वह गुफा योजनों बड़ी विशाल।
जीव जंतु विचरण करते थे
भय दायक एवं विकराल।।
412.दूर-दूर तक बस जंगल था,
सूर्य किरण का नहीं प्रवेश।
कुछ भी नजर नहीं आता था,
ऐसा था वह अनुपम देश।।
413.बहुत दूर तक चले गुफा में,
तब पाई प्रकाश की कोर।।
दिव्य भवन शोभा पाता था
पंछी उड़ते चारों ओर।।
414. दैत्यराज मय का निवास था,
प्रभावती थीं तप में लीन।
भोजन जल से स्वागत करके
हमें कर दिया कष्ट विहीन।।
415.तपस्विनी से आदर पाकर
नूतन बल संचार हुआ।
मार्ग पूछ बाहर आए
सागर से साक्षात्कार हुआ।।
416.लवण सिंधु के निकट
मलय दर्दुर और सह्य महागिरि तीन।
सागर का विस्तार लगा तो
उसने नींद भूख ली छीन।।
417.खिन्न व्यथित दुःखपूर्ण हृदय से
बैठे करते गहन विचार।
जीवन की आशाएं छोड़ी
दिखने लगा मृत्यु का द्वार।।
418.सोच रहे हम बार-बार यह
सिंधु अपरिमित जल विस्तार।।
लंका नजर ना आती,कैसे
होगा महा उदधि यह पार।।
419.सिंधु सैकड़ों योजन फैला
महा मत्स्य करते थे वास।
दुर्गमता के कारण सबकी
टूट रही जीवन की आस।।
420.फिर सब ने संकल्प किया-
अब करें यहीं रघुपति गुणगान।
दोनों तरह मृत्यु है तो
कर दें सागर को जीवनदान।।
421. गुणागार प्रभु रामचंद्र की
लीलाओं का करते गान।
प्रभु की कृपा याद की तो
सहसा जटायु का आया ध्यान।।
422.सम्मुख आया भीषण पक्षी
गरुड समान भयंकर काय।
जैसे पर्वत शिखर खड़ा हो
अपने पीछे पंख लगाय।।
423.युक्ति लगाता था वह पंछी,
कैसे सबको खाया जाय।
जो जटायु का नाम ले रहा
पहले वही सामने आय।।
423.मैं अग्रज हूं प्रिय जटायु का
गीधराज संपाती नाम।
पंख जलाये बैठा हूं मैं ,
आहत यहां करूं विश्राम।।
424.मैंने और जटायु ने इक दिन,
सूर्य लोक की ठानी होड़।
हम उड़ चले सूर्य मंडल को
एक दूजे को पीछे छोड़।।
425.जब जटायु को ताप लगा तो
उसने तकी भूमि की राह।
किंतु सूर्य को छूने का
मेरे मन में था अति उत्साह।।
426.सूर्य किरण से पंख जले तो
गिरा भूमि पर मैं आकर।
मरा नहीं, पर घायल था मैं
इस धरती से टकराकर।।
427.गिरि-कंदर में पड़ा हुआ हूं
बचा रहा जीवन नश्वर।
तब से मुझको प्रिय जटायु की
अब तक कोई नहीं खबर।।
428.क्या तुमने उसको देखा है?
कैसा है वह? और कहां?
तब हमने बतलाया,उसका
अनुज जटायू नहीं रहा।।
429.रावण से लोहा लेते,कैसे
कर दिया प्राण उत्सर्ग।
कैसे प्रभु ने दाह क्रिया की
दिया उसे कैसे अपवर्ग।।
430.कैसे सीता हरण हुआ
वह समाचार सब समझाया।
कौन राम हैं! कौन लखन-सिया !
सब का परिचय बतलाया।।
431.सीता के अन्वेषण को हम
निकल पड़े हैं वानर वीर।
किंतु खबर ना मिल पाने से
सभी हो रहे बहुत अधीर।।
432.बोला तब संपाति, वानरो!
मुझको लंका की पहचान।
गिरि त्रिकूट पर बसी,
सुरक्षा है अचूक अतिकुशल विधान।।
433.मैं हूं गीध, दृष्टि मेरी
होती है बड़ी अचूक अपार।
सीता सहित नगर लंका का
मुझको दिखता सागर पार।।
434.सीता निश्चय वहीं मिलेंगी,
करो ना कोई अन्य विचार।
हम सब मिलकर लगे सोचने
कैसे अगम सिंधु हो पार।।
435.जब कोई भी जुटा न पाया
उदधि पार का मन विश्वास।
कृपा आपकी, शक्ति पिता की
मैं कर पाया सफल प्रयास।।
436.सौ योजन सागर को लांघा
किया सिंहिका का संहार।
किया प्रवेश नगर लंका में
जा पहुंचा दशमुख के द्वार।।
437.सीता लंका में रह, करतीं
घोर तपस्या व्रत उपवास।।
जिए जा रही हैं वह लेकर
मन में प्रभु दर्शन की आस।।
438.अंग अंग है मलिन, जटा में
बदल गए घुंघराले केश।
दीन दुखी अति दुर्बल तन-मन
तपस्विनी सा उनका वेश।।
439.निकट गया मैं उनके,
जैसे ही पाया मैंने एकांत।
व्याकुल-मन कृश-काया एवं
प्रभु वियोग में हृदय अशांत।।
440.मेरे मुख से राम कथा सुनकर
उनको आया विश्वास।
दूर हुआ संकोच, बिठाया
तब जाकर के अपने पास।।
441.परिचय दिया, पवनसुत हूँ मैं,
रघुवर का लाया संदेश।
नभ की राह पकड़ कर आया,
अब न रखें मन में भय क्लेश।।
442.राघव लक्ष्मण संग कुशल हैं,
वानरेंद्र हैं उनके साथ।
यह लंका मुट्ठी में उनके
दूर नहीं अब प्रभु का हाथ।।
443.मैं न राक्षसी माया कोई
मैं मारुति, रघुवर का दूत।
माँ! विश्वास करो तुम मेरा
माँ से झूठ न बोले पूत।।
444.सीता बोलीं- मैं अविंध्य के
कहने पर करती विश्वास।
राक्षस कुल के हैं अविंध्य
पर रखें सत्य की सहज उजास।।
445.उनसे ही परिचय मिल पाया,
कैसे हैं सब वानर वीर।
अब तुम राघव को समझाओ
हों वियोग में नहीं अधीर।।
446.चूड़ामणि मेरी ले जाओ,
यह देगी मेरी पहचान।।
प्रभु का नेह छिपा है इसमें
इससे धारण करती प्राण।।
447.प्रभु से कहना, एक कथा की
याद कराई है मैंने।
दिव्य प्रेम की अनुपम गाथा
हृदय बसाई है मैंने।।
448.चित्रकूट में एक काग ने
मुझको जरा सताया था।
प्रभु ने क्रोधित होकर
उस पर हल्का बाण चलाया था।।
449.एक आंख से वंचित करके
उसे आपने छोड़ दिया।
मेरा क्या अपराध बना?
