एक बार सर कार्यवाह माननीय शेषाद्री जी का प्रवास बैतूल जिले में हुआ ! जिला सम्मलेन, कालेज विद्यार्थियों की बैठक, प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ बैठक आदि कार्यक्रम हुए !
एक बार भाऊराव देवरस भी बैतूल पधारे ! वनवासियों के बीच काम शुरू करने के लिए ताप्ती वनवासी आश्रम के नाम से छात्रावास प्रारम्भ किया गया ! किन्तु प्रारंभिक दौर में एक रोचक प्रसंग आया !
एक स्वयंसेवक श्री विहारीलाल जी के साथ प्रवास कर छात्रावास के लिए बच्चों को प्रेरित किया गया !
कुछ बच्चे आये भी ! किन्तु अचानक उनके अभिभावकों में भ्रान्ति फ़ैल गई की ये लोग बच्चों को ईसाई बना देंगे ! बहुत समझाने पर भी वे लोग अपने बच्चों को वापस ले गए !
इस दृश्य से कुछ परेशानी भी हुई तो वनवासी वन्धुओं की सजगता देखकर सब को अच्छा भी लगा कि वे धर्मांतरण के प्रति सजग हैं! धीरे धीरे संघ के प्रति वातावरण बदला और छात्रावास ठीक से चलने लगा !
· स्वतन्त्रता आंदोलन के समय हरदा के एक सज्ज्जन दधीचि जेल में प.पू. डाक्टर हेडगेवार जी के संपर्क में आये ! डाक्टर साहब से उन्हे संघ की स्थापना, उद्देश्य व कार्यपद्धति की जानकारी मिली ! वे बहुत प्रभावित हुए और जेल से निकलने के पश्चात १९३६ में उन्होंने छीपाबड में गाँव के बच्चों को एकत्रित कर शाखा लगाना शुरू कर दिया !
डाक्टर जी ने उन्हें बताया था कि संघ में भगवा धवज को ही गुरू मान्यकर उसकी गरिमामय उपस्थिति में ही संघ के कार्यक्रम होते हैं !
गाँव में दधीचि जी को भगवा कपड़ा ना मिलाने पर उन्होंने घर से खादी की एक सफ़ेद धोती ली और उसे गेरू से रंगकर भगवा बनाया ! इतना ही नही तो यह ध्वज संघ का है यह स्पष्ट करने के लिए उन्होंने नील से उस पर बीच में अंग्रेजी में आर.एस.एस. भी लिखबाया !
लंबे समय तक यह अनोखा ध्वज लगाकर छीपाबड शाखा चलती रही !·
विजयादशमी पर आयोजित होने बाले प्रगट उत्सव में अध्यक्षता हेतु बैरागढ़(हरदा) में एक कांग्रेसी नेता को बुलाया गया ! वे सबसे अंत में भाषण देने खड़े हुए और लगभग पोन घंटे बोले !
स्वयंसेवक शान्ति से सुनते रहे ! कार्यक्रम के अंत में अधिकारियों ने उन्हें सविनय बताया कि विजयादशमी के स्थान पर उन्होंने अपना पूरा उद्बोधन श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित पर दिया है !
नेता जी शर्मिन्दा तो हुए साथ ही स्वयंसेवकों द्वारा अप्रासंगिक भाषण चुपचाप सुन लेने से अत्यंत प्रभावित भी हुए !
स्वयंसेवकों के अनुशासन ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे पूर्णतः संघमय हो गए !·
डबरा के श्री सरनामसिंह रावत नियमित प्रभात शाखा पहुँचने बाले स्वयंसेवक रहे हैं !
संघ से प्रभावित होने की दास्तान वे स्वयं इस प्रकार वर्णन करते हैं - एक बार जब वे सर्दियों के मौसम में तत्कालीन प्रचारक श्री वाल मुकुंद झा को जगाने गए तो उन्हें एक धोती में ठिठुरकर सोते हुए देखा ! इस दृश्य ने उन्हें श्रद्धा से अभिभूत कर दिया तथा उन्होंने आजीवन नियमित शाखा जाने का व्रत ले लिया !
उनकी आजीविका का साधन एकमात्र चिकित्सा व्यवसाय था, किन्तु संघ शिक्षा वर्ग हेतु उसे बंद कर उन्होंने तीनो वर्ष का संघ शिक्षण वर्ग किया!
