रविवार, 20 फ़रवरी 2022

युगान्तकाल में कलि-धर्म-1(विष्णुपुराण व महाभारत आधार)

हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों एवं पुराणों में कलि-धर्म,अर्थात कलियुग में मानव का जीवन व्यवहार किस प्रकार का होगा, इसका विशद वर्णन किया गया है। इसका संक्षिप्त काव्य प्रस्तुतीकरण किया जा रहा है। इसका पठन-अध्ययन कहीं न कहीं हमें अपने कार्य व्यवहार को अध्यात्म की दिशा में प्रेरित करने एवं हृदय में मानवीय भावों की वृद्धि करने में सहायक होगा ऐसा हमारा विश्वास है। जय श्री राम..!!
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महाराज युधिष्ठिर ने महर्षि मार्कण्डेय से विनम्रता पूर्वक प्रश्न किया-हे मुनिश्रेष्ठ!
इस घोर कलिकाल में-
1.मानव का कैसा बल होगा 
और कैसा आहार विहार? 
क्या होंगे परिधान वस्त्र 
आभूषण, आपस का व्यवहार?? 

2.कलयुग की किस सीमा पर 
फिर वापस सतयुग आएगा?
सतयुग आने तक क्या यह 
मानव स्वरूप बच पाएगा?

3.हे मुनिवर कृपया फिर से 
करिए कलि-धर्मों का वर्णन।
कथा विचित्र लगी है मुझको 
रोचक है व्याख्यान कथन।।

4.ऋषिवर मार्कण्डेय बताने 
लगे उन्हें कलियुग का धर्म।
पांडव और श्रीकृष्ण ग्रहण करते 
ऋषि की बातों का मर्म ।।

5.बालमुकुंद जगत वत्सल की 
कृपा रही मुझ पर भरपूर।
उसी कृपा के कारण माया 
मोह जाल रहते हैं दूर।।

6.अति निकृष्ट कलयुग में मुझको 
जैसा हो पाया अनुभव।
बतलाता हूं सुनो ध्यान से 
वर्णन प्रलय और उद्भव।।

7.सतयुग में मानव चिंतन में 
धर्म नीति का भाव विशेष।
कपट दंभ संयुक्त मनुज शुभ 
जाति धर्म-युत सारा देश।।

8.धर्म वृषभ का रूप लिए 
चारों पग है धारण करता। 
तीनकाल मानव की रहती 
तब धर्मों पर निर्भरता।। 

9.त्रेता युग में धर्म वृषभ के 
पग रह जाते केवल तीन।।
अब अधर्म का एक चरण 
आकर जुड़ जाता धर्म अधीन।। 

10.द्वापर में अनुपात धर्म का 
रह जाता आधा-आधा।
दो-दो चरण अधर्म-धर्म के 
बढ़ने लगती हैं बाधा।।

11.कलयुग में फिर धर्म-वृषभ का 
एक चरण रह जाता है 
तीन चरण लेकर अधर्म 
तब अपना रंग जमाता है।...जारी💐

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