जो मुझसे नाता तोड़ दिया।।
450.गूढ़ कथा का जो रहस्य है
प्रभु लेंगे उसको पहचान।
तुमको मैं आशीष दे रही
बनो धीर योद्धा बलवान।।
451.कृपाराम की बनी रहे
तुम सेवाभाव करो विस्तार।
रामकथा के रहो प्रचारक,
जब तक सकल सृष्टि संसार।।
452.अनुमति लेकर माँ सीता की
मैंने वन के फल खाए।
राक्षस सारे मार भगाए
मुझे पकड़ने जो आये।।
453.रावण का दरबार सजा था,
धन वैभव की थी भरमार।
राक्षस वीर खड़े थे सम्मुख
हाथों में थामे तलवार।।
454.मैं हूं प्रभु का सेवक मुझको
वह तो बांध नहीं पाए।
प्रभु का कार्य पूर्ण करने को
खुद ही बंधन लगवाए।।
455.लंका दहन किया फिर वापस
मां के चरणों तक आया।
चूड़ामणि ले सागर तर कर
प्रभु का शुभ दर्शन पाया।।
456.हनुमत के यह कर्म सुने तो
प्रभु ने किया परम सत्कार।
हे हनुमत! तुम सदा सर्वदा
पाओ भरत सरीखा प्यार।।
457.बड़े बड़े योद्धा बलशाली
दिशा दिशा से वानर वीर।
जुटने लगे वहां पर, जो थे
युद्ध हेतु अत्यंत अधीर।।
458.माल्यवान पर्वत पर लक्ष्मण
संग विराज रहे रघुनाथ।
महाबली सुग्रीव विभीषण
छाया जैसे उनके साथ।।
459.कोटि सहस्त्र सैन्य ले आया
वाली का था ससुर सुखेन।
गज और गवय साथ लाए थे,
एक अरब की भीषण सेन।।
460.गोलांगूल गवाक्ष यूथपति
वानर रण का मतवाला।
छह अरबों की प्रबल सैन्य संग
तट पर आ डेरा डाला।।
461.पर्वतराज गंधमादन पर
इसी नाम का वानर वीर।
दस खरबों की सेना लेकर
आ पहुंचा दुर्दम रणधीर।।
462.दधिमुख पनस महा बलशाली,
उनके योद्धा कई करोड़।
महा-सैन्य लेकर आए,
उनके भी सैनिक थे बेजोड़।।
463.कोटि-कोटि रीछों की सेना
जामवंत नायक बलवान।
राम काज हित चले आ रहे
संख्या का न लगे अनुमान।।
464.पर्वत शिखर सरीखी काया
सिंह गर्जना जैसा नाद।
दौड़ रहे थे इधर उधर और
गरज-तरज करते संवाद।।
465.कुछ वानर थे श्वेत हरित तो
कुछ वानर सिंदूरी लाल।
पकड़ आ गया असुर कहीं तो
चाँटों से कर दें बेहाल।।
466.महा कटक वानर भालू का
मानो उमड़ा सिंधु अपार।
माल्यवान पर्वत पर बिखरा
दिख न रहा था वारापार।।
467.शुभ दिन शुभ नक्षत्र राशि में
शुभ मुहूर्त का बना विधान।
राम नाम उदघोष हुआ और
किया राम-दल ने प्रस्थान।।
468.एक छोर पर खड़े हुए थे
पवन तनय अतुलितबल धाम।
सैन्य-पीठ की रक्षा करते,
लक्ष्मण अविचल रह अविराम।।
469.रघुवंशी प्रभु राम लखन का
चंद्र सूर्य सा अनुपम तेज।
बड़े-बड़े रणदुर्मद रिपु भी,
उनके सम्मुख थे निस्तेज।।
470.शाल-ताल के वृक्ष शिलाएं
वानर दल का थे हथियार।
ऐसा लगे कि सूर्योदय पर
धान खेत देता चमकार।।
471.द्विविद मयंद नील नल अंगद
से संरक्षित वानर सैन।
चली जा रही उत्साहित हो,
मध्य चल रहे राजीव-नैन।।
472.दिग-दिगंत ध्वनि व्याप्त रही थी,
जय रघुनंदन जय श्री राम।
जय लक्ष्मण जय जय कपि नायक
जय बजरंगबली बल-धाम।।
473.मधुमय जल के स्रोत जहां पर
कंद-मूल फल की भरमार।
महासैन्य विश्राम वहां
लेता था मानो उदधि अपार।।
474.ध्वजा पताकाओं से सज्जित
शिविर लगाकर किया पडाव।
सारी सेना हुई व्यवस्थित
सुविधाओं का नहीं अभाव।।
475.वानरपति सुग्रीवराज से
बोले रघुनायक श्री राम।
मित्र हमारी प्रबल सैन्य अब
थक कर यही करें विश्राम।।
476.सम्मुख लहराता है देखो
महा जलधि यह अति गंभीर।
क्या उपाय अब करें कि यह
हो पार, हृदय हो रहा अधीर।।
477.बल अभिमानी वानर बोले-
हम जा सकते सागर पार।
लेकिन कुछ वानर ऐसे भी
जिनका नहीं बने निस्तार।।
478.कोई कहता नाव लगाओ
करो तैरकर सागर पार।
रामचंद्र सुन रहे सभी की
किंतु किया सब से इनकार।।
479.प्रभु बोले यह सारे वानर
सभी नहीं जा सकते पार।
सर्वमान्य योजना बनाएं
जो जन-जन को हो स्वीकार।।
480.इतना बड़ा कटक है, सोचो
हमें चाहिए कितनी नाव।
वानर दल होता है चंचल,
उछल कूद का रखें स्वभाव।।
481.मेरी तिया हरी रावण ने
सागर लंघन मेरा स्वार्थ।
अहित न मैं कर सकूं किसी का,
मुझे से बने मात्र परमार्थ।।
482.नौका से यदि सेना उतरी
बिखर बिखर सब होंगे दूर।
अवसर पा कमजोर जानकर,
शत्रु चोट देगा भरपूर।।
483.करूं सिंधु का आराधन मैं,
पहले होगा यही विचार।
त्याग अन्न-जल पड़ा रहूंगा,
हाथ जोड़ सागर के द्वार।।
484.स्वयं प्रकट होकर यह सागर
या तो मुझे सुझाए राह।
या फिर दिव्य अस्त्र से इसका
मैं रोकूँगा प्रबल प्रवाह।।
485.ऐसा कहकर किया आचमन
व्रत लेकर बैठे श्री राम।
सभी चाहते सरल मार्ग से
सहज सिद्ध हों सारे काम।।
486.नदियों के स्वामी सागर ने
दिए स्वप्न में तब दर्शन।
रत्नाकर जल-जंतु सहित
बोला जय कौसल्या नंदन।।
487.सगर-पुत्र मेरे संवर्धक
एक वंश हम दोनों बन्धु।
कहिए, क्या प्रिय करूं आपका?
शीश झुका कर बोला सिंधु।।
488.बोले रघुपति- हे नदीश! है हमें
पार जाने की चाह।
किंतु अगम विस्तार आपका
नजर न आती कोई राह।।
489.या तो मार्ग दिखाओ या फिर
कर दूंगा मैं पूर्ण विनाश।
नष्ट सभी जल जीव-जंतु हों,
तुम पर उग आएगी घास।।
490.पैदल चलकर मेरी सेना,
तुमको कर जाएगी पार।
मार्ग दिखाते हो या तुम पर
हंसने लगे सकल संसार??
491.काँप उठा वरुणालय,बोला
ऐसी शक्ति न मुझ में राम।
विघ्न बनूं या रोकूं तुम को
या कि बिगाडूँ कोई काम।।
492.यदि मैं तुम से डर कर तुम को
राह दिखाने लगा जरा,
ताकत से सब काम कराने की
पड़ जाए परंपरा।।
493.कोई भी बलवान धनुर्धर
दे देगा मुझको आदेश।
मर्यादा यदि टूटेंगी तो,
तुमको होगा कष्ट विशेष।।
494.देव-शिल्पि का तनय एक
वानर है उसका नल है नाम।
उत्तम भू संरचना करना
उसके वाम हस्त का काम।।
495.कोई तिनका लकड़ी लोहा
या फिर शिलाखंड पाषाण।
उसका हाथ लगे तो जल पर
तैरा करते सत्य प्रमाण।।
496.सेतु बनाओ मुझ पर फिर
ले जाओ सेना को उस पार।
मेरा भी सम्मान बचे और
तुम को याद करे संसार।।
497.यह उपाय बतला कर सागर
वहीं हो गया अंतर्ध्यान।
नल और नील कुशल रचना से
करने लगे सेतु निर्माण।।
498.सागर पर सौ योजन लंबे
पुल का हुआ शीघ्र निर्माण।
नाम रखा नल-सेतु और
सेना ने उस पर किया प्रयाण।।
499.सागर तट पर राम विराजे
रचते थे योजना विचार।
दश-मुख के चंगुल से कैसे
हो अब सीता का उद्धार!!
500.अल्प अवधि वनवास शेष था,
था मस्तक पर, गुरुतर भार।
सीता मुक्त करानी थीं,निज
नीति बुद्धि बल के अनुसार।।
501.लंकापति के अनुज विभीषण
सचिव साथ में लेकर चार।
नभ पथ से आ गए शरण में
करुणानिधि राघव के द्वार।।
502.स्वागत किया राम ने लेकिन
शंकित थे मन में कपिराज।
कहीं भेद लेने की खातिर
आ न गया हो शत्रु समाज।।
503.रावण का भ्राता है इस पर,
कैसे हम कर लें विश्वास?
सोच रहे सुग्रीव, इसे हम
रखें बनाकर प्रभु का दास।।
504.किंतु राम हैं परम विवेकी,
गतिविधि ली दो पल में जांच।
कहा- विभीषण अपने ही हैं,
कभी न आने देंगे आंच।।
505.शरणागत जब हुए भीषण,
उन्हें दिया लंका का राज।
सेतुबंध से एक मास में
पार हुआ कपि सैन्य समाज।।
506.लंका की सीमा में होने लगा
वानरों का उत्पात।
बाग उजाड़े और रखवालों पर
बरसाए घूंसे लात।।
507.राम शिविर में छुप कर आए
शुक-सारण दो नामी दूत।
जाँच रहे थे थाह,सैन्य बल
फैला था चहुँओर अकूत।।
508.सजग विभीषण चतुर सचिव थे,
झट से लिया उन्हें पहचान।
प्रभु के सम्मुख दोनों आए,
क्या हो? इनका दंड विधान।।
509.करुणाकर रघुवर ने उनको,
दिया अभय एवं सम्मान।
सैन्य लिया यदि देख,करो अब
शीघ्र यहां से तुम प्रस्थान।।
510.शुक-सारण प्रभु को प्रणाम कर
पहुंचे रावण के दरबार।
वालि तनयअंगद को प्रभु ने
भेजा,देकर संधि विचार।।
511.सीता को वापस लौटा दो
लंका को क्यों करो अनाथ।
या फिर करना होगा तुमको
काल रूप रण मेरे साथ।।
512.राघव की आज्ञा सेअंगद
पहुंचे रावण के दरबार।
शत्रु-दूत थे असुर वर्ग ने
किया नहीं समुचित सत्कार।।
513.मेघ-घटा में सूर्य-प्रभा से
चमक रहे अंगद रणधीर।
निर्भय खड़े हुए रावण के
सन्मुख वालि-तनय बलवीर।।
514.सचिवों के संग बैठा रावण
अंगद पर थी दृष्टि विशेष।
निर्भय अंगद लगे सुनाने,
रामचंद्र प्रभु का संदेश।।
515.कोसलपति प्रभु महा यशस्वी
राघव का सुनिए संदेश।
नीति नियम का पालन करिये,
विश्वजयी हे असुर नरेश।।
516.जो राजा मन उच्छ्रंखल रख
करता सब पर अत्याचार।
सहज नष्ट हो जाता उसका,
देश धर्म साथी परिवार।।
517.सीता का अपहरण किया यह
केवल मेरे प्रति अपराध।
इसमें जब निर्दोष मरेंगे
चढे शीश पर पाप अगाध।।
518.तुमने बल के अहंकार में,
जो भी किये क्रूर व्यवहार।
संत जनों को मारा,दो पल भी
मन में ना किया विचार।।
519.सचिव संग मारे जाओगे
तुम ही होंगे जिम्मेदार।
सीता वापस करो,संभालो
खुशी-खुशी घर और दरबार।।
520.साहस है तो युद्ध करो, रण में
देखो फिर मेरा बल।
अहंकार को त्याग,सही निर्णय लो
क्यों होते चंचल??
