बुधवार, 16 सितंबर 2020

हमारी दिल्ली- एक सिंहावलोकन ( इतिहास श्रृंखला )

विषय सूची

1. दिल्ली का इतिहास

2. पहली दिल्ली - पुराना लाल कोट

3. दूसरी दिल्ली - सीरी

4. तुग़लक़ों की तीन दिल्लियाँ - तुग़लक़ाबाद, जहाँपनाह और फ़ीरोज़ाबाद

5. तैमूर लंग का हमला

6. छठी दिल्ली : दीनपनाह या पुराना क़िला

7. सातवीं दिल्ली : शाहजहानाबाद

8. नादिर शाह का हमला और अहमद शाह अब्दाली की लूट

9. आठवीं दिल्ली : नयी दिल्ली

10. स्वतन्त्रता के बाद सिंहावलोकन

11. दर्शनीय स्थान

12. संग्रहालय

13. प्रमुख धार्मिक स्थल

14. प्रमुख बाग़-बग़ीचे

15. प्रमुख त्यौहार और भोजन

16. ख़रीदारी और परिवहन

17. विकास की रफ़्तार में आगे दिल्ली

18. दिल्ली के आस-पास

अध्याय एक

दिल्ली का इतिहास

दिल्ली का इतिहास कब शुरू होता है, इसकी स्थापना कब हुई, इस विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार दिल्ली का इतिहास तीन हज़ार वर्ष पुराना है। कुछ लोग इसे और पहले ले जाते हैं। दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में पुरा पाषाण युग के चिह्न, औ़जार और हथियार पाये गये हैं। हड़प्पा सभ्यता सिन्धु घाटी तक सीमित नहीं थी। वह दिल्ली के नज़दीक तक फैली थी। दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में उत्तर हड़प्पा काल के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। दिल्ली ने अनेक साम्राज्यों की स्थापना और अन्त देखा है। उसने अनेक आक्रमणकारियों के हमले झेले हैं। दिल्ली अनेक बार बसी और उजड़ी है। स्वतन्त्रता के समय पुरानी और नयी दिल्ली की कुल आबादी लगभग आठ लाख थी जो अब लगभग एक करोड़ ५० लाख है। दिल्ली में हर रोज़ सौ-दो सौ लोग रोज़गार और बेहतर अवसरों की तलाश में आते हैं। इस सम्बन्ध में भी विवाद है कि दिल्ली कितनी बार बसी है। कुछ लोगों का कहना है कि दिल्ली आठ बार बसी है, जबकि दूसरों का मानना है कि यह सोलह बार बसी है।

दिल्ली के बसने के बारे में ये दोनों बातें सच हो सकती हैं। हमारे देश में हर राजा को अपने नाम पर एक नया नगर बसाने का शौक़ था। उनके बसाये कुछ शहर फले-फूले और कुछ शहर समय के साथ विलीन हो गये। स्वतन्त्रता के बाद दिल्ली का इतना विस्तार हुआ है कि पहले बसी सभी बस्तियाँ वर्तमान दिल्ली में समा गयी हैं।

कालिका पुराण के अनुसार इन्द्रप्रस्थ नगर बसने से पहले यहाँ एक घना जंगल था जो खाण्डव वन कहलाता था। चन्द्रवंशी राजा सुदर्शन ने वन को साफ़ कर वहाँ खाण्डवपुरी बसायी। बाद में इन्द्र के अनुरोध पर काशी नरेश विजय ने खाण्डवपुरी पर हमला किया और सुदर्शन का वध करके खाण्डवपुरी अपने अधिकार में ले लिया। कालान्तर में विजय को यह नगरी ख़ाली करनी पड़ी और वह फिर वन क्षेत्र में बदल गयी।

यह वन क्षेत्र ऋषि-मुनियों का तपस्या-स्थल बन गया। खाण्डव वन के कुछ क्षेत्र पवित्र तीर्थ बन गये जैसे निगम (वेद) बोध (ज्ञान) घाट। शाहजहाँ ने जब पुरानी दिल्ली (शाहजहानाबाद) बसायी तो शहर की दीवार में एक दरवाज़ा निगम बोध घाट रखा। दारा शिकोह ने इसी स्थान पर काशी के पण्डितों की सहायता से उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद किया था।

पाण्डवों की नगरी इन्द्रप्रस्थ वर्तमान ओखला से बुराड़ी गाँव तक फैली थी। उन्होंने निगम बोध घाट पर ही अश्वमेध यज्ञ किया था। पाण्डवों के समय में यमुना चाँदनी चौक से हो कर बहती थी। चाँदनी चौक में एक प्राचीन मन्दिर घण्टेश्वर है जो पहले विश्वेश्वर कहलाता था। यह स्थान कभी विद्यापुरा कहलाता था। इसके समीप राजघाट है जहाँ ३१ जनवरी १९४८ को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का अन्तिम संस्कार हुआ था।

दिल्ली में ओखला के समीप पहाड़ी पर कालिका देवी का एक प्राचीन मन्दिर है। पुराने क़िले की दीवार के पास भैरों का मन्दिर है। पाण्डव भैरव यानी शिव के भक्त थे। दिल्ली में दो शक्तिपीठ भी हैं। योग माया का मन्दिर महरौली में लोहे की लाट से कुछ दूरी पर है। कालिका भवानी का मन्दिर बुराड़ी गाँव में है। ये प्राचीन तीर्थ महाभारत काल में भी थे, लेकिन वर्तमान घाट और मन्दिर महाभारत कालीन नहीं हैं। ये सौ वर्ष से अधिक पुराने नहीं हैं।

महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर ने ईसा पूर्व १४५० में खाण्डवप्रस्थ में अपनी राजधानी बनायी थी। कुछ अन्य विद्वान इसे एक हज़ार वर्ष और पीछे ले जाते हैं। बाद में युधिष्ठिर अपनी राजधानी दिल्ली से ८० किलोमीटर दूर हस्तिनापुर ले गये। लेकिन महाभारत काव्य-ग्रन्थ है अथवा ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करने वाली रचना, इस विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। तो भी, दिल्ली के समीप इन्द्रप्रस्थ, वृकप्रस्थ (बागपत), तिलप्रस्थ (तिलपत), सोनप्रस्थ (सोनीपत), पानीप्रस्थ (पानीपत) का होना और महाभारत में उनका उल्लेख होना इन नगरों के ऐतिहासिक स्वरूप को प्रकट करता है।

अकबर के दरबारी अबुल फ़ज़ल के अनुसार लाक्षागृह से पाण्डवों के सुरक्षित बच निकलने के बाद उनसे मैत्री करने के लिए दुर्योधन ने उन्हें इन्द्रप्रस्थ प्रदान किया। बाद में हुमायूँ ने इन्द्रप्रस्थ को दीन पनाह नाम दिया और वहाँ एक क़िले का निर्माण कराया। क़िले का निर्माण कार्य पूरा होने से पहले उसे शेरशाह के हाथों पराजित होने के बाद भारत से भागना पड़ा। शेरशाह ने क़िले को मज़बूत करवाया और क़िले का नाम शेरगढ़ रखा। उसने क़िले के भीतर शेर मण्डल का निर्माण भी कराया। हुमायूँ के दीन पनाह और शेरशाह के शेरगढ़ नाम को आम जनता ने कभी स्वीकार नहीं किया। वह उसे पाण्डवों का क़िला कहती रही। पुराने क़िले के नज़दीक इन्द्रप्रस्थ गाँव बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक था। जब १९११ में दिल्ली को देश की राजधानी बनाने का निर्णय किया गया तो इस गाँव के निवासियों को दूसरी जगहों पर बसा दिया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इस स्थान से प्राप्त कुछ सामग्री ईसा से एक हज़ार वर्ष पुरानी है।

पुराने क़िले में पिछले चार दशकों से खुदाई हो रही है। इस खुदाई के दौरान मिट्टी के अनेक पात्र, मूर्तियाँ और अन्य वस्तुएँ मिली हैं। इनसे प्रमाणित होता है कि इस स्थान ने मौर्य काल, शुंग काल, कुशाण काल, गुप्त काल और राजपूतों, मध्यकालीन बादशाहों और मुग़लों के दौरान अनेक सभ्यताओं का उत्थान और पतन देखा है। इस स्थान से प्राप्त सामग्री से यह भी पता लगता है कि दिल्ली क्षेत्र में मौर्य काल के दौरान, अर्थात ईसा पूर्व २७३-२३६ में अच्छी बसावट थी। १९६६ में श्रीनिवासपुरी में मौर्य काल का अशोक का शिलालेख मिला। इससे सिद्ध होता है कि मौर्य काल में भी दिल्ली क्षेत्र व्यापारियों के आवागमन और लोगों के निवास का महत्वपूर्ण केन्द्र था। अशोक के शिलालेख मुख्य रूप से प्रमुख बस्तियों और व्यापारिक मार्गों में लगाये जाते थे। अबुल फ़ज़ल सहित अनेक मुसलमान इतिहासकारों ने अपनी रचनाओं में इन्द्रप्रस्थ को मान्यता प्रदान की है। भगवत पुराण के अनुसार अर्जुन के वंशजों ने कई पीढ़ियों तक इस क्षेत्र में राज किया था।

दिल्ली की स्थापना के सम्बन्ध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। एक किंवदन्ती के अनुसार कन्नौज के राजा देलू के एक सरदार स्वरूप दत्त ने पाण्डवों के वंशजों से यह क्षेत्र छीन कर वर्तमान क़ुतुब और तुग़लक़ाबाद के मध्य के क्षेत्र का नाम अपने राजा के नाम पर देलू रखा। फिरिश्ता के अनुसार दिल्ली की स्थापना ईसा से ४०० वर्ष पूर्व इन्द्रप्रस्थ नामक स्थान पर की गयी। यह भी कहा जाता है कि मौर्य राजा धिल्लू के नाम पर इस क्षेत्र का नाम धिल्लू रखा गया जो बाद में दिल्लू और फिर दिल्ली हो गया, कुछ लोगों का कहना है कि फ़ारसी शब्द दहलीज़ के नाम पर देहली नाम रखा गया जो आगे चल कर दिल्ली हो गया। दहलीज़ का अर्थ सीमा होता है। मुसलमानों के लिए दिल्ली सीमान्त क्षेत्र था।

कनिंघम के अनुसार इस क्षेत्र के लिए दिल्ली नाम पहली बार विक्रमादित्य के ज़माने में इस्तेमाल किया गया। विक्रमादित्य ईसा से ५७ वर्ष पूर्व कन्नौज के राजा थे। दिल्ली की स्थापना तोमर नरेशों ने सन ७३६ में की। उन्होंने इसका नाम दिल्ली रखा, क्योंकि इस क्षेत्र की ज़मीन पोली थी और यहाँ सरदारों के तम्बुओं की कीलें ज़मीन के मुलायम और पोली होने के कारण निकल जाती थीं। इस सम्बन्ध में एक लोकोक्ति प्रचलित है :

कीली तो ढीली भई
तोमर भया मतिहीन

क्या कीली से तात्पर्य क़ुतुब के समीप स्थित लौह स्तम्भ से है? कहा जाता है कि यह लौह स्तम्भ पहले इन्द्रप्रस्थ में था। इसे तोमरों ने प्राचीन विष्णु मन्दिर के समीप लगवाया। पण्डितों की सलाह के अनुसार इसे इस प्रकार लगवाया गया कि इसका निचला हिस्सा वासुकी नाग के ऊपर स्थित रहे। पण्डितों का कहना था कि जब तक लौह स्तम्भ वासुकी नाग के ऊपर रहेगा तोमर राजवंश का शासन स्थायी रहेगा। लेकिन राजा को विश्वास नहीं हुआ। उसने लौह स्तम्भ खुदवा कर देखना चाहा। जब लौह स्तम्भ खोद कर देखा गया तो उसके निचले हिस्से पर रक्त लगा था। लौह स्तम्भ पुन: वासुकी नाग के ऊपर बिठाने की चेष्टा की गयी। इस बीच वासुकी नाग आगे बढ़ गया और तोमर राजवंश अस्थिर हो गया। अधिकांश विद्वान इस गाथा को कपोल कल्पित मानते हैं।

लौह स्तम्भ कब लगाया गया इस विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। अधिकांश का मत है कि इसे चौथी-पाँचवीं शताब्दी में लगाया गया। इसके सिर पर गरुड़ की आकृति बनी हुई थी। गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन है। स्तम्भ में उत्कीर्ण लेख के अनुसार चन्द्र नरेश ने अनेक स्थानों पर विजय प्राप्त करने के बाद विष्णु भगवान के ध्वज दण्ड के रूप में सन ३१७-४१७ के दौरान इसकी स्थापना की। इसकी लम्बाई आधार पर २३ फ़ुट ८ इंच और शिखर पर १२ इंच है। इसके शिखर पर एक उल्टा कमल बना हुआ है। इसका व़जन छह टन से अधिक होगा। कुछ लोगों का मत है कि यह स्तम्भ बिहार में बनाया गया और वहाँ से यहाँ लाया गया। यह ढलवाँ लोहे का नहीं, पिटवाँ लोहे का है। पिटवाँ लोहे के कई खण्ड तैयार करके उन्हें जोड़ दिया गया।

यह स्तम्भ तत्कालीन भारतीयों के धातुओं के ज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियों का परिचायक है। यूरोप के देश दो-ढाई सौ वर्ष पूर्व तक इस तरह का लोहा तैयार नहीं कर सकते थे। लगभग १६०० वर्षों से यह स्तम्भ गर्मी, बारिश, तूफ़ानी हवाओं और सर्दी का सामना करता रहा है और इस पर मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, कोई ज़ंग नहीं लगा है। नादिर शाह ने तोप के गोले छोड़ कर इसे ध्वस्त करना चाहा लेकिन उन गोलों का इस पर कोई असर नहीं हुआ।

ऐतिहासिक दृष्टि से दिल्ली का इतिहास अनंगपाल द्वारा इस क्षेत्र पर अधिकार करने से शुरू होता है। उसने गुड़गाँव जिले में अरावली की पहाड़ियों पर अपनी राजधानी अनंगपुर बनायी। पर्सिवल स्पियर के अनुसार उसने १०२० में तुग़लक़ाबाद से तीन मील दूर सूरज कुण्ड का निर्माण कराया। सूरज कुण्ड एक घाटी के सिरे पर है। अनंगपाल ने सम्भवत: इस स्थान का चुनाव मुसलमानों के आक्रमण से रक्षा के लिए किया था। सूरज कुण्ड में अब प्रतिवर्ष फ़रवरी में हस्तशिल्प मेला लगता है। इसमें सभी राज्यों के हस्तशिल्पी और कुछ विदेशी भी भाग लेते हैं।

एक अन्य वर्णन के अनुसार मुहम्मद शहाबुद्दीन ग़ोरी ने ११९१ में पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर दिल्ली पर अधिकार किया। कुछ हिन्दू इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वीराज ने इससे पहले मुहम्मद ग़ोरी को सात बार पराजित किया था और आठवीं बार पराजित हो कर बन्दी बना कर उसे ग़ोर ले जाया गया। पृथ्वीराज के साथ उसके राजकवि चन्द बरदाई को भी ग़ोर ले जाया गया। ग़ोर पहुँच कर चन्द बरदाई ने सुल्तान मुहम्मद ग़ोरी को अपनी कविताओं और लतीफ़ों से प्रसन्न कर दिया।

