बुधवार, 2 मार्च 2022

1857 की क्रांति...प्रेम व सद्भावना का प्रतीक(2)

ऐसा क्या था 1857 में जिससे हमें आज भी प्रेरणा मिलती है और यह हमें आज भी प्रासंगिक लगता है..?? 
इस कहानी की शुरुआत बंगाल के बरहमपुर और बैरकपुर की छावनिओं में हुई थी। जब ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल सेना ने एनफील्ड राइफल को प्रयोग में लाने से इंकार कर दिया था और क्रांति का उद्घोष कर दिया था। विद्रोह के प्रथम शहीद मंगल पांडे को भारत आज भी याद करता है। विद्रोह एवं क्रांति का संदेश एक छावनी से दूसरी छावनी तक आग की तरह फैलता गया और 11 मई की सुबह मेरठ के सिपाही, जिन्होंने अंग्रेजों की हत्या कर दी थी,दिल्ली पहुंच गए। उन्होंने बहादुर शाह जफर द्वितीय से इस विद्रोह का नेता बनने का निवेदन किया और उसी क्षण से इस विद्रोह ने एक क्रांतिकारी युद्ध का स्वरूप ले लिया। 
बहादुरशाह पहले तो हिचकिचाए परंतु बाद में इस युद्ध के प्रतीकात्मक नेता बनने के लिए तैयार हो गए। उन्हें भारत का बादशाह घोषित कर दिया गया और इसी हैसियत से उन्होंने सभी देश के सभी राजाओं और प्रमुखों को पत्र लिखकर एकजुट होकर अंग्रेजी राज को हटाने के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया। विद्रोह हवा की रफ्तार से फैलने लगा। अवध और रोहेलखंड, दोआब व बुंदेलखंड पूर्वी पंजाब- जो आज का हरियाणा है, मध्य भारत और बिहार-ये सभी विद्रोह में उठ खड़े हुए। किसान-जमीदार, तालुकदार पंडित-मौलवी,अमीर-गरीब जैसे सभी लोग... कुछ और होने से पहले क्रांतिकारी हो गए। विद्रोह का तत्कालीन कारण था राइफल की गोलियों में गौ मांस एवं सूअर के गोश्त की चर्बी का उपयोग जो कि हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समुदायों के लिए धर्म विरुद्ध था।इन गोलियों को दांतों से काटकर खोलना पड़ता था जो हिंदुओं और मुसलमानों के लिए समान रूप से घृणास्पद और अपमानजनक था।विद्रोह को पूरे भारत से स्वतः एवं स्वैच्छिक सहयोग मिल रहा था जिससे यह भी साबित हो गया कि भारतीय ब्रिटिश राज से बिल्कुल नाखुश थे।यह बात खुलकर सामने आ गई थी कि अंग्रेजों ने कई वर्गों और समुदायों को अलग कर रखा था। भारत के कर्ज एवं लगान के बोझ से दबे गरीब किसानों की तरफ से सबसे अधिक सहयोग मिल रहा था। विद्रोह को अवध के तालुकदार और राजघराने के परिवारी जन भी मूक सहयोग दे रहे थे क्योंकि वे भी अपनी जमीन और राज्य छिन जाने की तकलीफ में थे। 
कम्पनी प्रशासक इस विद्रोह को बर्दाश्त न कर पाकर अत्याचारों की सभी सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे थे और इस अमानवीय क्रूरता से जनमानस का हृदय भी कम्पनी के प्रति क्रोध से भर गया था। 1757 के प्लासी के युद्ध से 1857 तक के शोषण और दमन चक्र का देश व्यापी विरोध था यह 1857 का विप्लवी संघर्ष...!! यह आग देश के सभी भागों में फैल गई थी जिसकी आंच में गांव और नगर ही नहीं ब्रिटिश शासन भी झुलस गया था। 
देश में सभी क्रांति की चिंगारियां इस व्यापक विद्रोह से पहले से ही भड़कने लगी थी जैसे 1840 के दशक में सिंध के सिख खालसा और तालमीरों का विद्रोह, सन्यासी विद्रोह,नील विद्रोह, अफगान बर्मी और मराठा विद्रोह, मैसूर में हैदरअली व टीपू सुल्तान के विद्रोह, दक्षिण भारत का पोलिगर विद्रोह, और 18वीं शताब्दी में बंगाल के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त विद्रोह।विद्रोह की इन दबी हुई चिंगारियों की भीषण लपट बन गया था 1857 का यह स्वतंत्रता संघर्ष..!! जिसने कि सारे देश में एकता की लहर पैदा कर दी।
इस महान क्रांति के जन नायक मंगल पांडेय, कुँवर सिंह,अमर सिंह,रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और अन्य असंख्य जन साधारण , जिन्होंने आजादी की अलख जगाई, आज भी जन-जन के हृदय में निवास करते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम उन्हें कभी विस्मृत न करें और आने वाली नई पीढ़ी को इनकी महानता से परिचित कराएं...!!
.....(जारी)💐💐

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