521.ऋषि-मुनियों का वध,
अबला का हरण
मांगता अपना मोल।
काल तुम्हारा खड़ा शीश पर
अब तो लो नयनों को खोल।।
522.सीता को कर दो स्वतंत्र
अन्यथा न बच पाएंगे प्राण।
चौदह भुवन तीन लोको में
कहीं न मिल पाएगा त्राण।।
523.बाण-वृष्टि भीषण जब होगी
राक्षस होंगे हत बल-हीन।
मैं सारी वसुधा के असुरों
को कर दूंगा प्राण विहीन।।
524.अंगद के वचनों से रावण
गुस्से में खो बैठा होश।
चार निशाचर उठे पकड़ने
मन में लिए उमडता जोश।।
525.अंगद उनको लिए दिए ही
पहुंचे महलों की छत पर,
ली जब बड़ी उछाल, निशाचर
आ पहुंचे फिर धरती पर।।
526.महल कंगूरों से होकर फिर
लंका से बाहर आकर।
उत्साहित अंगद आ पहुंचे
फिर सुबेल के पर्वत पर।।
527.समाचार जाकर बतलाए
प्रभु चरणों में किया प्रणाम।
राघव बोले-वीर धन्य तुम!
अब जाओ कर लो विश्राम।।
528.कल से इस भीषण रण में अब
तुम सबका होगा सहयोग।
धर्म युद्ध में करना होगा
एक-एक जन का उपयोग।।
529.लंका नगरी परम सुरक्षित,
सुखद अन्न जल का भंडार।
फल फूलों से लदे वृक्ष थे,
बाग बगीचों का विस्तार।।
530.सागर तट पर लगी छावनी
सैन्य सजग करती विश्राम।
राम दूत अंगद के जाने से भी
ना बदला परिणाम।।
531.युद्ध अवश्यंभावी लगता
सभी संजोते अपना बल।
वानर-दल का बल रघुवर थे,
असुरों का बल उनका छल।।
532.लंका में भी अस्त्र शस्त्र का
संग्रह होने लगा अपार।
परकोटे मजबूत किए
सुदृढ़ करवाए चारों द्वार।।
533.दुर्गम लंका को घेरे थीं
सात खाइयां चारों ओर।
खैर-खूँट खाई में गाड़े
मत्स्य मगर तैरें हर ओर।।
534.गोला वर्षक यंत्र लगे थे
वज्र सरीखे चढ़े किवाड़।
खुला हुआ मैदान सामने,
शत्रु न ले सकता था आड़।।
535.कहीं विषैले सर्प विचरते
लाह धूल पत्थर दीवार।
सक्रिय सैनिक सजग घूमते,
इन्हें असंभव करना पार।।
536.मूसल लाठी बाण गदा
फरसे मुग्दर भाले तलवार।
भांति भांति के प्रक्षेपक थे,
कोटि-कोटि के थे हथियार।।
537.नगर द्वार पर बुर्ज बने थे,
जिन पर रक्षक थे तैनात।
यह 'स्थावर-गुल्म' कहाते,
सजग रहें हरपल दिन-रात।।
538.'जंगल-गुल्म' नाम के सैनिक
पैदल या फिर अश्व सवार।
कोई गज पर गश्त लगाते,
परम चतुर ये पहरेदार।।
539.वानरवीर गरजते पल पल,
गरज तरज भरते हुंकार।
इंतजार कर रहे सुबह का,
कैसे खुलें नगर के द्वार।।
540.अगली प्रातः वायु वेग से
वानर दल ने हल्ला बोल।
पर्वत शिखरों के प्रहार से,
दिया एक परकोटा खोल।।
541.सभी द्वार पर वीर डटे थे ,
पर दुर्गम था दक्षिण द्वार।
लखन विभीषण जामवंत ने
किया भूमि जैसा इकसार।।
542.रीछ वानरों की सेना को
संग में लेकर किया प्रवेश।
लाल श्वेत और काले रंग से
भरा समूचा लंका देश।।
543.वृक्षों जैसी दीर्घ भुजाएं
जांघ,वक्ष ज्यों पर्वत खंड।
कोटि-कोटि रीछो का दल भी
उमड़ा जैसे पवन प्रचंड।।
544.उछल कूद से धूल उड़ रही
सूर्यप्रभा भी लगती क्षीण।
घोर शब्द चीत्कार गर्जना
कानों को कर रही विदीर्ण।।
545.धान्य-पुष्प या उगता सूरज
मौलश्री या सन की डोर।
रंग-बिरंगे अरबों खरबों
वानर विचरें चारों ओर।।
546.शंकित मन से दृश्य देखते,
बालक वृद्ध तथा नारी।
युद्ध महा भीषण था लेकिन,
बड़ी खोखली तैयारी।
547.मणिमय खम्भऔर कंगूरे
वानर गिरा रहे चहुँओर।
हटो-बचो-मारो-काटो का
चारों ओर हो रहा शोर।।
548.गोलाबारी करती तोपें,
वानर देते उन्हें उखाड़।
हाथी मूत्र त्याग देते थे,
सुन कपि-दल की एक दहाड़।।
549.तोप श्रृंग गोलों को वानर,
लंका में दे रहे उछाल।
परकोटे-रक्षक वीरों को
मार-मार करते बेहाल।।
550.राक्षस करने लगे पलायन
रावण का आया आदेश।
जो भी रण से भागेगा
मुझसे पाएगा दंड विशेष।।
551.लाख-लाख के टोल बना कर
निकल पड़े राक्षस विकराल।
वानर दल पर भारी पड़ता
असुर गणों का मायाजाल।।
552.उड़द ढेर से काले निशचर
टूट पड़े वानर दल पर।
परकोटे खाली करवाए
वानर दल से लड़-भिड़ कर।।
553.हुए धराशाई वानर,जब
पड़ी घोर शूलों की मार।
भीषण भगदड़ मची,
पड़े घायल करते थे हाहाकार।।
554.अस्त्र-शस्त्र चुक गए वहां तो
नख और दांत बने हथियार।
बाल पकड़कर नोंच काटकर,
हाथों से ही करें प्रहार।।
555.इतना भीषण युद्ध कि
मरने पर भी छोड़ सके ना हाथ।
कपि और दानव गरज तरज कर
लड़ते एक दूजे के साथ।।
556.बादल जैसे बरस रहे थे
रण में रघुनायक के बाण।
ऐसे बाण कि लंका में भी
घुसकर हर लेते थे प्राण।।
557.श्रम-जेता लक्ष्मण के रण में
बरस रहे भीषण नाराच।
लंका नगरी में जाकर वे बाण
शत्रु को लेते जांच।।
558.भीषण नरसंहार हुआ फिर
सूर्य गये जब अस्ताचल।
युद्ध विराम हुआ लेकिन
असुरों ने दिखलाया छल बल।।
559.तामस चिंतन होता जिनका
तम में हो जाती बल वृद्धि।
असुर रात्रि चर हैं इस गुण की
सारे जग में बड़ी प्रसिद्धि।।
560.असुरों ने फिर वानर दल पर
छुप कर किये प्रचण्ड प्रहार।
शत्रु दृष्टि से ओझल थे तो,
मची सैन्य में चीख-पुकार।।
(अध्याय 284 समाप्त)💐💐
अध्याय 285 प्रारम्भ
561.सूर्य अस्त पर शिविरों में जब
वानर दल ने किया प्रवेश।
क्रूर कुचाली निशाचरों ने
तभी आक्रमण किया विशेष।।
562.पर्वण,पतन,जंभ,हरि,खर और
प्ररुज,क्रोधवश,अनुज,प्रघस।
इन पिशाच मायावी असुरों से
लड़ पाना किसके बस।।
563.छुपकर करते वार निशाचर
वानर दल जब अकुलाया।
कुशल विभीषण ने आगे आ
मोहजाल वह कटवाया।।
564.अंतर्धान कला के माहिर
स्वयं निशाचर उनकी जात।
मायावी असुरों की उन पर
कैसे फिर चल पाती घात।।
565.मायाजाल हटा तो सारे
असुर दृष्टि पथ में आए।
वानर लौट पड़े सारे
जो भाग रहे थे अकुलाए।।
566.दृष्टि-केंद्र में आते ही फिर
वानर वीर महा बलवान।
असुर समूहों के प्राणों को
देने लगे मृत्यु का दान।।
567.असुरों का भीषण विनाश
जब आया रावण के संज्ञान।
भूत पिशाचों की सेना संग
अस्त्रों का करके संधान।।
568.व्यूह-कुशल सेनानायक वह
लिया वानरों को फिर घेर।
वानर दल में भी भगदड़ मचने में
किंचित लगी न देर।।
569.शुक्र नीति से रावण ने जब
किया व्यूह उत्तम निर्माण।
रीति बृहस्पति की अपनाकर
राघव ने भी रचा विधान।।
570.राम दशानन से टकराते
इंद्रजीत से लक्ष्मण वीर।
विरुपाक्ष-सुग्रीव भिड़ रहे
तार-निखर्वट लड़ें अधीर।।
571.पटुश-पनस लड़ते आपस में
नल और तुण्ड भिड़ें ज्यों शेर।
अपने जैसे प्रतिद्वंदी को,
छल-बल से लेते वह घेर।।
572.वीर युद्ध करते आपस में
सूख रहे कायर के प्राण।
अस्त्र-शस्त्र की इस वर्षा में
