आज से एक नई श्रृंखला प्रारम्भ कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ विश्व का सबसे बड़ा गैर-राजनीतिक संगठन है जिसके सेवाभावी स्वयंसेवक सदैव जाति धर्म पंथ के भेद से ऊपर उठ कर अपना कार्य करते रहे हैं। संघ के चिंतन समर्पण एवं सेवा कार्यों के मूल में है स्वयं सेवकों की संघ निष्ठा एवं आत्म समर्पण की भावना....!!! आज से इस श्रृंखला में ऐसी ही कुछ घटनायें एवं विचार प्रस्तुत हैं..ताकि हम संघ चिंतन को थोड़ा समझ सकें.....!!☺☺☺
1.१९४३ में द्वारिका प्रसाद तिवारी बैतूल में तहसील प्रचारक थे !
टिमरनी में प्रचारकों की बैठक में पूजनीय गुरूजी भी उपस्थित थे !
सह विभाग प्रचारक मोरोपंत जी पिंगले ने जब संपत ( स्वयं सेवकों का एकत्रीकरण) की आज्ञा दी, उस समय तिवारी जी लघुशंका के लिए खेतों में गए हुए थे !
संपत की आज्ञा सुनते ही वे एकदम दौड़े !
हडबडाहट में उनके पैरों में कांटे भी चुभ गए, किन्तु उन्हें निकाले बिना ही वे जाकर खड़े हो गए !
संपत के बाद मंडल और फिर उपविश और फिर परिचय भी प्रारम्भ हो गया, किन्तु उन्हें कांटे निकालने का अवसर नहीं मिला !
जब द्वारिका प्रसाद परिचय देने खड़े हुए तब गुरूजी का ध्यान उनके पैरों में चुभे हुए बहुत सारे काँटों पर गया !
उन्होंने अचम्भे से पूछा की तुम्हारे पैरों में इतने कांटे चुभे हुए हैं, इन्हें निकाला क्यों नहीं !
तिवारी जी ने इस प्रकार कहा जैसे कुछ हुआ ही न हो कि संपत की आज्ञा हो जाने के कारण निकालने का अवसर नहीं मिला !
गुरूजी ने उदगार प्रगट किये कि “ ऐसे स्वयंसेवकों की ही देश को आवश्यकता है ”!
1.१९४३ में द्वारिका प्रसाद तिवारी बैतूल में तहसील प्रचारक थे !
टिमरनी में प्रचारकों की बैठक में पूजनीय गुरूजी भी उपस्थित थे !
सह विभाग प्रचारक मोरोपंत जी पिंगले ने जब संपत ( स्वयं सेवकों का एकत्रीकरण) की आज्ञा दी, उस समय तिवारी जी लघुशंका के लिए खेतों में गए हुए थे !
संपत की आज्ञा सुनते ही वे एकदम दौड़े !
हडबडाहट में उनके पैरों में कांटे भी चुभ गए, किन्तु उन्हें निकाले बिना ही वे जाकर खड़े हो गए !
संपत के बाद मंडल और फिर उपविश और फिर परिचय भी प्रारम्भ हो गया, किन्तु उन्हें कांटे निकालने का अवसर नहीं मिला !
जब द्वारिका प्रसाद परिचय देने खड़े हुए तब गुरूजी का ध्यान उनके पैरों में चुभे हुए बहुत सारे काँटों पर गया !
उन्होंने अचम्भे से पूछा की तुम्हारे पैरों में इतने कांटे चुभे हुए हैं, इन्हें निकाला क्यों नहीं !
तिवारी जी ने इस प्रकार कहा जैसे कुछ हुआ ही न हो कि संपत की आज्ञा हो जाने के कारण निकालने का अवसर नहीं मिला !
गुरूजी ने उदगार प्रगट किये कि “ ऐसे स्वयंसेवकों की ही देश को आवश्यकता है ”!


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें