1857 की जन क्रांति- गदर या बदलाव की आवाज़?
1857 के विद्रोह को ब्रिटिश इतिहासकारों ने ऐसा सिपाही विद्रोह बताया है जो पूर्णत: स्वार्थ केंद्रित स्थानीय नेतृत्व पर आधारित था और इसमें देशभक्ति का कोई लेश भी नहीं था और ना इसे जन समुदाय का सहयोग प्राप्त था।
भारतीय इतिहासकारों ने लोक संस्कृतियों और जननायकों के कृतित्वों को आधार मानकर और ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रखकर इसका सटीक चित्रण प्रस्तुत किया है कि यह वह विद्रोह था जिसमें फिरंगियों के खिलाफ देश का साधारण जनमानस निर्भीक होकर खड़ा हो गया था।
अंग्रेजों ने इस पूरी लड़ाई को म्यूटनी या गदर बता कर 1857 के इस पूरे स्वाधीनता संग्राम को कुछ विद्रोही तत्वों की नाफरमानी तक सीमित कर दिया। अंग्रेजों ने इस समर को मामूली घटना बताने के मकसद से मैटकाफ की रिपोर्ट को इतना प्रचारित किया कि अनेक वामपंथी विचारक भी अंग्रेजों के इसी
कुप्रचार के प्रभाव में आ गए।
दुर्भाग्य से भारत में इतिहास लेखन की स्वस्थ परंपरा का अभाव रहा है व कथाओं और महाकाव्यों के जरिए ही यह इतिहास रचे गए, इसीलिए 1857 का कोई विधिवत इतिहास हमारे यहां नहीं है। अंग्रेजों को तो 1857 की क्रांति के बारे में किसी भी चर्चा से इतनी चिढ़ थी कि उन्होंने न केवल भारतीयों को इस विषय पर लिखने पर पाबंदी लगा रखी थी बल्कि भारतीयों द्वारा 1857 के योद्धाओं के नामों पर अपनी संतानों के नाम रखे जाने पर भी रोक लगा दी थी। यह तो स्पष्ट है कि इस दौर में भारतीय लेखन प्रकाश में लाया नहीं जा सकता था लेकिन हमारे विद्रोही पूर्वजों ने अपने रक्त से जो इतिहास रचा उसके अक्षर हमारे हृदय पटल पर सदा के लिए अंकित रहेंगे।
साम्राज्यवाद के समर्थक एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के 9 अगस्त 1896 केअंक में इस विषय पर स्पष्ट लिखा गया था कि "यदि कोई व्यक्ति तत्कालीन फ्रांसीसी विद्रोह का समर्थन करता था और संविधान की बात करता था उसे लोहे की बेड़ियों में जकड़ा जाता था तथा उसे क्रूरतम अपराधियों के साथ दंड दिया जाता था। इसी प्रकार 1857 के विद्रोह पर लिखने वाले हर दुस्साहसी भारतीय को इसी प्रकार दंड दिया जाना चाहिए"
किसानों सिपाहियों और पुराने सामन्तों का असंतोष हिंदी पट्टी में फैली लोकगीत और किंवदंतियों में आज भी मौजूद है। भारतीय जनमानस में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश और घृणा वास्तव में बहुत व्यापक थी। अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए जो पशुता दिखाई वह खुद मेटकाफ के परिश्रम से तैयार तर्कों का खंडन करने को काफी है कि "यह क्रांति नहीं सिर्फ धर्मांध सिपाहियों की धार्मिक असहिष्णुता का विस्फोटमात्र था। "
क्रांति के बारे में कई भारतीय इतिहासकारों ने भी विचार व्यक्त किए हैं कि अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति वास्तव में जेहाद यानि धर्म की रक्षा के लिए लड़ गया युद्ध था किंतु उनके विचारों से सहमत नहीं हुआ जा सकता। क्योंकि उन दिनों धर्म और राजनीति अलग नहीं थे। और अगर यह धर्म की रक्षा का युद्ध था तो अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई के दौरान सिपाहियों ने उन्हीं चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग क्यों किया जिनके इस्तेमाल के खिलाफ उन्होंने अंग्रेजों के सामने हथियार उठाये थे।
सत्य तो यह है कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में एक था,जहां से सामान्य जनता के अंदर की देशभक्ति को एक दिशा मिली थी और सबने एकजुट होकर विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने का मन बना लिया था। …..जारी💐
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