नहीं किसी को कोई त्राण।।
573.शक्ति शूल तलवार परिघ की
करें परस्पर वह बौछार।
कभी राम आगे होते तो
कभी प्रखर रावण के वार।।
574.महाबली रण कुशल विभीषण
और प्रहस्त करते संग्राम।
महा भयंकर युद्ध चल रहा
पल भर भी न मिले विश्राम।।
575. राम तथा रावण का यह रण
अतुलनीय अनुपम बेजोड़।
मृत्यु-चक्र चल रहा निरन्तर,
पता नहीं क्या लेगा मोड़।।
(अध्याय 285 पूर्ण)
576.जब प्रहस्त ने किया, विभीषण के
मस्तक पर गदा प्रहार।
अविचल रहे विभीषण,उन पर
असर न कर पाया यह वार।।
577.पुन: विभीषण ने प्रहस्त पर
किया शक्ति शर का आघात।
हुआ प्रहस्त धराशायी ज्यों
आंधी में वृक्षों की पांत।।
578.आक्रामक धूम्राक्ष, वानरों पर
हावी हो गया तुरंत।
अभिमानी के सम्मुख आकर
डटे पवन नंदन हनुमंत।।
579.किया पवनसुत का बल पा कर
वानर दल ने पलट प्रहार।
रक्त नदी बह चली भूमि पर,
मचा भयंकर हाहाकार ।।
580.जय रावण कह रहे असुर,
वानर-दल कहता जय श्री राम।
हनुमान-धूम्राक्ष युद्ध से
पल भर भी न हुए उपराम।।
581.इंद्र और प्रहलाद सरीखे
युद्ध कर रहे दोनों वीर।
एक बली इक मायावी
दोनों ही जय को हुए अधीर।।
582.गदा परिघ पट्टिश त्रिशूल से
राक्षस करें चोट पर चोट।
वृक्ष उखाड़ शीश दे मारा
असुर गया धरती पर लोट।।
583.अश्व सारथी एवं रथ को
पत्थर से कर चकनाचूर।
इधर मरा धूम्राक्ष,असुर सेना भी
बिखरी कोसों दूर।।
584.सेनानायक मृत देखा तो
बिखर गया असुरों का दल।
पराक्रमी वानर वीरों ने
असुर शक्ति कर दी विह्वल।।
585.समाचार उस महायुद्ध का
रावण तक पहुंचा तत्काल।
सुनकर सुत का वध,रावण का
हुआ क्रोध से चेहरा लाल।।
586. चिंतित रावण को उस क्षण तब आई कुंभकरण की याद।
सोता था छह मास, महानिद्रा की
थी न कोई मर्याद।।
587.ढोल नगाड़े बजा बजाकर
किया निशाचर को चेतन।
खिला पिला कर मद्य-मांस
संतुष्ट किया उसका तन-मन।।
588.स्वस्थ चित्त वह कुंभकरण
जो स्वयं सत्य ही यम का दूत।
उसे बताई रावण ने
अपनी सारी काली करतूत।।
589.भीषण संकट आ पहुंचा है
भाई अब लंका के द्वार।
'राम' नाम के इस संकट से
तुम्ही दिला सकते निस्तार।।
590.हम भीषण भय में जकड़े हैं,
तुम करते गहरा आराम।
समय आ गया, रण में निकलो
छोड़ो बाकी सारे काम।।
591.सीता है तपसी की पत्नी
मैंने जिसका किया हरण।
उसे छुड़ाने ही यह आया
इसकारण ठाना यह रण।।
592.सेतु बांध लंका तक आया
मारे गए करोड़ों वीर।
कहीं अंग प्रत्यंग पड़े हैं,
छिन्न-भिन्न सड़ रहे शरीर।।
593.तुम्ही शत्रु के संहारक हो
तुम सा कोई नहीं यहां।
अब देखूंगा वानर-भालू
तुमसे बचकर छिपें कहां।।
594.कवच डाल कर निकल पड़ो
इस वनवासी का हो संहार।
मैं रथ पर चढ़कर आगे
रक्षित कर दूंगा दक्षिण द्वार।।
595.वज्रवेग बलवान प्रमाथी
ले कर अपना कटक विशाल।
कुम्भकर्ण के साथ चले,
मस्तक पर लेकर अपना काल।।
(अध्याय 286 पूर्ण) अशेष💐
*श्रीराम कथा-53*
*(महाभारत आधार)*
*अध्याय 287 आरम्भ*
*दि. 14.2.22 सोमवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
596.विजय भाव से भरी हुई थी,
वानर अनी परम विकराल।
युद्ध भूमि में राम लखन भी
आकर खड़े हुए तत्काल।।
597.लाखों वानर कुंभकरण पर
वृक्ष शिला से करें प्रहार।
भीमकाय उस महावीर को
वह लगती फूलों की मार।।
598.कोई नाखूनों से नोचे,
कोई रहा दांत से काट।
कुंभकरण तो जोह रहा था,
रघुवर के आने की बाट।।
599.अट्टहास कर असुर,वानरों को था
बना रहा आहार।
वज्रबाहु, बल तथा चंडबल
वानर गए उदर के द्वार।
600.वाहनों से भयभीत
प्राण रक्षा की लगने लगी गुहार।
कुंभकरण का कर्म देखकर
वानर करते हाहाकार।।
601.निर्भय हो सुग्रीव स्वयं
आ पहुंचे कुंभकरण के पास।
वानरदल भी लौट पड़ा
राजा से मन में बांधी आस।।
602.शाल वृक्ष लेकर कपीश ने
किया असुर पर घोर प्रहार।
कुंभकरण भी सूर्य-तनय को
लेकर चला लंक के द्वार।।
603.राजा का अपहरण देखकर
वानर दल हो गया अधीर।
कुंभकरण से उन्हें बचाने,
आगे हुए लखन बलवीर।।
604.स्वर्ण पंख से सज्जित शर का
लक्ष्मण ने करके संधान।
हृदय विदीर्ण किया,पर इससे
निकल न पाए उसके प्राण।।
605.छूट गए सुग्रीव पकड़ से
टूट पड़ा वह लक्ष्मण पर।
शिलाखंड लेकर जा पहुंचा,
वह रिपु कपिगण के सिर पर।।
606.क्षुर बाणों का कर प्रहार
लक्ष्मण ने काटे उसके हाथ।
चार भुजाएं प्रगट हो गई,
उसके तन पर हाथों-हाथ।।
607.चारभुजा भी काट गिराईं,
उसने तन को किया विशाल।
कई शीश और कई भुजाएं,
प्रकट हुई उसकी तत्काल।
608.ब्रह्म अस्त्र का कर प्रयोग
लक्ष्मण ने अंतिम किया प्रहार।
आहत कुंभकरण जा पहुंचा
उसी समय यम-पुर के द्वार।।
609.प्राण हीन जब कुंभकरण को
देखा सारे राक्षस वीर।
अस्त्र-शस्त्र सब फैंक चले
भय के कारण खो बैठे धीर।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-54*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 16.2.22 बुधवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
610.वज्रवेग और वीर प्रमाथी
दूषण के दोनों भाई।
आकर खड़े हुए रण में
जब देखा सेना अकुलाई।।
611.सिंहनाद कर लक्ष्मण ने
उन पर कर दी बाणों की वृष्टि।
भीषण युद्ध हुआ तीनों में
काँप उठी यह सारी सृष्टि।।
612.वज्र-वेग पर पर्वत लेकर
टूट पड़े बलधर बजरंग।
प्राणहीन हो गिरा भूमि पर,
खंड खंड बिखरे सब अंग।।
613.नील प्रमाथी से टकराये,
वह भी पहुंच गया यमलोक।
विध्वंसक वानर वीरों को
उस पल कोई न सकता रोक।।
614.वनचर भालू वानर दल ने,
असुर गणों को किया विकल।
राक्षस मरते बहुसंख्या में
वानर होते थे घायल।।
615.कुंभकरण का वध सुनकर,
रावण का हृदय हुआ व्याकुल।
धीरे-धीरे घटता जाता
परम यशस्वी राक्षस कुल।।
616.इंद्रजीत से कहा- पुत्र! तुम
रण में उतर पडो तत्काल।
राम लखन सुग्रीव महारिपु,
बन जाओ तुम इनका काल।।
617.इंद्र विजय के बाद पुत्र,
तुमको यह अद्भुत नाम मिला।
तुम हो अतुल अजेय तुम्हें
आती है रण की हर इक कला।।
618.दिव्य अस्त्र से कभी छुपो तो
कभी प्रकट हो जाओ तुम।
मायावी हो कुशल शत्रु पर
अब भारी पड़ जाओ तुम।।
619.तुम जब शस्त्र उठाते हो
देवता न टिकने पाते हैं।
बाणों की वर्षा में केवल
अपने प्राण बचाते हैं।।
620.राम लखन सुग्रीव तुम्हारे
शर को कर पाएं न सहन।
जो अनुयाई हैं उनके
