एक-चिंतन....
( किसी लाइक या कमेंट की आशा और अपेक्षा के बिना )
***********आज हमें सर्वत्र यह दिखाई पड़ता है कि आज का युवा वर्ग नशे और मादक द्रव्यों की दुनिया के पीछे पागलों की तरह दौड़ रहा है।
इसका क्या कारण है??
इसके लिए बहुत कुछ 'अकेलापन' जिम्मेदार है, अकेलापन...!! एक मनःस्थिति है जो स्कूल और कॉलेज के परिवेश में, मित्रों और परिचितों की भीड़ में भी एक 'युवा मन' को बुरी तरह अकेला और अधूरा महसूस करने के लिए विवश कर देती है।
माता पिता की व्यस्त जिंदगी से, जहां उनके पास अपने बच्चों के निकट बिताने के लिए कुछ क्षण भी ना हो, तब यह 'अकेलापन' उभरता है, और न जाने कितनी ढलानों को पार कर के आंगन में बिछी धूप की चादर की तरह उनके सारे जीवन को आक्रांत कर लेता है। 'युवा मन' को लगता है कि इस अकेलेपन को पार करके कोई उनके पास कभी नहीं पहुंच सकेगा। इसी चिंतन के साथ वे अंतर्मुखी हो जाते हैं और अपने अकेलेपन में कभी किसी को साझीदार नहीं बनाना चाहते।
यह अकेलापन उनको बुरी तरह से घेर लेता है और उन्हें इससे उबरने का एकमात्र साथी 'नशा' दिखाई पड़ता है। और तब उन्हें लगने लगता है कि .....यही तो एक है जो मेरा है....!!बाकी सब झूठ....!! बेकार.....!! नशा....!!एक झूठा आश्वासन...!! लेकिन कितना आकर्षक....!! इतना आकर्षक कि जो आत्मा को अंदर तक हिला दे.. !! बेबस कर दे..!! पूरी तरह झुलसा दे.....फिर भी अपने मोहजाल में बांधे रहे, इसलिए उन्हें 'नशा' एक दोस्त लगता है...एकमात्र दोस्त ...जो उनकी तरह ही अकेला है...बदनाम है...प्रताड़ित है।
एक और कारण है जो मादक द्रव्यों के प्रति युवा पीढ़ी के मन में एक लगाव पैदा करता है।
आज की युवा पीढ़ी एक दर्द और तनाव के बीच जी रही है, सत्ता का अंकुश उसे सहन नहीं है।यह सत्ता चाहे परिवार के कारण हो, समाज के बंधनों की वजह से हो या सरकार के कारण।
मध्यवर्गीय सामाजिक मर्यादाऐं आज की युवा पीढ़ी को बुर्जुआ(पुरातन-पंथी) लगती है और नैतिक अनैतिक मूल्यों की सीमा रेखा बचकाना।
परिवार नियम और कानून, सत्ता और सरकार सभी उसे अस्थाई और कमजोर लगते हैं।
उसके पास प्रश्नों का अंबार होता है जबकि सन्तुष्टि परक उत्तर का नितांत अभाव।
जो कुछ उसके आसपास हो रहा है वह क्यों हो रहा है?? अगर झूठ बोलना बुरा है तो झूठ को जीना....!! वह बुरा क्यों नहीं है...??? क्या इस पूरे 'अंधे-युग' में उसके किये कुछ हो भी पाएगा...??
यह, और ऐसे ही जाने कितने अन्य तूफान एक अनजाने, अनचीन्हे आक्रोश को जन्म देते हैं, जोकि धीरे धीरे ऊब, घुटन और संत्रास में परिणित हो जाता है।
एक भय भी उसे सताता है कहीं इन्हीं सब मान्यताओं में वह स्वयं भी खो ना जाए। एक छटपटाहट सी होती है और इससे बचने के रास्ते तलाशे जाते हैं ।
सब कुछ छोड़कर एक 'विस्मृति' की तलाश सर्वोपरि हो जाती है, और यह विस्मृति उसे मिलती है... नशे में ..
...और तब लगता है कि यह नशा ही अंतिम यथार्थ है। जिसने त्रस्त मन को शरण दी है।
जबकि यह एक यातनादाई अनंत सिलसिला है।
..... शुरू में दोस्तों के साथ खेल-खेल में शुरू हो जाता है, फिर धीरे-धीरे यह घेरा छोटा होता जाता है और उसका शिकंजा चारों ओर कसता ही जाता है...कसता ही जाता है। नशे की लत उसे चारों ओर फैले नाखूनों के घेरे में ले लेती है। अच्छे-बुरे की पहचान खो जाती है। " में जो यह कर रहा हूँ वह ठीक नहीं है " ये अहसास अंतहीन बालू की तह में डूब जाता है।" किसी ने देख लिया है तो देख ले".........भाड़ में जायें सब....!!! ये अहसास.. केवल यही अहसास .. हर अपराध बोध या पश्चाताप भाव के ऊपर हावी हो जाता है।
कुछ देर के लिए... टूटे मन...टूटे शरीर को..एक आभासी शांति....उसके बाद फिर वही सिरदर्द...टकराव... बिखराव ... और वही खाली पन......जिससे बचने के लिये ये सब किया...!!!
