निश्चय दुःख पाता सदा जो सहता अन्याय।
किन्तु करे अन्याय जो कभी न वो बच पाय।।
जीवन में रखते सभी परम ज्ञान की चाह।
अनुभव ऐसा दीप है सदा दिखाता राह।।
अनुभव अपनी पीर का पंछी को भी होय।
सच्चा मानव है वही पर दुःख पर जो रोय।।
अन्तस् की आवाज को जो न सुने मन लाय।
कुपरिणाम भोगे तथा कष्ट अनेकों पाय।।
हदय धर्म से हीन है केवल बु़ि़द्ध विकास।
छिपी असुरता चित्त में सत्य मात्र आभास।।
समय बडा अनमोल है सबको इसका ज्ञान।
सत्य समय से भी बडा इसको भी पहचान।।
कर्मशील करता सदा कर्मशक्ति से प्यार।
रहे भरोसे भाग्य के मूढ सहे दुत्कार।।
प्रज्ञा सधे विवके से शठ को साधे काम।
अनुभव से मानव सधे पशु है प्रकृति गुलाम।।
नित नवीन उन्नति करंे पढें लिखें दिल खोल।
यह प्रसिद्धि का दण्ड है यश कीरति का मोल।।
प्रथम बने आदत तथा करता पुनः गुलाम।
अगर प्रेम होता नहीं नित नवीन अभिराम।।
बार बार कोशिश करें करें सतत अभ्यास ।
आशा मन आधार है निष्फल सभी प्रयास।।
मित्र हदय की शक्ति हेै जीवन का आधार।
वही मित्र सच्चा कि जो करे पूर्ण स्वीकार।।
संशय से मन के छॅंटें मोह विकृति व्यवहार।
किन्तु पुनः गिरती नहीं संशय की दीवार।।
याद बचाती चित्त के सभी व्यर्थ अपवाद।
समय गये मन भूलता भले बुरे संवाद।।
तन बूढा तो क्या हुआ मन न कभी बुढियाय।
बुरा तभी लगता कि जब बूढा समझा जाय।।
दीर्घकाल तक धैर्य से जब लें मन को जीत।
मिल पाता है तब कहीं मन को सच्चा मीत।।
गैरों के व्यवहार की करें शिकायत रोज।
जड तक जाना है अगर पहले खुद को खोज।।
जो शरीफ होता वही, तो पीछे रह जाय।
ये न सत्य सज्जन सदा विजय पूर्व ही पाय।।
विजयी होता जो,वही देता वचन विचार।
वादों में उलझा रहे जिसको मिलती हार।।
बातचीत के बल कभी मिले न ज्ञान विशेष।
जागे तभी विवके जब हों न प्रश्न अवशेष।।
लगता सुखद अतीत है,प्रचलित लगे विचित्र।
पीढी दर पीढी कहे बिगडा आज चरित्र।।
मिले वही फल जीव को जैसे रखें विचार।
हम माली इस बाग के जैसी हो रखवार।।
पराधीनता सहज है बंधी रहेगी सोच।
मुक्ति चुनौती है बडी कायर को संकोच।।
सहन पराजय को करें रख कर दृढ विश्वास।
यही परीक्षा की घडी मन ना करें निराश।।
देख मुसीबत गैर की चतुर सजग हो जाय।
कोई संकट ज्ञान को तुमसे ना ले पाय।।
नेक काम सच से भरा, दुर्लभ इस संसार।
मतलब की नेकी यहां बिखरी मिलें हजार।।
गैर सदा से गैर है, लाख निकट वह आय।
सच्चा रिश्ता तो यहां बस खुद से जुड पाय।।
विपदा का हम मानते कारण अपनी भूल ।
साफ करे मन की सतह, ये ईश्वर की धूल।।
दूर असलियत है खडी निकट खडा कर्तव्य।
पालन हो कर्तव्य का, ये ही चिन्तन भव्य।।
कर्म करो सन्तुष्टि से मुख से कभी न बोल।
गैरों को इस हेतु तुम कहने दो मुंह खोल।।
धन वैभव संसार में आवश्यक अनमोल।
लेकिन सेवाधर्म को धन से कभी न तोल।।
गैरों के हित जो यहां, अपना समय बिताय।
उसके जीवन का भला, स्वयं सिद्ध हो जाय।।
करें सत्य अनुभूति जो, रखें प्रेम के भाव।
सुन्दरतम अभिव्यक्ति से, कवि का बढे प्रभाव।।
कविता होती श्रेष्ठतम शब्दों का संगीत।
ध्वनि के कविता रूप में हो संगीत प्रतीत।।
अगर चाहते हो कभी दुःख न वापस आय।
ध्यान लगा सुनलो कि वो क्या कहता समझाय।।
आवश्यकता आ पडें, मिलतीं लाख सलाह।
बुद्धिमान इस भीड में खोजे अपनी राह।।
बदनामी का गम नहीं,यदि सच्चा व्यवहार।
मल मिट्टी से चिपकता,नहीं रतन दीवार।।
भजन करें हम रात भर,दिन भर बुरे विचार।
दूर रहें कुविचार से वरना सब बेकार।।
बार बार यदि म्यान से ख्ंिाचे रोज तलवार।।
शत्रु करे अनुमान यह तुम कितने दमदार।।
जो करना है वो करो किन्तु बनो मत ढोल।
मन की शक्ति छुपा रखो व्यर्थ न मुंह को खोल।।
अत्याचारी भाव से जो भी शस्त्र उठाय।
उसके जीवन का सदा, अन्त शस्त्र ही लाय।।
जो करना प्रभु ही करें, हम तो करें प्रयास।