कैसे सह पाए उनका मन।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-55*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 20.2.22 रविवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
621.👍🏼खर दूषण के वध का बदला
तभी चुका तुम पाओगे।
राम लखन दोनों का मस्तक
काट यहां जब लाओगे।।
622.देवराज को जीता एवं
ऊंचा रखा हमारा मान।
रिपुहन्ता बन कर फिर से तुम,
रखो असुर कुल का सम्मान।।
623.रावण से अनुमति लेकर
मायावी रथ पर हो आरूढ़।
निकल पड़ा संग्राम भूमि को
मेघनाद कर्तव्य विमूढ़।।
624.अपना परिचय देकर, लक्ष्मण
को दे दी उसने ललकार।
लक्ष्मण ने भी प्रबल शत्रु की
प्रबल चुनौती ली स्वीकार।।
625. दोनों वीर अप्रतिम थे
दोनों अमर्ष से भरे हुए।
क्या होगा परिणाम?सोच कर
ऋषि मुनि सुरगण डरे हुए।।
(छंद-परिवर्तन)
626.लक्ष्मण के धनु की सुनकर के
टंकार असुरदल काँप गया।
यह युद्ध महा भीषण होगा,
वीरों का दिल यह भांप गया।।
627.छोटे मृग-शावक सिंहों से,
डरते वैसे ही असुर डरे।
लक्ष्मण के तीखे बाणों के
आगे वह रह ना सके खड़े।।
628.दिव्यास्त्र सिद्ध थे दोनों को,
दोनों ही थे अति बलशाली।
दोनों के वार भयानक थे,
हर चोट जा रही थी खाली।।
629.तोमर नाराच परिघ जैसे
हथियार इंद्रजीत डाल रहा।
लक्ष्मण का शर संधान कि
मानो नाच शीश पर काल रहा।।
630.अंगद ने तरु विशाल लेकर,
ललकारा- मुझसे टकराओ।
तब मेघनाद ने कहा- अभी
बालक हो अपने घर जाओ।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-56*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 22.2.22 मंगलवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
631.मस्तक पर हुआ प्रहार किन्तु
किंचित विचलित नहीं कर पाया।
अंगद पर शक्ति प्रहार हुआ,
लक्ष्मण ने पीछे खिसकाया।।
632.दोनों बढ़-चढ़कर लड़ते थे
कोई न कहीं कमजोर पड़ा।
जिसको भी अवसर मिला वहां
वो ही दुश्मन पर जाए चढ़ा।।
633.अंगद ने वृक्ष से चला कर के
सारथी अश्व रथ नष्ट किये।
रथ से नीचे आ मेघनाद ने
मायाजाल विशिष्ट किये।।
634.गायब हो गया असुर जब,तो
रघुवर रक्षक बनकर आए।
वानर सेना को मायावी
कुछ हानि न पहुंचाने पाए।।
635.दैवी अस्त्रों का कर प्रयोग
खुद को वह कहीं छुपाता था।
गायब रह कर ही राम लखन को
बहुत कष्ट पहुंचाता था।।
636.नभ में उड़कर वानर उसको
हर बार खोजने जाते थे।
पर मेघनाथ की माया की
वह काट नहीं ला पाते थे।।
637.बाणों की भीषण वर्षा से,
दोनों के तन न रहे खाली।
आहत होकर आ गिरे वहीं,
जैसे विशाल तरु की डाली।।
638.मायावी चालें चलकर के
राघव को आहत कर डाला।
लक्ष्मण के तन को भी उसने,
विषमय बाणों से भर डाला।।
(अध्याय 288 पूर्ण)💐
अशेष...!!💐💐
*श्रीराम कथा-57*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 24.2.22 गुरुवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
(अध्याय289 प्रारंभ)
639.रावण कुमार ने राम लखन को
महा पाश में बांध लिया।
मन में प्रसन्न होता मूरख
मानो हर कारज साध लिया।।
640.पिंजरे में बद्ध पंछियों से
वे वीर नजर तब आते थे।
उनकी यह दारुण दशा देख
सारे प्रिय जन दुख पाते थे।।
641.बाणों से विद्ध शरीर पड़े
वानर दल खड़ा उन्हें घेरे।
अंगद नल नील सुखेण मैंद ने
रक्षा को डाले डेरे।।
642.तब चतुर विभीषण ने आ कर के
प्रज्ञा अस्त्र चलाया था।
वह अस्त्र राम लक्ष्मण दोनों को
सहज होश में लाया था।।
643.औषध विशल्य करणी लेकर
सुग्रीव चिकित्सा करते थे।
क्रमशः बाणों को खींच
घाव को दिव्यौषधि से भरते थे।।
644.हो गई चिकित्सा पूर्ण, वीर
दोनों फिर उठ बैठे रण में।
आलस्य थकावट त्याग चेतना
युक्त हो गये दो क्षण में।।
645.राघव को देखा स्वस्थ सबल
कह रहे विभीषण-शत्रु दमन!
गुह्यक जल लेकर आया है,
भेजा कुबेर ने कर चिंतन।।
646.यह जल पवित्र पर्वत का है,
नयनों से इसे लगाएंगे।
मायावी छुपे असुर सारे,
तब दृष्टि क्षेत्र में आएंगे।।
647.जो भी कोई पावन जल को
नयनों से अभी लगाएगा।
सारे अदृश्य भूतों को पल में
सहज देख वह पाएगा।।
648.राघव ने मानी बात,नेत्र
पावन दैवी जल से धोकर।
तैयार हो गए युद्ध हेतु
नवशक्ति युक्त सक्रिय होकर।।
649.सुग्रीव मैंद अंगद हनुमत ने
भी जल का उपयोग किया।
सब प्रमुख यूथपतियों ने फिर
उस दैव-कृपा का लाभ लिया।।
650.असुरों की मायावी चालें,
अब यहां न चलने वाली थीं।
यह दिव्य शक्ति उस महायुद्ध में
जीत दिलाने वाली थी।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-58*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 2.3.22 बुधवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
651.लंका में जाकर मेघनाद ने
रावण को यह बतलाया।
वह कैसा भीषण कर्म आज
रणभूमि मध्य करके आया।।
652.संवाद पिता को बतला कर
वह वापस लौट पड़ा रण में।
उसको अति उत्सुक देख
रोष फिर जाग गया था लक्ष्मण में।।
653.जय के मद में बौराया था
मरने को अति अकुलाया था।
वह नित्य कर्म भी प्रतिदिन के
उस रोज न करके आया था।।
654.लक्ष्मण के बाण मर्मभेदी
जब मेघनाद को लगते थे।
तन में छू जाएं जहां,वहीं
अंगारे सदृश्य सुलगते थे।।
655.मायावी दशमुख-सुत ने फिर
विष-संयुत बाण चलाए थे।
शेषावतार लक्ष्मण यह लख कर
मन ही मन मुस्काए थे।।
656.जब इंद्रजीत का अंत समय
रण में उसके सम्मुख आया।
सौमित्र वीर ने उसका वध
संकल्प चित्त में दोहराया।।
657.फिर प्रथम बाण से मेघनाथ का
धनुष युक्त भुज काट दिया।
दूजे शर से दूजी भुज को भी,
दो खंडों में बांट दिया।।
658.तीसरे बाणसे मेघनाद का
मस्तक हुआ भूमिशायी।
सारथि ने भी स्वामी के संग
रण में शुभ वीरगती पाई।।
659.रावण ने देखा खाली रथ
लंका में लौटा आता है।
उस रथ पर उस का वीर पुत्र तो
कहीं नजर ना आता है।।
660.वह जान गया सुत मेघनाद
वीरों के पथ पर चला गया।
वह सबसे बड़ा सहारा था
दश-मुख की नींवें हिला गया।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-59*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 4.3.22 शुक्रवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
661.हो गया शोक से भ्रांत चित्त,
सीता का वध करने दौड़ा।
मंत्री अविन्ध्य ने किसी भांति
हत्या से उसका मन मोड़ा।।
662.मंत्री बोला हे असुर-राज
अबला का वध क्यों करते हो?
अपने यश का यह शुभ्र पटल
इस कालिख से क्यों भरते हो??
