निर्मल अतीत है जगतवन्द्य,पर विकृत होता वर्तमान ।
आगत अंधियारों में डूबा,फिर भी मेरा भारत महान।।
इन उचे महलों तले दबीं हैं,पावन बूंद पसीने की।
उन दर्द भरी आहों में चाहें छुपी हुई हैं जीने की।।
कोई खा खा कर मरे, कोई मोहताज है दाने दाने को।
जब चमन हुआ जल कर वीरां,आते हैं जश्न मनाने को।।
बुनियादी चाह सभी की है,रोटी कपडा और इक मकान।
वो भी न मयस्सर है सबको, फिर भी मेरा भारत महान।।
जिनके हैं कत्लेआम, लूट, झगडे, दंगों में नाम बडे।
पाने को टिकट चुनावी सबसे आगे सीना तान खडे।।
भूखे मरते वसुधा सुत, मस्तक पर है आतंकी साया।
जनतन्त्र लोकहित की बातें करके सबका दिल बहलाया।।
वोटों की खातिर बेच दिया,गुण्डों के हाथों स्वाभिमान।
जनसेवा एक मजाक बनी, फिर भी मेरा भारत महान।।
नौजवां देश का चौराहों पर वक्त कीमती खोता है।
जिसको भी देखो आज उसी के दिल को कुछ कुछ होता है।।
निस्तेज नयन, सूखे चेहरे गुंजाइश दिल में नहीं जरा।
किससे जा कर फरियाद करें,कानून हुआ गूंगा बहरा।।
गोली की गूंज धमाकों को सुन सुन कर बहरे हुए कान।
लाखों विधवाऐं सिसक रहीं फिर भी मेरा भारत महान।।
हम नई सदी में उम्मीदों के ख्वाब सजाते आए हैं।
कन्यावध छूआछूत दम्भ की भी सौगातें लाए हैं।।
मानव विकास छू रहा चरम, पर अपनी चाल खरामा है।
गांधी गौतम गुम हुए आज के हीरो बुश ओसामा हैं।।
नव पीढी को गत गौरव का मन में किंचित भी है न ध्यान।।
उपभोगवाद ही लक्ष्य बना, फिर भी मेरा भारत महान।।
नारी बाजारू चीज बनी,कहलाती जग की माता है।
पूजा करके अपमान करें,कैसा अजीब ये नाता है।।
रुपयों की खातिर इक बेटी, घर का ईंधन बन जाती है।
उत्पीडित होती, दुःख पाती, दर दर ठुकराई जाती है।।
उस शक्ति रूपिणी की दुर्गति का नहीं किसी को रहा ध्यान।
धरती का धीरज डोल रहा, फिर भी मेरा भारत महान।।
कुरसी ही पहला धर्म आज, कुर्सी ही मोक्ष विधायक है।
नेताजी का सर्वस्व यही, सत्ता सुख की परिचायक है।।
कुर्सी न हटे इसलिए आज भारत को बांटा जाता है।
जो सबसे बडा लुटेरा हो वो जन नायक बन जाता है।।
पुंसत्वहीन सा ताक रहा कोने में सिमटा संविधान।
भक्षक ही भाग्य विधायक हैं, फिर भी मेरा भारत महान।।
विश्वास रुद्ध,नव युवा क्रुद्ध,अवरुद्ध हो गया आत्म ज्ञान।
सारा कौशल घर भरने में, फिर भी मेरा भारत महान।।
निर्मल अतीत है जगतवन्द्य,पर विकृत होता वर्तमान ।
आगत अंधियारों में डूबा,फिर भी मेरा भारत महान।।
निर्मल अतीत है जगतवन्द्य, अनुदिन उज्ज्वल है वर्तमान।
भवितव्य भव्य और दिव्य प्रबल,ऐसा मेरा भारत महान।।
आचार विचार अनोखे लेकिन सहयोगी व्यवहार यहां।
क्षमता रुचिता के साथ किया करते हम नया सुधार यहां।।
शिव शक्ति विष्णु गणपति रवि के हम सनातनी हैं आराधक।
हम विश्व ग्राम ही नहीं पूर्ण वसुधा कुटुम्ब के संवाहक।।
जल अग्नि शून्य या पवन भूमि पशु पक्षि मनुज को दिया मान।
हैं विविध वर्ण पहचान एक, ऐसा मेरा भारत महान।।
कायर बन कर अपमान हुआ है कभी न यहां अहिंसा का।
अन्यायी अत्याचारी को देते उत्तर हम हिंसा का।।
उद्रेक भाव का हो लेकिन रहता विवेक का ध्यान सदा।
निज धर्म कर्म से डिगा न पाती है हमको कोई विपदा।।
नम्रता प्रेम का कोष किन्तु सर्वोपरि अपना स्वाभिमान।
दुश्मन को भी है न्याय दिया ऐसा मेरा भारत महान।।
इस्लाम पारसी जैन बौद्ध सिख हों या फिर हों ईसाई।
हित हेतु लिया जिसने जो पथ, हर राह प्रेम से अपनाई।।
वह चैत्य चर्च हो या मन्दिर,मस्जिद हो या हो गुरुद्वारा।
हैं सभी शान्ति के शुभ निकेत,सबको अपना ही स्वीकारा।।
अवतार मसीहा सन्त नबी, सबकी बानी में एक तान।
हर बिखरे का अवलम्ब बना, ऐसा मेरा भारत महान।।
निज कर्म गुणों का आश्रय ले, बांटे हैं हमने चार वर्ण।
पोषक तोषक इक दूजे के,वह शूद्र वैश्य हो या सवर्ण।।
हों भिन्न वृत्ति व्यापार भिन्न,कोई न बना है कहीं भार।
सहयोगी हैं सब आपस में,मिलता न किसी को तिरस्कार।।
हम एक पिता की संतानें,चिन्तन व्यापक यह दिव्य ज्ञान।
है वर्ग भेद से पूर्ण मुक्त, ऐसा मेरा भारत महान।।
बहु शक्ति सिद्धि अरु ़़़ऋद्धि लब्धि में वृद्धि निरंतर है पाई।
शुभ ज्ञान कर्म विज्ञान योग में आज विश्व है अनुयाई।।
निज आत्म शक्ति है प्रबल, आज हम नहीं व्यक्ति के दास बने।
अब छोड दिए अवलम्ब सभी, खुद किए पूर्ण सारे सपने।।
ले कर सबको हम चले साथ, गीता बाइबिल हो या कुरान।
ग्रहणीय तत्व लेता सबसे, ऐसा मेरा भारत महान।।
हों ब्रहमचर्य दाम्पत्य प्रेम,या वानप्रस्थ सन्यास धर्म।
समयोजित सबका दिव्य भाव,है यही हमारा शक्ति मर्म।।
अध्ययन कभी गृहकर्म कभी विश्रान्ति कभी मुनि कर्म किए।
हर कर्म किया कर्तव्य मान परिपूर्ण शान्ति सन्तोष लिए।।
इसलिए आज कहलाता है भारत देवों का दिव्य दान।
उत्कृष्ट अतुल अनुपम अभिनव, ऐसा मेरा भारत महान।।
विश्वास प्रबल, नव युवा सबल,सम्बल है अपना आत्मज्ञान।
है चरम बिन्दु पर हर कौशल ,ऐसा मेरा भारत महान।।
.....कौशलकिशोरभट्ट 15/12/2002 9बजे रात्रि

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