ईश्वर इच्छा है बडी, रखो यही विश्वास।।
नयनों को मुस्कान दे करता पर उपकार।
आशा के दीपक जला, भरता मन में प्यार।।
गिरे चित्त में जो भरे जीवन का उत्साह।
सच्चा कवि वो सृष्टि का, उचित काव्य की राह।।
चेहरे पर मुस्कान रख करें पीठ पर वार।
उनसे तो दुर्जन भले, सीधे करें प्रहार।।
बदी कहें सबसे बुरी, है जघन्य अपराध।
चुगली तो सबसे बुरी, है असाध्य यह व्याधि।।
सत् असत्य दोनों सुलभ, चयन करो तुम एक।
अवसर सबको दे रहा, ईश्वर रूप विवेक।।
करें क्रोध आवेश में हम कैसा व्यवहार।
इससे जग को ज्ञात हो, संस्कृति और परिवार।।
संकट में मिलता अगर हमें नेह का हाथ।
कष्ट घटें,खुशियां बढें, जग भी अपने साथ।।
किससे कब क्या क्या कहा, रखना पडे न याद।
अगर असत् को त्याग कर करें सत्य संवाद।।
कार्य सदा होता सफल,अगर योजना ठीक।
जीत चाहते हो अगर रखिए दृष्टि सटीक।।
सद् ग्रन्थों का अध्ययन,करें नित्य स्वाध्याय।
ज्ञानवृद्धि, मन भी लगे, कौडी खर्च न आय।।
अर्द्धसत्य होता कुटिल, लेता सर्वस लूट।
या तो बोलें सत्य ही, या फिर पूरा झूठ।।
आकुलता होती अधिक, सहज प्राप्ति ना होय।
पाते हम वह सहज ही, जिस हित धैर्य न खोय।।
जो जन इस संसार में अधिक प्रसिद्ध न होय।
स्वर्ग सम्पदा में रमें, चाहे जग में खोय ।।
बढे शक्ति संकल्प की,उसको कहें स्वतन्त्र।
खुली सोच जिसमें नहीं, वही सदा परतंत्र।।
राम भूल धन को भजें, डूबें इस संसार।
मूढ मन्द उस जीव को पडें कोटि धिक्कार।।
युद्धभूमि संसार है,मिलें नित नए घाव।
जीवन में उत्साह ही, है स्थाई भाव।।
सूक्ष्म राह से ना खुलें जीवन की हर गांठ।
आदि मध्य और अंत तक सदा अधूरा पाठ।।
हंसना सीखो कष्ट में रखो हदय समझाय।
चढे बुढापे का जहर,फिर न जीव हंस पाय।।
ज्यों सागर के तीर पर टहले बालक एक।
क्या कब जेबों में भरे, सीपी शंख अनेक।।
इसी तरह से याद का, है अद्भुत विज्ञान।
क्या कब उसके काम का ,लगे न कुछ अनुमान।।
अगर विजय की चाह है,रखिए पैर जमाय।
टुकडों में मिलती विजय, सहज न पाई जाय।।
जीवन की इस दौड में, समय बचाते आप।
चाहें जब उपयोग तो,यही समय अभिशाप।।
भागदौड चलती रहे,सदा समय के साथ।
समय बचे तो देखते कुछ न बचा अब हाथ।।
कार्य पूर्व ही मत करें लम्बा सोच विचार।
अधिक सोच परिणाम में,कार्य होय बेकार।।
खनिज भूमि धन धान्य की खूब कीजिए वृद्धि।
पर बच्चे ही देश की, हैं सच्ची समृद्धि।।
जीवन लम्बा है मगर,इतना भी मत जान।
एक जन्म में सत्य की हो पाए पहचान।।
अति उत्सुकता से सहज,खुल जाता अज्ञान।
हम क्या बनना चाहते,अपने हाथ कमान।।
अधिक दान या लोभ से,हो जाता नुकसान।
एक करे कंगाल तो, दूजा दे अपमान।
किसी कर्म की अति सदा करती सत्यानाश।
अति को वर्जित ही रखें, चाहें अगर विकास।।
अल्प कथन,सुनना अधिक, कान खुले मुंह बन्द।
बुद्धिमान बनते तभी रखें जीभ पाबन्द।।
अज्ञानी यदि चुप रहे,पा लेता सम्मान।
समझे ना इस बात को, ये ही तो अज्ञान।।
सामाजिक उन्नति बिना,देश रहे कमजोर।
नव समाज के हाथ ही,राजनीति की डोर।।
बिन सामाजिक साथ के करना चाहें राज।
नभ में महल बना रहे,सधे न उनका काज।।
जब न रहूं संसार में,याद रहे यह एक।
चाहे कुछ ना कर सका,रखी प्रेम की टेक।।
अगर झूठ दमदार है,सिंहासन आसीन।
सत्य पडा हो कैद में,दिखता दुर्बल दीन।।
विजयी होता सत्य ही,हो अन्तिम जयकार।
सिंहासन बैठा असत्,पाता है धिक्कार।।
पहले करें प्रयास हम,साधें लघु पाषाण।
उच्च पर्वतों की फतह, को तब करें प्रयाण।।
सहनशीलता है भली,साधे हदय विवेक।
किन्तु बात अन्याय की, ना चलने दें एक।।
यद्यपि लगे सशक्त पर,है असत्य कमजोर।
बिना सत्य आधार ले,चले न उसका जोर।।
जो करते संसार में स्थिति निज अनुकूल।
स्वतः सुधरती हैं सदा,उनकी सारी भूल।।

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