663.स्त्री है, घर में कैद, शोक में डूबी,
मृतक समान रहे।
यह जीवित कब है? पति वियोग में
इसे न तन का भान रहे।।
664.पति के मरने पर बेचारी
स्वयमेव सहज मर जाएगी।
दुनिया इसके मरने का दोषी
तुम्हें नहीं ठहराएगी।।
665.देवता दैत्य गंधर्व प्रेत
है कौन न जो तुम से हारा?
सम्मुख रण में टिक पाएगा,
कब तक यह तपसी बेचारा??
666.नारीवध का न विचार करें,
इन तपस्वियों के प्राण हरें।
कल प्रातः रण में उतर स्वयं
अपनी सेना में शक्ति भरें।।
667.मंत्री अविन्ध्य ने रावण को
सीता-वध से यू विरत किया।
रावण ने निर्णायक रण में
खुद जाने का संकल्प लिया।।
668.अस्त्रों से सज्जित इस रथ का
यह गमन आज अंतिम होगा।
अपनी प्रिय लंका नगरी को,
यह नमन आज अंतिम होगा।।
669.ले चलो युद्ध में मेरा रथ
यह रण होना निर्णायक है।
जीवित वह ही रह पाएगा,
जिसको अब जीने का हक है।।
670. या तो इस रण के बाद
त्रिलोकी मेरे यश को गायेगा।
या कालचक्र राक्षस कुल की
अंतिम गाथा लिख जाएगा।।
(अध्याय289 पूर्ण)💐💐
अशेष💐
*श्रीराम कथा-60*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 5.3.22 शनिवार*
अध्याय 290 प्रारम्भ
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
671. इंद्रजीत के वध ने
रावण के मन को पहुंचाया क्लेश।
लक्ष्मण के प्रति उसके मन में
उबल रहा था रोष विशेष।।
672.स्वर्ण जड़ित रथ पर सवार हो
लंका से आया बाहर।
साथ चल रहे उत्साहित हो
कोटि-कोटि भीषण निशचर।।
673.वानर वीरों को मर्दित कर
दौड़ चला राघव की ओर।
पीछे पीछे दौड़ रहे थे
प्रेत पिशाच कर रहे शोर।।
674.अंगद मैंद नील नल हनुमत
जामवंत आगे आए।
रघुनायक को अपने
रक्षा-चक्र मध्य तत्क्षण लाए।।
675.वानर सेनापतियों ने की
वृक्ष पत्थरों की बौछार।
लात चपेट तमाचों से ही
असुरों का करते संहार।।
676.रावण ने देखा अब उसकी
सेना झेल रही है मार।
सेना रक्षा हेतु दशानन
करता माया का विस्तार।।
677.रावण की काया से पैदा
होने लगे हजारों वीर।
अस्त्र-शस्त्र से सज्जित एवं,
पर्वत से विकराल शरीर।।
678.दिव्य अस्त्र से क्षण में प्रभु ने
माया का कर डाला अंत।
तब रावण ने प्रकट किए,
रघुवर लक्ष्मण के रूप अनंत।।
679.चारों ओर हजारों माया
रूप राम विचरण करते।
वानर हुए विमूढ़ मोहवश
भाग रहे गिरते पड़ते।।
680.रावण की उस माया को लख
राम न किंचित घबराए।
बालक जैसा खेल समझ कर
अपने मन में मुस्काये।।
681.लक्ष्मण बोले- प्रभु! मायावी
रूपों का संहार करें।
घबराई वानर सेना में
नई शक्ति संचार करें।।
682.एक बाण से राघव ने तब
काटी रावण की माया।
सेना का विश्वास और
उत्साह लौट वापस आया।।
683.इंद्र सारथी मातलि, देवों
का रथ लेकर के आए।
नाथ! अस्त्र और रथ सेवा में
देवराज ने भिजवाए।।
684.इस रथ पर खुद इंद्रदेव ने
दनुजों का संहार किया।
रावण के वध हेतु दिव्य रथ
देवों ने यह भेज दिया।।
685.इस रथ पर प्रभु आप विराजें
पूर्ण स्वयं का कार्य करें।
देव विप्र-घाती रावण का
आज शीघ्र संहार करें।।
अशेष💐
*श्रीराम कथा-61*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 7.3.22 सोमवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
686. राघव को संदेह हुआ
यह हो सकती आसुर-माया।
सचिव विभीषण ने प्रभु को
यह मर्म शीघ्र ही समझाया।।
687.इंद्रदेव का ही यह रथ है
माया का विस्तार नहीं।
हमको है विश्वास आज
अब रावण का निस्तार नहीं।।
688.रथारूढ़ राघव रावण के
सम्मुख खड़े हुए जाकर।
अंतिम क्षण आ चुका दशानन
अब तुम जाओ यहीं ठहर।।
689.रावण पर जब हुआ आक्रमण,
देवलोक में जय जयकार।
भूत पिशाच प्रेत दानव गण
भाग चले कर हाहाकार।।
690.देवलोक में बजे नगाड़े
पुष्प वृष्टि सुरगण करते।
उत्साही उत्साहित होते,
कायर मन में भय भरते।।
691.दशकंधर और राघव में
छिड़ गया वहां भीषण संग्राम।
एक पक्ष था असुर-राज का
दूजे जन-नायक श्री राम।।
692.अनुपमेय था युद्ध कि उसकी,
उपमा कहीं नहीं मिल पाय।
महायुद्ध ना हुआ नहोगा,
वह किसके संग तोला जाय।।
693.रावण ने मारा त्रिशूल जो
इंद्र वज्र सा था विकराल।
रघुवर ने तीखे बाणों से
उसको दिया भूमि पर डाल।।
694.ब्रह्म दंड सा वह त्रिशूल जब
प्रभु ने किया सहज निष्फल।
दशग्रीव रावण की इंद्रिय
हुई मृत्यु भय से चंचल।।
695.शूल परिघ मूसल भुशुण्डि
फरसों की वहां हुई बौछार।
नभ से शस्त्र गिर रहे ऐसे
जैसे वर्षा की जलधार।।
696.रावण की माया को देखा,
वानर दल हो गया विमूढ़।
इंद्रजाल का विशेषज्ञ था
उसकी विद्या थीं अति गूढ़।।
697.रामभद्र ने स्वर्ण पंख का
उत्तम बाण निकाला एक।
ब्रह्मअस्त्र से अभिमंत्रित था
काल न सकता उसको छेक।।
698.देव मनुज गंधर्व हो गए
हर्षित, जब देखा वह बाण।
दानव किन्नर समझ गए अब
क्षीण हुए रावण के प्राण।।
699.ब्रह्मदंड का रघुनंदन ने
जब रावण पर किया प्रहार।
काँप उठे त्रिलोक,गूंजता
दसों दिशा में हाहाकार।।
700.रथ घोड़े सारथी सहित
जल उठी दशानन की काया।
रावण के संग नष्ट हो गई
सारी निशाचरी माया।।
701.रामचंद्र के हाथों,पापी
रावण का हो गया विनाश।
ऋषि चारण गंधर्व देव की
जय ध्वनि से गूंजा आकाश।।
702.पंचभूत ने रावण की
काया का किया पूर्णत: त्याग।
लोक भ्रष्ट कर गई दशानन को
उस ब्रह्मअस्त्र की आग।।
703.धातु मांस रस-रक्त जल गए
बचा नहीं कोई अवशेष।
था विशिष्ट रावण इस कारण,
हुआ अंत भी परम विशेष।।
(अध्याय290 पूर्ण)
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-62*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 14.3.22 रविवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
704.रावण का वध हुआ
त्रिलोकी में छाया अनुपम आनंद।
देशद्रोहकारी रावण के
वध से देव हुए स्वच्छंद।।
705.रामादल किलकारी भरता
उछल रहे थे वानर वीर।
मां सीता के दर्शन को
हो रहे सभी अत्यंत अधीर।।
706.इधर दशानन मरा उधर
ऋषि देव दे रहे आशीर्वाद।
युगों युगों तक सकल विश्व को
भीषण युद्ध रहेगा याद।।
707.महाबाहु राघव की पूजा
और प्रशंसा करते संत।
राम शेष-शायी नारायण
इनकी महिमा अमित अनंत।।
708.पुष्प वृष्टि कर रहे देवता
और गंधर्व गा रहे गीत।
देवलोक में गूंज रहा था,
खुशियों भरा दिव्य संगीत।।
709.समारोह सा हुआ गगन में
सब का मन था परम प्रसन्न।
नदियां बहने लगी और
धरती उगले मनचाहा अन्न।।
710.लंका विजय समाप्त हुई तो,
मिला विभीषण को यह राज।
रघुवर के चरणों में नत था,
लंकापुरी का दैत्य-समाज।।
711.तब लंकेश विभीषण ने
लेकर अविंध्य को अपने साथ।
जगन्मात सीता के पग में
जाकर सादर टेका माथ।।
712.संग सिया को लिया साथ,
बोले- हे प्रभु! करिए स्वीकार!