माता पिता की व्यस्त जिंदगी से, जहां उनके पास अपने बच्चों के निकट बिताने के लिए कुछ क्षण भी ना हो, तब यह 'अकेलापन' उभरता है, और न जाने कितनी ढलानों को पार कर के आंगन में बिछी धूप की चादर की तरह उनके सारे जीवन को आक्रांत कर लेता है। 'युवा मन' को लगता है कि इस अकेलेपन को पार करके कोई उनके पास कभी नहीं पहुंच सकेगा। इसी चिंतन के साथ वे अंतर्मुखी हो जाते हैं और अपने अकेलेपन में कभी किसी को साझीदार नहीं बनाना चाहते।
यह अकेलापन उनको बुरी तरह से घेर लेता है और उन्हें इससे उबरने का एकमात्र साथी 'नशा' दिखाई पड़ता है। और तब उन्हें लगने लगता है कि .....यही तो एक है जो मेरा है....!!बाकी सब झूठ....!! बेकार.....!! नशा....!!एक झूठा आश्वासन...!! लेकिन कितना आकर्षक....!! इतना आकर्षक कि जो आत्मा को अंदर तक हिला दे.. !! बेबस कर दे..!! पूरी तरह झुलसा दे.....फिर भी अपने मोहजाल में बांधे रहे, इसलिए उन्हें 'नशा' एक दोस्त लगता है...एकमात्र दोस्त ...जो उनकी तरह ही अकेला है...बदनाम है...प्रताड़ित है।
एक और कारण है जो मादक द्रव्यों के प्रति युवा पीढ़ी के मन में एक लगाव पैदा करता है।
आज की युवा पीढ़ी एक दर्द और तनाव के बीच जी रही है, सत्ता का अंकुश उसे सहन नहीं है।यह सत्ता चाहे परिवार के कारण हो, समाज के बंधनों की वजह से हो या सरकार के कारण।
मध्यवर्गीय सामाजिक मर्यादाऐं आज की युवा पीढ़ी को बुर्जुआ(पुरातन-पंथी) लगती है और नैतिक अनैतिक मूल्यों की सीमा रेखा बचकाना।
परिवार नियम और कानून, सत्ता और सरकार सभी उसे अस्थाई और कमजोर लगते हैं।
उसके पास प्रश्नों का अंबार होता है जबकि सन्तुष्टि परक उत्तर का नितांत अभाव।
जो कुछ उसके आसपास हो रहा है वह क्यों हो रहा है?? अगर झूठ बोलना बुरा है तो झूठ को जीना....!! वह बुरा क्यों नहीं है...??? क्या इस पूरे 'अंधे-युग' में उसके किये कुछ हो भी पाएगा...??
यह, और ऐसे ही जाने कितने अन्य तूफान एक अनजाने, अनचीन्हे आक्रोश को जन्म देते हैं, जोकि धीरे धीरे ऊब, घुटन और संत्रास में परिणित हो जाता है।
एक भय भी उसे सताता है कहीं इन्हीं सब मान्यताओं में वह स्वयं भी खो ना जाए। एक छटपटाहट सी होती है और इससे बचने के रास्ते तलाशे जाते हैं ।
सब कुछ छोड़कर एक 'विस्मृति' की तलाश सर्वोपरि हो जाती है, और यह विस्मृति उसे मिलती है... नशे में ..
...और तब लगता है कि यह नशा ही अंतिम यथार्थ है। जिसने त्रस्त मन को शरण दी है।
जबकि यह एक यातनादाई अनंत सिलसिला है।
..... शुरू में दोस्तों के साथ खेल-खेल में शुरू हो जाता है, फिर धीरे-धीरे यह घेरा छोटा होता जाता है और उसका शिकंजा चारों ओर कसता ही जाता है...कसता ही जाता है। नशे की लत उसे चारों ओर फैले नाखूनों के घेरे में ले लेती है। अच्छे-बुरे की पहचान खो जाती है। " में जो यह कर रहा हूँ वह ठीक नहीं है " ये अहसास अंतहीन बालू की तह में डूब जाता है।" किसी ने देख लिया है तो देख ले".........भाड़ में जायें सब....!!! ये अहसास.. केवल यही अहसास .. हर अपराध बोध या पश्चाताप भाव के ऊपर हावी हो जाता है।
कुछ देर के लिए... टूटे मन...टूटे शरीर को..एक आभासी शांति....उसके बाद फिर वही सिरदर्द...टकराव... बिखराव ... और वही खाली पन......जिससे बचने के लिये ये सब किया...!!!
*Not forwarded*
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