(हर घर में अलग अलग रूप में पाई जाने वाली माँ रूपिणी धात्री के पावन चरणों में समर्पित.....!!!)💐💐
घर की सारी चिंताएं
अपने सिर पर ले लेती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
1. सुबह सवेरे उठते ही
चिंता है साफ-सफाई की।
झाड़ू पौंछा कपड़ा ढेर
घिसाई और धुलाई की।।
कच्छे से लेकर वर्दी तक
धोनी उसको अच्छे से।
हफ्ते भर के मैल
उतरने लगते बिल्कुल लच्छे से।।
सारे घर के कामों को
मानो अंडे सा सेती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
2. आठ बजे तक हर सदस्य को
कुछ खाने को मिल जाए।
इस चिंता में चार बजे ही
मां बिस्तर से उठ जाए।।
बच्चे पढ़ने जाएंगे तो
उनका टिफिन लगाना है।
उनके मन को रुचे, उसे
कुछ ऐसा नया बनाना है।।
फिर निकलेंगे घर से
जिनको 'रिजक' कमाने जाना है।
उनका हर पल, मां की
आंखों का, जाना पहचाना है।।
सही वक्त पर कैसे..
सबका संयोजन कर देती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
3.रोटी सब्जी चावल दाल
सलाद सजाती थाली है।
खाना गरम रहे आखिर तक
यह उसकी रखवाली है।।
कहीं नमक कम ज्यादा हो तो
सब गड़बड़ हो जानी है।
सारी मेहनत भुला लोग
कहते हैं.. क्या नादानी है !
धन्यवाद के शब्द हमेशा
उसको कम पड़ जाते हैं।
उसकी मेहनत भुला
जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं।।
लेकिन छोटे कामों में भी
कितना कुछ भर देती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
4.गर्मी में जब हम
पंखे कूलर का मजा उठाते हैं।
मां की आंखों में चूल्हे के
झोंके उसे तपाते हैं।।
नए नए व्यंजन प्रयोग
घर भर के लिए बनाती है।
बच्चों को अच्छे लगते तो
वह भी खुश हो जाती है।।
हर त्योहार, पर्व का दिन
उसका कुछ बोझ बढाता है।
खुशियां बच्चों की हैं, उसको
जिम्मेदारी लाता है।।
घर की नौका कई बार
पतवार बिना ही खेती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
5.दूध कौन सा..? कैसा..?
और किसकी दुकान से लाना है?
बिजली बिल भी सही-सही
तारीख पर जमा कराना है।।
किस सौदे पर कहां छूट
कितने की मिलने वाली है?
घर पुतवाना कपड़े लाना
सिर पर खड़ी दिवाली है।।
किसकी शादी में कितने का
भरना उसे लिफाफा है।
धूप पड़े चिंताओं की
वह गंजे सिर का साफा है।।
जब हर ओर उदासी हो
वह मुस्कानें भर देती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
6.जिसको हम बेकार समझते
उसे काम में लाती वो।
प्रकृति सुरक्षा संरक्षण को
चुटकी में समझाती वो।।
एक काम कंधे पर ले
बीसों कामों पर जाती वो।
दुर्गा रमा शारदा अम्बा
इसीलिए कहलाती वो।।
हम बिगाड़ ही सकते लेकिन
बिगड़ी बात बनाती वो।
सब के लिए जी रही
खुद को वक्त निकाल न पाती वो।।
कठिन काम हमको लगते पर
वो अक्सर कर देती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
7.तिनका तिनका जोड़
घोंसला सबके लिए बनाती है।
उसी घोसले में इक दिन वो
दरकिनार हो जाती है।।
हर सदस्य को हर पल उसकी
सही जगह दिखलाती है।
वृक्ष लगाकर..! खुद ही
छाया से बाहर हो जाती है।।
अपनी हर बीमारी को
अपनों से रोज छुपाती है।
अगर छींक भी हो बच्चों को
अस्पताल ले जाती है।।
सरल दुआओं से भी मानो
चमत्कार कर देती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
8.मां ब्रह्मा सी सर्जक है
नारायण जैसी पालक है।
महारुद्र सी.. घर के
हर संकट की वो संहारक है।।
मन में छुपे हुए नवरस की
वह सच्ची विस्तारक है।
भक्ति प्रेम करुणा श्रद्धा की
सबसे बड़ी प्रचारक है।।
व्यक्ति तभी तक जीवित है
जब तक सर पर मां की छाया।
उसके बाद शक्ति गुम होती
रह जाती केवल काया।।
मांगो... तब ईश्वर देता,
पर वह.. बिन मांगे देती है।
हम तो कभी कभार
मगर मां..! रोज परीक्षा देती है।।
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