चन्द बरदाई ने सुल्तान से पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण चलाने की चर्चा की। जब सुल्तान ने इस पर विश्वास करने से इनकार किया तो चन्द बरदाई ने सुल्तान से कहा कि पृथ्वीराज को ऐसा बाण चलाने का आदेश दिया जाये जिससे सत्य-असत्य का पता चल जायेगा। सुल्तान ने पृथ्वीराज से अपने शब्दभेदी बाण का करतब दिखाने को कहा। जब सभी तैयारियाँ हो गयीं और पृथ्वीराज ने धनुष पर बाण चढ़ा लिया, सुल्तान ने उसे बाण चलाने का हुक्म दिया। चन्द बरदाई ने कहा,

‘‘चार बाँस चौबीस गज़ अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान।।’’

यह सुन कर पृथ्वीराज ने निशाना साधा और बाण छोड़ा। बाण जा कर मुहम्मद ग़ोरी को लगा और वह कटे पेड़ की तरह गिर पड़ा। इसके बाद सुल्तान के सैनिकों ने पृथ्वीराज और चन्द बरदाई की हत्या कर दी। पृथ्वीराज ने पराजय का बदला ले लिया।

अकबर के दरबारी इतिहास लेखक अबुल फ़ज़ल ने हिन्दू इतिहासकारों के हवाले से इस घटना का वर्णन किया है। अनेक इतिहासकारों के अनुसार इस कथा में कोई सच्चाई नहीं है। पृथ्वीराज तरायन के युद्ध (११९२) में बन्दी बनाया गया और मुहम्मद ग़ोरी के हाथों मारा गया। दिल्ली पर अधिकार करने के बाद मुहम्मद ग़ोरी ने राय पिथौरा के क़िले में स्थित मन्दिर को तोड़ कर वहाँ मस्जिद बनवायी। इसी के साथ देश में मन्दिरों को तोड़ने और देव मूर्तियों को मस्जिदों के रास्तों और सीढ़ियों में दबाने का सिलसिला शुरू हुआ।

दिल्ली पर अधिकार करने के बाद इसे आक्रमणकारी सेना का मुख्यालय बना दिया गया। पृथ्वीराज को हटा कर ग़ोरी ने कन्नौज पर हमला किया। इटावा के पास चाँदवाड़ की लड़ाई में जयचन्द मारा गया। कन्नौज और बनारस पूरी तरह लूटे गये। लूट-पाट, आगज़नी, औरतों का अपहरण और लोगों को ग़ुलाम बनाने का कार्यक्रम अबाध गति से चलता रहा। नि:सन्देह इस दौरान एक-दो उदार शासक भी हुए, जिन्होंने हिन्दू प्रजा के साथ मानवता का व्यवहार किया, लेकिन अधिकांश शासक कट्टरपन्थी, उग्र और जिहादी विचारों के थे। लगभग समूचा देश मुसलमान सेना के क़ब्ज़े में था और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सभी स्थानों पर सैनिक छावनियाँ थीं।

मुहम्मद शहाबुद्दीन ग़ोरी अपने ग़ुलाम प्रतिनिधि क़ुतुबुद्दीन को शासन सौंप कर ग़ोर लौट गया। क़ुतुबुद्दीन ने १२०६ में स्वयं को दिल्ली का सुल्तान घोषित किया। वह भारत में तुर्क इस्लामी राज्य का संस्थापक था। उसने दिल्ली में अनेक इमारतें बनवायीं। उसने महरौली क्षेत्र में २७ हिन्दू, जैन मन्दिरों को गिरा कर उनके मलबे से क़ुतुब मीनार और क़ुव्वत-उल-इस्लाम (इस्लाम की शक्ति) मस्जिद बनवायी। यह बात मस्जिद में लगी पट्टिका में स्पष्ट रूप से कही गयी है। इस मस्जिद का निर्माण इस क्षेत्र में स्थित एक प्रमुख मन्दिर को गिरा कर किया गया। मन्दिर को गिराने के बाद पश्चिम दिशा में मेहराबयुक्त एक दीवार बना दी गयी। मन्दिरों के मलबे का उपयोग मस्जिद और क़ुतुब मीनार के निर्माण में उदारता से किया गया।

क़ुतुबुद्दीन और उसके बाद के सुल्तानों ने दिल्ली को सल्तनत की राजधानी बनाया। उसे क़िले, महलों, मस्जिदों और बाज़ारों से सजाया। दिल्ली के सुल्तानों ने धीरे-धीरे दक्षिण भारत के कुछ भाग को छोड़ शेष सम्पूर्ण भारत पर अधिकार कर लिया। उनका साम्राज्य गुप्त और हर्ष की तरह विशाल था। इस कारण राजधानी दिल्ली का तेज़ी से विकास हुआ। इन सुल्तानों ने ३२० वर्षों के भीतर दिल्ली क्षेत्र में सात नगरों की स्थापना की।

उस काल के सुल्तानों का मानना था कि दिल्ली की सल्तनत इस्लामी राज्य है। उनका मानना था कि सभी ग़ैर-मुसलमान राज्य के दुश्मन हैं, इसलिए राज्य के हित में है कि उन्हें नियन्त्रण में रखा जाये। हनफ़ी विचारधारा के अनुसार राज्य को ग़ैर-मुसलमानों की संख्या और शक्ति को कम करने के उपाय करने चाहिए। उनको सुरक्षा प्रदान करने के एवज़ में उन पर जज़िया लगाया जाना चाहिए। इस्लाम ने सामाजिक क्षेत्र में समानता का जो बेहतरीन सिद्धान्त प्रतिपादित किया था उससे हिन्दुओं को अलग रखा गया।

ज़ख़ीरात-उल-मुल्क के लेखक शेख़ हमदानी के अनुसार किसी मुसलमान शासक के संरक्षण में रहने वाले ग़ैर-मुसलमानों के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना ज़रूरी था : वे नये मन्दिर नहीं बना सकते थे। वे पुराने मन्दिरों की मरम्मत नहीं कर सकते थे। वे मुसलमान यात्रियों को मन्दिर में विश्राम करने से नहीं रोक सकते थे। हिन्दू न तो जासूस बन सकते थे और न जासूसों की सहायता कर सकते थे। अगर कोई मुसलमान बनना चाहता तो उसे ज़िम्मी (हिन्दू) नहीं रोकेंगे। अगर ज़िम्मियों की कोई बैठक हो रही है और कोई मुसलमान उसमें भाग लेना चाहता है तो उसे रोका नहीं जायेगा। ज़िम्मी मुसलमानों जैसे कपड़े नहीं पहनेंगे। ज़िम्मी घोड़े पर नहीं चढ़ेंगे और तीर-कमान ले कर नहीं चलेंगे। वे मुहर वाली अँगूठी नहीं पहनेंगे और अपनी पहचान प्रकट करने वाला कपड़ा पहनेंगे। ज़िम्मी मुसलमानों के पड़ोस में मकान नहीं बनायेंगे और मुसलमान ग़ुलाम नहीं ख़रीदेंगे।

मुहम्मद तुग़लक़ और फ़ीरोज़ तुग़लक़ अपेक्षाकृत उदार शासक समझे जाते थे। लेकिन जब चीन के सम्राट ने मुहम्मद तुग़लक़ से मुसलमान सेना द्वारा ध्वस्त एक मन्दिर को फिर से बनाने की अनुमति माँगी तो उसने अनुमति देने से इनकार कर दिया। सल्तनत काल के शासक भारत को मुसलमान देश मानते थे। उनकी फ़ौजें थोड़ा-सा भी विरोध करने पर हिन्दू स्त्री-पुरुषों और बच्चों को बन्दी बना लेती थीं। कुछ को जबरन मुसलमान बना दिया जाता था और शेष को ग़ुलाम बना कर बेच दिया जाता था।

सांस्कृतिक मिलन

अरबों ने सन ७११-७१२ में सिन्ध और मुल्तान पर अधिकार किया था। इससे पहले भी अरब व्यापार के लिए भारत के पश्चिमी तट, सिन्ध, गुजरात और केरल में आते-जाते रहते थे। सिन्ध पर विजय प्राप्त करने के बाद अरब विजेताओं ने स्थानीय जनता पर किसी तरह का अत्याचार नहीं किया। इस तरह इस्लामी और हिन्दू संस्कृतियों का आपसी सम्पर्क लगभग १४०० वर्ष पहले शुरू हुआ। इस सम्पर्क के परिणामस्वरूप हिन्दू विद्वानों के खगोल विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, गणित, बीज गणित आदि के अनेक संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद अरबी-फ़ारसी में किया गया। इस काल में अनेक भारतीय विद्वान पश्चिम एशिया के अरब राज्यों में विशेष रूप से ख़लीफ़ा के दरबार में उच्च पदों पर नियुक्त थे। अरबों ने भारतीय अंक प्रणाली, दशमलव और शून्य यूरोपीय देशों में पहुँचाया। भारत ने अरब देशों से चिकित्सा की यूनानी प्रणाली प्राप्त की जो आयुर्वेद की तरह जड़ी-बूटियों पर आधारित थी।

दिल्ली के अधिकांश सुल्तान अपनी सल्तनत के इस्लामी राज्य होने का दावा करते थे। इस्लामी राज्य का अर्थ था ख़लीफ़ा की प्रभुसत्ता को स्वीकार करना और शरिया यानी इस्लामी क़ानून का पालन करना। लेकिन व्यवहार में दिल्ली के सुल्तान ख़लीफ़ा की प्रभुसत्ता को नाममात्र के लिए स्वीकार करते थे और अपनी मर्ज़ी के अनुसार इस्लामी क़ानून की व्याख्या करते थे।

इस्लामी क़ानून के अनुसार किसान से उसकी उपज का पाँचवाँ हिस्सा लगान के रूप में लिया जाना चाहिए था। कम उपजाऊ भूमि का लगान इससे भी कम लिये जाने का आदेश था। मुसलमान किसानों को लगान वसूली में पचास प्रतिशत की रियायत दी जानी थी, लेकिन लोदी और सूरी सुल्तान पाँचवें हिस्से से कहीं अधिक लगान वसूल करते थे। अलाउद्दीन ख़िल्जी ने तो उपज का आधा हिस्सा लेना शुरू किया। उत्तराधिकार का इस्लामी क़ानून भी लागू नहीं किया जाता था। इस्लाम अपनाने वालों को उत्तराधिकार के मामले में अपना पुराना क़ानून मानने की छूट थी। इस्लाम का सबसे महत्वपूर्ण योगदान समानता और भाई-चारे की भावना की स्थापना और औरतों को सम्पत्ति में हिस्सा देना था। लेकिन धर्म परिवर्तन करने वाले हिन्दुओं पर इस्लामी क़ानून का यह बुनियादी सिद्धान्त लागू नहीं होता था। उन्हें पहले की तरह औरतों को सम्पत्ति में हिस्सा न देने की छूट थी। सूद पर रुपया देना इस्लाम में वर्जित है, लेकिन इस क़ानून का भी पालन नहीं किया जाता था।

प्रारम्भ में मुसलमान विदेशी आक्रमणकारी थे। उन्हें म्लेच्छ कहा जाता था। यह समझा जाता था कि विदेशी आक्रमणकारी कुछ समय बाद लूट-मार करके अपने देश वापस चले जायेंगे। कुछ समय तक ऐसा ही हुआ लेकिन जब इन आक्रमणकारियों ने यहीं बसने और राज करने का निर्णय किया तो हिन्दुओं और उनके बीच सम्पर्क होना ज़रूरी हो गया। ग़ुलाम वंश के शासन के प्रारम्भिक दौर में शासन और सेना में हिन्दुओं के लिए कोई स्थान नहीं था, लेकिन कालान्तर में दोनों पक्षों के बीच विरोध के भाव कम हो गये और सत्ता के साथ जनता के सम्बन्ध सामान्य होने लगे। पारस्परिक सन्देह, अविश्वास और शत्रुता के भाव कम हुए और लोग नयी सरकार के साथ सहयोग करने लगे। इस बीच कुछ लोगों ने राजनैतिक, आर्थिक और सैनिक लाभ के लिए इस्लाम क़बूल करना भी स्वीकार किया।

मुसलमान सुल्तानों ने देश में शान्ति, व्यवस्था और न्यायपूर्ण शासन की स्थापना की। उन्होंने हिन्दुओं के विवाह, उत्तराधिकार और अन्य निजी क़ानूनों में बदलाव नहीं किया। उन्हें निजी मामलों में अपने क़ानून से नियन्त्रित होने का अधिकार प्रदान किया। हिन्दुओं ने फ़ारसी सीखनी शुरू की और उन्हें प्रशासन में पद मिलने लगे। लगान वसूली के क्षेत्र में निचले स्तर पर सभी कर्मचारी हिन्दू थे। उनमें कोई बदलाव नहीं किया गया। लगान का विवरण फ़ारसी और हिन्दी में अलग-अलग व्यक्ति लिखते थे। हालाँकि जज़िया और अधिकारियों तथा सैनिकों के दुर्व्यवहार के कारण कभी-कभी दोनों पक्षों के बीच तनाव हो जाता था। जज़िया अनिवार्य सैनिक सेवा के बदले लिया जाने वाला कर था। चूँकि अनिवार्य सैनिक सेवा का सवाल नहीं था, इसलिए जज़िया लिये जाने का कोई औचित्य नहीं था। जज़िया भेदभावपूर्ण कर था और आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाता था।

लेकिन इस सब के बावजूद दोनों समुदायों में धीरे-धीरे सम्पर्क और मेल-मिलाप बढ़ा। इस मेल-मिलाप को बढ़ाने में धर्मान्तरित हिन्दुओं का काफ़ी योगदान था। प्रारम्भ में कथित नीची जातियों के लोग इस्लाम के समानता और भाई-चारे के सिद्धान्त से आकृष्ट हो कर मुसलमान हुए। उस युग में जाति, सम्प्रदाय और पेशे से पंच या मुखिया के धर्म बदलने पर उस वर्ग के सभी लोग धर्म परिवर्तन करते थे। अब इस जाति, सम्प्रदाय और पेशे के एक वर्ग के मुसलमान होने के बावजूद उसके अपने पुराने पेशेवर हिन्दुओं के साथ सामाजिक-आर्थिक सम्बन्ध पहले की तरह बने रहते थे। इस सम्पर्क के कारण हिन्दू-मुसलमानों ने एक-दूसरे के रहन-सहन और विचारों को प्रभावित किया।

कुछ मुसलमान नरेशों तथा सरदारों ने हिन्दू लड़कियों से विवाह किया। सुल्तान ग़यासुद्दीन तुग़लक़ और फ़ीरोज़ तुग़लक़ की माँ हिन्दू थीं। फ़ीरोज़ ने भी एक गूजर लड़की से विवाह किया था। इससे दोनों धर्मों के बीच की खाई कुछ कम हुई हालाँकि अधिकांश हिन्दू, विशेष रूप से पण्डित पुरोहित ऐसे विवाहों के विरुद्ध थे। मुसलमान मुल्ला, मौलवी हिन्दुओं को काफ़िर समझते थे और दोनों धर्मों के मेल-मिलाप के विरुद्ध थे।

