ऐ चांद शिकायत है तुमसे,क्यों सपनों में बहलाते हो।
हर तरह अधूरी दुनियां में,क्यों पूर्ण चन्द्र कहलाते हो।।
कोने कोने में लूट मची, भाई पर भाई टूट रहा ।
एहसास मोहब्बत का मरता,अपनों का दामन छूट रहा।।
धरती टुकडों में बांट चुके,अब आसमान पर हैं आंखें।
उडने के स्वप्न हजारों हैं,पर पानी में भीगी पांखें।।
क्यों नहीं रुपहली किरनों से,तुम दिल के दाग मिटाते हो।। हर0
दामन लोहू से सने हुए, गाली गोली की है भाषा।
बस ताकत ही है मानव के, जीवन जीने की परिभाषा।।
ऐ चांद, जमीं पर ये तुमने, कैसे प्रतिबिम्ब सजाए हैं।
अपने चेहरे के दाग हमारे चेहरों पर चिपकाए हैं।।
हो तो मयंक,पर निज कलंक की कथा न क्यों कह पाते हो।।हर0
शासक अनुशासनहीन हुए, शासित पर सारे अनुशासन।
अपनी पहचान गंवा बैठे, हर शक्ल किसी का विज्ञापन।।
सारे रहस्य अब सुलझ चुके,तुम खुद को भी न बचा पाए।
ये ‘प्रगतिशील’ बरसों पहले, तुम पर भी ध्वजा लगा आए।।
रातों को आवश्यक न रहे, फिर क्यों नभ पर इठलाते हो।।हर0
जब कभी ‘ग्रहण’ तुम पर आता,सब गाते भजन, बचाने को।
सैकडों ‘राहु’ अब खडे हुए, ‘चांदों’ पर ग्रहण लगाने को।।
है शरद चांदनी सजी हुई, फिर भी क्यों इतना अंधियारा।
हर सीने में है छुपी आह, दुःख दर्द बटोरे हर द्वारा।।
सागर सुत फिर क्यों सागर के सीने में ज्वार जगाते हो।।हर0
धरती का चक्कर देते तुम, जो पडी हुई खुद चक्कर में।
मुश्किल से टूटन बचा रही,अपने बच्चों की टक्कर में।।
फन पर न टिकी होती अब तक,तो अन्तरिक्ष में खो जाती।
अपनी संतानों की जहरीली, सांसों से ही सो जाती।।
तुम मीलों दूर खडे हम सबकी, हालत पर मुसकाते हो।।हर0
शठ सुधरें सत्संगति पा कर, पहले से सुनते आए हैं।
सत्संग सुभाषित के कवियों ने, खूब तराने गाए हैं।।
भाई, माई, साईं, बापू, प्रतिदिन चैनल पर चीख रहे।
इन व्यवसाई गुरुओं से क्या हम, लेश मात्र भी सीख रहे।।
मानव में मानवता जागे, वह सुधा न क्यों बरसाते हो।।हर0
बचपन जीएगा फिर खुद को,भरपूर जवानी गाएगी।
फिर युवा शक्ति सपनों को पूरा करने में जुट जाएगी।।
मेरे भारत की नव पीढी, अपनी पहचान बनाएगी।
बूढों की बुझती आंखों में,खुशियों की लाली छाएगी।।
हर हाथ रखेगा रोजगार, हर पैर भाग्य को ठोकर पर।
आकाश नाप लेंगे जब हम,अपनी दोनों बाहें भर कर।।
जब फिर से निज गत गौरव को, मेरा भारत छू पाएगा।
इन तथाकथित विकसित देशों के सिर पर पैर जमाएगा।।
नारी की गरिमा की कविता,फिर से दोहराई जायेगी।
वह शक्ति स्वरूपा सडकों पर अपमानित ना हो पाएगी।।
भारत की जन गण शक्ति, जगत को निज ‘कौशल’ दिखलाएगी।
मुझ को लगता है शरद चन्द्रिका तब खुल कर मुसकाएगी।।
फिर आज सुधाकर नाम लिए,क्यों वृथा हमें भरमाते हो।।हर 0
