1857 की जन क्रांति- आक्रोश के कारण व परिणिति-:
अंग्रेजों ने क्रमशः देश की रियासतों को हड़पने की प्रक्रिया शुरू कर दी ताकि कंपनी शासन की जड़ें मजबूत हो सकें। सन 1849 में अंग्रेजों ने मुल्तान में हुए विद्रोह की सजा पंजाब का राज्य हड़पने के रूप में दी जबकि पंजाब का बालक शासक किसी भी तरह से इस विद्रोह के लिए जिम्मेदार नहीं था।
इसी तरह स्वाभाविक उत्तराधिकारी ना होने के कारण सातारा झांसी और तंजौर के राज्य भी हड़प लिए गए। सन 1856 में अवध राज्य के हड़पे जाने पर देशवासियों को पूरा विश्वास हो गया कि अंग्रेज इस देश में अत्याचार व अन्याय की सभी सीमाओं को पार कर गए हैं।
कंपनी के खजाने में राज्यों का शोषण करके दिनोंदिन वृद्धि होती रही।प्लासी युद्ध से 1857 के विद्रोह के बीच कंपनी ने छोटे-बड़े बीस युद्ध किये और देश के अलग-अलग हिस्सों पर अपना अधिकार जमा लिया। 100 वर्षों में मैसूर,महाराष्ट्र कर्नाटक,तंजौर,बुंदेलखंड,रोहिलखंड हरियाणा, पंजाब और अवध पर कंपनी का शासन हो गया।
इधर कश्मीर से कोचीन तक की रियासतें अंग्रेजी शासन के अधिकार क्षेत्र में आ गई। अवध के हड़पे जाने पर कंपनी सेना में भीतर ही भीतर बहुत असंतोष फैल गया क्योंकि कंपनी की सेना में सैनिकों का तीन चौथाई हिस्सा पूर्वांचल और अवध क्षेत्र से आता था।
अवध पर अंग्रेजी अधिकार से अवध की सेना के 70000 सिपाही बेरोजगार हो गए। इस संदर्भ में लेफ्टिनेंट जनरल इन्स ने कहा था कि "एक सिपाही का बेरोजगार होना, मतलब एक डाकू का तैयार होना था।"
धार्मिक कारण-:
1857 की क्रांति में धार्मिक भावनाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी क्योंकि पूरे देश में यह भावना फैल गई थी कि हिन्दू व मुसलमान दोनों का ही धर्म खतरे में था। यद्यपि अंग्रेज इतिहासकारों ने यह जताने की कोशिश की है कि यह देश रूढ़िवादी परंपराओं और धर्मांधता में जकड़ा हुआ था और इसीलिए यहांके लोग प्रगतिशील अंग्रेजी शासन का विरोध कर रहे थे।
19वीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेज शासक सत्ता के नशे में इतने चूर हो गए थे कि प्राचीन धर्म परायण देश की आस्था पर भी आघात करने लगे थे। देश के साधारण जनमानस के मन में यह बात भी बैठने लगी कि अंग्रेज लोग उनसे ईसाई धर्म को मनवाना चाहते थे।
मेलेसन के अनुसार चर्बी वाले कारतूस तो केवल एक बहाना मात्र था,यह तो वह चिंगारी थी जिसने बारूद के ढेर में आग लगा दी।
हमारे क्रांतिकारी पूर्वजों ने धर्म को अपनी कमजोरी नहीं, शक्ति बनाया ताकि फिरंगी शत्रु का सामना कर सकें। कंपनी के सिपाहियों की एक वाजिब शिकायत यह भी थी कि कंपनी भारतीय सिपाहियों की धार्मिक भावनाओं पर लगातार चोट करती रही थी। सती प्रथा और विधवा पुनर्विवाह के कानून भले ही प्रगतिशील रहे हों लेकिन उस दौर में भारतीयों को यह अपने धर्म और धार्मिक स्वतंत्रता में दखलअंदाजी लगती थी।
कंपनी सरकार ने देश की जनता में सुलगते आक्रोश को कभी समझा ही नहीं और जब ज्वालामुखी फट पड़ा तो उनकी सत्ता ही हिल गई।
