युगान्तकाल में कलिधर्म-3
(विष्णुपुराण व महाभारत आधार)
[क्रमांक-22से आगे]
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हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों एवं पुराणों में कलि-धर्म,अर्थात कलियुग में मानव का जीवन व्यवहार किस प्रकार का होगा, इसका विशद वर्णन किया गया है। इसका संक्षिप्त काव्य प्रस्तुतीकरण किया जा रहा है। इसका पठन-अध्ययन कहीं न कहीं हमें अपने कार्य व्यवहार को अध्यात्म की दिशा में प्रेरित करने एवं हृदय में मानवीय भावों की वृद्धि करने में सहायक होगा ऐसा हमारा विश्वास है। जय श्री राम..!!
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23.सरिता तट को खोद-खोद कर
कृषि हो पाए कठिन प्रयास।
शुष्क भूमि रसहीन धान्य में
फल का हो केवल आभास।।
24.जो परान्न-त्यागी व्रतधारी
वे भी करें श्राद्ध भोजन।
देव यज्ञ दक्षिणा-लोभ से
विचलित हो उनका भी मन।।
25.पिता पुत्र की,पुत्र पिता की
शैया का करते उपभोग।
भक्ष्य-अभक्ष्य विचार न होगा
भोजन में सब कुछ उपयोग।।
26.व्रत और नियम त्याग वेदों के
निंदक द्विज बन जाएंगे।
घोर कुतर्की बन यज्ञों से
अपना चित्त हटाएंगे।।
27.नीच कर्म सारे अपनाकर
तर्क-वाद पर होगा जोर।
जो जितनाही कुटिल कुतर्की
उतना वह होगा सिरमौर।।
28.गोचर भूमि हड़प कर उस पर
मनुज करेंगे कृषि का कर्म।
गाय तथा बछड़े हल जोतें,
इससे बढ़कर नहीं अधर्म।।
29.गाय दुधारू बोझा ढोवें
छोटे बछड़े खींचे हल।
पिता पुत्र का, पुत्र पिता का
वध कर डालें हो निश्चल।।
30.वंचक आत्म प्रशंसा करके
बातें खूब बनाएंगे।
किंतु वही पाखंडी, जग में
यश और आदर पाएंगे।।
31.यज्ञ और शुभ कर्म जगत से
गायब ही हो जाएंगे।
उत्सव और आनंद-हीन मानव
बस समय बिताएंगे।।
32.विधवाओं असहायों के भी
धन को लूटा जाएगा।
पीड़ित को पीड़ा देने में
तनिक न शरमायेगा।।
33.शारीरिक बल और पराक्रम
क्रमशः होते जाएं क्षीण।
लोभ मोह में डूबे रहकर,
हो उद्दंड, बनेंगे दीन।।
34. वंचक-जन की चर्चा होगी
ठग ही ठग से लेंगे दान।
जो भी जितना कपटी होगा
उसका उतना ही सम्मान।।
35.पाप बुद्धि के राजा
आपस में ही रार मचाएंगे।
प्राण हरण के लिए परस्पर
प्रतिपल घात लगाएंगे।।
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