हिन्दू और मुसलमानों के बीच व्यापक सम्पर्क १३वीं शताब्दी में दिल्ली में ग़ुलाम वंश की सल्तनत क़ायम होने के दौरान शुरू हुआ। दिल्ली के सुल्तानों ने भारत के पूर्ववर्ती गुप्त सम्राटों और हर्षवर्धन की तरह एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। दोनों धर्मों के मतावलम्बियों का सम्पर्क लगभग तीन सौ वर्षों तक चला। दोनों धर्मों के मतावलम्बियों के आपसी सम्पर्क से कुछ विचित्र नतीजे भी निकले। इस्लाम के समानता के सिद्धान्त के प्रभाव में हिन्दू समाज में जातिवाद के विरुद्ध विरोध के स्वर उठे। इसी के साथ हिन्दू जातिवाद के प्रभाव में मुसलमानों में भी जाति-व्यवस्था विकसित हुई। हिन्दुओं की वर्ण-व्यवस्था की तरह मुस्लिम समाज में भी जातिगत भेद-भाव और ऊँच-नीच की भावना पैदा हुई। मुसलमानों की उच्च जातियों में शेख़, सैयद, मुग़ल और पठान थे और निम्न जातियों में अजलफ़ यानी कसाई, नाई, जुलाहे शामिल थे। मैला ढोने वाले, जूता बनाने वाले अरजाल सबसे नीचे समझे जाते थे।

हिन्दू-मुसलमानों को एक-दूसरे के निकट लाने और धर्म को शासन-व्यवस्था से अलग रखने में मुग़ल सम्राट अकबर का योगदान उल्लेखनीय है। उसने न केवल हिन्दू लड़कियों से विवाह किया, बल्कि उन्हें और उनके परिवारों को अत्यन्त सम्मानजनक पद प्रदान किये। उसने हिन्दुओं पर लगने वाला तीर्थ कर और जज़िया समाप्त किया। राजपूतों को सैनिक अभियानों की कमान सौंपी और प्रशासन तथा दरबार में उच्च पद प्रदान किये। जहाँगीर मातृ पक्ष से राजपूत था। जहाँगीर की एक पत्नी, उसके बड़े पुत्र ख़ुसरो की माँ राजपूत थी।

मुग़ल शासनकाल के दौरान राजा टोडरमल ने फ़ारसी को राज-काज की भाषा बना दिया। इससे पहले उत्तर भारत क्षेत्र में लगान सम्बन्धी दस्तावेज़ हिन्दी और फ़ारसी दोनों भाषाओं में और देश के अन्य क्षेत्रों में अन्य भाषाओं में तैयार किये जाते थे। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद लगभग सम्पूर्ण मुग़ल शासन के क्षेत्र में फ़ारसी राज-काज की भाषा हो गयी। इससे फ़ारसी भाषा को ज़बरदस्त प्रोत्साहन मिला और बड़ी संख्या में हिन्दू फ़ारसी सीखने लगे। फ़ारसी के राजभाषा बनाये जाने के बावजूद दिल्ली दरबार में ब्रज भाषा को विशेष सम्मान हासिल था। अकबर सहित अनेक मुग़ल शासक ब्रज भाषा में कविता करते थे।

समय बीतने के साथ मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता और विजेता के रूप में श्रेष्ठता प्रकट करने की भावना समाप्त हुई। इसके परिणामस्वरूप अमीर ख़ुसरो, कुतबन, मंझन, जायसी और ख़ानख़ाना जैसे शायर और विचारक पैदा हुए जो एकदम भारतीयता के रंग में रँगे थे। ख़ुसरो ने तो साफ़ कहा था ‘‘हिन्द मेरा मौलिद-ओ मादा ओ वतन’’ अर्थात भारत मेरी जन्मभूमि, मेरी माता और मेरा देश है। ख़ुसरो को हिन्दुस्तानी होने पर बहुत नाज़ था। ख़ुसरो की परम्परा को अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने आगे बढ़ाया। आधुनिक शिक्षा, भारतीयों की विदेश यात्रा, समानता और बन्धुत्व के विचारों और लोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था ने दोनों धर्मों के मतावलम्बियों को एक-दूसरे के निकट लाने का आधार तैयार किया। हिन्दुओं में जाति-प्रथा और ऊँच-नीच की भावना से इस क्षेत्र में अड़चनें आयी हैं, लेकिन प्रगति जारी है।

अध्याय दो

पहली दिल्ली : पुराना लाल कोट

अनंगपाल ने अपनी राजधानी दिल्ली के समीप सूरजकुण्ड में बनायी थी। लेकिन, कुछ समय बाद अनंगपाल ने इस स्थान को छोड़ वर्तमान क़ुतुब के समीप लाल कोट क़िला बनाया। सम्भवत: यही पहली दिल्ली थी। दिल्ली में अरावली की पहाड़ियाँ यमुना के कछार में आ कर समाप्त होती हैं। यहाँ से यमुना नदी दक्षिण पश्चिम दिशा की ओर बढ़ने के स्थान पर पूर्व दिशा का रुख़ करती है। यहाँ सुरक्षा के लिए पहाड़ियाँ, पानी और आवागमन के लिए यमुना नदी, भवन निर्माण के लिए चट्टानें और खाद्यान्नों की आपूर्ति के लिए उपजाऊ मैदान हैं, इसलिए दिल्ली के लिए भारत के इतिहास में प्रमुख स्थान प्राप्त करना लाज़िमी था।

कनिंघम के अनुसार अनंगपाल ने १०६० ईस्वी में लाल कोट का निर्माण कराया। इसकी दीवारें अभी मौजूद हैं। लाल कोट एक विषम आकृति का आयताकार क़िला है। इसका व्यास सवा दो मील तक फैला है। क़ुतुब क्षेत्र में स्थित इसकी दीवारें तुग़लक़ाबाद की तरह विशाल और ऊँची है। क़िले की प्राचीर २८ से ३० फ़ुट चौड़ी और ६० फ़ुट ऊँची है। क़िले की दीवारें १४.७५ फ़ुट चौड़ी थीं और उनमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर बुर्ज थे। क़िले में चार दरवाज़े थे जिनमें से तीन अभी तक हैं। पश्चिमी दरवाज़े को रणजीत द्वार कहा जाता था। मुसलमान आक्रमणकारियों ने इसका नाम गज़़नी द्वार रख दिया। प्रमुख स्थानों पर ६० फ़ुट व्यास के बुर्ज हैं। उत्तर क्षेत्र में स्थित दो बड़े बुर्जों को फ़तह बुर्ज और सोहन बुर्ज कहा जाता है।

अजमेर के शासक विग्रहराज ने ११५० में तोमरों को पराजित करके इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। चौहानों ने क़ुतुब क्षेत्र में लाल कोट का विस्तार किया और अनेक मन्दिरों का निर्माण किया। चौहानों के अन्तर्गत दिल्ली उनके राज्य का सुदूरवर्ती नगर और एक प्रान्त अथवा भूभाग का मुख्यालय था। विग्रहराज के भतीजे और अनेक लोककथाओं के नायक पृथ्वीराज ने लाल कोट को मज़बूत करने के अलावा एक और क़िले राय पिथौरा का निर्माण कराया। पृथ्वीराज अनेक शौर्य गाथाओं के नायक थे।

पृथ्वीराज के पिता और अजमेर के राजा सोमेश्वर शक्तिशाली, निडर और बहादुर योद्धा थे। पृथ्वीराज के ऊपर ११ वर्ष की उम्र में पिता का साया उठ गया। उनकी माता कर्पूरी देवी ने उनका लालन-पालन योग्यता से और राज्य का शासन बड़ी कुशलता से किया। चौदह वर्ष की आयु में पृथ्वीराज राजगद्दी पर बैठे। गद्दी पर बैठते ही उन्हें अनेक युद्धों में भाग लेना पड़ा। पृथ्वीराज ने अपने सभी विरोधियों को पराजित किया। सर्वत्र जीत हासिल करने के कारण उन्हें दिग्विजयी कहा जाने लगा। उनके नाना अनंगपाल ने उन्हें दिल्ली का राज भी सौंप दिया। पृथ्वीराज का उदय कन्नौज के राजा जयचन्द सहित कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा। इन लोगों ने गज़़नी के राजा मुहम्मद ग़ोरी को दिल्ली पर हमला करने के लिए उकसाया।

राय पिथौरा का क़िला लाल कोट को तीन ओर से घेरता था। इसका निर्माण आक्रमणकारियों से दिल्ली की रक्षा के लिए किया गया था। राय पिथौरा का क़िला लाल कोट से तीन गुना बड़ा था, लेकिन सामरिक दृष्टि से वह उतना मज़बूत नहीं था। इसकी दीवारें अपेक्षाकृत छोटी और इसके रक्षात्मक बुर्ज काफ़ी दूरी पर थे। राय पिथौरा के क़िले में नौ दरवाज़े थे, तीन पश्चिम दिशा में, पाँच उत्तर दिशा में और एक पूर्व दिशा में। इसकी दीवारें लगभग साढ़े चार मील तक फैली थी और शहर में, जो शाहजहाँ की दिल्ली से लगभग आधा था, सत्ताईस मन्दिर थे, जिनके स्तम्भ तत्कालीन शासकों और समाज की सुरुचि और सम्पदा के परिचायक थे।

दिल्ली पर अधिकार करने के बाद मुहम्मद ग़ोरी ने राय पिथौरा के क़िले को मज़बूत बनाया, क़िले में स्थित मन्दिर को तुड़वा कर मस्जिद बनवायी और दिल्ली को आक्रमणकारी सेना का मुख्यालय बना कर छावनी में बदल दिया। इसी के साथ दिल्ली का स्वरूप और चरित्र बदल गया और वह छह शताब्दियों तक इस्लामी संस्कृति का केन्द्र बनी रही। दिल्ली पर अधिकार करने के बाद ग़ोरी ने कन्नौज और बनारस पर अधिकार किया और इन जगहों पर ज़बरदस्त लूट-मार की। कहा जाता है कि इस लूट-मार से उसके हाथ हज़ारों मन सोना-चाँदी, हाथी-घोड़े लगे। दिल्ली, अजमेर और कन्नौज पर अधिकार करने बाद मुहम्मद ग़ोरी गज़़नी चला गया, लेकिन उसके सिपहसलार मुहम्मद बख़्तियार ख़िल्जी ने बिहार पर अधिकार किया और नालन्दा विश्वविद्यालय को ध्वस्त किया। इसके बाद उसने १२०२ में बंगाल के राजा लक्ष्मण सिंह को पराजित किया। बंगाल कालान्तर में भारत में इस्लामी शासन का उपकेन्द्र बना।

क़ुतुबउद्दीन ऐबक ने ग्वालियर, गुजरात और कालिंजर पर अपनी विजय पताका फहरायी। शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी के मरने के बाद क़ुतुबउद्दीन ऐबक १२०६ में दिल्ली का सुल्तान बना। ऐबक, मुहम्मद ग़ोरी का ग़ुलाम था। मध्य युग में छोटी उम्र के बच्चों को ख़रीद कर सुल्तान के अंगरक्षकों के रूप में प्रशिक्षण देने की प्रथा थी। ऐबक को पहले तुर्किस्तान से ला कर नेशापुर के बाज़ार में किसी क़ाज़ी को बेचा गया था। इसके बाद उसे किसी अमीर ने ख़रीद कर मुहम्मद ग़ोरी को भेंट कर दिया। ऐबक की स्वामी-भक्ति और कर्त्तव्य परायणता से प्रसन्न हो कर ग़ोरी ने उसे अपना सिपहसलार बना दिया था।

तख़्त हासिल करने के बाद सुल्तान क़ुतुबउद्दीन ऐबक, सुलतान शम्सुद्दीन अल्तमश, और सुलतान ग़यासुद्दीन बलबन ने राय पिथौरा के क़िले को अपनी राजधानी बनाया। क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने राय पिथौरा के क़िले में रक्षा और प्रशासन की आवश्यकता को देखते हुए परिवर्तन किये। राय पिथौरा के क़िला क्षेत्र में काफ़ी लोग रहते थे। वहाँ राजमहल के अलावा अनेक दुकानें तथा सामन्तों और उच्च अधिकारियों के पक्के निवास थे। इसे ही वास्तव में पहली पुरानी दिल्ली कहा जा सकता है। लगभग सौ वर्षों तक दिल्ली का महरौली क्षेत्र सुलतानों की राजधानी रहा।

क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने इस क्षेत्र में अनेक निर्माण कार्य किये। ऐबक के पास अपने राजगीर नहीं थे, इसलिए उसने लालकोट के हिन्दू मिस्त्रियों-मज़दूरों से मस्जिद का निर्माण कराया। हिन्दुस्तानी मिस्त्रियों को नोकदार मेहराब बनाना नहीं आता था, इसलिए उन्होंने बिना चोटी की मेहराबें बनायीं जो अपेक्षाकृत कमज़ोर होती थीं। उन्होंने मेहराबों को सजाने के लिए उनमें पेड़, पत्ते, लताएँ बनायीं। क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के दालानों में मन्दिरों के सुन्दर नक़्क़ाशीदार स्तम्भ आज भी दिखाई देते हैं। कुछ स्तम्भों पर ऐसे पत्थर हैं जिनमें एक ओर मूर्तियाँ खुदी हैं और दूसरी और पवित्र कुरान की आयतें हैं। कालान्तर में उत्तर पश्चिम क्षेत्र से मिस्त्री लाये गये और उन्होंने इस्लामी वास्तुशिल्प के अनुसार मेहराबें बनायीं। मस्जिद की मेहराबें इस्लामी वास्तु विधि से बनी पहली मेहराबें हैं और कुछ वास्तुविदों के अनुसार यही मस्जिद को भव्य और नया स्वरूप प्रदान करती हैं।

बलबन के पौत्र कैकूबाद का पालन-पोषण अत्यन्त कठोर निर्देशों में हुआ था। बलबन ने उसे बड़ी अच्छी शिक्षा दिलायी थी और सभी क़िस्म की बुराइयों से दूर रखा था लेकिन सुल्तान बनते ही उसका जीवन बदल गया। वह १२८७ में मुइजुद्दीन कैकूबाद नाम से सुलतान बना। उस समय उसकी उम्र केवल १८ वर्ष थी। राज काज और साम्राज्य विस्तार में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह भोग-विलास में डूब गया और उसने यमुना के तट पर अपने लिए एक नया नगर किलु-खड़ी या किलुगढ़ी बसाया। उसने नये नगर को अनेक सुन्दर इमारतों से सजाया। अमीर ख़ुसरो ने अपनी पुस्तक में इस नगर की प्रशंसा की है। कैकूबाद का सम्पूर्ण समय नाच-गाने और सुन्दरियों के साथ भोग-विलास में बीतता था। तीन साल के अन्दर उसे अनेक बीमारियों ने घेर लिया। वह इतना कमज़ोर हो गया था कि बिस्तर से उठ नहीं सकता था। उसकी बदइन्तज़ामी से ऊब कर अमीरों ने उसकी हत्या करवा दी। उसकी हत्या होते ही दिल्ली में अराजकता फैल गयी। अमीरों में फूट पड़ गयी। दिल्ली की यह हालत देख समाना का हाकिम शाइस्ता ख़ाँ अपने सैनिकों के साथ दिल्ली आया और शान्ति स्थापित की। फिर वह जलालुद्दीन ख़िल्जी के नाम से दिल्ली के तख़्त पर बैठा।

