सोमवार, 22 जुलाई 2024

अहं को नष्ट करें

आत्मबोध के लक्ष्य में हमारे सामने आनेवाली सबसे बड़ी बाधा अहं है। जब हम भौतिक अर्थ में सफलता प्राप्त करते हैं तो अहं अपने आप पुष्ट होता और बढ़ता रहता है। जब हम दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को देखने और फिर अपनी गलती स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते तो वह खुद को अभिव्यक्त करता है।हमें यह सोचना अच्छा लगता है कि हम हमेशा सही हैं। अपनी गलती को स्वीकार कर लेने से हमारी नजर में हमारा दरजा कम हो जाता है। जरूरी नहीं है कि ऐसी प्रवृत्ति सफलता से जुड़ी हो। 

माता-पिता को अपने बच्चों के साथ और वरिष्ठों को अपने कनिष्ठों के साथ अहं की समस्याएँ होती हैं। और इस विचार की आलोचना हो सकती है, परंतु एशियाई जीवनशैली में आमतौर पर पतियों का अहं अपनी पत्नियों के मुकाबले बहुत तगड़ा होता है।

माता-पिता के रूप में आपने कितनी बार अपने बच्चे के सामने स्वीकार किया है कि उसे डाँटने के मामले में आप गलत थे? बड़े भाई-बहन के रूप में, आपने कितनी बार अपने छोटे भाई-बहन के साथ अनुचित व्यवहार के लिए उससे माफी माँगी है? यकीन है कि ऐसा अकसर नहीं हुआ होगा। हर बुद्धिमान व्यक्ति के इस कहावत पर अमल करने के अलावा इस प्रवृत्ति का कोई इलाज नहीं है कि : अपने अहं को नष्ट कर दें।अहं से निपटने का एक आरामदेह तरीका है कि कभी खुद को गंभीरता से न लें। हम सभी में अहं इसलिए उत्पन्न होता है, क्योंकि जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हम अपने आप अपनी एक बहुत गंभीर छवि बना लेते हैं और उसका मजाक उड़ाया जाना पसंद नहीं करते।साथ ही, हम अपनी 'छवि' को लेकर कुछ ज्यादा ही सजग होते हैं । परंतु उस छवि की प्रस्तुति हमें गलत और तनाव पूर्ण बना देती है। हम जिन लोगों को सामाजिक रूप से खुद से हीन समझते हैं, उनके बीच नहीं हँसेंगे, क्योंकि उससे हमें लगता है कि हम उनके स्तर तक आ जाएँगे।दूसरी ओर, हम उन बातों पर भी हँस लेंगे जो हमें समझ नहीं आईं, सिर्फ इसलिए कि हमसे उच्च स्तरवाले लोग उस पर हँसे और हम अपनी नासमझ की छवि प्रस्तुत नहीं करना चाहते।

बस एक बच्चे को ध्यान से देखिए : वह दुनिया में किस तरह बिना किसी की परवाह किए हँसता है। उसे परवाह नहीं कि कौन देख रहा है, न ही उसे इस चीज की परवाह होती है कि उसका चेहरा कितना अजीब दिख रहा है। वह बच्चा इसलिए हँसता है, क्योंकि वह उस पल को जी रहा है और वह एक असली एहसास होता है।

अफसोस की बात है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम अपने आसपास के झूठे मूल्यों पर अधिक ध्यान देने लगते हैं और वह सहजता खो बैठते हैं। हँसना सीखिए क्योंकि वह आपका असली मूल्य बढ़ाता है!

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