शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

एक बार एक राजा ने अपने राजप्रासाद के विशाल कक्ष  की आमने सामने की दो दीवारों पर चित्र बनाने के लिए  दो चित्रकारों को  बुलाया। उनमें से एक चित्रकार चाहता था की दूसरा उसके चित्र को न देख सके।इसलिए राजा ने उन दोनों के मध्य एक पर्दा लटकवा दिया। पहले चित्रकार ने गज़ब का खूबसूरत चित्र बनाया। प्रत्येक दृश्य मानो  सजीव हो गया था। अब दुसरे चित्रकार की बारी  थी। पर्दा हटाया गया। लोगों ने दांतों तले उँगली दबा ली।
वह चित्र पहले वाले चित्र की हूबहू नक़ल था। उस चित्र का सामने वाला हिस्सा किसी भी रूप में
दूसरे चित्र से किसी मायने में कमजोर नहीं लग रहा था बल्कि उस चित्र में एक विशेष चमक थी।
राजा  तथा दरबारियों ने जब बहुत ध्यान से चित्र को देखा तो महसूस हुआ की उस चित्रकार ने कोई चित्र नहीं बनाया था बल्कि अपने तरफ की दीवार को घिस घिस कर इतना  चिकना कर दिया
था की वह शीशे की तरह पारदर्शी हो गयी थी। उस दीवार पर कोई चित्र नहीं था बल्कि सामने वाले चित्र का प्रतिबिम्ब ही था।
उस कलाकार की कुशलता से राजा दंग रह गया और उसे दरबारी कलाकार का सम्मान प्रदान किया।
महापुरुषों के जीवन में जो भी उत्कृष्ट कर्म हैं उन जैसे कर्मों को अपने जीवन में उतारने के लिए
हमें अपने चरित्र रुपी दिवार को इतना घिस डालना चाहिए की महापुरुषों के जीवन का स्वरुप उसमें प्रतिबिंबित
होने लगे।क्योंकि हमारा मन भी एक दर्पण है जिस पर अहंकार एवं मोह की काई लग जाने के कारन उसमें
सत्य का प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं देता। 

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