प्राचीन अगस्त्य संहिता में एक सूत्र दिया गया है। संस्कृत में कहे गए इस सूत्र का तात्पर्य है ........
[एक मिटटी का पात्र लें।उसमें ताम्र पट्टिका (ताम्बे की प्लेट ) डालें।इसके बाद शिखिग्रीव ( ? ) डालें।
फिर बीच में गीली काष्ठ पान्सुभ ( गीली लकड़ी की परत ) लगायें।उस के ऊपर पारा तथा दस्तलोष्ठ ( जस्ता ) डालें। फिर तारों को मिलाएं तो मित्रावरुण शक्ति (विद्युत् )का निर्माण होगा।]
उपरोक्त वर्णन के आधार पर नागपुर के एक इंजीनियरिंग प्राद्ध्यापक श्री पी पी हीले ने तयारी की सारी चीजों का अर्थ समझ में आ गया पर शिखिग्रीव का अर्थ समझ में नहीं आया।
संस्कृत कोष में देखा तो शिखिग्रीव का अर्थ था ......मोर की गर्दन। प्रोफ़ेसर महोदय तुरंत चिड़ियाघर में गए और जा कर पूछा ....आपके यहाँ कोई मोर कब मरेगा? चिड़ियाघर के मालिक ने
गुस्से में कहा ....क्या मतलब ?
प्रोफ़ेसर ने कहा कि हमें एक वैज्ञानिक प्रयोग के लिए मोर की गर्दन चहिये। मैनेजर ने कहा की आप प्रार्थनापत्र दे जाइये। मोर मरेगा तो सूचित कर देंगे।
कुछ दिनों बाद एक पुराने आयुर्वेदाचार्य से चर्चा हुई। उसने सुना तो खूब हँसा पर कहा की शिखिग्रीव का अर्थ मोर की की गर्दन जैसे रंग वाला पदार्थ ..कापर्सल्फेट यानि नीला थोथा होता है।
प्रोफ़ेसर महोदय ने बताई गयी विधि से सेल बनाया।मल्टी मीटर से मापने पर उसका ओपन सर्किट
वोल्टेज 1.38 वोल्ट तथा शार्ट सर्किट करंट 23 मिली एम्पियर प्राप्त हुआ। इस प्रयोग के सफल होने
के बाद अगस्त्य संहिता के अन्य सूत्रों पर भी प्रयोग हुए।
यह एक उदाहरण है कि कैसे हमारे प्राचीन विज्ञानं को अधकचरे रूप में लिया गया तथा हम खुद को भूलते चले गए।
[एक मिटटी का पात्र लें।उसमें ताम्र पट्टिका (ताम्बे की प्लेट ) डालें।इसके बाद शिखिग्रीव ( ? ) डालें।
फिर बीच में गीली काष्ठ पान्सुभ ( गीली लकड़ी की परत ) लगायें।उस के ऊपर पारा तथा दस्तलोष्ठ ( जस्ता ) डालें। फिर तारों को मिलाएं तो मित्रावरुण शक्ति (विद्युत् )का निर्माण होगा।]
उपरोक्त वर्णन के आधार पर नागपुर के एक इंजीनियरिंग प्राद्ध्यापक श्री पी पी हीले ने तयारी की सारी चीजों का अर्थ समझ में आ गया पर शिखिग्रीव का अर्थ समझ में नहीं आया।
संस्कृत कोष में देखा तो शिखिग्रीव का अर्थ था ......मोर की गर्दन। प्रोफ़ेसर महोदय तुरंत चिड़ियाघर में गए और जा कर पूछा ....आपके यहाँ कोई मोर कब मरेगा? चिड़ियाघर के मालिक ने
गुस्से में कहा ....क्या मतलब ?
प्रोफ़ेसर ने कहा कि हमें एक वैज्ञानिक प्रयोग के लिए मोर की गर्दन चहिये। मैनेजर ने कहा की आप प्रार्थनापत्र दे जाइये। मोर मरेगा तो सूचित कर देंगे।
कुछ दिनों बाद एक पुराने आयुर्वेदाचार्य से चर्चा हुई। उसने सुना तो खूब हँसा पर कहा की शिखिग्रीव का अर्थ मोर की की गर्दन जैसे रंग वाला पदार्थ ..कापर्सल्फेट यानि नीला थोथा होता है।
प्रोफ़ेसर महोदय ने बताई गयी विधि से सेल बनाया।मल्टी मीटर से मापने पर उसका ओपन सर्किट
वोल्टेज 1.38 वोल्ट तथा शार्ट सर्किट करंट 23 मिली एम्पियर प्राप्त हुआ। इस प्रयोग के सफल होने
के बाद अगस्त्य संहिता के अन्य सूत्रों पर भी प्रयोग हुए।
यह एक उदाहरण है कि कैसे हमारे प्राचीन विज्ञानं को अधकचरे रूप में लिया गया तथा हम खुद को भूलते चले गए।

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