अध्याय तीन

दूसरी दिल्ली : सीरी

चरित्रहीन कैकूबाद के स्थान पर १२८६ में जलालुद्दीन फ़ीरोज़ ख़िल्जी को सुलतान बनाया गया। इसी के साथ दिल्ली में ग़ुलाम वंश का अन्त हो गया। दिल्ली पर पिछले ८० वर्षों से तुर्कों का शासन था, इसलिए दिल्ली के मुसलमान अमीर (अमीर का अर्थ बड़ा सरदार होता है), धनपति, सामन्त, प्रभावशाली लोग और विद्वान ख़िल्जी शासन के विरुद्ध थे, जिन्हें अफ़ग़ान समझा जाता था, इसलिए नया सुलतान राजधानी (राय पिथौरा का क़िला) नहीं गया। वास्तव में ख़िल्जी अफ़ग़ान नहीं, तुर्क थे। उन्होंने अपनी अफ़ग़ान वंशावली का उपयोग असन्तुष्ट अफ़ग़ान सरदारों की वफ़ादारी हासिल करने के लिए किया था, जो यह समझते थे कि पिछले सुल्तानों ने उनकी उपेक्षा की। ख़िल्जी धर्मान्तरित मुसलमानों को उच्च पद देने के पक्ष में थे। उन्होंने इस विषय में बलबन की नीति में बदलाव किया। जलालुद्दीन ने किलुगढ़ी को अपनी राजधानी बनाया, उसने कैकूबाद द्वारा शुरू किये गये महल को पूरा कराया और जमुना के तट पर एक सुन्दर विशाल बाग़ का निर्माण कराया। राज्य के अमीरों, सामन्तों और अन्य लोगों को किलुगढ़ी में अपने निवास, बाज़ार आदि बनाने के आदेश दिये गये, इसलिए किलुगढ़ी को ‘नया शहर’ नाम मिला। किलुगढ़ी में एक क़िला बनाने का आदेश भी जारी किया गया। तीन-चार वर्षों में किलुगढ़ी पूरी तरह आबाद और गुलज़ार हो गया।

इस बीच सुलतान की सत्ता स्थिर हो गयी। सुलतान के कुशल प्रशासन, न्यायप्रियता और दानशीलता के कारण ख़िल्जियों के प्रति लोगों का विरोध शान्त हो गया, इसलिए लोगों ने सुलतान से राजधानी चलने का अनुरोध किया और सुलतान धूमधाम से राजधानी पहुँच कर तख़्त पर आसीन हुआ।

जलालुद्दीन का भतीजा और दामाद अलाउद्दीन कड़ा (इलाहाबाद) का सूबेदार था। वह बेहद महत्वाकांक्षी था। वह स्वयं सुल्तान बनना चाहता था। इसके लिए उसे काफ़ी धन की ज़रूरत थी। उसने दक्षिण के राजाओं और मन्दिरों की अथाह सम्पत्ति की कथाएँ सुनी थीं, इसलिए उसने १२९३ में देवगिरि पर जो इलाहाबाद से ६०० मील दूर था, हमला किया। उसने समस्त योजना गुपचुप तरीक़े से बनायी और देवगिरि के यादव राजा रामचन्द्र देव को पराजित कर उससे भारी हर्जाना वसूल किया। इसके अलावा उसने दक्षिण के कुछ मन्दिरों को लूट कर भी काफ़ी दौलत इकट्ठा की। यह सब ले कर वह इलाहाबाद लौटा। उसने अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन को एक ख़त लिख कर उससे बिना पूछे दक्षिण जाने के लिए माफ़ी माँगी। उसने दक्षिण से लायी गयी दौलत जलालुद्दीन को भेंट करने का लालच दे कर इलाहाबाद बुलाया और उसकी हत्या करवा दी। इसके बाद वह दिल्ली पहुँचा और दक्षिण से लायी दौलत सरदारों में बाँट कर स्वयं सुल्तान बन गया।

अल्लाउद्दीन को अपने शासन काल के दौरान निरन्तर मंगोल हमलों का सामना करना पड़ा। उसने सीमा क्षेत्र में क़िलेबन्दी मज़बूत की और दिल्ली में मंगोल बस्ती का, जिसमें मंगोलों की संख्या बढ़ गयी थी, उन्मूलन किया। उसने दिल्ली के बाहर एक मीनार पर सैकड़ों मंगोलों के सिर लटका दिये। ज़ियाउद्दीन बर्नी के अनुसार मंगोलों का एक दल तर्घी के नेतृत्व में दिल्ली तक आ पहुँचा। ख़िल्जी के सैनिकों और मंगोल आक्रमणकारियों के बीच झड़पें हुईं, लेकिन किसी पक्ष को निर्णायक विजय हासिल नहीं हुई। दो महीने बाद मंगोल सेना लौट गयी।

अलाउद्दीन के शासनकाल के दौरान उत्तर भारत पर मंगोलों के हमले जारी रहे। उन्हें १३०६ में अपने क्षेत्र में समस्याओं के कारण स्वदेश लौटना पड़ा। अल्लाउद्दीन दूसरा सिकन्दर (सिकन्दर सानी) बनना चाहता था। मंगोल हमलों का सामना करने और अन्य देशों पर हमला करने के लिए वह अपनी फ़ौज बहुत बढ़ाना चाहता था, इसलिए उसने अपनी विशाल सेना का ख़र्च वहन करने के लिए खाद्यान्नों तथा अन्य वस्तुओं पर मूल्य नियन्त्रण लागू किया। इसके अलावा उसने मलिक काफ़ूर के नेतृत्व में एक सैनिक अभियान दल दक्षिण भारत भेजा। मलिक काफ़ूर दक्षिण में मदुरै तक पहुँचा। दक्षिण भारत के सभी प्रमुख राजाओं को पराजित करने, उनसे काफ़ी हर्जाना वसूल करके और दक्षिण भारत के मन्दिरों में लूट-मार करके वह काफ़ी दौलत ले कर दिल्ली लौटा।

महरौली क्षेत्र में आबादी बहुत बढ़ गयी थी। नगर और क़िले की दीवारों के बाहर भी लोग रहने लग गये थे, इसलिए सुल्तान बनने पर अलाउद्दीन ने १३०३ में लाल कोट के उत्तर में शाहपुर गाँव के नज़दीक एक नया नगर सीरी बसाया। कहा जाता है कि अल्लाउद्दीन ने आठ हज़ार मंगोलों को मौत के घाट उतार कर और इन लोगों के शवों को गाड़ कर उसके ऊपर सीरी का क़िला और नगर बसाया। शीघ्र ही सीरी महलों, भवनों और बाज़ारों से युक्त व्यस्त नगर बन गया। उसने इस नगर में अपने लिए एक विशाल और भव्य महल का निर्माण कराया। इस महल में एक हज़ार खम्भे थे। ये खम्भे लकड़ी के थे, इसलिए नष्ट हो गये। उसने पानी की समस्या हल करने के लिए एक विशाल सरोवर हौज़-ए-अलाई या हौज़ ख़ास का निर्माण कराया। अब सीरी के अस्तित्व के चिह्न लगभग समाप्त हो गये हैं। केवल अल्लाउद्दीन द्वारा निर्मित हौज़ ख़ास नाम बचा है।

अल्लाउद्दीन द्वारा निर्मित विशाल सरोवर आधा मील लम्बा और तीन फ़र्लांग चौड़ा था। फिरिश्ता के अनुसार यह गर्मियों में किनारों में सूख जाता था और वहाँ गन्ना, खीरा, ख़रबूज़ा और कद्दू बो दिया जाता था। फ़ीरोज़ तुग़लक़ ने इसकी मरम्मत करवायी और यहाँ एक मदरसा बनवाया। तैमूर ने महमूद और मल्लू ख़ान को पराजित करने के बाद हौज़ ख़ास नाम के इस सरोवर के तट पर अपने लश्कर का पड़ाव किया था। तैमूर ने लिखा है इस सरोवर का हर हिस्सा तीर की मार से अधिक लम्बा है। इसके चारों ओर इमारतें हैं। तालाब बरसात में पानी से भर जाता है और इससे शहर के लोगों को साल भर पानी मिलता है।

अलाउद्दीन ने क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का विस्तार कराया और उसका क्षेत्र दोगुना किया। वह क़ुतुब से ऊँची एक मीनार बनाना चाहता था। उसकी मौत के कारण इसका निर्माण रुक गया। यह केवल २५ फ़ुट ऊँची बनायी जा सकी और अब अलाई मीनार कहलाती है। १३९८ में तैमूर ने सीरी नगर का अवलोकन करने के बाद पाया कि यह एक गोलाकार नगर है। इसमें सात दरवाज़े, भव्य ऊँची इमारतें हैं। शहर के चारों ओर मज़बूत दीवार है। अल्लाउद्दीन का हज़ार खम्भों का महल इतना ख़ूबसूरत था कि तैमूर के हरम की औरतों ने इस महल को देखने की इच्छा प्रकट की। तैमूर ने उनके इस अनुरोध को मानते हुए अपने सैनिकों की सुरक्षा में उन्हें महल देखने भेजा। सीरी से पुरानी दिल्ली (महरौली क्षेत्र) काफ़ी दूर था। नगर का जहाँपनाह भाग मध्य में था। इस नगर के अवशेष अब लुप्त प्राय हैं। इस नगर को शुरू में लश्कर या लश्करगाह कहते थे। बाद में इसे दारुल ख़लीफ़ा कहा जाने लगा।

अध्याय चार

तुग़लक़ों की तीन दिल्लियाँ

तुग़लक़ाबाद

अलाउद्दीन अपने बड़े लड़के ख़िज़र ख़ाँ को सुल्तान बनाना चाहता था, लेकिन क़ुतुबुद्दीन ख़िल्जी ने अपने भाई ख़िज़र ख़ाँ को अन्धा करके ग्वालियर के क़िले में क़ैद कर दिया और स्वयं सुल्तान बन गया। क़ुतुबुद्दीन ख़िल्जी सन्त निज़ामुद्दीन औलिया से चिढ़ता था और किसी-न-किसी बहाने उन्हें दिल्ली से निकालना चाहता था। एक दिन उसने निज़ामुद्दीन को सन्देश भेजा कि आप भी दरबारियों और शहरियों के साथ चाँद रात में हमें सलाम करने के लिए आया करें। निज़ामुद्दीन ने दरबार में आने से इनकार कर दिया। इस पर सुल्तान ने कहा अगर ऐसे नहीं आये तो तलवार से बुलाया जायेगा। जब चाँद रात आयी तो क़ुतुबुद्दीन अपने वज़ीर के हाथों मारा गया। वज़ीर ख़ुसरो ख़ाँ के नाम से गद्दी पर बैठा। ख़ुसरो ख़ाँ को गद्दी पर बैठे चार महीने हुए थे कि मुल्तान के सूबेदार ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने दिल्ली पर हमला किया। युद्ध में ख़ुसरो मारा गया। राज्य के सरदारों ने १३२० में पंजाब के सूबेदार ग़यासुद्दीन को सुल्तान बनाया। अल्लाउद्दीन की मृत्यु के बाद भी मंगोल हमलों का भय नये सुल्तान ग़यासुद्दीन को सताता रहता था। ग़यासुद्दीन ने मंगोल हमलों से बचाव के लिए तुग़लक़ाबाद का नया नगर बसाया। इसके लिए जगह का चुनाव सामरिक ज़रूरतों को ध्यान में रख कर चट्टानी क्षेत्र में किया गया था।

यह नगर लाल कोट से पाँच मील पूर्व बदरपुर के चट्टानी क्षेत्र में १३२१ से १३२३ के दौरान बसाया गया था। यहाँ एक क़िला भी बनाया गया उसमें अनेक भूमिगत कमरे थे। नया नगर मुख्य रूप से मंगोल आक्रमणों की आशंका से सुरक्षित स्थान पर बसाया गया था। तुग़लक़ाबाद के महलों, हम्मामों के अवशेष आज भी लोगों को आश्चर्य में डाल देते हैं। उन्हें देख कर लोग सोचने लगते हैं कि इनका निर्माण किन लोगों ने किया होगा? यह नगर कभी पूरी तरह नहीं बसा। अपने निर्माण के पन्द्रह वर्षों के भीतर यह पूरी तरह वीरान हो गया। इसके निर्माण में लाल पत्थर और संगमरमर का प्रयोग किया गया है। क़िले की दीवारें साढ़े तीन मील की दूरी तक फैली हैं। ये दीवारें अभी तक मौसम की मार से बची हैं, लेकिन इसका भीतरी क्षेत्र कुछ कमरों को छोड़ कर ध्वस्त हो गया है।

राष्ट्रमण्डल खेलों के सिलसिले में दीवारों की मरम्मत करके उनका पुराना रूप बहाल करने की कोशिश की गयी है। क़िले में यत्र-तत्र पड़े अवशेष उसकी प्राचीनता और भव्यता की ओर संकेत करते हैं। तुग़लक़ाबाद क़िले में ग़यासउद्दीन का मक़बरा क़िले के दक्षिण में है। यह तुग़लक़ काल की वास्तु-कला का सुन्दर उदाहरण है। क़िले में उसके परिवार के अन्य सदस्यों की क़ब्रें भी हैं।

तुग़लक़ाबाद का पानी खारा था। वहाँ मीठे पानी की कमी थी। ग़यासुद्दीन ने पानी की कमी दूर करने के लिए एक सरोवर का निर्माण कराया, लेकिन फिर भी पानी की कमी बनी रही। सम्भवत: पानी की कमी तुग़लक़ाबाद के कभी पूरी तरह न बस सकने का प्रमुख कारण था।

इस सम्बन्ध में प्रचलित एक किंवदन्ती के अनुसार इस नगर का विनाश प्रसिद्ध सूफ़ी सन्त हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया के अभिशाप के कारण हुआ। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ निज़ामुद्दीन औलिया को पाखण्डी और धूर्त समझता था। औलिया की दरगाह में गाना-बजाना होता था। सुलतान ने औलिया को सन्देश भिजवाया कि गाना-बजाना इस्लाम में वर्जित है, इसलिए बन्द किया जाये। इन्हीं दिनों ग़यासुद्दीन क़िला बनवा रहा था और सूफ़ी सन्त एक बावली बनवा रहे थे। मज़दूर दिन में क़िले में काम करते और रात में बावली बनाते थे। जब यह बात सुलतान को पता लगी तो उसने हुक्म जारी किया कि कोई तेली चिराग़ जलाने के लिए औलिया को तेल न बेचे। कहा जाता है कि तेल न मिलने पर औलिया के शिष्य नसीरुद्दीन ने पानी भर कर दिये जला दिये। बावली का काम बन्द न हुआ। इससे नसीरुद्दीन ‘चिराग़ रोशन’ कहे जाने लगे। वह जगह जहाँ वे दफ़्न किये गये ‘चिराग़ दिल्ली’ कहलायी।

सुलतान ग़यासुद्दीन हर तरह से फ़क़ीर निज़ामुद्दीन को परेशान करता था। उसने फ़क़ीर को दिल्ली छोड़ने का हुक्म दिया। इसी बीच ग़यासुउद्दीन को बंगाल जाना पड़ा। उसने बंगाल से फ़क़ीर को सँदेसा भेजा कि जब तक वह दिल्ली लौटता है, वे दिल्ली छोड़ कर चले जायें। जब फ़क़ीर को यह सँदेसा दिया गया फ़क़ीर ने कहा ‘हनोज़ दिल्ली दूर अस्त’ — अभी दिल्ली दूर है। बंगाल से लौटते हुए दिल्ली के बाहरी क्षेत्र अफ़ग़ानपुर में लकड़ी के महल में सुलतान का स्वागत किया गया। अचानक महल एक धमाके के साथ गिरा और सुलतान दब कर मर गया। सन्देह है कि सुलतान को मारने में उसके बेटे अलग ख़ाँ या जूना शाह का हाथ था, जो निज़ामुद्दीन औलिया का भक्त था। ग़यासुद्दीन फ़क़ीर को दिल्ली से निकाल नहीं सका। फ़क़ीर की कही बात ‘‘दिल्ली दूर है’’ सच हुई।

