बुधवार, 5 मई 2021

पेट-स्तोत्र

(रचना में प्रयुक्त तमाम उपनाम केवल कविता प्रवाह का ही एक हिस्सा है। इनका किन्ही विशेष बन्धुजनों से कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः इसे व्यक्तिगत रूप में न लिया जाए)

नमामि पेटं 

नमामि पेटं 

पेटं परमाराध्य प्रभो ! 


पाँडे 'पानी-पाँडे' बनते । 

चौबे जी चपरास पहनते ॥ 

हेतु तुम्हारे, शुक्ल, भिखारी । 

अद्भुत- महिमा बड़ी तुम्हारी  

नमामि पेटं नमामि पेटं

 पेट परमाराध्य प्रभो ! 

द्वारपाल हैं बने द्विवेदी । 

तेल बेंचते बैठ , त्रिवेदी ॥ 

बने मिश्र जी जमादार हैं। 

गावें कैसे गुण अपार हैं। 

बिड़ी बनाते हैं साई जी । 

बड़ी बेचती हैं बाई जी॥ 

पाठक बेचें . धोती-जोड़ा। 

जो कुछ आप करें से थोड़ा। 

सज हथियार तराजू धारी । 

क्षत्री बन बैठे - पंसारी। 

त्याग बेचना जीरा-धनियाँ । 

बने कान्स्टेबिल हैं बनियाँ। 

दुखदाई चपेट तव खा के । 

भस्म रमाके जटा बढ़ाकै ॥  

कई शूद्र दुर्व्यसनी पाजी | 

बन बैठे जग में बाबा जी ' 

पृथ्वी भर के सकल जीवगण। 

साहब, बाबू, सेठ, महाजन |  

लगा रंक से महाराज तक । 

सभी आपके हैं आराधक ' 

सिरमें टोपी तन में कुरता । 

भले नही हो पग में जूता '

आप भरे हैं तो क्या कहना। 

बहता सदा शान्तिका झरना। 

तव चिन्ता निज मन में धारे । 

भूख प्यास की दशा बिसारे 

प्रतिदिन प्रतिक्षण हेतु तुम्हारे। 

फिरते हैं सब मारे मारे । 

किसी को परधर्मी बनवाया। 

किसीको लन्दन तक पहुचाया 

किसी को बाघंबर पहिनाया । 

सब को तुमने नाच नचाया। 

लिये तुम्हारे लोग झगड़ते । 

पैर पकड़ते नाक रगड़ते । '

ऐंठ छोड़ते हाथ जोड़ते । 

आँख फोड़ते पैर तोड़ते ॥ । 

ज्ञान तभी तक ध्यान तभी तक। 

ईश्वर का गुणगान तभीतक । 

रहते भरे आप हैं जब तक । 

खाली में है कोरी बक बक । 

करें भक्त गण तुमको अर्पित । 

लेह्य.चोष्य,पेयादिक चर्वित। 

नित नैवेद्य ग्रहण करते हो । 

तो भी 'खाँव खाँव' करते हो । 

घर में कोई भी मर जावे । 

रोना-धोना भी मच जावे। 

तो भी होती है तव पूजा । 

कौन समर्थ आप सा दूजा ॥ : 

प्रातः काल नींद खुलती जब । 

मनोवृत्ति जागृत होती तब ॥ 

याद आपकी ही आ जाती । 

शीघ्र दृष्टि हंडिया पर जाती। 

जन्म काल से जीवन भर तक | 

प्रातःकाल से अद्धरात्रि तक॥ 

लेकर मन में विविधि वासना । 

करते सब तव नित उपासना॥ 

करै न जो नित तव आराधन । 

महा मूर्ख पापी वह दुर्जन ।। 

शीघ्र अवज्ञा फल पाता है। 

कुछ दिन  में ही मर जाता है। 

जग में तव ऐसी है महिमा । 

ऐसे हैं प्रताप, गुण गरिमा । 

बड़ को पीपल कहना पड़ता । 

साले को,प्रभु कहना पड़ता। 

कई आप हित ऐसे मरते । 

नीचों को सलाम नित करते॥

कई, पीटते यश की भेरी । 

करते नीच द्वार में फेरी ॥  

तुम्हीं दुखों से भेंट कराते । 

तुम्ही अनेक चपेट खिलाते ॥ 

जड़ लेखनी कहाँ तक गावे ,| 

जग जीवों की कौन चलावे॥ 

यक्ष, रक्ष, सिद्धादिक किन्नर । 

सुर तक भी रखते हैं तव डर ॥ 

मैं ने स्तुति की तव ऐसी। 

होगी, न की , किसी ने जैसी॥ 

बस वरदान यही मैं पाऊँ । 

तेरा दुःख कभी न उठाऊँ ।  


- शुकदेवप्रसाद पांडेय

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