स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से दूर रखना भारतीय जनता में असंतोष का एक अन्य प्रमुख कारण था। योग्य स्थानीय लोगों को ऊंचे पदों से दूर रखना भारत के सामान्य जन को भी पसन्द नहीं आया। एक भारतीय के लिए सबसे ऊंचा पद ज्यादा से ज्यादा डिप्टी कलेक्टर और न्यायपालिका में सदर अमीन का ही हो सकता था। यही असंतोष विद्रोह का भी कारण बना। शासकों की तरफ से ऊंचे पदों के लिए स्थानीय लोगों को अयोग्य समझा जाना और उच्च पदों पर केवल अंग्रेजों को ही भर्ती करना असंतोष का प्रमुख कारण बना।
ऐसा नहीं था कि भारतीयों में योग्यता की कोई कमी थी फिर भी अंग्रेज अधिकारी प्रशासनिक ढांचे में उन्हें कोई प्रमुख स्थान नहीं देना चाहते थे।
इस समय महाजन वर्ग का एक संस्था के रूप में उदय होने लगा था।सहारनपुर के मजिस्ट्रेट राबर्टसन 1857 के दौर में भारत के उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में नियुक्त थे। उन्होंने लिखा है "इस देश के किसान वर्ग में हमारे शासन के प्रति घृणा का एक बहुत बड़ा कारण है हमारा महाजन वर्ग को सुविधाएं प्रदान करना व उनको गरीब निर्धन किसानों को कर्ज देने के नाम पर शोषण करने की पूरी छूट देना।
मैंने पाया कि छोटे किसानों के भीतर इन बनियों और महाजनों के प्रति घृणा भरी हुई है क्योंकि हमारी अदालतें भी इन पैसे वाले वर्ग का ही साथ देती हैं।
थार्नली बताते हैं " तालुकदार जमीदार से लेकर किसान वर्ग तक महाजनों के शोषण की भयानक प्रक्रिया के कारण अंदर ही अंदर सुलग रहे थे। ऐसी परिस्थिति में चर्बी वाले कारतूस ने चिंगारी का काम कर दिया।"
तात्कालिक कारण निसंदेह चर्बी वाले कारतूस थे किंतु यह भी सत्य है कि लॉर्ड विलियम बेंटिक, लॉर्ड एम्हरस्ट, लॉर्ड ऑकलैंड,लॉर्ड ऑकलैंड, लार्ड एलिनबरो,लॉर्ड कॉर्नवालिस और लॉर्ड डलहौजी आदि सभी कम्पनी प्रशासकों ने जाने-अनजाने देश की जनता की धार्मिक भावनाओं को अनेकों बार चोट पहुंचाई।
यह विदेशी शासन लोगों की वफादारी पर नहीं बल्कि अपने सैन्य बल पर टिका हुआ था और यही कारण था कि अंग्रेज शासकों ने इंग्लैंड के अन्य युद्धों में प्रयुक्त हथियारों की श्रेष्ठता को देखते हुए नई राइफल बनवायीं और 1856 में भारतीय सेना को दीं। इस रायफल के साथ इंग्लैंड से कुछ कारतूस आये पर बाकी कारतूस यहीं भारत में कोलकाता,दमदम व मेरठ आदि में बनाए जाने लगे। दम दम मेरठ और सियालकोट छावनी में सिपाहियों को चुनकर इसके प्रयोग के प्रशिक्षण के लिए भी भेजा गया।
सब कुछ ठीक चल रहा था पर जब अचानक एक ब्राह्मण सिपाही मंगल पांडे को बताया गया कि इन कारतूसों में जानवरों की चर्बी का प्रयोग किया जा रहा है तो यह खबर जंगल की आग की तरह हर जगह फैल गई और जल्द ही अंग्रेज अधिकारियों को इस विरोध की सूचना मिल गई।
22 जनवरी 1857 को लेफ्टिनेंट राइट ने दमदम हथियार डिपो के अधिकारी अफसर मेजर बान्टीन को इस बात की रिपोर्ट दी और उन्होंने अपने उच्च अधिकारियों को यह सूचना दीकि सभी सिपाहियों ने इस नई राइफल के कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया है और अनुरोध किया है कि चर्बी के स्थान पर मोम तथा तेल का प्रयोग हो। यह तो स्पष्ट है कि सिपाहियों की पहली प्रतिक्रिया धर्म भ्रष्ट होने का भय था, अंग्रेजों के प्रति नाराजगी नहीं किन्तु यहीं कंपनी सरकार से बड़ी चूक हुई कि सिपाहियों की भावना की अवहेलना करते हुए वह इन्ही कारतूसों के प्रयोग पर जोर डालती रही और अंततः वास्तविक विस्फोट का समय आ गया।…(जारी)
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