गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

हमारे देश का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा..??


अपने देश का नामकरण भारतवर्ष कैसे हुआ वस्तुतः इसमें तनिक भी विवाद का स्थान नहीं है। स्वायम्भू मनु से ही मानवीय सृष्टि प्रारंभ हुई। 
स्वायंभू मनु अरु शतरूपा।
जिन्ह ते भई नर सृष्टि अनूपा।।(रा.च.म.) 

इनके कनिष्ठ पुत्र थे प्रियव्रत।

उन्होंने रात में भी प्रकाश रखने की इच्छा से ज्योतिर्मयी रथ द्वारा सात बार वसुधा तल की परिक्रमा की। इससे जो रेखाएं बनीं,वहीं सप्तसिंधु बने।

फिर उनके अंतरवर्ती क्षेत्र सात महाद्वीप हुए। यह क्रम से पहले से पहले के दुगुने परिमाण के हैं। 
यह जम्बू, प्लक्ष,शाल्मली, कुश,क्रौंच,शाक तथा पुष्कर नाम से हैं और क्रमशः क्षीरोद इक्षु इत्यादि सागरों से घिरे हैं। 
इस परिमाण को देखते और क्षार समुद्र से आवेष्ठित होने के कारण आज का पूरा भूगोल जंबूद्वीप ही है।
प्रियव्रत के दस पुत्रों में से कवि सवन और महावीर इन तीन के विरक्त हो जाने के कारण शेष सात पुत्र,इन सात द्वीपों के अधिपति हुए। 
इनमें आग्नीध्र जंबूद्वीप के,इध्मजिह्व प्लक्ष के,यज्ञबाहु शाल्मली द्वीप के, हिरण्यरेता कुशद्वीप के,घृतपृष्ठ क्रौंच द्वीप के,मेधातिथि शाकद्वीप के और वीतिहोत्र पुष्कर द्वीप के अधिपति हुए। 
जंबूद्वीप के अधिपति आग्नीध्र के 9 पुत्र हुए। यह थे नाभि, किंपुरुष, हरिवर्ष इलावृत रम्यक हिरण्यमय कुरु भद्राश्व तथा केतुमाल। 
सम विभाग के लिए जम्बू द्वीप को 9 भागों में बांट दिया गया और इनके नाम पर ही इन विभागों के नामकरण भी हुए। 

आत्मतुल्यनामानि यथाभागं 
जंबूद्वीप वर्षाणि बुभुज:।
(श्रीमदभागवत 5/2/21, मार्कण्डेय पुराण 53/31-35, वायु पुराण 33, ब्रह्मांड व कूर्म पुराण के सम्बन्धित स्थल ) 

आठ वर्षों के नाम तो किंपुरुष,हरिवर्ष आदि ही पड़े किंतु जेष्ठ पुत्र का भाग 'नाभि' से 'अजनाभ' हुआ। 
नाभि के एक ही पुत्र ऋषभदेव थे जिनकी गणना भगवान विष्णु के 24 अवतारों में की जाती है।
वे जैन धर्म के आदि  तीर्थंकर भी माने जाते हैं।ऋषभदेव के 100 पुत्र हुए जिनमें गुणों में श्रेष्ठ और ज्येष्ठ थे भरत। 
उनकी अत्यंत लोकप्रियता और।   उनकी अत्यंत लोकप्रियता व सद्गुण शीलता के कारण 'अजनाभवर्ष' से 'भारतवर्ष' नाम चल पड़ा।
इस संबंध में निम्नलिखित प्रमाण भी हैं-

 अजनाभं नामैतद्वर्षम भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति। 
 (श्रीमद भागवत 5/7/3)
 अर्थात इस वर्ष को, जिसका नाम पहले अजनाभ वर्ष था राजा भरत के समय से ही  भारतवर्ष कहते हैं।

भरतो ज्येष्ठ: श्रेष्ठगुण आसीत येन इदम
वर्षं भारतम इति व्यपदिशन्ति।।
(श्रीमद भागवत 5/4/9)

अर्थात उनमें भरत जी सबसे बड़े और अधिक गुणवान थे उन्हीं के नाम से लोग इस अजनाभ खंड को भारतवर्ष कहने लगे। 

तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायण परायण:।
विख्यातं वर्षमेतद यन्नाम्ना भारतमद्भुतम।।
(श्रीमद भागवत 11/2/17)

अर्थात उनमें सबसे बड़े थे राजर्षि भरत।
वे भगवान नारायण के परम प्रेमी भक्त थे। उन्हीं के नाम से यह भूमि खंड जो पहले  अजनाभ वर्ष कहलाता था, 'भारतवर्ष' कहलाया।

ऋषभात भरतो जज्ञे ज्येष्ठ: पुत्र शतस्य स:।
ततश्च भारतं वर्ष मेतल्लोकेषु गीयते।।
(विष्णु पुराण 2/1/28-32)