सदाचार की मूरत सीता
आकर खड़ी आपके द्वार।।
713.जनक सुता पावन पतिव्रता
देख रही बरसों से राह।
उनके मन में एक लगन थी,
केवल प्रभु दर्शन की चाह।।
714.रथ से उतर राम राघव ने,
तब देखा सीता की ओर।
दुर्बल अंग, वस्त्र मैले,
सिर जटा नयन आंसू की कोर।।
715.प्रभु वियोग में उनका मुखड़ा,
दीन-गात के वस्त्र मलीन।
जैसे ग्रहण काल में शशि की
छटा राहु ने, ली हो छीन।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-63*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 17.3.22 गुरुवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
716.प्रभु को था संदेह, पर-पुरुष
के घर सिय ने किया निवास।
मर्यादा विपरीत कर्म कर
कैसे उनको रख लूं पास।।
717.प्रकट रूप में बोले राघव,
सीता!सुनो हमारी बात।
यद्यपि मुक्त कराया लेकिन
रख न सकेंगे अपने साथ।।
718.तुम्हें बचा कर लाऊँ
निश्चय ही, यह था मेरा कर्तव्य।
किंतु न कोई ग्रहण करेगा
कभी श्वान का झूठा हव्य।।
719.इतने दिन पर पुरुष संग तुम
रहीं भले ही कितनी शुद्ध।
किंतु साथ में तुमको रखना
निश्चय होगा लोक विरुद्ध।।
720.मेरे जैसा पति पाकर यदि
रह जाती रावण के गेह।
मैं पति धर्म निभा नहीं पाता,
झूठा पड़ता मेरा नेह।।
721.किंतु आज तुमको दशमुख के
बंधन से करके यों मुक्त।
मैं भी हुआ वंश की निर्मल
कीर्ति और यश से संयुक्त।।
722.अब तुम वहीं पधारो सीता
जहां तुम्हारा चाहे मन।
रावण के घर से लौटीं तुम
मैं न करूंगा अभिनंदन।।
723.अति कठोर यह वचन सुने तो
सीता को पहुंचा संताप।
कटे वृक्ष की भांति भूमि पर
गिरीं और कर रहीं विलाप।।
724.मुख प्रसन्न जो था क्षण भर को
फिर से हुआ विरूप मलीन।
जैसे मुख की भाप लगे
दर्पण से हो प्रतिबिंब विलीन।।
725.लखन सहित सारे कपि भालू
हुए मृतक जैसे बलहीन।
राघव के 'कटु' वचनों ने
उत्साह विजय का लीन्हा छीन।।
726.कमल योनि जगसृष्टा ब्रह्मा
लेकर अपना दिव्य विमान।
इंद्र अग्नि यम वायु वरुण
गंधर्व देव ऋषिगण विद्वान।।
727.श्वेत वेश में दिव्य रुप से
शुभ्र हंस पर हो आरूढ़।
दशरथ स्वयं पधारे
वातावरण हुआ गंभीर निगूढ़।।
728.गुरुजन मध्य सिया ने प्रभु से
वचन कहे मन रख विश्वास।
राजपुत्र! अपनी इस गति पर
किंचित भी मैं नहीं निराश।।
729.नहीं आप को दोष दे रही
तुम हो सर्वज्ञात महिमान।
केवल मेरे इन वचनों को,
क्षणभर सुन लें देकर ध्यान।।
730.जीवन दायक वायु देव हैं
यदि मुझ में हो पापाचार।
करें त्याग मेरे प्राणों का
अभी इसी क्षण बिना विचार।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-64*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 18.3.22 शुक्रवार*
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731.यदि सपने में भी मेरा
पर-पुरुष जाति से है संयोग।
पंचतत्व दें त्याग मुझे
प्राणों से होवे अभी वियोग।।
732.अगर स्वप्न में भी मैंने
नहीं त्यागा है प्रभु पद चिंतन।
देव प्रदत्त आप पति मेरे
सदा समर्पित यह तन मन।।
733.सीता की यह करुण शपथ सुन
गगन गिरा गूंजी गंभीर।
वायु देव बोले- हे राघव!
तुम हो शीलवान मतिधीर।।
734.सीता ने जो कहा सत्य है-
इसमें नहीं असत्य लवलेश।
पाप शून्य मिथलेश कुमारी
मेरा है आशीष विशेष।।
735.अग्निदेव ने कहा-राम तुम
सुनो वचन यह पूर्ण प्रमाण।
पाप तथा अपराधहीन हैं
सीता के यह निर्मल प्राण।।
736.वरुण देव बोले- हे राघव!
मानव में जल तत्व प्रधान
मुझसे ही उत्पन्न अजीब है
मेरे सम्मुख सभी समान
737. मैं प्रमाण देता हूं सीता
तन मन चिंतन से निष्पाप।
किंचित करें विचार न मन में,
इनको अब स्वीकारें आप।।
738.ब्रह्मदेव चतुरानन ने फिर
कहा धर्मयुत यह संवाद।
राम! धर्म रक्षक हो तुम
इस कारण मान रहे अपवाद।।
739.राज धर्म के नायक हो तुम,
सद्विचार रखते अभिराम।
मेरी बात सुनो मन देकर
साधु सदाचारी श्री राम।।
740.देव यक्ष गंधर्व नाग ऋषि
का रावण था शत्रु विशेष।
इसे मारकर तीन लोक का
काट दिया है तुमने क्लेश।।
741.मेरा ही वरदान प्राप्त कर
हुआ अवध्य और उद्दंड।
रहा उपेक्षित काल-पाश से
किंतु दे दिया तुमने दंड।।
742.अपने ही वध हेतु मूर्ख ने
सीता पर कुदृष्टि डाली।
सीता के स्वरूप में अपनी
मृत्यु सहज घर बुलवा ली।।
743.नारी रक्षा हेतु दिलाया
इसको नलकूबर से शाप।
पर-दारा को छुआ अगर तो
घातक होगा इसका पाप।।
744.नारि अनिच्छा रखे,अगर यह
जबरन हाथ लगाएगा।
खंड-खंड होगा मस्तक
या तत्क्षण मारा जाएगा।।
745.इस कारण यह सीता का
स्पर्श नहीं कर पाया है।
किंतु अभागिन अबला को
लंका में बहुत सताया है।।
746.रावण वध से देव कार्य सब
सिद्ध हो गए रघुनंदन।
ग्रहण करो निशंक सिया को
कर लो निर्मल अपना मन।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-65*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 22.3.22 मंगलवार*
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747.दशरथ बोले- मैं प्रसन्न हूं,
सदा तुम्हारा हो कल्याण।
अनुमति मैं देता हूं
सीता संग अवध को करो प्रयाण।।
748.वचन पूर्ण हो चुका वत्स अब
करो अयोध्या पर तुम राज।
अक्षय कीर्ति कमाओ जग में
तुम जन मन में रहे विराज।।
749.कहा राम ने- पूज्य पिता!
मैं चरणों में नत करूं प्रणाम।
पावन अवधपुरी मैं जाता
आप पधारें अपने धाम।।
750.दशरथ बोले रामभद्र से,
पूर्ण किया तुमने वनवास।
शासन सूत्र संभालो अब तो
अवध तुम्हारा उचित निवास।।
751.कर प्रणाम ऋषि देवगणों को
सबसे पाकर अभिनंदन।
जनक सुता से राम मिले
ज्यों शची-इंद्र का परम मिलन।।
752.त्रिजटा और अविन्ध्य को देकर
धन वैभव आदर सम्मान।
किया पूर्ण अभिनंदन एवं
विदा किया देकर वरदान।।
753.ब्रह्मदेव ने कहा- राम!
तुम कहो तुम्हें क्या दूं वरदान।
सरल सत्य व्यक्तित्व तुम्हारा
वर पाता तुमसे सम्मान।।
754.कहा राम ने- मुझको यह
इच्छित वर दीजै चतुरानन।
शत्रु विजित ना करें,धर्म से
सदा जुड़ा हो मेरा मन।।
755.महा युद्ध में मारे जा कर
पड़े भूमि पर जो वानर।
कृपा करें प्रभु आप! पुनः
वे जीवित हो जाएं सत्वर।।
756.एवमस्तु कहते ही वानर
उठ बैठे कर जय-जयकार।
ब्रह्मदेव ने दिया भक्ति का,
वानर दल को यह उपहार।।
757.माँ सीता ने बजरंगी को
दिया दिव्य यह वर अभिराम।
कीर्ति रहेगी अमिट तुम्हारी,
जब तक अमिट राम का नाम।।
758.रघुवर का यश अमर
धरा पर जब तक गाया जाएगा।
प्रिय सुत तब तक तेरे भी
जीवन का अंत न आएगा।।
759.पिंगल नयन वीर हनुमत तुम
करो सदा सेवा सुख भोग।
अजर अमर अविनाशी हो तुम
छू न सकें माया के रोग।।
760.अंतर्धान हुए ऋषि मुनि गण
इंद्र आदि पहुंचे निज लोक।
सियाराम को संग विराजित
देख भक्त सब हुए अशोक।।अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-66*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 25.3.22 शुक्रवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
761.इंद्र सारथी मातलि ने तब
रघुनंदन को किया प्रणाम।
देव यक्ष गंधर्व नाग
ऋषिगण दुःखभंजक हेश्री राम!!