तुग़लक़ाबाद क्यों कभी पूरी तौर पर नहीं बस सका, इस सम्बन्ध में एक और कथा है। कहा जाता है कि जिन दिनों ग़यासुद्दीन क़िला बनवा रहा था सन्त निज़ामुद्दीन बावली बनवा रहे थे। ग़यासुद्दीन ने हुक्म दिया कि सभी मज़दूर क़िले में काम करे। इस पर नाराज़ हो कर सन्त ने शाप दिया ‘या रहे ऊसर या बसे गूजर’। ग़यासुद्दीन के मरने के बाद उसके पुत्र मुहम्मद तुग़लक़ ने क़िला छोड़ दिया और वहाँ गूजर बस गये।

जहाँपनाह

ग़यासुद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलग ख़ान या जूनाशाह मुहम्मद तुग़लक़ के नाम से गद्दी पर बैठा। उसे तुग़लक़ाबाद पसन्द न था, इसलिए वह पुरानी दिल्ली क़ुतुब-महरौली क्षेत्र में लौट गया। लेकिन यह क्षेत्र काफ़ी फैल गया था। उसने क़ुतुब से लगभग एक मील दूर एक नया नगर बसाया। यह स्थान सर्वप्रिय विहार के दक्षिण में और पंचशील क्लब के सामने है। उसने यहाँ एक विशाल महल बनाया। महल में हज़ार स्तम्भों वाला (क़स्र-ए-हज़ार सितून) एक कक्ष था। मुहम्मद तुग़लक़ ने सीरी से लाल कोट तक एक विशाल दीवार बना कर उसमें सीरी, लाल कोट और जहाँपनाह को शामिल करने की योजना बनायी। इस दीवार पर काम शुरू हुआ और कुछ दीवार बनायी भी गयी। लेकिन इस पर बहुत ख़र्च आ रहा था, इसलिए इसका निर्माण रोक दिया गया और सीरी और कोट राय पिथौरा की दीवारों की आबादी को ले कर एक नया नगर जहाँपनाह (विश्व की शरण स्थली) का निर्माण कराया। यह नगर क़ुतुब और सीरी के मध्य बसाया गया था। इस शहर के बीच विजय मण्डल महल और एक मस्जिद बनवायी। विजय मण्डल में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-ख़ास के अवशेष हैं। जहाँपनाह में कुल १६ दरवाज़े थे। पानी की समस्या से निपटने के लिए खिड़की गाँव के समीप एक विशाल हौज़ बनवाया गया।

मुहम्मद तुग़लक़ विचित्र चरित्र का व्यक्ति था। वह राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद ले गया। मुहम्मद तुग़लक़ द्वारा दक्षिण के भू-भाग पर अधिकार कर लेने के बाद दक्षिण भारत में राजधानी बनाने का विचार सर्वथा उचित था, लेकिन उसका कार्यान्वयन इतनी कठोरता से किया गया कि उसकी आलोचना होती है। दिल्ली में रह रहे सभी लोगों को दौलताबाद जाने का हुक्म हुआ। सुल्तान के हुक्म से यह खोज की गयी कि कोई दिल्ली में रह तो नहीं गया है। शाही सिपाहियों को बिस्तर पर पड़ा एक बीमार और एक अन्धा मिला। सुल्तान ने हुक्म दिया इन्हें घसीटते हुए दौलताबाद ले चलो। बीमार बिस्तर से उठ नहीं सका तो उसके सीने में ख़ंजर भोंक दिया गया। अन्धे को एक गाड़ी में बाँध दिया गया। उसकी केवल एक टाँग दौलताबाद पहुँची। मुहम्मद तुग़लक़ ने चीन और फ़ारस की तरह प्रतीक स्वरूप ताँबे और पीतल के सिक्के चलाये, लेकिन वह इस बात की व्यवस्था नहीं कर सका कि लोग घरों में सिक्के न ढाल सकें। प्रशासन की शिथिलता के कारण हर घर टकसाल बन गया और बाज़ार नक़ली सिक्कों से भर गया। योजना बुरी तरह विफल हो गयी। उसने चीन पर हमला करने के लिए एक विशाल सेना हिमालय क्षेत्र में भेजी जो बर्फ़बारी में नष्ट हो गयी।

अनेक व्यक्तियों की राय में तुग़लक़ के विचार चौदहवीं शताब्दी में उन्नीसवीं शताब्दी की सोच का परिचय देते थे। उसने पुराने नगर दिल्ली (महरौली क्षेत्र) राय पिथौरा के क़िले, सीरी और तुग़लक़ाबाद की क़िलेबन्दी को मज़बूत किया और जहाँपनाह सहित इन सभी नगरों को मिला कर एक बड़ा नगर बनाने का प्रयास किया। मुहम्मद तुग़लक़ के शासन काल में उत्तर अफ्रीका से एक अरब यात्री इब्न बतूता भारत आया था। वह कुछ समय तक सुल्तान का काज़ी (न्यायाधीश) भी रहा। फिर वह सुल्तान का दूत बन कर चीन गया। उसने मुहम्मद तुग़लक़ के शासन काल का सूचनाप्रद और सजीव वर्णन किया है। उसने तुग़लक़ के दरबार की शान-शौकत के बारे में लिखा है :

‘‘अगले दिन हम दिल्ली पहुँचे, भारत का महानगर, दूर-दूर तक फैला एक भव्य नगर, जहाँ सौन्दर्य और मज़बूती का संगम है। इस नगर के चारों ओर एक दीवार है, जैसी विश्व में और कहीं नहीं है। पूर्व के सम्पूर्ण इस्लामी देशों में यह सबसे बड़ा नगर है.....शाही महल को दार-ए-सिरा कहते हैं। इसमें कई ड्योढ़ियों में हो कर जाना पड़ता है। पहले फाटक पर सिपाही रहते हैं। नौबत-नफ़ीरी बजाने वालों के बैठने की भी यही जगह है; जहाँ कोई अमीर या बड़ा आदमी आया ऩक़्कारे पर चोट पड़ी। नफ़ीरियाँ बजनी शुरू हो गयीं। इस दरवाज़े के बाहर तेग़ें-तलवारें हाथों में लिये जल्लाद खड़े रहते हैं। दोनों तरफ़ चबूतरों पर रोशन चौकी वाले होते हैं। दूसरे और तीसरे दरवाज़े के बीच सुनहरी बल्लम लिये चोबदार रहते हैं। उनके सिरों पर मोर पंख वाली सुनहरी टोपियाँ होती हैं। कुछ चोबदार हाथों में कोड़े लिये होते हैं। दूसरे दरवाज़े में एक बड़ा दीवानख़ाना है जहाँ राज्य में काम करने वाले नौकर बैठते हैं। तीसरी ड्योढी मुंशियों के लिए है जो दरबार में आने-जाने वालों के अते-पते पूछ कर पर्चे लिखते रहते हैं। हर रात को बादशाह नमाज़ के बाद इन पर्चों को देख कर लोगों को अपने दरबार में बुलाता है। आने वाले नज़र पेश करते हैं। मौलवी क़ुरान शरीफ़ या म़जहबी किताब देते हैं। फ़क़ीर तश्बीह यानी माला या दातून। अमीर हाथी, घोड़े, ख़च्चर, हथियार, हीरे-जवाहरात देते हैं। दरबार की ड्योढ़ी ही हज़ार सितून कहलाती है। बादशाह ऊँचे से तख़्त पर बैठता है; बड़े-बड़े अमीर पीछे खड़े मोरछल हिला रहे हैं। दायें-बायें सौ-सौ हथियारबन्द सिपाही तीर की तरह खड़े हैं। बादशाह के वज़ीर और उसके पीछे सब दरबारी खड़े होते हैं। सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के दरबार में जो भी आता है अपनी पीठ बादशाह की तरफ़ नहीं कर सकता। वापस जाते समय भी उल्टे पाँव लौटता है। दरबार में परदेसियों की बड़ी आव-भगत होती है। उन्हें जागीरें इनाम में दी जाती हैं।’’

फ़ीरोज़ाबाद

मुहम्मद तुग़लक़ के बाद उसका चचेरा भाई फ़ीरोज़ तुग़लक़ सुल्तान बना। वह ग़यासुद्दीन के भाई रजब और राजा रणमल भट्टी की राजकुमारी नीला का बेटा था। मुहम्मद तुग़लक़ की मौत के समय वह सिन्ध में किसी क़िले का घेराव कर रहा था। फ़ीरोज़ को सभी सरदारों ने आम सहमति से सुल्तान बनाया था।

फ़ीरोज़ के सुल्तान बनने पर अनेक लोगों ने, जो मुहम्मद तुग़लक़ द्वारा सताये गये थे, ख़ुशियाँ मनायीं। फ़ीरोज़ ने सुल्तान बनने के तीन वर्ष बाद, जब उसका शासन सुदृढ़ हो गया, १३५४ में यमुना के किनारे क़ुतुब क्षेत्र से पाँच कोस की दूरी पर, गाविन गाँव के समीप, फ़ीरोज़ाबाद नाम का एक नया शहर बसाया। इस शहर को बसाने में दिल्ली के पुराने शहरों का माल-मसाला उदारता से काम में लाया गया। यह शहर काफ़ी दूर-दूर तक फैला था। अब यह क्षेत्र फ़ीरोज़ शाह कोटला कहलाता है। यह बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग और दिल्ली गेट के मध्य है। इसमें इन्द्रप्रस्थ सहित १८ क्षेत्र शामिल थे। यहाँ उसने अपने लिए तीन भव्य महल, बाग़-बग़ीचे, मस्जिद, एक बावली और अन्य इमारतों का निर्माण कराया। फ़ीरोज़ के सरदारों-सामन्तों ने भी वहाँ मकान बनाये और शीघ्र ही वहाँ एक नगर बस गया। सम्भवत: इस नगर के चारों ओर कोई दीवार नहीं थी। यह नगर बहुत फैला हुआ था। पुरानी दिल्ली (महरौली-क़ुतुब क्षेत्र) से फ़ीरोज़ाबाद की पाँच कोस की दूरी में सड़क के दोनों ओर इतने मकान बन गये कि कोई स्थान ख़ाली नहीं बचा। इस क्षेत्र में आठ सार्वजनिक और एक निजी मस्जिद बनायी गयी।

फ़ीरोज़ शाह ने रिज (बाबटे) पर एक शिकारगाह और सितारों की चाल या नजूम (ज्योतिष विद्या) की जानकारी के लिए एक वेधशाला जहाँनुमा भी बनवायी। फ़ीरोज़ ने चिराग़ रोशन की दरगाह के पास स्थित खिड़की गाँव में भी एक शिकारगाह बनवायी। फ़ीरोज़ के शासन के चालीस वर्षों के दौरान पुरानी दिल्ली (महरौली क्षेत्र) से फ़ीरोज़ाबाद आने जाने वाले लोगों से पटा रहता था। लोगों को लाने ले जाने के लिए पालकियाँ ख़च्चर, घोड़े उचित दरों पर सर्वत्र उपलब्ध रहते थे।

फ़ीरोज़ को शिकार खेलने का शौक़ था। उसने नयी दिल्ली क्षेत्र में भी दो शिकारगाहें, तीन मूर्ति भवन में कोशक महल और सरदार पटेल मार्ग में मालचा महल बनवाया। मुहम्मद तुग़लक़ के राज में एक बार वह शिकार की खोज में हरियाणा के जंगलों में पहुँच गया और रास्ता भटक गया। भूख प्यास से बेहाल वह काफ़ी देर तक जंगल में भटकता रहा। थक जाने पर उसने पेड़ के नीचे घोड़ा बाँधा और आराम करने लगा। कुछ देर बाद दो गूजर सिद्धू और सहारन वहाँ आये। उन्होंने वहाँ एक परदेसी को परेशान हाल में देखा तो उसे अपने घर ले आये। उन्होंने उसे भोजन कराया। परदेसी ने उन्हें बताया कि वह दिल्ली दरबार का शहज़ादा है। यह सुन कर उन्होंने उसकी बहुत ख़ातिर की और उसे काफ़ी दिनों तक दिल्ली नहीं जाने दिया।

इस बीच फ़ीरोज़ की आँख सहारन की बहन से लड़ गयी। उसने गूजरी से विवाह करने की ठानी और अपनी माँ को ख़बर भेज दी। कुछ समय बाद फ़ीरोज़ का गूजरी से विवाह हो गया। जब फ़ीरोज़ सुल्तान बना उसने अपनी गूजरी रानी के लिए उसके गाँव हिसार में क़िला-महल बनवाया। हिसार में पानी की कमी थी। फ़ीरोज़ ने सतलुज और यमुना पर बाँध बना कर दो नहरें बनवायीं। एक हिसार-सिरसा तक और दूसरी दिल्ली तक आयी।

फ़ीरोज़ का एक और उल्लेखनीय कार्य मेरठ और अम्बाला से अशोक स्तम्भों को दिल्ली मँगवाना था। ये स्तम्भ ४८ पहियों की गाड़ी में बड़े जतन से दिल्ली लाये गये। मेरठ से लाया गया स्तम्भ हिन्दू राव हस्पताल के समीप फ़ीरोज़ के आखेट कक्ष क्षेत्र पीर ग़ायब में लगाया गया। यह स्तम्भ १७१३ में बारूद में विस्फोट होने से ध्वस्त हो गया था और इसका शिखर कोलकाता के संग्रहालय को भेज दिया गया था। बाद में कोलकाता से शिखर मँगा कर स्तम्भ की मरम्मत करके उसे फिर से लगा दिया गया है। अम्बाला से लाया गया स्तम्भ फ़ीरोज़शाह के नये महल फ़ीरोज़ाबाद में स्थापित किया गया। उस समय इन शिलालेखों की लिपि को कोई नहीं पढ़ सका। १८२७ में जेम्स प्रिंसेप ने इन्हें पहली बार पढ़ा। इसके बाद ब्राह्मी लिपि पढ़ना सरल हो गया। फ़ीरोज़ शाह ने क़ुतुब मीनार की मरम्मत करायी और उसकी दो मंज़िलें बनवायीं। उसने हौज़ ख़ास सरोवर के एक किनारे पर अरबी का अध्ययन करने के लिए एक मदरसे का निर्माण भी कराया। यह तुग़लक़ युग की सबसे आकर्षक इमारत है।

मेरठ वाले स्तम्भ में चौदहवीं शताब्दी में अंकित संस्कृत में तीन अलग-अलग व्यक्तियों के लेख हैं। पहला लेख सिन्धु के शासक के पुत्र का है, दूसरा एक स्वर्णकार का है, तीसरा लेख सोलहवीं शताब्दी का है। टोपरा स्तम्भ में बारहवीं शताब्दी के तीन लेख हैं। इनमें चौहान राजपूत नरेश विशाल देव और विग्रह राज की विजयों का और म्लेच्छों को भगाने का उल्लेख है। इसमें दो सोलहवीं शताब्दी के शिलालेख भी हैं। पहले में तारीख़ और लेखक का नाम है। दूसरा संस्कृत फ़ारसी में है। इसमें सुल्तान इब्राहीम का उल्लेख है।

फ़ीरोज़शाह को ज्वालामुखी के एक मन्दिर में १३०० संस्कृत ग्रन्थ मिले। उसने उन ग्रन्थों में से पण्डितों की सहायता से कुछ चुने हुए ग्रन्थों का फ़ारसी और अरबी में अनुवाद कराया। इनमें से एक खगोल शास्त्र से सम्बन्धित दलाइल-ए-फ़ीरोज़शाही था, जिसका बदायूँ ने अध्ययन करने का उल्लेख किया है। खगोल शास्त्र से सम्बन्धित वराह मिहिर की एक पुस्तक का अनुवाद तारीख़-ए-फ़ीरोज़शाही के लेखक शम्स-ए-शीराज़ से कराया गया। इस पुस्तक का फ़ारसी नाम है तर्जुमा-ए-वराही। इसी समय भारतीय संगीत पर एक पुस्तक का अनुवाद एक अज्ञात व्यक्ति ने दुनयात-अल-मुनयात के नाम से किया।

अध्याय पाँच

तैमूर लंग का हमला

दिल्ली को समय-समय पर अनेक विदेशी हमलों का सामना करना पड़ा। इनमें से कुछ हमले दिल्ली की ख़ुशहाली और दौलत की ख़बरें सुन कर लूट-मार के लिए किये गये। दिल्ली के सुल्तानों ने मंगोल हमलों का सामना सफलतापूर्वक किया। लेकिन फ़ीरोज़ तुग़लक़ की मृत्यु(१३८८) और तुग़लक़ वंश की समाप्ति के बाद दिल्ली सल्तनत लगभग समाप्त हो गयी। गुजरात, मालवा और जौनपुर के सूबेदारों ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था, इसलिए तैमूर ने हमला किया।

फ़ारस (ईरान, १३८७) और ब़गदाद (१३९३) पर अधिकार करने के बाद तैमूर ने भारत पर हमला किया। तैमूर ने तुर्कों, तातारियों और ईरानियों के बहुत बड़े लश्कर के साथ भारत पर हमला किया। उसका कहना था कि तुग़लक़ अच्छे मुसलमान नहीं हैं, इसलिए उन्हें दण्ड दिया जाना चाहिए। वह सितम्बर १३९८ में दिल्ली के बाहरी क्षेत्र में पहुँचा। लोनी पर क़ब्ज़ा करने के बाद उसने यमुना पार करके दिल्ली का चक्कर लगाया।

दिल्ली पर हमला करने से पहले तैमूर की युद्ध परिषद के दो सदस्यों, अमीर जहाँ शाह और अमीर सुलेमान शाह और कुछ अन्य लोगों ने तैमूर को बताया कि हमारे पास दस हज़ार हिन्दू क़ैदी हैं। ये क़ैदी हिन्दुस्तान में प्रवेश करने के बाद अब तक पकड़े गये हैं। कल जब शत्रु पक्ष ने हम पर हमला किया तो इन क़ैदियों ने ख़ुशी मनायी और कहा कि दुश्मन के सफल होने पर हम लोग संगठित हो कर इन तम्बुओं को लूट लेंगे और दुश्मन के साथ मिल जायेंगे। तैमूर ने उनसे इन बन्दियों के बारे में राय माँगी। उन्होंने कहा कि युद्ध के दिन इन बन्दियों को यहाँ नहीं छोड़ा जा सकता और इनको आज़ाद करना युद्ध के नियमों के ख़िलाफ़ है। वास्तव में इन्हें तलवार का शिकार बनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। तैमूर ने उनकी बात को युद्ध नियमों के अनुसार पाया और हुक्म दिया कि वे समूचे तम्बू में यह घोषणा करें कि जिस किसी के पास काफ़िर (ग़ैर-मुसलमान) क़ैदी हों वह उसे मौत के घाट उतार दे जो कोई इस हुक्म की तामील नहीं करेगा उसे भी मौत के घाट उतार दिया जायेगा और उसकी दौलत इस बात की ख़बर देने वाले को दे दी जायेगी।

जब इस हुक्म का पता इस्लाम के ग़ाज़ियों को लगा उन्होंने अपनी तलवारें निकाल कर अपने क़ैदियों को मौत के हवाले किया। उस दिन १० हज़ार काफ़िर, अपवित्र, नापाक मूर्ति पूजक मौत के घाट उतारे गये। मौलाना नासिरुद्दीन उमर विद्वान और तैमूर के सलाहकार थे। उन्होंने अपने जीवन में कभी एक चिड़िया भी नहीं मारी थी। लेकिन तैमूर के हुक्म का पालन करने के लिए उन्होंने १५ मूर्तिपूजक हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा। तैमूर के हमले का हाल उसी के शब्दों में पढ़िए।

‘‘मैं जमना नदी पर पहुँचा। इसके दूसरी ओर लोनी का क़िला और नगर था। इस क़िले का भार मैमून नाम के कोतवाल पर था। मैंने अपने तीन अमीरों को क़िले का घेराव करने भेजा। एक शेख़ ने मैमून को क़िला सौंपने की सलाह दी। लेकिन उसकी सलाह नहीं मानी गयी। इस पर मैंने अपनी सेना को क़िले पर हमला करने का हुक्म दिया। उसने क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया। यह इलाक़ा जमुना और हालिन का दोआब कहलाता है। युद्ध के दौरान अनेक राजपूतों ने अपने बच्चों और औरतों को आग के हवाले कर दिया और स्वयं युद्ध में मारे गये। क़िले की सेना के भी अनेक लोग मारे गये और कुछ पकड़े गये।

अगले दिन मैंने हुक्म दिया कि मुसलमान सैनिकों को अलग किया जाये और उनकी जान बख़्श दी जाये। लेकिन सभी काफ़िरों को जहन्नुम भेज दिया जाये। मैंने यह भी हुक्म दिया कि सैयद, शेख़ और विद्वान मुसलमानों के घरों की रक्षा की जाये और शेष घरों को लूटा जाये और क़िले को ध्वस्त कर दिया जाये।’’

इसके बाद तैमूर ने अपने अग्रिम दस्तों, तुर्क तीरन्दा़जों के साथ जमना पार की। तैमूर की सेना के साथ पहली झड़प में ही महमूद की सेना को भागना पड़ा। दिल्ली पहुँचने पर तैमूर ने आज जहाँ सिविल लाइंस वाला मेटकाफ़ हाउस है, वहाँ अपना लश्कर डाला। यहाँ पर तैमूर ने बन्दी बनाये गये पाँच हज़ार लोगों का क़त्ले-आम किया। उसे डर था कि ये लोग दुश्मन से मिल जायेंगे। अन्तिम युद्ध में तैमूर के तुर्क सैनिकों ने महमूद की सेना को तीन ओर से घेर लिया और उसके ६००० सैनिकों को मूली-गाजर की तरह काट दिया। उसके तीरन्दा़जों ने हाथियों को भगा दिया। सुल्तान महमूद और मल्लू ख़ाँ ने क़िले में शरण ली। सुल्तान रात में अपने विश्वस्त अनुचरों के साथ गुजरात की ओर भाग गया। दूसरे दिन तैमूर दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उसने दिल्ली से भारी हर्जाना माँगा। जो लोग हर्जाना नहीं दे सके उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। दिल्ली में लाशों का ढेर लग गया।

अगले दिन तैमूर के सिपाहियों और स्थानीय निवासियों में झड़प हो गयी। कुछ तातार सैनिक मारे गये। इस पर तैमूर ने क़त्ले-आम का हुक्म दे दिया। हज़ारों लोग ग़ुलाम बना लिये गये। तैमूर दिल्ली से करोड़ों रुपये, सैकड़ों हाथी, घोड़े, पालकी और नामी कारीगर लेता गया। इन कारीगरों ने समरकन्द में उसका मक़बरा ग़ोरे-अमीर बनाया। तैमूर के हमले से तुग़लक़ वंश का अन्त हो गया। केन्द्रीय सत्ता कमज़ोर हो गयी। सूबे आज़ाद हो गये और विदेशी हमले का रास्ता साफ़ हो गया। दिल्ली को तैमूर के हमले से उबरने में लगभग ढाई सौ वर्ष लगे।

तैमूर के दिल्ली प्रवास के बारे में एक दिलचस्प कथा है। एक दिन तैमूर दिल्ली के गली-कूचों में घूम रहा था। उसे एक बुढ़िया मिली। उसने नाम पूछा तो बुढ़िया ने कहा, ‘‘मुझे दौलत कहते हैं।’’ तैमूर ने हँस कर पूछा, ‘‘क्या दौलत अन्धी होती है?’’ बुढ़िया ने उत्तर दिया, ‘‘हाँ हुज़ूर, दौलत अन्धी होती है। तभी तो वह लँगड़े-लूलों के यहाँ चली जाती है।’’ तैमूर खिसिया कर चुप हो गया।

तैमूर दिल्ली को लूटने के बाद मध्य एशिया वापस चला गया। वह पंजाब में अपना प्रतिनिधि छोड़ गया। दिल्ली में तुग़लक़ वंश का शासन समाप्त हो गया। तैमूर के प्रतिनिधि ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया और वह सुल्तान बन गया। वह दिल्ली का पहला पठान (सैयद वंश का) शासक था।

अध्याय छह

छठी दिल्ली : दीनपनाह या पुराना क़िला

दिल्ली में मुग़ल साम्राज्य की नींव बाबर ने रखी थी। मुग़लों में मंगोलों और तुर्कों का ख़ून था। बाबर के पिता बदख़शाँ में एक छोटी रियासत फ़रग़ना के मालिक थे। बाबर १४९४ में ग्यारह वर्ष की उम्र में अपने पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा। लेकिन उसे उज़बेक सरदार शैबानी ख़ाँ ने फ़रग़ना से बेदख़ल कर दिया। बाबर ने १४९४ से १५१३ के बीच के वर्ष फ़रग़ना में बने रहने और समरकन्द पर अधिकार करने में बिताये। १५०४ में उसने काबुल और कन्धार पर अधिकार किया। १५१३ में जब उत्तरी क्षेत्र पर अधिकार करने की उसकी आशा समाप्त हो गयी तो उसने भारत की ओर नज़र की। दिल्ली के अफ़ग़ान शासक एक-दूसरे की जड़ खोदने में लगे थे। पंजाब के अफ़ग़ान सूबेदार ने बाबर को भारत आने का निमन्त्रण दिया। उसके संकेत पर बाबर ने १५२३-२४ और १५२५-२६ में भारत पर हमला किया। बाबर की तुलना में उसके विपक्षी की फ़ौज उससे कई गुना अधिक थी। लेकिन बाबर के सैनिक संगठित और वफ़ादार थे। उसके घुड़सवार सैनिक बेहतर लड़ाके थे और उसके पास तुर्क अफ़सरों की कमान में तुर्की का नया तोपख़ाना था, इसलिए बाबर ने इब्राहीम लोदी की फ़ौज को आसानी से हरा दिया। इसके बाद कनवहा में राणा साँगा की फ़ौज को हरा कर बाबर हिन्दुस्तान का बादशाह बन गया।

बाबर भारतीय इतिहास का अत्यन्त आकर्षक चरित्र था। वह उत्कृष्ट सेनाध्यक्ष होने के साथ कवि, साहित्यकार और सुरुचि सम्पन्न व्यक्ति था। वह जहाँ कहीं जाता बाग़ लगाता था। उसने आगरा में आरामबाग़ नाम से एक बाग़ लगाया जिसे अब रामबाग़ कहते हैं। उसे पहाड़ों, चश्मों से बेहद प्रेम था। तुर्की भाषा में लिखी गयी उसकी आत्मकथा बाबरनामा एक उत्कृष्ट रचना है। हिन्दुस्तान के बारे में बाबर की बहुत अच्छी राय नहीं थी। उसने हिन्दुस्तान का वर्णन इस तरह किया है : ‘‘हिन्दुस्तान ऐसा देश है जहाँ आनन्द मनाने के अधिक साधन नहीं हैं। यहाँ के लोग रूपवान नहीं हैं। वे इस बात को नहीं जानते कि आपस में मिलने-जुलने, सम्पर्क रखने और बातचीत करने से कितना आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। उनमें कोई प्रतिभा नहीं है, कोई समझ नहीं है। उनके आचार-विचार में कोई नम्रता, शालीनता नहीं है, उनमें कोई दया या भाई-चारा नहीं है। उनमें अपने हस्तशिल्प कार्य की कारीगरी करने या यान्त्रिक आविष्कार करने की क्षमता नहीं है। उनमें डिज़ाइन करने या वास्तु-कला में कुशलता या ज्ञान हासिल करने की क्षमता नहीं है। उनके यहाँ अच्छे घोड़े नहीं है, अच्छा मांस नहीं है, अच्छे अंगूर, ख़रबू़जे और अच्छे फल नहीं हैं। बर्फ़ या ठण्डा पानी नहीं है। उनके बाज़ारों में अच्छा भोजन या रोटी नहीं मिलती। उनके यहाँ हमाम, मदरसे, मोमबत्ती और शमादान नहीं हैं।’’

बाबर के बाद उसका बड़ा लड़का हुमायूँ गद्दी पर बैठा। हुमायूँ अफ़ग़ानिस्तान में बाबर के क़िलों का अधिकारी था। हुमायूँ जब भारत लौटा, बाबर गम्भीर रूप से बीमार था। लेकिन फिर हुमायूँ बीमार पड़ गया। बाबर ने प्रार्थना की कि ख़ुदा उसकी ज़िन्दगी ले ले और हुमायूँ की बख़्श दे। तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार ख़ुदा ने उसकी प्रार्थना क़बूल कर ली। हुमायूँ स्वस्थ हो गया और गद्दी पर बैठा।

हुमायूँ ने १५३० से १५४० के दौरान दीन पनाह या चतुर लोगों की शरण स्थली नगर और पुराने क़िले का निर्माण ज़ोर-शोर से शुरू कराया। दीन पनाह निर्माण योजना में एक शानदार क़िले, महल और नगर का निर्माण शामिल था। हुमायूँ का नगर वर्तमान पुराने क़िले से बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग तक फैला था। इसका एक दरवाज़ा अभी तक है जिसे ख़ूनी दरवाज़ा कहते हैं, क्योंकि यहाँ अंग्रेज़ कप्तान हडसन ने मुग़ल शहज़ादों की हत्या की थी। तब इसे काबुल दरवाज़ा कहते थे।

हुमायूँ ने १५३४-३५ में एक शानदार अभियान में मालवा और गुजरात पर अधिकार किया। इसके बाद उसने आगरा में एक वर्ष मौज-मस्ती में बिता दिया और दोनों सूबों को खो दिया। इससे अफ़ग़ानों को अपनी ताक़त बढ़ाने का मौका मिला। सौभाग्यवश इसी समय उन्हें शेरशाह के रूप में एक बेहतरीन नेता मिला। शेरशाह १५२६ में बाबर के साथ था, लेकिन फिर उसने बाबर का साथ छोड़ कर दक्षिण बिहार में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली। जब शेरशाह ने बंगाल की सम्पदा पर अधिकार करने के लिए वहाँ का रुख़ किया तो हुमायूँ ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। १५३७-४० के दौरान हुमायूँ ने अपनी सुस्ती और काहिली के कारण बहुत कुछ खोया। १५४० में शेरशाह से दो बार हारने के बाद उसे अफ़ग़ानिस्तान का रुख़ करना पड़ा। उसके भाई कामरान ने उसे पंजाब और काबुल नहीं आने दिया। हुमायूँ किसी तरह फ़ारस के शाह इस्माईल के पास पहुँचा जिसने उसे शरण और सैनिक सहायता दी। इसी दौरान जब वह इधर-उधर भागा फिर रहा था, अमरकोट में अकबर का जन्म हुआ। हुमायूँ ने कई वर्ष फ़ारस में बिताये। बाद में फ़ारसी सैनिकों की सहायता से उसने दिल्ली पर फिर से अधिकार किया।

शेरशाह ने हुमायूँ को हराने के बाद दिल्ली की गद्दी सँभाली। अपनी जीत के उपलक्ष में शेरशाह ने सुल्तान बनने पर पुराने क़िले और नये नगर का निर्माण पूरा कराया। पुराने क़िले में शाही महल पूर्ववत रहा। शेरशाह बहुत योग्य शासक था। उसने ज़मीन का बन्दोबस्त किया, घोड़ों को दाग़ने की प्रथा चलायी, बंगाल में सोनार गाँव से सिन्ध तक सड़क बनवायी और सड़कों पर सरायें और कोस मीनार बनवायीं। शेरशाह का सबसे उल्लेखनीय कार्य लगान वसूल करने की उचित और न्यायपूर्ण व्यवस्था करना था। उसने प्रशासन के लिए सुयोग्य नौकरशाही की भी व्यवस्था की और इस प्रकार मुग़लों को एक संगठित और कुशल शासन व्यवस्था प्रदान की। उसने केवल पाँच वर्ष तक राज किया। अगर वह युवावस्था में दिल्ली की गद्दी पाता तो शायद मुग़लों को दोबारा भारत जीतने में सफलता नहीं मिलती।

शेरशाह की मृत्यु के बाद के बाद उसका पुत्र इस्लाम शाह गद्दी पर बैठा और उसने पुराने क़िले का निर्माण कार्य पूरा कराया। फिर उसका चचेरा भाई मुबारिज ख़ाँ सुल्तान आदिल शाह के नाम से गद्दी पर बैठा। आदिल शाह की राज-काज में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह दिन-रात रँगरलियों में डूबा रहता था।, इसलिए राज्य में सभी जगह विद्रोह की ज्वाला सुलगने लगी। आदिल शाह के सभी रिश्तेदार सम्राट बनने का प्रयास करने लगे। एक समय ऐसा आया जब तीन अफ़ग़ान दिल्ली के बादशाह थे। लगभग इसी समय हुमायूँ अपना खोया राज्य प्राप्त करने के लिए भारत लौटा। ईरान के शाह ने उसे १२,००० ईरानी सैनिकों का एक दल दिया था। हुमायूँ ने बिना किसी विरोध के दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया।

पुराने क़िले में हुमायूँ द्वारा निर्मित एक कुआँ और शेरशाह द्वारा निर्मित एक इमारत शेर मण्डल और मस्जिद भी है। यह मुग़लों के आने से पहले बनायी गयी मस्जिद है। शेर मण्डल अष्ठभुजा वाली इमारत है। इसे बनाने में लाल, सफ़ेद, सलेटी और काले पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इसकी सीढ़ियाँ सीधी हैं। इसमें सुन्दर नक़्क़ाशी और मेहराबें हैं और अरबी में पवित्र क़ुरान की आयतें खुदी हुई हैं। पुराने क़िले के सामने एक मस्जिद और मदरसा है। अकबर की धाय माहम अंगा ने इनका निर्माण कराया था। हुमायूँ ने अपनी विजय के बाद शेर मण्डल को पुस्तकालय बना दिया था। मुग़ल पुस्तकालय को क़ुतुबख़ाना कहते थे। हुमायूँ एक दिन आकाश में सितारों की चाल देख रहा था। इसी समय मस्जिद से नमाज़ के लिए अज़ान की आवाज़ आयी। हुमायूँ मस्जिद जाने के लिए सीढ़ियाँ उतरने लगा। अचानक वह फिसला और उसकी मौत हो गयी। कुछ लोगों का कहना है सीढ़ियों से गिरने से नहीं, अफ़ीम की पीनक में शेरमण्डल के छज्जे से गिरने से उसकी मौत हुई।

अध्याय सात

सातवीं दिल्ली : शाहजहानाबाद

आगरा की अत्यधिक गर्मी के कारण शाहजहाँ ने १६३९ में दिल्ली को राजधानी बनाने का फ़ैसला किया। अब विचित्र बात यह है कि सिकन्दर लोदी दिल्ली को अत्यधिक गर्म पा कर राजधानी आगरा ले गया था। तैमूर लंग ने दिल्ली में इतनी लूट-मार की थी कि वह अपने पुराने वैभव को खो कर एक साधारण कस्बा मात्र रह गयी थी। शाहजहाँ ने मीर-ए-इमारत मुकर्रमत ख़ाँ को जगह का चुनाव करने के लिए दिल्ली भेजा। प्रारम्भ में ताल कटोरा के पास का इलाक़ा पानी की प्रचुरता और हरियाली के कारण राजधानी के लिए और रायसीना पहाड़ी का इलाक़ा क़िले के निर्माण के लिए चुना गया।

क़िले के निर्माण के लिए दिल्ली के सर्वोत्तम राज उस्ताद हामिद और उस्ताद हीरा नियुक्त किये गये। इन दोनों ने शोरे की अधिकता के कारण रायसीना क्षेत्र को नामंज़ूर कर यमुना के समीप शेरशाह के बेटे सलीम शाह के बनाये सलीमगढ़ के पास खुली जगह का सुझाव दिया। नगर के लिए जगह का चुनाव करते समय इन बातों का ध्यान रखा गया : नदी का किनारा, नगर ऊँचे स्थान पर हो, जिससे बाढ़ का ख़तरा न हो। दिल्ली का दाहिना तट बाढ़ की चपेट में नहीं आता था। इन लोगों की राय में यह जगह इसलिए भी ठीक थी कि अगर शाही महलों को यमुना की तरफ़ बनाया गया तो गर्मियों में भी ठण्डक रहेगी। नयी जगह का सुझाव सम्राट ने मंज़ूर कर लिया। नींव की खुदाई के साथ नये नगर के निर्माण का काम शुरू हुआ। नींव खोदने के बाद उस्ताद हामिद और उस्ताद हीरा मौक़े से ग़ायब हो गये। क़िला बनाने का काम रुक गया। मीर इमारत ने सम्राट से शिकायत की और दोनों की गिरफ़्तारी का हुक्म जारी हो गया। कुछ समय बाद दोनों आगरा में शाही दरबार में हाज़िर हो गये। उन्होंने सम्राट को बताया कि हम नहीं चाहते थे कि क़िले की नींव कमज़ोर हो। हमने नींव को इसलिए खुला छोड़ा ताकि वह मौसम की मार को झेल सके। अब गर्मी, बरसात और सर्दी की हवा खा कर नींव स्थिर हो गयी है। अब क़िले की इमारत को कोई ख़तरा नहीं है।

लाल क़िले का निर्माण १६३८ में शुरू किया गया और दस वर्ष में इसका निर्माण पूरा हुआ। लाल क़िले का निर्माण इज़्ज़त ख़ाँ, अल्लाहवर्दी ख़ाँ, हामिद ख़ाँ और अहमद ख़ाँ जैसे सुप्रसिद्ध वास्तुकारों की देख-रेख में किया गया। इसके निर्माण में उस समय की मुद्रा में एक करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे। इस धनराशि का आधा हिस्सा सम्राट और उसकी बेगमों के महलों के निर्माण पर ख़र्च हुआ। आगरे का क़िला, फ़तहपुर सीकरी और लाल क़िला सभी एक ही नमूने पर बने हैं।

शाहजहानाबाद के निर्माण में नौ वर्ष लगे। यह कार्य १६४८ में पूरा हुआ। फ़ीरोज़ शाह युग की कई इमारतें नये नगर में शामिल की गयीं। निर्माण के दौरान शाहजहाँ ने समय-समय पर नगर का निरीक्षण किया। नगर का निर्माण पूरा होने के बाद शाहजहाँ ने ८ अप्रैल १६४८ को शुभ मूहर्त में धूमधाम से नगर में प्रवेश किया। दारा शिकोह ने रास्ते में सम्राट पर सोने-चाँदी की पंखुड़ियाँ गिरायीं। शाहजहानाबाद सात मील के दायरे में फैला था।

शाहजहाँ अपने क़िले को उर्दू-ए-मुल्ला कहता था। बाद के मुग़ल बादशाह इसे क़िला-ए-मुल्ला कहने लगे। लाल पत्थर का बना होने के कारण जनता इसे लाल क़िला कहती थी। कालान्तर में यही उसका नाम हो गया। शाहजहानाबाद के निर्माण के लिए अधिकांश सामग्री पत्थर, ईंटें, चूना, लकड़ी आदि अधीनस्थ राजाओं, ज़मींदारों ने भेजी। इन लोगों ने दिल्ली में अपनी हवेलियाँ, महल आदि भी बनवाये। व्यापारियों ने अपने कारोबार के लिए दुकानें और रहने के लिए हवेलियों का निर्माण किया। इस तरह १६४८ में शाहजहाँ ने एक व्यस्त कारोबार से भरे-पूरे शानदार नगर में प्रवेश किया। विडम्बना यह है कि शाहजहाँ नयी राजधानी में अधिक समय तक राज नहीं कर सका। उसके पुत्र औरंगज़ेब ने उसे आगरा के क़िले में बन्दी बना दिया। वह सात वर्ष से अधिक समय तक बन्दी रहा। इस क़ैद से उसे २२ जनवरी १६६६ को मृत्यु के साथ ही मुक्ति मिली।

नगर बसने के बाद शाहजहानाबाद में पानी की कमी होने लगी। कुएँ सूखने लगे। शाहजहाँ ने अली मर्दान ख़ाँ को नहर बनाने की आज्ञा दी। अली मर्दान ख़ाँ ने एक पुरानी नहर, जिसे जलालुद्दीन ख़िल्जी ने बनाया था और फ़ीरोज़ तुग़लक़ ने सुधारा था, फिर से चालू किया। अली मर्दान ख़ाँ ने हिमाचल के सिरमौर की पहाड़ियों से एक और नहर निकाली और दोनों को जोड़ कर एक नयी नहर बनायी। यह नगर पश्चिमी जमुना नहर के नाम से प्रसिद्ध हुई।

अली मर्दान की नहर काबुली दरवाज़े से नगर में प्रवेश करती थी और तीस हज़ारी और जहाँआरा बाग़ होते हुए आगे बढ़ती थी। नहर नगर को पर्याप्त पीने का पानी देती थी और बग़ीचों को सींचने का काम करती थी। नहर फ़तहपुरी मस्जिद से चाँदनी चौक होते हुए उर्दू बाज़ार, जैन मन्दिर होते हुए लाल क़िले में प्रवेश करती थी। क़िले के भीतर इसे नहर-ए-बहिश्त कहा जाता था। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद नहर गाद से भर गयी थी। मोहम्मद शाह रंगीला के शासन काल में सआदत ख़ाँ ने इसे ठीक कराया। बाद में अंग्रेज़ों ने चाँदनी चौक में नहर को पाट दिया।

उत्तराधिकार के युद्ध में विजयी होने के बाद औरंगज़ेब ने २१ जुलाई १६५८ को आगरा में अपना राज्याभिषेक किया। उत्तराधिकार के युद्ध के कारण देश के कुछ भागों में केन्द्रीय शासन समाप्त हो गया था। सेनाओं के इधर-उधर जाने और चोरों की हरकतों के कारण कृषि-व्यवस्था समाप्त हो गयी थी। लोग बढ़े हुए करों के भार से पिस रहे थे। खाद्यान्नों के दाम बहुत बढ़ गये थे, इसलिए औरंगज़ेब ने अपना शासन कुछ सुधारों के साथ शुरू किया। उसने सर्वत्र प्रशासन को बहाल किया। तहबाज़ारी कर समाप्त किया। यह प्रत्येक सड़क पर हो कर गुजरने वाले मार्ग पर उसके मूल्य का दस प्रतिशत होता था। उसने पानदारी भी समाप्त कर दी। यह ज़मीन या मकान पर लगने वाला कर था। कुछ अन्य कर भी समाप्त किये गये। खाद्यान्नों के दाम कम करने के लिए उसने अनाज पर लगे सभी कर समाप्त कर दिये।

औरंगज़ेब ने लगभग ५० वर्ष तक शासन किया। वह सादा जीवन बिताता था। उसकी पत्नियों की संख्या कभी चार से अधिक नहीं रही। वह अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए पवित्र क़ुरान की नक़ल करके और टोपी सिल कर पैसे इकट्ठा करता था। तथापि, वह भारतीय इतिहास का अत्यन्त विवादास्पद चरित्र है। जहाँ कुछ लोग उसे ज़िन्दा पीर कहते हैं, दूसरे अन्य उसे धर्मान्ध कट्टरपन्थी कहते हैं। उसने अकबर की सुलहकुल की नीतियों को पूरी तरह पलट दिया। मराठों और दक्षिण की रियासतों को साम्राज्य का हिस्सा बनाने के लिए उसे ३० वर्ष तक दक्कन में रहना पड़ा और संघर्ष करना पड़ा। दक्कन की लड़ाइयों से साम्राज्य का ख़ज़ाना ख़ाली हो गया। सेना का हौसला पस्त हो गया और प्रशासन जर्जर हो गया। उसकी नीतियों से सिख, सतनामी, राजपूत, मराठे और जाट नाराज़ हो गये और अन्त में मुग़ल सल्तनत अपने पूर्व रूप की छाया मात्र रह गयी।

औरंगज़ेब भारत का सबसे शक्तिशाली मुग़ल शासक था। उसके साम्राज्य में लगभग सम्पूर्ण भारत के अलावा अफ़ग़ानिस्तान तथा उसके नज़दीकी इलाक़े भी शामिल थे। औरंगज़ेब को आशंका थी कि उसकी मौत के बाद उसके तीनों लड़के तख़्त के लिए लड़ेंगे। उसका बड़ा लड़का मुअज़्ज़म काबुल का, आज़म गुजरात का और कामबख़्श दक्कन का सूबेदार था, इसलिए औरंगज़ेब ने उत्तराधिकार के युद्ध को टालने के लिए साम्राज्य को तीनों लड़कों में बाँटने की वसीयत की। लेकिन उसकी मृत्यु की ख़बर मिलते ही आज़म और कामबख़्श ने स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया और युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। मुअज़्ज़म पिता की इच्छानुसार साम्राज्य के बँटवारे के लिए तैयार था, लेकिन उसके दोनों भाई इसके लिए तैयार नहीं थे। उत्तराधिकार के युद्ध में आज़म और कामबख़्श दोनों मारे गये और मुअज़्ज़म ने बहादुरशाह प्रथम की उपाधि के साथ गद्दी सँभाली।

