फ़ेसबुक के सभी मित्रों को कौशल किशोर की ओर से दीपावली की हार्दिक मंगलकामना
फ़ेन सिन्धु का जितना विस्तृत उतनी खुशियॉ पाये आप ।
सदा सर्वदा कोसों भागे तुमसे कष्टों का अभिशाप ॥
बुरी बलायें कभी न घेरें हर पल खुशियों भरा रहे ।
कण कण घर का सुरभित हो आनन्द प्रेम की नदी बहे ॥
मित्र सुखों के नहीं ,दुखों के भी मिल पायें ,सदा तुम्हें ।
त्रस्त दुखी पीडित जन सारे तुमको अपना बन्धु कहें ॥
परम मधुर जीवन तुम सबका हो खुशियों का ही प्रतिरूप ।
रिमझिम करती सुख वर्षा से, पूरित हो जाये मन कूप ॥
वाम विधाता अनुकूलित हों,तन मन में छाये सन्तोष ।
रत्नाकर सा गहन सुपूरित, रहे ग्यान धन बल का कोष ॥
कोलाहल से दूर शान्ति में ,ज्यों मिलता मन को विश्राम ।
दीप कर्म निष्ठा से जल कर, सुख पाता अनुपम अभिराम ॥
पावन प्रभु से एक विनय है, सदा आपका हो मंगल ।
वन उपवन घर बाहर प्रतिपल, भाग्य आपका रहे प्रबल ॥
ली न रहें कर्तव्य कर्म में हो, सबके मुख पर मुसकान ।
कीर्तिपताका जग में फ़हरे, मिले विरोधी से भी मान ॥
हास तथा परिहास सुरों से, गुन्जित रहे आपका घर ।
रजत स्वर्ण की झंकारें हों, अनुदिन हो धन व्रष्टि प्रखर ॥
दिया जले घर घर में ऐसा, हो आलोक न जिसका मन्द ।
कमल खिले सबके ह्रदयों, का मन पाये अनुपम आनंद ॥
शुभ संकल्प उदित हों मन में, स्वयं सिध्द हों सारे काज ।
भग्न चित्त में भी अनुगुंजित, रहें नेह वीणा के साज ॥
कादम्बरी ह्रदय की हर 'कौशल' से करती यही पुकार ।
मनुज श्रष्टि जब तक है जग में, सुखी रहे सबका परिवार ॥
नाथ जगत के करें क्रिपा सब सिध्दि मिलें अणिमा महिमा ।
है मन में बस भाव यही प्रिय, बढे आपकी गुण गरिमा ॥
ऊपर दिए गये छन्द की
प्रत्येक पंक़्ति के प्रथम अक्षर को
ध्यानपूर्वक देखें।
वहां भी आपसे कुछ कहने का प्रयास किया है ।
धन्यवाद!!
फ़ेन सिन्धु का जितना विस्तृत उतनी खुशियॉ पाये आप ।
सदा सर्वदा कोसों भागे तुमसे कष्टों का अभिशाप ॥
बुरी बलायें कभी न घेरें हर पल खुशियों भरा रहे ।
कण कण घर का सुरभित हो आनन्द प्रेम की नदी बहे ॥
मित्र सुखों के नहीं ,दुखों के भी मिल पायें ,सदा तुम्हें ।
त्रस्त दुखी पीडित जन सारे तुमको अपना बन्धु कहें ॥
परम मधुर जीवन तुम सबका हो खुशियों का ही प्रतिरूप ।
रिमझिम करती सुख वर्षा से, पूरित हो जाये मन कूप ॥
वाम विधाता अनुकूलित हों,तन मन में छाये सन्तोष ।
रत्नाकर सा गहन सुपूरित, रहे ग्यान धन बल का कोष ॥
कोलाहल से दूर शान्ति में ,ज्यों मिलता मन को विश्राम ।
दीप कर्म निष्ठा से जल कर, सुख पाता अनुपम अभिराम ॥
पावन प्रभु से एक विनय है, सदा आपका हो मंगल ।
वन उपवन घर बाहर प्रतिपल, भाग्य आपका रहे प्रबल ॥
ली न रहें कर्तव्य कर्म में हो, सबके मुख पर मुसकान ।
कीर्तिपताका जग में फ़हरे, मिले विरोधी से भी मान ॥
हास तथा परिहास सुरों से, गुन्जित रहे आपका घर ।
रजत स्वर्ण की झंकारें हों, अनुदिन हो धन व्रष्टि प्रखर ॥
दिया जले घर घर में ऐसा, हो आलोक न जिसका मन्द ।
कमल खिले सबके ह्रदयों, का मन पाये अनुपम आनंद ॥
शुभ संकल्प उदित हों मन में, स्वयं सिध्द हों सारे काज ।
भग्न चित्त में भी अनुगुंजित, रहें नेह वीणा के साज ॥
कादम्बरी ह्रदय की हर 'कौशल' से करती यही पुकार ।
मनुज श्रष्टि जब तक है जग में, सुखी रहे सबका परिवार ॥
नाथ जगत के करें क्रिपा सब सिध्दि मिलें अणिमा महिमा ।
है मन में बस भाव यही प्रिय, बढे आपकी गुण गरिमा ॥
ऊपर दिए गये छन्द की
प्रत्येक पंक़्ति के प्रथम अक्षर को
ध्यानपूर्वक देखें।
वहां भी आपसे कुछ कहने का प्रयास किया है ।
धन्यवाद!!

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