डबरा के बडेरा गाँव का एक ट्रेक्टर गन्ने लादकर ओवर ब्रिज पर जा रहा था कि तभी उसका एक पहिया फट गया, जिसके कारण ट्रेक्टर एक ओर को झुक गया तथा ट्रेक्टर पर गन्नों के ऊपर बैठा क्लीनर रतन सिंह रावत गन्नो के साथ ३० फुट की ऊंचाई से पुल के नीचे जा गिरा !
ट्रेक्टर चालक घवरा कर मौके से भाग गया ! कोई भी घायल क्लीनर की मदद को आगे नही आया ! सबको पुलिस जांच में फंसने तथा गवाही के लिये कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने का भय था ! किन्तु एक स्वयंसेवक श्री निखिल पाल घायल नव युवक को कंधे पर लादकर डॉक्टर के क्लीनिक तक लेकर गए तथा उनके सुझाव पर दो अन्य स्वयंसेवक श्री हरीश जैन वा दीपक चौधरी की मदद से घायल को रिक्शे में अस्पताल पहुंचाया गया ! परिजनों के आने तक उसका इलाज करबाया तथा देखभाल की ! तब तक कमलेश जी व कुछ अन्य स्वयंसेवक भी बहां पहुँच गए ! बाद में घायल नवयुवक के परिजन आये ! वे आज भी संघ स्वयंसेवकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं !
१४ नवम्बर १९७५ से संघ द्वारा पूरे देश में आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह की योजना बनाई | भिंड में भी जत्थे सर्व श्री रसाल सिंह, केशव सिंह भदौरिया और रणवीर सिंह भदौरिया "भोला भाई साहब" के नेतृत्व में निकले |
आपातकाल ख़तम करो, इंदिरा तेरी तानाशाही नही चलेगी, मीसावंदी रिहा करो जैसे नारे गुंजाते इन लोगों के साथ भय के उस माहौल में भी सेंकडों की संख्या में आमजन शामिल थे |
कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन करते इस माहौल से प्रभावित होकर एक शासकीय कर्मचारी रतीराम जाटव भी पुलिस लपेटे में आ गया | उस बेचारे का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने नारे लगाते एक कार्यकर्ता को प्रोत्साहित करते हुए एक नया नारा सुझा दिया था |
पुलिस को लगा कि यही वास्तविक नेता है जो स्वयं पीछे रहते हुए सत्याग्रहियों को मार्गदर्शन दे रहा है | फिर क्या था बेचारे पूरे १५ महीने अकारण ग्वालियर केन्द्रीय काराग्रह की हवा खाते रहे |
संयोग से रतीराम जी की पत्नी का नाम रामरती था, जिनको याद करते गमजदा रतीराम जी मीसावंदियों के करुणा दया के साथ हँसी मजाक के भी पात्र थे |•
भिंड में संघ कार्यालय को प्रशासन द्वारा सील्ड कर दिया गया था | जब आन्दोलन प्रारम्भ हुआ तब साइक्लोस्टाइल मशीन से हस्तलिखित स्टेंसिल द्वारा जन जागरण हेतु पर्चे छापने का तय हुआ | किन्तु समस्या थी कि इस छोटी सी किन्तु उपयोगी मशीन को रखा कहाँ जाए | क्योंकि कार्यकर्ताओं के यहाँ रखने पर उसके पकडे जाने और परिवार को परेशान होने की आशंका थी |
तब स्वयंसेवकों ने एक अद्भुत उपाय सोचा | कार्यालय के बगल में स्थित श्री रामनारायण गुप्ता के मकान की छत से कार्यालय की छत पर और बहां से जीने उतरकर कार्यालय में अन्दर पहुंचा गया | और बाहर से सील्ड कार्यालय के ही एक कमरे में स्वयंसेवकों का छोटा सा छापाखाना शुरू हो गया |
अधिक सुरक्षा की दृष्टि से उपयोग करने के बाद उस कमरे को ताला लगा दिया जाता था | छपे हुए जन जागरण के पर्चों को रात के समय घरों में और नगर की दुकानों में डाल दिया जाता था |
आपातकाल के विरुद्ध जन आक्रोश निर्मित करने में यह अभियान अत्यंत उपयोगी साबित हुआ | पर्चे छापने से लेकर उन्हें वितरित करने में सर्व श्री सुरेश जैन, छेदी लाल जैन, सुशील गुप्ता, नरेंद्र जैन सहित दस स्वयं सेवकों की टोली रहती थी |....(जारी)☺☺
ट्रेक्टर चालक घवरा कर मौके से भाग गया ! कोई भी घायल क्लीनर की मदद को आगे नही आया ! सबको पुलिस जांच में फंसने तथा गवाही के लिये कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने का भय था ! किन्तु एक स्वयंसेवक श्री निखिल पाल घायल नव युवक को कंधे पर लादकर डॉक्टर के क्लीनिक तक लेकर गए तथा उनके सुझाव पर दो अन्य स्वयंसेवक श्री हरीश जैन वा दीपक चौधरी की मदद से घायल को रिक्शे में अस्पताल पहुंचाया गया ! परिजनों के आने तक उसका इलाज करबाया तथा देखभाल की ! तब तक कमलेश जी व कुछ अन्य स्वयंसेवक भी बहां पहुँच गए ! बाद में घायल नवयुवक के परिजन आये ! वे आज भी संघ स्वयंसेवकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं !
