मानवता के रत्न हैं, चार वेद ऋक् साम।
वेद अथर्व तथा यजुः,दिव्य मंत्र अभिराम।।
धनुर्वेद गान्धर्व अरु, अभिनव आयुर्वेद।
स्थापत्य समेत यह, श्रेष्ठ चार उपवेद।।
चार निरूपण वेद के,आरण्यक अरु मंत्र।
ब्राह्मण एवं उपनिषद्,ज्ञान शक्ति के तंत्र।।
मंत्र व्याख्या ग्रन्थ हैं, गोपथ शतपथ चार।
पंचाविंशेतरेय हैं,परम वेद विस्तार।।
चार अवस्था में बंटा, ऋषिकुल आर्यसमाज।
ब्रह्मचर्य एवं गृही, वानप्रस्थ संन्यास।।
केवल अन्तिम लक्ष्य हैं जीवन के ये सार्थ।
अर्थ धर्म अरु कामना मोक्ष परम पुरुषार्थ।।
परमारथ के शत्रु हैं,लोभ काम और मोह।
करता नाश विवेक का, मन जब छाता कोह।।
साम दाम भय भेद हैं प्रचलित चार उपाय।
जो आवश्यक हो जहां, उसे वहां अपनाय।।
प्रकट चार भुज विष्णु के,चतुरानन मुख चार।
व्यूह अवतरण चार से, हुआ कृष्ण अवतार।।
संकर्षण अनिरुद्ध और वासुदेव प्रद्युम्न।
चार रूप श्री कृष्ण के चारों पूर्ण महिम्न।।
पांचजन्य प्रभु शंख है,और सुदर्शन चक्र।
अरुणोत्पल कौमोदकी, सदा शत्रु पर वक्र।।
पूर्वाेत्तर पश्चिम तथा दक्षिण हैं दिशि चार।
यम कुबेर वरुणेन्द्र हैं, दिग्पालक भी चार।।
अग्नि वायु नैऋत्य हैं चार कोण ईशान।
प्रभु अर्चन वन्दन करें,इनको दे कर ध्यान।।
चार धाम रामेश्वरम्,और द्वारिका धाम।
बद्रीनाथ विशाल हैं जगन्नाथ सुख धाम।।
कुम्भ पर्व का देश में अमृत वर्षण याग।
हरिद्वार उज्जैन शुभ नासिक और प्रयाग।।
गया कुशी अरु लुम्बिनी सारनाथ पहचान।
बुद्ध जन्म उपदेश और बोध तीर्थ निर्वाण।।
कलि त्रेता द्वापर तथा सतयुग चार महान।
यज्ञ तपस्या अर्चना कलि हरिनाम प्रधान।।
चार चरण अस्तित्व के जाग्रत स्वप्न तुरीय।
तथा सुषुप्ति विचार लें,देह दशा मननीय।।
जीव जगत व्यवहार में,प्रकट चार आकार।
उद्भिज अण्डज स्वेद अरु पिण्ड जन्म संसार।।
व्यक्त पुरातन ग्रन्थ में वर्ण धर्म हैं चार।
ब्राह्म क्षात्र एवं वणिक् शूद्र कर्म अनुसार ।।
चार देव प्रत्यक्ष हैं,सदा सहज स्वीकार्य।
परम पूज्य माता पिता, अतिथि और आचार्य।।
धर्म पुत्र भी चार हैं शास्त्र कथित जो नित्य।
शिष्य पोष्य अंगज तथा परम निकट जो भृत्य।।
परम तपस्वी ब्रह्म सुत बालक ऋषि हैं चार।
सनक, सनातन, सनंदन एवं सनत्कुमार।।
उच्चाटन मारण तथा वशीकरण के तंत्र।
सम्मोहन जग का करें, दिव्य चार यह मंत्र।।
जगत जीव ब्रह्मातमा,सिद्ध करे वेदान्त।
चित्त बुद्धि मन वृत्ति हैं,अहंकार पर अन्त।।
आर्त ॉदय अर्थार्थी ज्ञानी अरु जिज्ञास।
चार भेद हरिभक्त के लिए प्रेम की प्यास।।
शरणागति ये चार हैं,आज्ञा अरु सन्तोष।
