युगान्तकाल में कलिधर्म-2
(विष्णुपुराण व महाभारत आधार)
[क्रमांक-11 से आगे]
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हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों एवं पुराणों में कलि-धर्म,अर्थात कलियुग में मानव का जीवन व्यवहार किस प्रकार का होगा, इसका विशद वर्णन किया गया है। इसका संक्षिप्त काव्य प्रस्तुतीकरण किया जा रहा है। इसका पठन-अध्ययन कहीं न कहीं हमें अपने कार्य व्यवहार को अध्यात्म की दिशा में प्रेरित करने एवं हृदय में मानवीय भावों की वृद्धि करने में सहायक होगा ऐसा हमारा विश्वास है। जय श्री राम..!!
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12.आयु वीर्य बल बुद्धि तेज सब
क्रमशः घटते जाते हैं।
नारी वृद्धा बाल युवा सब
अल्प आयु ही पाते हैं।।
13.ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र
वर्णाश्रम धर्म भुलाते हैं।
धर्म जाल में फंसा मनुज को
अपना काम बनाते हैं।।
14.पंडित कहलाने वाले ही
करते धर्म नीति का त्याग।
उच्च वर्ण सोते रह जाएं
निम्न वर्ण जाएगा जाग।।
15.सत्य हानि होते रहने से
आयु अल्प हो जाएगी
अल्प आयु में जीवन यापन
विद्या नहीं मिल पाएगी।।
16.विद्या बिना ज्ञान से वंचित
सब लोभी हो जाएंगे।
लोभ क्रोध के वश में केवल
भेदभाव भर लाएंगे।।
17.वैर प्रबल होगा तो वह
प्राणों पर भी कर देंगे घात।
लोभ मोह वासना क्रोध की
बिछी रहेगी रोज बिसात।।
18.ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य स्वयं ही
रिश्तो में बंध जाएंगे।
सत्य,तपस्या रहित
शूद्र जैसा ही समय बिताएंगे।।
19.अंतरजातीय कर्म करेंगे
वैश्य समान करें व्यापार।
क्षत्रिय एवं वैश्य हेतु
चांडाल कर्म होगा आधार।।
20.सन के वस्त्र बनेंगे अंबर,
कोदों होगा उत्तम धान्य।
पुरुष नारी सँग करें मित्रता,
मद्य-मांस सब होगा मान्य।।
21.गोवंशों का हो अभाव तो
बकरी बने दुग्ध भंडार।
जो व्रत-मय जीवन जीते
उनमें भी होगा लोभ अपार।।
22.लूटमार चोरी बटमारी
ही बन जाएंगे व्यापार।
जप तप रहित मूढ़ मानव सब
रखे नास्तिक बुद्धि विचार।।
जारी...!!
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