बुधवार, 2 मार्च 2022

1857 की जन क्रांति या सिपाही विद्रोह(1)

वर्तमान वर्ष स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती का वर्ष है और हम सभी उत्साह पूर्वक इसे अमृत-महोत्सव के रूप में मना रहे हैं। किन्तु अब से 165 वर्ष पूर्व जिस घटना से भारत की स्वतंत्रता की पटकथा लिखना प्रारम्भ हुआ वह हम सब की दृष्टि में या तो धूमिल पड़ती जा रही है या उसे अलग अलग नज़रियों से परिभाषित किया जाता रहा है। इस लेख माला के ज़रिए हम उसी महान क्रांति को याद करने का प्रयास कर रहे हैं।(lionseye1.blogspot.com) 

अठारह सौ सत्तावन का स्वतंत्रता संग्राम एक सामान्य विद्रोह ना होकर तत्कालीन जनता की तत्कालीन ब्रिटिश शासन के प्रति अस्वीकार्यता का सजीव उद्घोष था। वर्तमान समय में इसे नए सिरे से देखने व समझने की आवश्यकता है। यह समझ केवल इतिहासकारों या बुद्धिजीवियों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि समाज में इसका व्यापक प्रसार भी होना चाहिए। 

सबसे पहली बात तो यह है कि 1857 का विद्रोह केवल एक सिपाही विद्रोह नहीं बल्कि लम्बे समय से उबलते एक विशाल जनाक्रोश का परिणाम था,जिसमें समाज के विभिन्न वर्ग सक्रिय रूप से शामिल थे। इसमें किसान, बुनकर, जमीदार, रजवाड़े आदि अनेक ऐसे तबके शामिल थे जो अंग्रेज शासन से प्रताड़ित थे, अतः यह किसी वर्ग विशेष का विद्रोह नहीं बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से के आक्रोश का परिणाम था। 

दूसरी बात यह कही जाती है कि यह विद्रोह सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित था जबकि ऐसा नहीं है। कई ऐतिहासिक जांच पड़तालों ने यह साबित कर दिया है 1857 में देश का एक विशाल हिस्सा इस विद्रोह के प्रभाव क्षेत्र में आ चुका था। उत्तर भारत के साथ-साथ महाराष्ट्र, असम, बंगाल, उड़ीसा और दक्षिण भारत के कई इलाकों में लगभग एक ही समय में विद्रोह की चिंगारी प्रज्वलित हो चुकी थी और जनमानस में यह विद्रोह  स्वतंत्रता संग्राम के प्रखर प्रतीक के रूप में उभर कर सामने आ चुका था। 

तीसरी बात कि जिस तरह की हिंदू मुस्लिम एकता और सहभागिता 1857 के दौरान देखी गई उससे पहले या उसके बाद शायद ही दोबारा दिखाई पड़ी हो। सैनिकों की मिली-जुली लड़ाई और बागियों के फरमान से लेकर प्रतिबंध लगाने तक विद्रोह के दौरान हर स्थान पर हिंदू मुस्लिम एकता का बोलबाला रहा। 

…..और अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्रोह का चरित्र संपूर्ण रूप से राष्ट्रवादी भले ही ना रहा हो लेकिन इसमें आधुनिक राष्ट्रवाद के कई महत्वपूर्ण अंश विद्यमान थे। यह आखिरी विशाल पारंपरिक विद्रोह के साथ साथ पहला आधुनिक विद्रोह भी था और इसे इस मायने में महात्मा गांधी के नेतृत्व में बाद में बीसवीं सदी में लड़े गए राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रदूत के रूप में भी देखा जाना चाहिए। 

हम सब कृतज्ञ भारतीयों की ओर से इस महान क्रांति के महान योद्धाओं को याद करते हुए तथा इस क्रांति में अपने जीवन को बलिदान देने वालों की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए यह गद्य-श्रृंखला प्रारम्भ की जा रही है…!!

आशा है यह आप सभी के लिए न केवल रोचक व ज्ञान वर्धक होगी बल्कि हमारी स्मृतियों में उन क्रांतिवीरों की प्रसुप्त होती यादों को पुनर्जीवित करने में सहायक सिद्ध होगी….!! 

भारत माता की जय 💐💐💐

…..(जारी)

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