जितना जिसका पतन हुआ है उतना ही आकाश छुआ है।
आदम हव्वा की दुनिया, है भुगत रही आदम की गलती।
वर्जित फल चख लेने की क्यों फिर भी हदय लालसा पलती।।
बढते कदमों तले बिखेरे जाते कांटे और अंगारे ।
सच की घुटती सांस न्याय ईमां फिरते हैं मारे मारे।।
जिधर दृष्टि जाती है चारों ओर कुहासा और धुंआ है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
शिक्षा है व्यापार सरे बाजार ज्ञान की करें तिजारत।
नकल माफिया भाग्य विधाता, गरिमा को कर डाला गारत ।।
डिग्री और कलम बिकते हैं, खून मिली बहती है स्याही।
सोच गिर गई कितनी नीचे, वक्त दे रहा आज गवाही।।
लाशों से ही पट पाएगा, जाने कितना गहन कुंआ है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
अपराधों को दें संरक्षण, मठ और मठाधीश ज्यादातर।
सिर चढ कर पाखण्ड बोलता, शासन भी चलता है बच कर।।
योग दवा उद्योग बना है, टी.वी. से मिलता है पोषण।
जेबें ढीली, ख्वाब सुनहरे, श्रद्धा का जम कर है शोषण।।
निर्द्धन चौहद्दी से झांके, धन कुबेर ले रहा दुआ है ।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
पत्रकारिता थी समाज दर्पण, जो होता सच बतलाते।
अब तो भूत प्रेत की जाने कहॉं कहॉं से खबरें लाते।।
ओछी बात खबर कहलाती सच पर डाले जाते परदे।
मीडीया भगवान बना है, कब किसको कैसेे क्या कर दे।।
न्याय सत्य विश्वास दया की आंखों में गड गया सुआ है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
जन समाज के जिन वर्गों पर है रक्षा की जिम्मेदारी।
उन सबने ही कर डाली है हमें लूटने की तैयारी।।
रपट लिखाओ डण्डे खाओ,यही संहिता बनी पुलिस की।
चौराहों पर चाकू चलते, इज्जत यहां सुरक्षित किसकी।।
जो रक्षक, उनसे ही डरता इस समाज का रुआं रुआं है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
यमलोकों की राह दिखाते सारे अस्पताल सरकारी।
संवेदनहीनों के चंगुल में दुगुनी होती बीमारी।।
झूठी जांच नतीजे झूठे नकली पानी मिली दवाई।
किसको अपना दर्द बताऐं बस पैसे की है सुनवाई।।
यहॉं जिन्दगी मिलना या खो देना सबसे बडा जुआ है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
न्याय प्राप्ति की आस लगाये,न्यायालय में पीडित जाते।
वादी प्रतिवादी दोनों के तन के कपडे तक बिक जाते।।
टके टके बिकते सुबूत हैं, बिके गवाही दो पैसे में ।
सच की आंखें मुंदी हुई हैं, कैसे न्याय मिले ऐसे में।।
बरसों में परिणाम निकलता, इनसे तेज चले कछुआ है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
वो सुभाष आजाद भगत सिंह जैसे वीर अमर बलिदानी।
गांधी गौतम महावीर की बस पुस्तक में पढें कहानी।।
आज उठानी वही विरासत जिनको है अपने कन्धों पर।
उनकी हरकत पर शर्मिन्दा हो जाते सर्कस के जोकर।।
भूखी मां बच्चों को बेचे पर इनका फूले बटुआ है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
बूढे जवां बने फिरते हैं,लुटी पिटी सी फिरे जवानी।
आज नग्नता आदर पाती, सुन्दरता का उतरा पानी।।
क्या अतीत है,क्या भविष्य था,है विचार की फुर्सत किसको।
कन्धों पर भारत ढोना, पर टांगें करतीं दर्दे डिस्को।।
भूल गए माटी की खुशबू, कैसी चली हवा पछुआ है।।
जितना जिसका पतन हुआ है0
Kaushal Kishor Bhatt

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