(रचना में प्रयुक्त तमाम उपनाम केवल कविता प्रवाह का ही एक हिस्सा है। इनका किन्ही विशेष बन्धुजनों से कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः इसे व्यक्तिगत रूप में न लिया जाए)
नमामि पेटं
नमामि पेटं
पेटं परमाराध्य प्रभो !
पाँडे 'पानी-पाँडे' बनते ।
चौबे जी चपरास पहनते ॥
हेतु तुम्हारे, शुक्ल, भिखारी ।
अद्भुत- महिमा बड़ी तुम्हारी
नमामि पेटं नमामि पेटं
पेट परमाराध्य प्रभो !
द्वारपाल हैं बने द्विवेदी ।
तेल बेंचते बैठ , त्रिवेदी ॥
बने मिश्र जी जमादार हैं।
गावें कैसे गुण अपार हैं।
बिड़ी बनाते हैं साई जी ।
बड़ी बेचती हैं बाई जी॥
पाठक बेचें . धोती-जोड़ा।
जो कुछ आप करें से थोड़ा।
सज हथियार तराजू धारी ।
क्षत्री बन बैठे - पंसारी।
त्याग बेचना जीरा-धनियाँ ।
बने कान्स्टेबिल हैं बनियाँ।
दुखदाई चपेट तव खा के ।
भस्म रमाके जटा बढ़ाकै ॥
कई शूद्र दुर्व्यसनी पाजी |
बन बैठे जग में बाबा जी '
पृथ्वी भर के सकल जीवगण।
साहब, बाबू, सेठ, महाजन |
लगा रंक से महाराज तक ।
सभी आपके हैं आराधक '
सिरमें टोपी तन में कुरता ।
भले नही हो पग में जूता '
आप भरे हैं तो क्या कहना।
बहता सदा शान्तिका झरना।
तव चिन्ता निज मन में धारे ।
भूख प्यास की दशा बिसारे
प्रतिदिन प्रतिक्षण हेतु तुम्हारे।
फिरते हैं सब मारे मारे ।
किसी को परधर्मी बनवाया।
किसीको लन्दन तक पहुचाया
किसी को बाघंबर पहिनाया ।
सब को तुमने नाच नचाया।
लिये तुम्हारे लोग झगड़ते ।
पैर पकड़ते नाक रगड़ते । '
ऐंठ छोड़ते हाथ जोड़ते ।
आँख फोड़ते पैर तोड़ते ॥ ।
ज्ञान तभी तक ध्यान तभी तक।
ईश्वर का गुणगान तभीतक ।
रहते भरे आप हैं जब तक ।
खाली में है कोरी बक बक ।
करें भक्त गण तुमको अर्पित ।
लेह्य.चोष्य,पेयादिक चर्वित।
नित नैवेद्य ग्रहण करते हो ।
तो भी 'खाँव खाँव' करते हो ।
घर में कोई भी मर जावे ।
रोना-धोना भी मच जावे।
तो भी होती है तव पूजा ।
कौन समर्थ आप सा दूजा ॥ :
प्रातः काल नींद खुलती जब ।
मनोवृत्ति जागृत होती तब ॥
याद आपकी ही आ जाती ।
शीघ्र दृष्टि हंडिया पर जाती।
जन्म काल से जीवन भर तक |
प्रातःकाल से अद्धरात्रि तक॥
लेकर मन में विविधि वासना ।
करते सब तव नित उपासना॥
करै न जो नित तव आराधन ।
महा मूर्ख पापी वह दुर्जन ।।
शीघ्र अवज्ञा फल पाता है।
कुछ दिन में ही मर जाता है।
जग में तव ऐसी है महिमा ।
ऐसे हैं प्रताप, गुण गरिमा ।
बड़ को पीपल कहना पड़ता ।
साले को,प्रभु कहना पड़ता।
कई आप हित ऐसे मरते ।
नीचों को सलाम नित करते॥
कई, पीटते यश की भेरी ।
करते नीच द्वार में फेरी ॥
तुम्हीं दुखों से भेंट कराते ।
तुम्ही अनेक चपेट खिलाते ॥
जड़ लेखनी कहाँ तक गावे ,|
जग जीवों की कौन चलावे॥
यक्ष, रक्ष, सिद्धादिक किन्नर ।
सुर तक भी रखते हैं तव डर ॥
मैं ने स्तुति की तव ऐसी।
होगी, न की , किसी ने जैसी॥
बस वरदान यही मैं पाऊँ ।
तेरा दुःख कभी न उठाऊँ ।
- शुकदेवप्रसाद पांडेय
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