तब बीकानेर एक रियासत थी जिसके राजा शार्दूल सिंह थे। शार्दूल सिंह अंग्रेजों की नीतियों का समर्थन करते थे जबकि बीरबल सिंह ने बचपन से ही सामंती अत्याचारों का विरोध किया और नागरिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय बीरबल सिंह बीकानेर प्रजामंडल के सदस्य थे। उनदिनों राज्य की ओर से प्रजामंडल के अधिवेशनों के आयोजन पर तो कोई प्रतिबंध नहीं था लेकिन तिरंगा झंडा फहराने पर कठोर प्रतिबंध था। रियासत की ओर से यह प्रतिबंध तोड़ने पर कठोर सजा का ऐलान भी किया गया था इसके बावजूद 30 जून 1946 को राज्य के आदेश की अवहेलना करके शहर में तिरंगा लेकर जुलूस निकाला गया, जिसमें बीरबल सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
सिपाहियों ने जुलूस को घेर लिया और लोगों पर लाठियां बरसाने लगे। बीरबल सबसे आगे चल रहे थे इसलिए पुलिस के निशाने पर सबसे ज्यादा वही रहे। लाठियों की मार इतनी जबरदस्त थी कि तंदुरुस्त होने के बावजूद वीरबल सिंह की बांई भुजा लहूलुहान हो गई। इसके बावजूद आजादी के दीवानों का जोश कम नहीं हुआ व भीड़ भारत माता की जय तथा इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने लगी।
जब प्रशासन ने देखा कि पुलिस की लाठियां भी इन दीवानों का रास्ता नहीं रोक पा रही तब सेना के जवानों ने जुलूस पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी। बीरबल सिंह की जांघ में तीन गोलियाँ लगी फिर भी वह तिरंगा थामेआगे बढ़ते रहे। उनके शरीर से निरन्तर खून बह रहा था और काफी गंभीर स्थिति में उन्हें चारपाई पर टांग कर अस्पताल ले जाया गया था।तब भी वह हाथ में तिरंगा थामे हुए थे। अस्पताल में मौजूद चिकित्सक उस दशा में भी उनकी हिम्मत देखकर दंग थे। अचेत होने से पहले उन्होंने अपने एक क्रांतिकारी साथी को तिरंगा सौंपते हुए कहा कि अब इसके सम्मान की जिम्मेदारी तुम्हारी है।
1 जुलाई 1946 को अचेत अवस्था में ही बीरबल सिंह ने सदा के लिए आंखें मूंद लीं। वह जीनगर समाज के प्रथम बलिदानी थे। उसी दिन अमर बलिदानी का जुलूस निकाला गया जिसमें आजाद हिंद फौज के कर्नल तिरंगा झंडा लेकर सबसे आगे चल रहे थे। तिरंगे के लिए अपना जीवन कुर्बान कर देने वाले वीरबल सिंह ढालिया को लोगों और समाज ने याद रखा है। रायसिंहनगर की रेस्ट हाउस के पास जहां बीरबल सिंह को गोली लगी थी उनकी स्मृति में संगमरमर की एक प्रतिमा स्थापित की गई है। हर साल 30 जून और 1 जुलाई को वहां शहीद मेला लगता है जिसमें दूर दूर से लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए आते हैं। श्रीगंगानगर के मुख्य चौक में बलिदानी बीरबल सिंह की मूर्ति स्थापित की गई है जिसे शहीद बीरबल चौक कहा जाता है। वीरबल सिंह के नाम से वहां एक बगीचा भी है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें