लौट आओ प्यारी गौरैया
(20मार्च विश्व गौरैया दिवस)
गौरैया रोज़ आती। घर आंगन में सुबह से चींचीं करती, फुदकती, दाना चुगती और ज़रा-सी आहट पर फुर्र हो जाती। फिर एक दिन वह नहीं लौटी। आख़िर क्यों दूर हो गई हमसे.....
मैं गौरैया हूं। हां, वही छोटी-सी फुदकती हुई चिड़िया, जो कभी तुम्हारे आंगन, बालकनी और खेतों में बेफिक्र उड़ती थी। याद है चुगती थी? पर अब मैं कहां हूं? क्या तुम्हें मेरी कमी महसूस होती है? तुम इंसानों से मेरी दोस्ती बहुत पुरानी है। जब तुमने खेतों में हल चलाना शुरू किया था, मैं वहीं थी। मिट्टी के घरों की छतों पर मेरा बसेरा था और तुम्हारी कहानियों, लोकगीतों तथा मंदिरों के आंगन में मेरी मौजूदगी थी। मेरी चहचहाहट से सुबह की ताज़ी हवा में एक नई उमंग भर जाती थी। लेकिन अब तेज़ी से बदलते माहौल ने मुझे असहाय बना दिया है। शहरीकरण, प्रदूषण और आधुनिक तकनीकी विकास ने मेरे प्राकृतिक आवास को सिकोड़ दिया है।
पर्यावरण की सेहत का पैमाना में....
मैं सिर्फ़ एक छोटी चिड़िया नहीं हूं, बल्कि मैं उस जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूं जिसे तुम अक्सर अनदेखा कर देते हो हर दिन मैं औसतन 500 छोटे कीड़ों का सेवन करती हूं जिससे खेतों में हानिकारक कीड़ों की संख्या नियंत्रण में रहती है। कई छोटे पौधों के परागण में मेरी भूमिका होती है, जिससे पौधों की वृद्धि और फलों का उत्पादन बेहतर होता है। मेरी मौजूदगी पर्यावरण की सेहत का पैमाना है। अगर मेरी संख्या घटने लगे तो समझ लो कि आसपास का पर्यावरण बिगड़ रहा है।
घोंसला आख़िर कहां बनाऊं
आज के शहरों में जहां ऊंची इमारतें, शीशे की दीवारें और कंक्रीट के जंगल बन गए हैं, मेरे जैसी प्रजातियां कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। कुछ शोधों के अनुसार, पिछले 30-40 वर्षों में शहरी इलाक़ों में हमारी आबादी में 70% से अधिक गिरावट देखी गई है। परंपरागत घरों और खुली छतों का अभाव मेरे लिए सुरक्षित घोंसला बनाने के स्थानों को कम कर देता है। ध्वनि, वायु और विद्युत चुंबकीय विकिरण मुझे परेशान करते हैं। मोबाइल टावरों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तरंगें मेरी उड़ान को बाधित कर देती हैं।
मेरी कमी की वजह :
कृषि के आधुनिक तरीक़े ने खेती को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही प्राकृतिक संतुलन को भी हिलाकर रख दिया है। कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मेरे भोजन के स्रोत यानी छोटे कीड़े-मकोड़े तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं। भारत के कुछ हिस्सों में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण हम गौरैयों की संख्या में पिछले एक दशक में लगभग 40% तक कमी आई है। कीटनाशकों का इस्तेमाल मिट्टी, पानी और हवा को ज़हरीला बना देता है जिससे न सिर्फ़ जीव-जंतुओं, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
मुझे बचा पाना तुम्हारे ही हाथ में है.....
कुछ क़दम उठाने होंगे तुम्हें ताकि मैं फिर से तुम्हारे आंगन लौट सकूं और तुम्हारी सुबह मेरी चहचहाहट से खिल उठे।
1.प्राकृतिक आवास बनाएं अपनी बालकनी या छत पर छोटे- छोटे नेस्टिंग बॉक्स या सुरक्षित कोने बनाएं।
2.बाग़-बाग़ीचों में ऐसे पौधों का चयन करें, जिससे मुझे खाद्य और आश्रय दोनों मिल सकें।
3.खाद्य और पानी की व्यवस्था पानी के कटोरे और अनाज, जैसे बीज या चावल के दाने अलग से रखें ताकि मेरी और अन्य छोटी चिड़ियों की मदद हो सके।
4.मौसम के अनुसार खाद्य सामग्री का ध्यान रखें जिससे मुझे हर मौसम में सहारा मिल सके।
रासायनिक पदार्थों का कम से कम उपयोग :
1.कृषि में जैविक और प्राकृतिक तरीक़ों को अपनाएं।
2.कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का उपयोग न्यूनतम करें ताकि न केवल मेरी, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा हो सके।
3.पर्यावरण संरक्षण का संदेश फैलाएं: अपने मित्रों, परिवार और समुदाय में इस बारे में जागरूकता फैलाएं कि एक छोटी-सी चिड़िया भी पर्यावरण की सेहत का पैमाना होती है।
4.सोशल मीडिया, स्कूलों और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से मेरी कहानी सुनाएं ताकि हर कोई इस परिवर्तन का हिस्सा बन सके।
1. नर और मादा की पहचान ■
नर गौरैया चमकीले रंग के पक्षी होते हैं जिनके सिर भूरे, गाल सफ़ेद और गर्दन लाल होती है। मादा पूरी तरह से भूरी नज़र आती है। इनका निचला हिस्सा धूसर भूरा होता है जबकि पीठ पर स्पष्ट रूप से भूरी और काली धारियां होती हैं।
2. गौरैया के अंडे ....■
गौरैया हर प्रजनन के मौसम में (मार्च से अगस्त) में आमतौर पर 4-6 छोटे, धब्बेदार अंडे देती है। इन अंडों का आकार लगभग 12-16 मिमी तक होता है और इन पर मौजूद हल्के धब्बे प्राकृतिक परिवेश में छिपने में मदद करते हैं।
3.चीन का अनुभव क्या कहता है?
1950 के दशक में चीन ने 'स्मैश स्पैरो' नामक अभियान के तहत गौरैयों को मारना शुरू किया, यह मानते हुए कि वे फ़सलों को नुकसान पहुंचाती हैं। लेकिन गौरैयों के नष्ट हो जाने से कीड़ों की संख्या में उछाल आया, जिससे फ़सलों पर अप्रत्याशित प्रभाव पड़ा और चीन में खाद्यान्न संकट और भुखमरी जैसी गंभीर समस्या देखने को मिली।
4.कबूतरों का दबदबा है.....
■ शहरी क्षेत्रों में ऊंची इमारतों और कंक्रीट की संरचनाओं में कबूतर तेज़ी से अपना विस्तार कर लेते हैं। गौरैया और अन्य छोटे पक्षी उनकी बढ़ती मौजूदगी के कारण भी शहरों से दूर चले जाते हैं, चूंकि उन्हें पर्याप्त दाना-पानी नहीं मिल पाता।
मैं थी, मैं हूं... क्या मैं रहूंगी?
मेरी कहानी सिर्फ़ एक गौरैया की नहीं है, बल्कि ये धरती, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की कहानी भी है। अगर हम आज क़दम उठाएंगे तो न सिर्फ़ मुझे, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखा जा सकेगा। दुनिया का संतुलन तुम्हारे हाथ में है और मैं उम्मीद करती हूं कि तुम मुझे बचाने के लिए आवश्यक क़दम उठाओगे ।
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