द्वितीय वर्ष के दौरान वे फेलसीफेरम से पीड़ित हो बुखार में भी रहे किन्तु अपनी जीवटता के कारण वे शिक्षा वर्ग करके ही लौटे !
एक बार भाऊराव देवरस भी बैतूल पधारे ! वनवासियों के बीच काम शुरू करने के लिए ताप्ती वनवासी आश्रम के नाम से छात्रावास प्रारम्भ किया गया ! किन्तु प्रारंभिक दौर में एक रोचक प्रसंग आया !
एक स्वयंसेवक श्री विहारीलाल जी के साथ प्रवास कर छात्रावास के लिए बच्चों को प्रेरित किया गया !
कुछ बच्चे आये भी ! किन्तु अचानक उनके अभिभावकों में भ्रान्ति फ़ैल गई की ये लोग बच्चों को ईसाई बना देंगे ! बहुत समझाने पर भी वे लोग अपने बच्चों को वापस ले गए !
इस दृश्य से कुछ परेशानी भी हुई तो वनवासी वन्धुओं की सजगता देखकर सब को अच्छा भी लगा कि वे धर्मांतरण के प्रति सजग हैं! धीरे धीरे संघ के प्रति वातावरण बदला और छात्रावास ठीक से चलने लगा !
· स्वतन्त्रता आंदोलन के समय हरदा के एक सज्ज्जन दधीचि जेल में प.पू. डाक्टर हेडगेवार जी के संपर्क में आये ! डाक्टर साहब से उन्हे संघ की स्थापना, उद्देश्य व कार्यपद्धति की जानकारी मिली ! वे बहुत प्रभावित हुए और जेल से निकलने के पश्चात १९३६ में उन्होंने छीपाबड में गाँव के बच्चों को एकत्रित कर शाखा लगाना शुरू कर दिया !
डाक्टर जी ने उन्हें बताया था कि संघ में भगवा धवज को ही गुरू मान्यकर उसकी गरिमामय उपस्थिति में ही संघ के कार्यक्रम होते हैं !
गाँव में दधीचि जी को भगवा कपड़ा ना मिलाने पर उन्होंने घर से खादी की एक सफ़ेद धोती ली और उसे गेरू से रंगकर भगवा बनाया ! इतना ही नही तो यह ध्वज संघ का है यह स्पष्ट करने के लिए उन्होंने नील से उस पर बीच में अंग्रेजी में आर.एस.एस. भी लिखबाया !
लंबे समय तक यह अनोखा ध्वज लगाकर छीपाबड शाखा चलती रही !·
विजयादशमी पर आयोजित होने बाले प्रगट उत्सव में अध्यक्षता हेतु बैरागढ़(हरदा) में एक कांग्रेसी नेता को बुलाया गया ! वे सबसे अंत में भाषण देने खड़े हुए और लगभग पोन घंटे बोले !
स्वयंसेवक शान्ति से सुनते रहे ! कार्यक्रम के अंत में अधिकारियों ने उन्हें सविनय बताया कि विजयादशमी के स्थान पर उन्होंने अपना पूरा उद्बोधन श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित पर दिया है !
नेता जी शर्मिन्दा तो हुए साथ ही स्वयंसेवकों द्वारा अप्रासंगिक भाषण चुपचाप सुन लेने से अत्यंत प्रभावित भी हुए !
स्वयंसेवकों के अनुशासन ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे पूर्णतः संघमय हो गए !·
डबरा के श्री सरनामसिंह रावत नियमित प्रभात शाखा पहुँचने बाले स्वयंसेवक रहे हैं !
संघ से प्रभावित होने की दास्तान वे स्वयं इस प्रकार वर्णन करते हैं - एक बार जब वे सर्दियों के मौसम में तत्कालीन प्रचारक श्री वाल मुकुंद झा को जगाने गए तो उन्हें एक धोती में ठिठुरकर सोते हुए देखा ! इस दृश्य ने उन्हें श्रद्धा से अभिभूत कर दिया तथा उन्होंने आजीवन नियमित शाखा जाने का व्रत ले लिया !
उनकी आजीविका का साधन एकमात्र चिकित्सा व्यवसाय था, किन्तु संघ शिक्षा वर्ग हेतु उसे बंद कर उन्होंने तीनो वर्ष का संघ शिक्षण वर्ग किया!
द्वितीय वर्ष के दौरान वे फेलसीफेरम से पीड़ित हो बुखार में भी रहे किन्तु अपनी जीवटता के कारण वे शिक्षा वर्ग करके ही लौटे !


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