सोमवार, 12 नवंबर 2012

Ghas Ka Swapn..... Ek Phool Ki Jubani

           घास का फूल
शान्त निरभ्र गगन के नीचे फैला था वन एक विशाल।
उन्नत पर्वत खडा हुआ था लेकर अपना गर्वित भाल।।
उस घाटी में बिखरे चारों ओर हजारों प्रस्तर खण्ड।
निर्विकार हो  कर सहते जो वर्षा आतप पवन प्रचण्ड।।
समाधिस्थ सी एक शिला झेला करती मौसम की मार।
उस पर जा असफल हो जाते प्रकृति के प्रत्येक प्रहार।।
उस के तल में बिना सहारे उग आया करती थी घास।
किसी तरह अस्तित्व बचाना उसका होता यही प्रयास।।
शिलाखण्ड का आश्रय ले कर खिलने लगे घास के फूल।
धीरे धीरे बढते जाते बना परिस्थिति को अनुकूल।।
गर्मी हलकी हो जाती रिमझिम सी पावस ऋतु आती।
हर मौसम में यही कहानी फिर फिर दोहराई जाती।।
जाने कितनी बारिश बीतीं और हजारों धूप खिलीं।
अगली पीढी जाग रही थी लुप्त हो रही थी पिछली।।
उस निश्चिन्त सुरक्षा में जी रहे फूल हो कर स्वच्छंद।
वर्तमान आगत अतीत का मन में रखे न कोई द्वन्द।।
रोज सुबह आकर के सूरज उस पत्थर को गरमाता।
उन फूलों से इसी बहाने कानों में कुछ कह जाता।।
एक सुबह अलसाया सूरज जब उचा उठ कर आया।
नया तमाशा उसने देखा चौंक उठा मन भरमाया।।
बहस छिडी पत्थर के नीचे फूल क्रुद्ध उत्तेजित घास।
कभी डांट फटकार सुनाई देती या होता उपहास।।
एक घास का फूल खडा कहता में उपर जाउंगा।
ब्हुत रहा पत्थर के नीचे बन गुलाब मुस्काउंगा।।
रोज यहीं हम पैदा होते और यहीं मुरझाते हैं।
छिपा हुआ जीवन जीते हैं क्या खोते क्या पाते हैं।।
कोई भौंरा कभी न हमको मधु गुंजार सुनाता है।
भूला भटका आ भी जाए तो वापस हो जाता है।।
कोई तितली कभी न हम पर अपनी रंगत बरसाती।
आस पास थोडा मंडरा कर बिन ठहरे ही उड जाती।।
रंग गन्ध से हीन तथा रस से विहीन हम जीते हैं।
ना खुशियों की सुधा बांटते ना गम के विष पीते हैं।।
ये जीवन कैसा जीवन है खुशियों की बरसात नहीं।
बस जीना जीते रहना है नई अनोखी बात  नहीं।।
देखो उस गुलाब को देखो हल्की रंगत मीठी गन्ध ।
रोजसुबह वह खिल उठता है बन्धनमुक्त तथा स्वच्छन्द।।
उसकी मदिर सुगन्ध सभी के मन को बहुत लुभाती है।
मधु लोलुप भौंरों की टोली चक्कर रोज लगाती है।।
मुझको तो गुलाब बनना है,प्यारी गंध अनोखा रंग।
मुझे न अच्छा लगता अपने जीने का यह थोथा ढंग।।
पीली घास डपट कर बोली,क्यों उंचा उडता पगले।
लाखों फूल खिले इस तल में खिले झडे तुझसे पहले।।
परम्परा है यही हमारी,जीवन अपना स्वर्ग यहां।
मूर्ख भटकते फिरते ठोकर खाते रहते जहां तहां ।।
तेरी चाहत नई नहीं है औरों को भी आया ध्यान।
क्या गुलाब यों ही खिल जाते तुझको ये लगता आसान।
कुछ घण्टों का जीवन होता, सुबह खिले मुरझाए शाम।
चारों ओर चुभें जब कांटे किसको मिल पाता आराम।।
कडी धूप में कुम्हला जाता, हवा बिखेरे उसके अंग।
हर मौसम सीने पर झेले, हर कोई करता है तंग।।
अगर किसी के मन भा जाता मस्तक कट जाता तत्काल।
सुइयों से फिर छेदा जाता मौत मिली वो भी बदहाल।।
गले पडे सिर चढे अन्त में पैरों से रौंदा जाये।
थोडी सी खुशबू या रंगत, दर्द भरा जीवन पाए।।
हम पत्थर की जड में बैठे  बिता रहे अपना जीवन।
शान्त चित्त भय मुक्त रहें मचले न कभी अपना ये मन।।
हमें न कोई तोडे कुचले रहें सुरक्षित छाया में।
कष्ट उठाना बु़ि़द्ध नहीं है, क्या रखा इस माया में।।
अब भी क्या तू यही चाहता अपनी सुख सुविधाऐं छोड।
अब भी मन में लगी हुई है क्या गुलाब बनने की होड।।
मुस्काया वह फूल गर्व से बोला फिर सीना ताने ।
किसका जीवन कितना होता ये तो बस प्रभु ही जाने।।
मुझे न मरने का भय किंचित नहीं बडा बनने की चाह।
मुझको तो गुलाब बनना है, हर मुश्किल से हूं आगाह।।
पल दो पल का भी जीवन यदि में गुलाब सा पाउंगा।
ऐसे लाखों जीवन में उस पर निसार कर जाउंगा।।
मुझे लगेगा अपना जीवन आज सही में जी पाया।
मेरा जीवन धन्य हुआ जो भी पाया पूरा पाया।।
आंखों में खुशियां भर दे होठों को दे सच्ची मुस्कान।
गैरों का सम्मान बढाए चाहे घटे स्वयं का मान।।
मैं गुलाब या फूल घास का इसका किंचित नहीं सवाल।
मैं मुसकानों का वाहक बन, हो जाउंगा आज निहाल।।
ऐसा कह कर उसने अपना छोटा चेहरा चमकाया।
एक नई हिम्मत बटोर, उस दुनिया से बाहर आया।।
सूरज की कोमल किरनें बोलीं उसका सिर सहला कर।
स्वागत मेरे छोटे साथी, दूर करो मन से हर डर।।
आओ, कलियों फूलों पौधों की दुनियां में स्वागत है।
वर्तमान जी भर जी लो अब, भूलो जो कि अनागत है।।
है महत्व कुछ नहीं कि तुम कितना लम्बा जी पाओगे।
यह अस्तित्व मिटा कर जग को कितना कुछ दे जाओगे।।
पंछी नदिया पर्वत झरने देखो तुम्हें बुलाते हैं।
जरा गौर से सुनो,तुम्हारे साहस के गुण गाते हैं।।
तुमने समझा जीवन क्या है, कैसे जीया जाता है।
कायर गिनती पूरी करता, सच में कब जी पाता है।
जीवन का हर कतरा खतरा, हर खतरे में है जीवन।
जो संशय में पडा हुआ है, बिखरा है उसका जीवन।
आओ प्यारे मित्र पधारो,स्वीकारो ये अभिनंदन।
आज तुम्हारे नव जीवन पर,सृष्टि कर रही तुम्हें नमन।।
kaushal kishor bhatt



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