हर तरह अधूरी दुनियां में,क्यों पूर्ण चन्द्र कहलाते हो।।
कोने कोने में लूट मची, भाई पर भाई टूट रहा ।
एहसास मोहब्बत का मरता,अपनों का दामन छूट रहा।।
धरती टुकडों में बांट चुके,अब आसमान पर हैं आंखें।
उडने के स्वप्न हजारों हैं,पर पानी में भीगी पांखें।।
क्यों नहीं रुपहली किरनों से,तुम दिल के दाग मिटाते हो।। हर0
दामन लोहू से सने हुए, गाली गोली की है भाषा।
बस ताकत ही है मानव के, जीवन जीने की परिभाषा।।
ऐ चांद, जमीं पर ये तुमने, कैसे प्रतिबिम्ब सजाए हैं।
अपने चेहरे के दाग हमारे चेहरों पर चिपकाए हैं।।
हो तो मयंक,पर निज कलंक की कथा न क्यों कह पाते हो।।हर0
शासक अनुशासनहीन हुए, शासित पर सारे अनुशासन।
अपनी पहचान गंवा बैठे, हर शक्ल किसी का विज्ञापन।।
सारे रहस्य अब सुलझ चुके,तुम खुद को भी न बचा पाए।
ये ‘प्रगतिशील’ बरसों पहले, तुम पर भी ध्वजा लगा आए।।
रातों को आवश्यक न रहे, फिर क्यों नभ पर इठलाते हो।।हर0
जब कभी ‘ग्रहण’ तुम पर आता,सब गाते भजन, बचाने को।
सैकडों ‘राहु’ अब खडे हुए, ‘चांदों’ पर ग्रहण लगाने को।।
है शरद चांदनी सजी हुई, फिर भी क्यों इतना अंधियारा।
हर सीने में है छुपी आह, दुःख दर्द बटोरे हर द्वारा।।
सागर सुत फिर क्यों सागर के सीने में ज्वार जगाते हो।।हर0
धरती का चक्कर देते तुम, जो पडी हुई खुद चक्कर में।
मुश्किल से टूटन बचा रही,अपने बच्चों की टक्कर में।।
फन पर न टिकी होती अब तक,तो अन्तरिक्ष में खो जाती।
अपनी संतानों की जहरीली, सांसों से ही सो जाती।।
तुम मीलों दूर खडे हम सबकी, हालत पर मुसकाते हो।।हर0
शठ सुधरें सत्संगति पा कर, पहले से सुनते आए हैं।
सत्संग सुभाषित के कवियों ने, खूब तराने गाए हैं।।
भाई, माई, साईं, बापू, प्रतिदिन चैनल पर चीख रहे।
इन व्यवसाई गुरुओं से क्या हम, लेश मात्र भी सीख रहे।।
मानव में मानवता जागे, वह सुधा न क्यों बरसाते हो।।हर0
बचपन जीएगा फिर खुद को,भरपूर जवानी गाएगी।
फिर युवा शक्ति सपनों को पूरा करने में जुट जाएगी।।
मेरे भारत की नव पीढी, अपनी पहचान बनाएगी।
बूढों की बुझती आंखों में,खुशियों की लाली छाएगी।।
हर हाथ रखेगा रोजगार, हर पैर भाग्य को ठोकर पर।
आकाश नाप लेंगे जब हम,अपनी दोनों बाहें भर कर।।
जब फिर से निज गत गौरव को, मेरा भारत छू पाएगा।
इन तथाकथित विकसित देशों के सिर पर पैर जमाएगा।।
नारी की गरिमा की कविता,फिर से दोहराई जायेगी।
वह शक्ति स्वरूपा सडकों पर अपमानित ना हो पाएगी।।
भारत की जन गण शक्ति, जगत को निज ‘कौशल’ दिखलाएगी।
मुझ को लगता है शरद चन्द्रिका तब खुल कर मुसकाएगी।।
फिर आज सुधाकर नाम लिए,क्यों वृथा हमें भरमाते हो।।हर 0

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