परम समर्पण स्मरण ॉदय प्रेम के कोष।।
ब्रह्मवाद के चार हैं रूप द्वैत अद्वैत।
द्वैताद्वैत प्रधान हैं, तथा विशिष्टाद्वैत।।
चार रूप में मुक्ति है,सामीप्यरुसालोक्य।
सायुज्यरुसारूप्य हैं सदा कृपा अवलोक्य।।
अन्तरमन की शक्ति हैं अभय सहजपद चिन्त्य।
ज्ञान बुद्धि उपलब्धि ये प्रत्यय विद्या नित्य।।
संशय एवं स्वप्न ये प्रमुख अविद्या चार।
स्वप्न अनध्यवसाय को मन में लेहु विचार।।
ब्रह्म हंस श्री रूद्र हैं सम्प्रदाय ये चार।
परम तत्व के ज्ञान से सबका हो उद्धार।।
हिन्दुधर्म के मुकुट में चार प्रकाशित अर्क।
मध्व विष्णुस्वामी तथा रामानुज निम्बार्क।।
शैव पन्थ के खण्ड भी बंटे हुए हैं चार।
शैव पाशुपत कालदम कापालिक व्यवहार।।
चार प्रमेय विचार हैं शब्द और अनुमान।
प्रत्यक्षरुउपमान से कार्यसिद्धि का ज्ञान।।
जैन धर्म मतिज्ञान भी यही चतुष्टय गाय।
परम अवग्रह धारणा ईहा और अवाय।।
दुःखमय दुःखसमुदाय है दुःख निरोध का सत्य।
गामिनि प्रतिपद बुद्ध के चार आर्य यह सत्य।।
ज्ञान ज्योति और चेतना अन्तिम है अस्तित्व।
सूफी मत में सदा से, इनका बडा महत्व।।
चार वाद्य में है बसा, भारत का संगीत।
तंत्र,सुषिर,अवनद्ध अरु घन हैं परम पुनीत।।
अभिनय के हैं नाट्य में वर्णित चार प्रकार।
वचन,अंग,आहार्य वा सात्विक शास्त्रनुसार।।
चौमासा बरसात का रखे महीने चार।
सबका प्रिय आषाढ है,श्रावण भादों क्वार।।
चौगिरही की कुण्डली चार गिरह प्रतिकूल।
चार प्रहर दिन के तथा चार रात के मूल।।
दशरथ सुत हैं चार श्री,राम भरत शत्रुघ्न।
लक्ष्मण सेवा रूप हैं,करें पाप को भग्न।।
कर्म धर्म अरु मर्म के प्रगटे चार स्वरूप।
राम स्वयं वैराग्य हैं,रख आदर्श अनूप।।
श्रुतकीरति अरु माण्डवी,उर्मिल सीता मात।
युक्तिभक्ति अरु मुक्ति का परमविरक्त प्रभात।।
गीता गायत्री तथा गंगा अरु गोविन्द।
चतुर्गकार विचार लें,पुनर्जन्म हो बन्द।।
रथ गज अश्व पदाति की चतुःअंगिनी सेन।
चार चतुर्थी चन्द्र की हिन्दु धर्म की देन।।
गणगौरी,बहुला तथा गणपति करवाचौथ।
सकल सुहागिन नारियां, पूजें रख मन सौध।।
अवतारों के चार दिन वामन नरसिंह पर्व।
राम जन्म जन्माष्टमी भक्त मनाते सर्व।।
दीपमालिका श्रावणी पावन यह त्यौहार।
होली है उल्लासमय दशमी विजय विचार।।
चौराहा चौमुख दिया,मंगल कलश विधान।
चौरंगा चतुरंग यह खेल अनोखा जान।।
चौपड चौपाटी तथा,सुन्दर चार मीनार।
काश्मीर का श्रीनगर रखता चार चिनार।।
बावन दोहों में रचा,चार अनेक विचार।
चमत्कार है चार का इसे करें स्वीकार।।

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