बहादुरशाह ने साम्राज्य की स्थिरता और एकता बनाये रखने के लिए ज़ोरदार क़दम उठाये। वह एक योग्य शासक था। गद्दी पर बैठने के समय वह ६३ वर्ष का था। उसने मराठों के साथ सन्धि की, राजपूतों के साथ सुलह-सफ़ाई की, सिखों पर निर्णायक विजय प्राप्त की और उनके गुरु गोविन्द सिंह को अपनी सेवा में ले लिया। उसका शासन केवल पाँच वर्ष रहा। अगर वह अधिक समय तक ज़िन्दा रहता तो प्रशासन को मज़बूती प्रदान करता। बहादुरशाह के उत्तराधिकारी विलासी और काहिल थे। उनका अधिकांश समय नाच-गाना देखने-सुनने में बीतता था। मुग़ल दरबार षड्यन्त्रकारियों, चापलूसों और हरामख़ोरों का केन्द्र बन गया। मुहम्मद अब्दुल्ला ख़ाँ और हुसैन अली ख़ाँ (सैयद बन्धु) अत्यन्त शक्तिशाली हो गये। वे जिसको चाहते उसे गद्दी पर बिठा देते और नाराज़ होने पर उसे अन्धा कर देते या उसकी हत्या कर देते। उनका कहना था हम जिस किसी के सिर पर अपनी जूती रख देंगे वह दिल्ली का बादशाह बन जायेगा। उन्होंने बहुत मनमानी की। इससे उनके बहुत-से दुश्मन हो गये थे और अन्त में दोनों भाई मारे गये।

केन्द्रीय सत्ता के कमज़ोर होने के कारण मराठों ने दिल्ली के बाहरी इलाक़ों को लूटा और मुग़ल सम्राट को मालवा देने के लिए मजबूर किया। दिल्ली का यह हाल देख कर नादिर शाह और अहमद शाह ने दिल्ली पर हमला किया। नादिर शाह को हमला करने के लिए मुग़ल दरबारी आसिफ़ जाह ने उकसाया था। मुग़ल सल्तनत की बदहाली का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि १५२६ से १७०७ तक यानी बाबर से औरंगज़ेब की मृत्यु तक के १८१ वर्षों के दौरान कुल छह मुग़ल शासक हुए जबकि १७०७ से १८५७ तक १५० वर्षों के दौरान ११ शासक हुए।

रुहेल खण्ड में रुहेलों ने अपनी शक्ति ख़ूब बढ़ा ली और लाल क़िले पर अधिकार कर लिया। रुहेला सरदार ग़ुलाम क़ादिर ने शाह आलम द्वितीय की आँखें निकाल दीं और मुग़ल हरम की औरतों के साथ बदसलू़की की। शाह आलम ने मराठों से सहायता माँगी। मराठों ने शाह आलम को ग़ुलाम क़ादिर के चंगुल से मुक्त कराया और ग़ुलाम क़ादिर को उचित दण्ड दिया। इसके कुछ समय बाद शाह आलम ने मराठों के प्रभाव से मुक्त होने के लिए अंग्रेज़ों से सहायता माँगी। १८०३ में अंग्रेज़ों ने मराठों को पराजित करके दिल्ली पर अधिकार कर लिया। देश की सत्ता अंग्रेज़ों के हाथों में आ गयी। मुग़ल सम्राट की सत्ता लाल क़िले तक सीमित रह गयी। एक कहावत प्रसिद्ध हो गयी।

बादशाहते शाह आलम
अज दिल्ली ता पालम

प्रशासन, फ़ौज और ख़जाने पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। मुग़ल सम्राट नाम के सम्राट रह गये। दिल्ली के गली-कूचों में ढिंढोरा पीटा जाता था : ‘‘ख़ल्क ख़ुदा का, मुल्क बादशाह का, हुक्म कम्पनी बहादुर का।’’

अध्याय आठ

नादिर शाह का हमला और अहमद शाह अब्दाली की लूट

नादिर शाह ने मुहम्मद शाह रंगीले के शासन काल के दौरान भारत पर हमला किया। नादिर शाह ने पहले कन्धार पर अधिकार किया। काबुल के सूबेदार ने दिल्ली दरबार को नादिर शाह के हमले की चेतावनी दी। लेकिन मुहम्मद शाह ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। अन्त में नादिर शाह अफ़ग़ानिस्तान को चीरता, पेशावर और लाहौर में लूट-मार करता करनाल पहुँचा। मुग़ल सेनाध्यक्ष ख़ान दौराँ ने एक बड़ी फ़ौज इकट्ठा करके जंग का ऐलान कर दिया। शाही फ़ौजें आराम के साथ करनाल पहुँची। नादिर शाह की फ़ौजों के एक ही हमले में शाही सेना में खलबली मच गयी। ईरानियों ने हिन्दुस्तानी फ़ौजों का बहुत-सा सामान लूट लिया और काफ़ी सैनिकों को मार दिया। ख़ान-ए-दौराँ और सादत ख़ान ने अपनी फ़ौजों को आगे बढ़ने का हुक्म दिया। तीन घण्टे तक घमासान युद्ध हुआ। ख़ान-ए-दौराँ, मु़ज़फ़्फ़र ख़ान और १०-१२ हज़ार मुग़ल सैनिक मारे गये।

नादिर शाह ७ मार्च १७३९ को दिल्ली, शालीमार बाग़ पहुँचा। ८ मार्च को उसने लाल क़िले में प्रवेश किया। मुहम्मद शाह ने उसका स्वागत किया। ९ मार्च को नादिर शाह ने पेशकुश या रक्षा धन (जान माल की रक्षा के लिए वसूला जाने वाला धन) एकत्र करने के आदेश जारी किये। १० मार्च को मुहम्मद शाह ने पेशकुश की रक़म जमा करने पर विचार-विमर्श किया। उसी दिन थमास ख़ान ने नौ निसिखची घुड़सवार दुकानें खुलवाने और गेहूँ का दाम निश्चित करने को पहाड़गंज भेजे। गेहूँ का दाम एक रुपये का १० सेर निश्चित करने पर विवाद हो गया और उपर्युक्त निसिखची और कुछ कुजलबास सैनिकों की हत्या कर दी गयी। अफ़वाहें फैलने लगीं कि नादिर शाह बन्दी बना लिया गया है, उसे ज़हर दे दिया गया है। इस पर नगर में बलवा हो गया। बलवाई क़िले की तरफ़ बढ़े और उन्होंने अनेक ईरानी सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काट दिया। ११ मार्च को नादिर शाह बलवा दबाने लाल क़िले से चाँदनी चौक रवाना हुआ। उसने रास्ते में अनेक मृत सैनिकों के शव देखे। उसने फ़ौज का बड़ा दस्ता बलवाइयों को दबाने के लिए भेजा, लेकिन बलवाइयों की संख्या और तेवर देख उसे अपनी नीति बदलनी पड़ी। लोग उस पर भी पत्थर फेंक रहे थे। वह बड़े दरीबा से थोड़ा आगे बढ़ा था कि रौशनुद्दौला तुर्रेबाज़ ख़ाँ की हवेली से किसी ने उस पर गोली चला दी। नादिर शाह तो बच गया, लेकिन उसका एक सहयोगी घायल हो गया। यह देख नादिर शाह ने क़त्ले-आम का हुक्म दे दिया। यह हुक्म दे कर वह रोशनुद्दौला की सुनहरी मस्जिद में चला गया और उसने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाल ली।

नादिर शाह का हुक्म जारी होते ही ईरानी सिपाही लोगों को मारने-काटने, लूट-मार करने में जुट गये। पहाड़गंज, तेलीवाड़ा, पुरानी ईदगाह, किनारी बाज़ार, कटरा रोशनुद्दौला और मालीवाड़ा में हज़ारों स्त्री-पुरुष और बच्चे क़त्ल कर दिये गये। चाँदनी चौक, बड़े दरीबे से जौहरियों, सर्राफ़ों की दुकानें लूट ली गयीं। व्यापारियों, साहूकारों की दुकानों और कोठियों को लूट कर आग लगा दी गयी। दिल्ली की यह दुर्दशा देख मुहम्मद शाह के वज़ीर आसफ़ शाह ने किसी तरह नादिर शाह को क़त्ले-आम बन्द करने के लिए तैयार किया। वह सुनहरी मस्जिद पहुँचा। जहाँ नादिर शाह बैठा था। आसफ़जाह सिर झुका कर खड़ा हो गया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने कहा :

‘कसे न माँद कि दीगर व तेगे नाज़ कुशी,
मगर कि ज़िन्दा कुनी खल्क रा व बाज कुशी।’

‘‘ऐ शहंशाहों के शहंशाह; अब दिल्ली में कोई जीवित नहीं रहा जिसे क़त्ल किया जा सके। अगर आप किसी का क़त्ल करना चाहते हैं तो फिर से मुर्दों में जान डालिए।’’ इतना कहने के बाद आसफ़जाह फूट-फूट कर रोने लगा। इस पर नादिर शाह ने क़त्ले-आम बन्द करने का हुक्म दिया और अपनी तलवार म्यान में रख ली। क़त्ले-आम में २० हज़ार से अधिक नागरिक मारे गये। नादिर शाह ने थानेश्वर, पानीपत और सोनीपत आदि में काफ़ी लूट-मार और मार-काट की। वह दो महीने दिल्ली में रहा।

नादिर शाह अपने साथ हज़ारों स्त्री-पुरुषों, बच्चों, मिस्त्रियों, कारीगरों, राज-मज़दूरों और शिल्पियों को ग़ुलाम बना कर ले जा रहा था। इन दिनों पंजाब और मुलतान का सूबेदार ज़करिया ख़ाँ नादिर शाह का प्रिय पात्र था। उसे नादिर शाह की सिफ़ारिश पर सैफ़द्दौला द्वितीय की उपाधि दी गयी थी। वह बहुत ही न्यायप्रिय और प्रजापालक प्रशासक था। भारत से लौटते हुए जब नादिर शाह लाहौर से गुज़रा तो उसने ज़करिया ख़ाँ से कुछ माँगने को कहा। जकरिया ख़ाँ ने नादिर शाह से अनुरोध किया कि वह दिल्ली से ग़ुलाम बना कर ले जाये जा रहे कारीगरों-दस्तकारों और अन्य लोगों को मुक्त कर दे। नादिर शाह ने ज़करिया ख़ाँ का यह अनुरोध मान लिया और ग़ुलाम बनाये गये हज़ारों लोग आज़ाद कर दिये गये।

यदुनाथ सरकार के अनुसार नादिर शाह १५ करोड़ रुपये नक़द, ५० करोड़ रुपये के आभूषण, सोने-चाँदी के बर्तन, रेशमी जरब़़फ्त और कमखाब तथा और दो अमूल्य वस्तुएँ तख़्त-ए-ताउस और कोहेनूर ले गया। महेश्वर दयाल के अनुसार नादिर शाह लूट का सामान एक हज़ार हाथियों, सात हज़ार घोड़ों और दस हज़ार ऊँटों पर लाद कर ले गया। चमड़े का कोट बनाने वाले ख़ुरासानी के पुत्र नादिर ने अपने पुत्र का विवाह मुग़ल बादशाह की पुत्री से करवाया। उसने युद्ध में मारे गये मु़ज़फ़्फ़र ख़ाँ की सभी ख़ूबसूरत पत्नियों, बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाया।

अहमदशाह अब्दाली की लूट

नादिर शाह द्वारा तबाह किये जाने के सत्रह वर्ष बाद १७५७ में दिल्ली को एक बार फिर लूट-मार, हिंसा, बलात्कार और आगज़नी के रूप में अहमदशाह अब्दाली के हमले का सामना करना पड़ा। अब्दाली नादिर शाह का अफ़ग़ान सेवक था और नादिर की हत्या के बाद शक्तिशाली हो गया था। अब्दाली २३ जनवरी १७५७ को दिल्ली पहुँचा। दिल्ली पहुँचते ही उसने धन वसूली के इन्तज़ाम किये। उसके सैनिकों ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने के बाद ही लूट-मार और आगज़नी शुरू कर दी थी।प्रारम्भ में अब्दाली के सैनिकों ने छुटपुट लूट-मार की थी। यह अनधिकृत थी। दिल्ली पहुँचने और सरकारी तन्त्र पर क़ब्ज़ा करने के बाद अब्दाली ने अधिकृत वसूली शुरू की। अब्दाली गर्मी से बचने और मराठों के दक्षिण से बड़ी सेना लाने से पहले ही स्वदेश चला जाना चाहता था, इसलिए उसने आदेश दिया कि धन जल्दी वसूला जाये। दिल्ली के सभी अमीरों, सरकारी अफ़सरों, व्यापारियों को पत्र भेज कर धन माँगा गया। धन वसूलने के लिए स्त्रियों सहित लोगों पर अत्याचार किया गया। धनी लोगों और सल्तनत के बड़े अधिकारियों से धन वसूलने के लिए उन पर तरह-तरह के ज़ुल्म ढाये गये। मुहल्लों में हर घर से धन की माँग की गयी; जिसने भी देने में असमर्थता व्यक्त की, उस पर भयानक अत्याचार किये गये। धन वसूलने के लिए बन्द घरों के ताले तोड़े गये, गड़ा धन खोजने के लिए मकानों की खुदाई की गयी। अब्दाली के ज़ुल्मों से बचने के लिए लोगों ने सोना-चाँदी बेच कर धन जुटाने का प्रयास किया। ख़रीददारों के अभाव में सोना ८-१० रुपये तोला और चाँदी एक रुपये की दो तोला बिकी। बहुत-से लोगों ने अपमान, अत्याचार से बचने के लिए ज़हर खा कर जान दे दी। अब्दाली की नज़र सुन्दर स्त्रियों पर भी थी। अनेक औरतों को जबरन अब्दाली के हरम में दाख़िल कर लिया गया।लूटे गये सोना-चाँदी से अब्दाली के नाम से टकसाल में सिक्के ढाले गये। लूट की पहली खेप अब्दाली के लड़के तैमूर शाह की रखवाली में स्वदेश रवाना कर दी गयी। इससे पहले तैमूर का निकाह आलमगीर द्वितीय की पुत्री ज़ोहरा बेगम से किया गया। इन्तिज़ाम-उद्दौला ने वज़ीर पद दिये जाने के एवज में दो करोड़ रुपये देने का वादा किया था। अब्दाली ने उसकी माँ शोलापुरी बेगम को बुला कर उसके पिता द्वारा एकत्र किये गये ख़ज़ाने की पूछ-ताछ की। शोलापुरी बेगम एक बड़े वज़ीर की पुत्रवधू, दूसरे वज़ीर की विधवा और तीसरे की माँ थी। उससे कहा गया अगर उसने ख़ज़ाने का पता नहीं बताया तो उसके नाख़ूनों में कील ठोंक दी जायेंगी। यह सुन कर वह बेहोश हो गयी। होश आने पर उसने वह कमरा बताया। छह घण्टे की खुदाई के बाद वहाँ १६ लाख रुपये, सोने-चाँदी के रत्न जड़ित बर्तन और अन्य बहुमूल्य सामान मिला। सभी बड़े अधिकारियों के घरों की या तो खुदाई की गयी या वहाँ से सभी बहुमूल्य वस्तुएँ लूट ली गयीं। ४ से २० फ़रवरी (१७५७) तक वसूली, खुदाई और लूट-मार चलती रही। दिल्ली को केन्द्र बना कर अब्दाली ने बुलन्दशहर, अनूप शहर, फ़रीदाबाद, मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, महावन और आगरा में लूट-मार, हत्याएँ और धन वसूली की।तीस मार्च १७५७ को अब्दाली स्वदेश रवाना हुआ। उसका लूट का सामान २८ हज़ार ऊँट, हाथी, खच्चर, बैल और बैलगाड़ियों में ले जाया गया। इसके अलावा उसके साथ मुहम्मद शाह की विधवाएँ भी थीं, जिनका सामान दो सौ ऊँटों पर था।

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