गुरुवार, 17 जनवरी 2019

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ...!! सेवा साधना व समर्पण का प्रतीक ( भाग- 2)

संघ कार्य हेतु स्वयंसेवक जब एक बार संकल्पित ही जाता है तब एक ही स्वर गूंजता है कि ..." बाधाएँ हमें डिगा न सकीं...!!

एक बार 30-35 स्वयंसेवक दाल बाटी का सामान लेकर साईकिलों से निकले ! जब कुछ लोग ट्रेन मार्ग में पडने वाली एक सुरंग (बोगदा) को पार कर रहे थे की तभी ट्रेन आ गई ! गनीमत रही की कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई !
फिर भी कुछ साईकिलें कुचल गईं तो कुछ स्वयंसेवकों के पैर में मोच आदि आ गई !
इस दुर्घटना के बाद साक्षात मौत के मुंह में से निकलने के बाद भी कार्यकर्ताओं की मस्ती में कोई कमी नही आई !
 दाल बाटी भी बनी और शाखा भी लगी !
संपर्क आया !
 वहां शाखा लगाते समय किसी की शिकायत पर पुलिस पहुँच गई ! पर इसके पहले की कोई बखेडा होता वहां का सरपंच ढाल बन गया और बोला यह लोग मेरे गाँव में आये हैं ! मेरे मेहमान हैं ! इन्हें परेशान करोगे तो ठीक नही होगा ! बाद में उन सरपंचजी का छोटा भाई  अच्छा स्वयंसेवक बना !

( ज्ञातव्य है कि सरपंच महोदय कांग्रेसी थे और विपरीत विचारधारा के बावजूद इन्होंने सहयोग किया )

 एक कार्यकर्ता श्री यावलकर जी ने कमरा तो निशुल्क उपलव्ध करा दिया था किन्तु वहां ना तो पानी की व्यवस्था थी और ना ही शौच आदि की ! एसे में प्रचारक नाना धर्माधिकारी जी के घर पर शौच आदि के लिए जाते तो जहां से नगर को पानी सप्लाई होता था वहां जाकर स्नान करते ! धीरे धीरे आसपास के दुकानदारों से मित्रता होने पर पीने के पानी की व्यवस्था उनके सहयोग से होने लगी

 कुछ समय एक स्वयमसेवक श्रीअनिल राजपूत के यहाँ शौचादि के लिए जाना शुरू हुआ ! तभी श्री डी.एन. वर्मा के यहाँ 100 रु. मासिक पर कमरा किराए पर उपलव्ध हुआ, और इन असुविधाओं पर विराम लगा !

यह वह समय था जब जिला कार्यवाह भी 5रु. गुरू दक्षिणा करते थे ! इस कारण अत्यंत कठिनाईयों से प्रवास तथा प्रचारक की दैनंदिन व्यवस्थाओं का प्रवंध होता था ! फिर धीरे धीरे गुरू दक्षिणा का महत्व समझ में आने पर स्थिति में सुधार हुआ !

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