762.जब तक वसुधा टिकी रहेगी
तब तक ऋषि मुनि जन विद्वान।
देव असुर गंधर्व नाग
मनुजादि करेंगे तव यश गान।।
763.राघव की अनुमति पाकर
मातलि ने किया स्वर्ग प्रस्थान।
रावण वध के अतुल पराक्रम
का त्रिलोक करता जय गान।।
764.इंद्रिय जयी राम ने लंका,हेतु
किए सब उचित प्रबंध।
भक्त विभीषण को शासन की
सत्ता भी दे दी स्वच्छंद।।
765.लखन विभीषण अंगदादि सँग
जामवंत सुग्रीव महान।
हनुमत और नल नील आदि भी
चले यूथपति संग प्रधान।।
766.सभी वानरों ने मिलकर
उत्साहयुक्त कीन्हा जयघोष।
स्वामी की नगरी देखेंगे
वानर वीरों में था जोश।।
767.सभी यूथपतियों को संग ले,
चढ़ कर पुष्पक दिव्यविमान।
रघुनंदन ने जनक लली सँग
किया अवधपुर को प्रस्थान।।
768.युद्ध भूमि का दृश्य दिखाया
वीरों के देखे अवशेष।
एक व्यक्ति के अहंकार ने
नष्ट किया वह सुंदर देश।।
769.सेतुबंध से ऊपर उठकर
किया महा मकरालय पार।
महासिंधु वह था जलचर
मणि रत्नों का अनुपम आधार।।
770.उछल रहीं उत्ताल तरंगें
करते कोलाहल जलचर।
केवल जल ही जल दिखता था
दृष्टि न पाती कहीं ठहर।।
771.सागर पार सियावर ने
पहले था किया जहां विश्राम।
वहीं आज भी डाला डेरा
वानर यूथ करें विश्राम।।
772.रघुनंदन ने निकट बुलाये,
सभी रीछ वानर सरदार।
रत्न भेंट कर आदर सहित
हृदय से व्यक्त किया आभार।।
773.विदा किये कपि भालु वीर
फिर किष्किंधा आये श्री राम।
जनक सुता को दिखा रहे प्रभु
वन की सुंदरता अभिराम।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-67*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 30.3.22 बुधवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
774. किष्किंधा जाकर रघुवर ने
अंगद को दे पद युवराज।
नींव रखी सुदृढ़ शासन की
आनंदित कपिराज समाज।।
775.लक्ष्मण और सुग्रीव विभीषण
संग भक्तपालक श्री राम।
पुष्पक पर आरूढ़ सिया सँग,
आ पहुंचे निज पावन धाम।।
776.कहा राम ने हनुमत से
तुम नंदिग्राम होकर आओ
समाचार आगमन हमारा
प्रथम भरत को बतलाओ।।
777.अवधि आस में किसी तरह
उसने धारण कर रखे प्राण।
अगर समय पर मैं न गया तो
वह कर देगा महाप्रया नण।।
778.अवध धाम से पहले तत्क्षण
नन्दिग्राम पहुंचे हनुमंत।
त्यागी जीवन बिता रहा था
जहां भरत सा सच्चा संत।।
779.दुर्बल काया मलिन वसन
लेकिन मुख पर था अनुपम तेज।
मिट्टी के थे पात्र भूमि पर
बिछी हुई तिनकों की सेज।।
780.गतिविधि सब पहचान भरत की
हनुमत ने तब किया प्रणाम।
समाचार शुभ दिया, अवध को
आ पहुंचे रघुनंदन राम।।
781.नन्दि ग्राम पहुंचा विमान
राघव ने देखे भरत अधीर।
चरण पादुका लिए मलिन तन,
नयनों से झरता था नीर।।
782.लखन राम सीता भी उनके
दिव्य दरश से हुए निहाल।
प्रभुवियोग में समय भरत का
भी तो बीता था बेहाल।।
783.सिंहासन पर चरण पादुका
वीतराग खुद का जीवन।
नगरद्वार से दूर कुटी में
अविरत रघुवर का चिंतन।।
784.समय आ गया,भरत हो गए
राज बंधनों से अब मुक्त।
उनका तन मन जीवन सब कुछ
था प्रभु चरणों से संयुक्त।।
785.संत भरत ने प्रभु चरणों में
किया समर्पित कोसल राज।
जिसकी थाती रखी संजोकर
आज गई उसके ही पास।।
अशेष💐💐
*श्रीराम कथा-68*
*(महाभारत आधार)*
*दि. 31.3.22 शुक्रवार*
-::-::-::-::-::-::-::-::-::
(समापन चरण)
इस पावन श्री राम चरित्र की विगत लगभग दो महीने से चल रही श्रृंखला का आज यहां समापन हो रहा है। आप सभी पाठक बन्धुओं का आभार जिन्होंने इसे पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया दी।
प्रभु के श्री चरणों में प्रार्थना है कि वे आप सभी को अपनी अविचल भक्ति प्रदान करेंगे.....!! जय श्री राम!!!
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
786.भरत अश्रु से भरे नयन ले
प्रभु चरणों में थे नत शीश।।
आज अयोध्या की वसुधा ने
प्राप्त किया अपना अवनीश।।
787.दिव्य श्रवण नक्षत्र पूण्यशाली
आया जिस दिन बेजोड़।
नगर अयोध्या में खुशियों ने
दिए सभी अवरोधन तोड़।।
788.घर घर मंगल दीप जल रहे
द्वार बज रही शहनाई।
रघुनंदन के राजतिलक की
शुभ मंगल बेला आई।।
789. चौदह वर्ष पूर्व छाया था
जन मन में जो प्रबल उछाह।
आज किनारे तोड़ बह चला
सुख सागर का दिव्य प्रवाह।।
790.ऋषि वशिष्ठ और वामदेव ने
दिव्य वस्तु शुभ मंगा अनेक।
शूर शिरोमणि रामभद्र का
किया राजपद पर अभिषेक।।
791.हुआ राज्य अभिषेक पूर्ण
रघुवर ने कर आदर सत्कार।
विदा किए सुग्रीव विभीषण
देकर बहु अनुपम उपहार।।
792.कर्तव्यों की शिक्षा दी और
कहा-मित्र तुम हो मतिधीर।
तुम दोनों की प्रजा,पूर्व शासन में
रही विशेष अधीर।।
793.सुख देना तुम सदा प्रजा को,
यह राजा का धर्म विशेष।
मुझे देखना सदा प्रजा में,
जीवन अब जितना भी शेष।।
794.आनंदित उद्विग्न हृदय से,
प्रिय मित्रों ने किया प्रणाम।
रामसखा सुग्रीव विभीषण
पहुंचे अपने-अपने धाम।।
795.सभी मित्रगण विदा किए
'पुष्पक' से बोले प्रभु रघुनाथ।
बहुत दिनों तक आप रह लिए,
अलग-अलग स्वामी के साथ।।
796.तुम कुबेर के प्रिय वाहन थे
तुम्हें लिया रावण ने छीन।
दुष्कर्मों में कर प्रयोग
तुमको कर डाला शोभा हीन।।
797.समय आ गया अब,कुबेर के
निकट आप करिए प्रस्थान।
शीश नवा, चल पड़ा शीघ्र
अलका नगरी को दिव्य विमान।।
798.रामराज्य की उत्तमता को
युग-युग विश्व रखेगा याद।
जहां सुखी थे सभी , नहीं था कहीं
किसी के मध्य विवाद।।
799.अश्वमेध दस किये राम ने
तीन लोक छाया आनंद।
महायज्ञ में याचक जन पर
द्वार नहीं होता था बंद।।
800.महा गोमती तट पर जाकर
अन्न वस्त्र आभूषण दान।
रघुनायक के राजद्वार पर
आदर पाते गुणि विद्वान।।
801.न्याय युक्त शासन रघुवर का
नहीं कष्ट पीड़ा सन्त्रास।
प्रकृति दिव्य फलदायक एवं
कोई चेहरा नहीं उदास।।
802. मार्कण्डेय-युधिष्ठिर का यह
पूर्ण हुआ अनुपम संवाद।
पाठक गण के हृदय उदित हो,
राम भक्ति का अनुपम नाद।।💐💐
【सियावर रामचन्द्र की जय】
इति श्री राम चरित्र माला
(महाभारत आधार)
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
महाभारत ग्रंथ का
वनपर्व परम विशाल है।
पांडुसुत के वन गमन का,
कह दिया सब हाल है।।
पाण्डु तनयों ने समागम,
संत जन से जो किया।
महा ऋषि श्री व्यास ने
वृतांत वह सब लिख दिया।।
राम राघव के चरित
अध्याय सत्रह में कहे।
ताकि पांडव हृदय में
दुख क्षोभ किंचित ना रहे।।
यह नहीं इतिहास पूरा
राम का लघु स्मरण।
पाप पंकिल चित्त में
होवें विराजित प्रभु चरण।।
पांडवों को था बताना
कष्ट तुमने क्या सहा।
राम की जीवन व्यथा का
अंश भी यह ना रहा।।
धर्म युत उत्तम सहायक
आज जिसके पास है।
कीर्ति यश वैभव जगत के
बने उसके दास हैं।।
युद्ध तो है धर्म क्षत्रिय का
इसे पहचानिए।
त्याग शंकाएं सभी
विश्वास का बल ठानिये।।
युद्ध यदि होगा, विजय श्री
तुम्हें ही अपनायेगी।
धर्म पर स्थिर रहो
वह पूर्ण साथ निभायेगी।।
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