१४ नवम्बर १९७५ से संघ द्वारा पूरे देश में आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह की योजना बनाई | भिंड में भी जत्थे सर्व श्री रसाल सिंह, केशव सिंह भदौरिया और रणवीर सिंह भदौरिया "भोला भाई साहब" के नेतृत्व में निकले |
आपातकाल ख़तम करो, इंदिरा तेरी तानाशाही नही चलेगी, मीसावंदी रिहा करो जैसे नारे गुंजाते इन लोगों के साथ भय के उस माहौल में भी सेंकडों की संख्या में आमजन शामिल थे |
कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन करते इस माहौल से प्रभावित होकर एक शासकीय कर्मचारी रतीराम जाटव भी पुलिस लपेटे में आ गया | उस बेचारे का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने नारे लगाते एक कार्यकर्ता को प्रोत्साहित करते हुए एक नया नारा सुझा दिया था |
पुलिस को लगा कि यही वास्तविक नेता है जो स्वयं पीछे रहते हुए सत्याग्रहियों को मार्गदर्शन दे रहा है | फिर क्या था बेचारे पूरे १५ महीने अकारण ग्वालियर केन्द्रीय काराग्रह की हवा खाते रहे |
संयोग से रतीराम जी की पत्नी का नाम रामरती था, जिनको याद करते गमजदा रतीराम जी मीसावंदियों के करुणा दया के साथ हँसी मजाक के भी पात्र थे |•
भिंड में संघ कार्यालय को प्रशासन द्वारा सील्ड कर दिया गया था | जब आन्दोलन प्रारम्भ हुआ तब साइक्लोस्टाइल मशीन से हस्तलिखित स्टेंसिल द्वारा जन जागरण हेतु पर्चे छापने का तय हुआ | किन्तु समस्या थी कि इस छोटी सी किन्तु उपयोगी मशीन को रखा कहाँ जाए | क्योंकि कार्यकर्ताओं के यहाँ रखने पर उसके पकडे जाने और परिवार को परेशान होने की आशंका थी |
तब स्वयंसेवकों ने एक अद्भुत उपाय सोचा | कार्यालय के बगल में स्थित श्री रामनारायण गुप्ता के मकान की छत से कार्यालय की छत पर और बहां से जीने उतरकर कार्यालय में अन्दर पहुंचा गया | और बाहर से सील्ड कार्यालय के ही एक कमरे में स्वयंसेवकों का छोटा सा छापाखाना शुरू हो गया |
अधिक सुरक्षा की दृष्टि से उपयोग करने के बाद उस कमरे को ताला लगा दिया जाता था | छपे हुए जन जागरण के पर्चों को रात के समय घरों में और नगर की दुकानों में डाल दिया जाता था |
आपातकाल के विरुद्ध जन आक्रोश निर्मित करने में यह अभियान अत्यंत उपयोगी साबित हुआ | पर्चे छापने से लेकर उन्हें वितरित करने में सर्व श्री सुरेश जैन, छेदी लाल जैन, सुशील गुप्ता, नरेंद्र जैन सहित दस स्वयं सेवकों की टोली रहती थी |....(जारी)☺☺


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