रिश्तों सी पाक वक्त सी बेबाक बेटियां।
मां का दुलार बाप की हैं नाक बेटियां।।
धागों से बुने मखमली गदराये शाल सी,
लगती हैं कभी घूमता सा चाक बेटियां।।
पकनेे पे कटे धान सी बिखरी है जिन्दगी।
जड से हटाया फिर नई जमीं पे जा लगीं।।
मन्दिर की घण्टियों सी सुबह के अजान सी,
रूहों का नूर हैं ये कुदरत की बन्दगी।।
उड कर कटी पतंग सी गिरती हैं बेटियां।
ख्यालों पे हरसिंगार सी झरती हैं बेटियां।।
बदली में इन्द्रधनुष सी सतरंगी छटा हैं।
बूंदों को समोए हुए ये काली घटा हैं।।
चकरी सी घूमती हैं खिंचे दायरों में ये,
खुद से ही फूटती हैं ये बरगद की जटा हैं।।
चौसर की गोटियों सी हैं पाबन्द बेटियां।
खाई में या शिखर में बनीं द्वन्द बेटियां।।
ये बूंद हैं शहद की ये शीरे की चाशनी।
चूल्हे की रोटियों सी ये अधकच्ची अधबनी।।
वो छांह गमों की हो या खुशियों की खिली धूप,
गैरों में भी मगन तो कभी खुद से अनमनी।।
जलते दिये की सुलगती बाती हैं बेटियां।
कच्ची उमर के प्यार की पाती हैं बेटियां।।
सावन की बूंद सी कभी बिजली की चमक सी।
नेमत हैं ये खुदा की,हैं पायल की खनक सी।।
पतझड हैं कभी तो कभी गुल हैं बहार हैं,
महफूज प्यार पाने के पैदाइशी हक सी।।
लाती हैं नई राह नई चाह बेटियां।
जाने पे छोड जातीं घुटी आह बेटियां।।
बेटी है घर का नूर और कुल की आन है।
बेटी के बिना स्वर्ग भी लगता मसान है।।
बेटी है नहीं बोझ, तरन्नुम है सोज है,
बेटी हमारा आखिरी दीन-ओ-ईमान है।।
गम और खुशी के पल की हैं हमराज बेटियां।
दो-दो घरों की शान और सरताज बेटियां।।
दुनियां में बेटियों की राह रोकने वालो।
हर वक्त बात बात उन्हें टोकने वालो।।
खुद पर खुदा की मार उन्हें मानते हो क्यों,
मसूमियत को आग में, ऐ झोंकने वालो।।
हीरे की चमक मोतियों की खान बेटियां।
विश्वास मां का,बाप का सम्मान बेटियां।।
रिश्तों सी पाक वक्त सी बेबाक बेटियां।
मां का दुलार बाप की हैं नाक बेटियां।।
धागों से बुने मखमली गदराये शाल सी,
लगती हैं कभी घूमता सा चाक बेटियां।।

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