वानों का सम्मान करने वाले और उनसे उपदेश पाने वाले राजपूत शासकों के लिए न्याय तुला का चित्र उन्हें कर्तव्य बोध कराने का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा होगा।......(जारी)
लाल किला या लाल कोट भाग 2-:
दीवाने खास और दीवाने आम में मंडप शैली की अलंकृत हिंदू कलाकृति है।
इसके अतिरिक्त दीवाने खास सन 984 ईसवी के आसपास निर्मित अंबर या आमेर जो पुराना जयपुर भी कहलाता है,उसके भीतरी भाग से अत्यधिक मिलता-जुलता है।
दीवानेखास की एक दीवार पर फारसी की पंक्तियों में खुदा है कि -
यह स्थान पृथ्वी पर स्वर्ग है
इस प्रकार की डींग केवल जबरदस्ती कब्जा करने वाला ही कह सकता था क्योंकि यदि शाहजहां इस भवन का मूल निर्माता रहा होता तो कभी भी ऐसे अतिशयोक्ति पूर्ण शब्दावली का प्रयोग ना करता।
क्योंकि मूल निर्माता तो प्रायः रचना के संबंध में संकोची होता है और भवन के दोषों के संबंध में वह इतना सजग होता है कि वह कभी भी अपने निर्माण को पृथ्वी पर स्वर्ग कहने की कल्पना कर ही नहीं सकता।
दीवाने खास में अंकित आत्मस्तुति पूर्ण यह पंक्ति इस बात का प्रबल प्रमाण है कि यह पंक्ति किले के उन विजेताओं के द्वारा यहां पर जोड़ दी गई जिन्होंने युद्ध के मध्य उपलब्ध सामग्री के रूप में स्मारक की अलंकृत सुंदरता से आंखें चौंधिया जाने पर इस भवन को साक्षात स्वर्ग कह दिया था। लाल किले से आगे बढ़ने पर केवल कुछ गज दूर पर ही स्थित दो देवालय हैं जो गैर मुस्लिमों के हैं।
इनमें से एक लाल जैन मंदिर और दूसरा गौरी शंकर मंदिर है।
यदि शाहजहां ने लाल किला बनाया होता तो कभी भी इन दोनों गैर मुस्लिम काफिरों के धर्म स्थलों को बने रहने की अनुमति न देता। यह दोनों मंदिर इन स्थानों पर इसीलिए हैं कि शाहजहां से शताब्दियों पूर्व राजपूतों ने यह लाल किला बनवाया।
लाल किले से निकलता हुआ मुख्य बाजार चांदनी चौक मूल रूप में केवल हिंदुओं से ही घिरा हुआ है। यदि मुगलों ने इस किले का निर्माण कराया होता तो चांदनी चौक में तुर्कों अफ़गानों फारसी लोगों और अबी सीनियाई हिंदू धर्म परिवर्तितों के आवास होते, हिंदुओं के नहीं।
सारी पुरानी दिल्ली की जनसंख्या अधिकांशतः हिंदू ही है इसकी घुमावदार छोटी-छोटी गलियों में मकान भी परंपरागत हिंदू शैली में ही बने हुए हैं।
यह मानना कितनी असंगत बात है कि शाहजहां जैसा क्रूर व धर्मांध व्यक्ति हिंदुओं के लिए मकान बनवाए और समस्त नगर की विशाल दीवार में किलेबंदी करे? और वैसे भी शाहजहां के पूर्ववर्ती तैमूर लंग की आत्मकथा में कहा गया है कि पुरानी दिल्ली शाहजहां से शताब्दियों पूर्व अस्तित्व में थी।
मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों की रचनायें प्रायः परी कथाओं की तरह से है।मुस्लिम बादशाहों के स्मृति ग्रंथ,चाहे वह बाबरनामा हो,अकबरनामा हो, आईने अकबरी या अन्य कोई ग्रंथ हो, इन पर टीका करते हुए सर एच एम इलियट और प्रोफेसर जॉन डॉसन ने बार-बार सावधान किया है कि इन स्मृति ग्रंथों में उन सभी बातों का समावेश किया गया है जो उस बादशाह या चाटुकार लेखक ने विचारा कि अमुक अमुक बात सार्वजनिक जानकारी में आनी चाहिए।
मध्यकालीन मुस्लिम इतिहास वृत्तों की समीक्षा में स्वर्गीय सर इलियट ने लिखा है कि भारत में मुस्लिम काल का इतिहास सुनियोजित तरीके से निर्मित किया गया एक रोचक जाल है।
दिल्ली के इन अनगिनत स्मारकों के संबंध में ध्यान रखने वाली एक विचित्र बात यह है कि दिल्ली में इतने सारे मकबरे और दरगाह है, किंतु उन्हीं के अनुरूप महल एक भी नहीं।
हमें हुमायूं का मकबरा,अब्दुल रहीम खानखाना का मकबरा, नजफ़ खान का मकबरा, लोदी का मकबरा,अलाउद्दीन खिलजी का मकबरा,सफदरजंग का मकबरा, बख्तियार काकी का मकबरा व निजामुद्दीन औलिया का मकबरा ऐसे ही अनेक मकबरे तो मिलते हैं किंतु इन मकबरों में 'सोने' वाले किन महलों में रहते थे। क्योंकि मकबरे तो मरे हुए व्यक्ति को दफन करने के काम आते हैं। जब मकबरे ऐसे बनवाये तो उनके आवास कैसे होने चाहिए और यदि ऐसे कोई आवास थे तो वह कहां है??उनका कहीं पता नहीं चलता...!!💐 (जारी)
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