अर्थात ऋषभ जी से भरत का जन्म हुआ जो उनके सौ पुत्रों में सबसे जेष्ठ पुत्र थे।
तब से यह (हिमवर्ष) इस लोक में भारत वर्ष के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

हिमाह्वम दक्षिणं वर्षं 
भरताय न्यवेदयत।
तस्मात तद भारतं वर्षं 
तस्य नाम्ना विदुः बुधा:।।
(वायु पुराण 33/52,
ब्रह्मांड पुराण 2/14/62)

अर्थात ऋषभदेव जी ने दक्षिण की ओर स्थित वर्ष भरत को सौंप दिया तभी से बहुजन भारत के नाम से इस वर्ष को भारतवर्ष कहने लगे। 

ऋषभो मेरुदेव्यां च ऋषभात भरतोभवत।
भरतात भारतं वर्षं भरतात सुमतिस्त्वभूत।।
(अग्नि पुराण 107/11-12)

अर्थात (हिम वर्ष के शासक नाभि के) मेरु देवी से ऋषभदेव पुत्र रूप में उत्पन्न हुए। ऋषभ के पुत्र भरत हुए। भरत के नाम से भारतवर्ष प्रसिद्ध है। भरत से सुमति हुए।

ऋषभात भरतो जज्ञे 
वीर: पुत्र शताद वर:।
हिमाह्वम दक्षिणं वर्षं 
भरताय पिता ददौ।।
तस्मात तु भारतं वर्षं 
तस्य नाम्ना महात्मन:।।
(मार्कण्डेय पुराण 53/39-41)

अर्थात ऋषभ से भरत का जन्म हुआ था जो कि वीर और अपने भाइयों में सबसे श्रेष्ठ थे। पिता ने दक्षिण की ओर का वर्ष, जिसका नाम हिमालय के नाम पर पड़ा था, भरत को दे दिया। 
इन्हीं महापुरुष के नाम पर उस वर्ष का नाम भारतवर्ष रखा गया।

ऋषभात भरतो भरतेन चिरकालं धर्मेण पालितत्वात इदं भारतं वर्षं अभूत।।
(नारसिंह पुराण 30/7)

अर्थात ऋषभ से भरत का जन्म हुआ, जिनके द्वारा चिरकाल तक धर्म पूर्वक पालित होने के कारण इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

आसीत पुरा मुनिश्रेष्ठ: 
भरतो नाम भूपति:।
आर्षभो यस्य नाम्नेदं 
भारतं खंडमुच्यते।।
(वृहन्नारदीय पुराण पूर्वभाग 48/5)

प्राचीन काल में भरत नाम से प्रसिद्ध एक राजा हुए थे जो ऋषभदेव जी के पुत्र थे और जिनके नाम पर इस देश को भारतवर्ष कहते हैं।

ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीर:पुत्र शताग्रज:।
भरताय य: पित्रा दत्ता प्रातिष्ठता वनं।।
ततश्च भारतं वर्षं तल्लोकेषु गीयते।।
(कूर्म पुराण ब्राह्मी संहिता पूर्व.40/41)

दुष्यंतपुत्र भरत के नाम पर देश का नाम भारत हुआ यह परवर्ती मत है।
दुष्यंत पुत्र भरत तो 6 मन्वंतर और 426 दिव्य युगों के बाद हुए। 
इसके अनंत वर्ष पूर्व ही देश का नाम भारत हो चुका था।
उनके नाम पर क्षत्रियों की एक शाखा भरतवंशी अवश्य विख्यात हुई जिससे अर्जुन आदि को 'भारत' कहा गया है और यह वायु पुराण और महाभारत के इस श्लोक से स्पष्ट होता है- 

भरताद भारती कीर्तियेनेदं भारतंकुलं।
अपरे ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुता।।
(महाभारत आदिपर्व 74/131)

अर्थात भरत से ही इस भूखण्ड का नाम भारत (अथवा भूमि का नाम भारती) हुआ।उन्हीं से यह कौरव वंश , भारत वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उनके बाद उस कुल में पहले तथा आज भी जो राजा हो गए हैं वे भारत (भरतवंशी) ही कहे जाते हैं। भारता:  शब्द बहुवचन है अतः बहुत से मनुष्यों का वाचक है।
कुल तो स्पष्ट है। अभिज्ञान शाकुंतल या अन्य ग्रंथ में भी शकुंतला पुत्र भरत के देश का नामकरण भरत से देश का नामकरण होने की बात नहीं आती है। अतः ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर देश का नाम भारत होना निर्विवाद है।
संदर्भ-:
1.देवी भागवत 8/14/1-28 
2.श्रीमद् भागवत 5/1/33 
3.मार्कंडेय पुराण 53/15-19
4.वायु पुराण 33/3-7 
5.वराह पुराण अध्याय 74
6.कूर्म पुराण अध्याय 8
7.शिव पुराण ज्ञान संहिता 47 
8.स्कंद महापुराण माहेश्वरखंड कुमारिकाखंड अ.31

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