वृन्दाबन के वासी बढ़ते ट्रैफिक से लाचार हैं।
बाहर वालों को ये तीरथ बने स्वर्ग के द्वार हैं।।
छुट्टी वाले दिन वृन्दाबन बनता मुंबई दिल्ली है।
सारे नियम कानूनों की जम कर उड़ती खिल्ली है।।
जहाँ तहां गाड़ियाँ अड़ा कर जो दर्शन को जाते हैं।
वृन्दाबन वासी का संकट क्यों न समझ ये पाते हैं।।
कोई जाता विद्यालय तो कोई ऑफिस को जाता।
होता है जब लेट बॉस या टीचर की डांटें खाता।।
पिकनिक को वृन्दाबन आते खाते हैं टिकिया भल्ले।
दुनिया भर में गाते हैं फिर अपनी श्रद्धा के हल्ले।।
अपना शासन तो सोया है उसे नहीं चिंता जन की।
आम आदमी त्रस्त हो रहा ये करते अपने मन की।।
वृन्दाबन को देख न लगता कभी यहाँ खेले कान्हा।
लपकों से जो लुटा कहे वो वृन्दाबन अब ना आना।।
मंदिर के आँगन में रेलिंग क्या बढ़िया लगवाई है।
मरने या घायल होने की खबर नित नई आई है।।
ले श्रद्धा की आड ठगी का जम कर चलता कारोबार।
करो शिकायत कष्टों की तो अधिकारी देते फटकार।।
यों तो 'बन्द' कराते फिरते नेता क्यों सो जाते हैं।
जनता के दुःख दर्द उन्हें क्यों किंचित नज़र न आते हैं।।
धरना और प्रदर्शन केवल छपने भर को करते हो।
खुल कर कभी न आते, क्या कुर्सी जाने से डरते हो।।
जिस जनता ने तुम्हें जिताया उस पर दर्द न आता है।
जिस नेता को पकड़ो, तुमको इमला नई पढाता है।।
यारो सुनो, परेशानी ये दो चुटकी में भागेगी।
जिस दिन वृन्दाबन की जनता कड़ी नींद से जागेगी।।
जब तक उतर सड़क पर तुम इनके कुरते ना फाडोगे।
तब तक इस 'जंगल' से तुम 'तिनका' तक नहीं उखाड़ोगे।।
( वैसे मैं कहना तो कुछ और ही चाह रहा था ....माफ़ करें )
उस दिन फिर से झूम उठेगा, ब्रज वृन्दाबन का जन जन।
जिस दिन शांत सुरक्षित सुरभित होगा मेरा वृन्दाबन।।
बाहर वालों को ये तीरथ बने स्वर्ग के द्वार हैं।।
छुट्टी वाले दिन वृन्दाबन बनता मुंबई दिल्ली है।
सारे नियम कानूनों की जम कर उड़ती खिल्ली है।।
जहाँ तहां गाड़ियाँ अड़ा कर जो दर्शन को जाते हैं।
वृन्दाबन वासी का संकट क्यों न समझ ये पाते हैं।।
कोई जाता विद्यालय तो कोई ऑफिस को जाता।
होता है जब लेट बॉस या टीचर की डांटें खाता।।
पिकनिक को वृन्दाबन आते खाते हैं टिकिया भल्ले।
दुनिया भर में गाते हैं फिर अपनी श्रद्धा के हल्ले।।
अपना शासन तो सोया है उसे नहीं चिंता जन की।
आम आदमी त्रस्त हो रहा ये करते अपने मन की।।
वृन्दाबन को देख न लगता कभी यहाँ खेले कान्हा।
लपकों से जो लुटा कहे वो वृन्दाबन अब ना आना।।
मंदिर के आँगन में रेलिंग क्या बढ़िया लगवाई है।
मरने या घायल होने की खबर नित नई आई है।।
ले श्रद्धा की आड ठगी का जम कर चलता कारोबार।
करो शिकायत कष्टों की तो अधिकारी देते फटकार।।
यों तो 'बन्द' कराते फिरते नेता क्यों सो जाते हैं।
जनता के दुःख दर्द उन्हें क्यों किंचित नज़र न आते हैं।।
धरना और प्रदर्शन केवल छपने भर को करते हो।
खुल कर कभी न आते, क्या कुर्सी जाने से डरते हो।।
जिस जनता ने तुम्हें जिताया उस पर दर्द न आता है।
जिस नेता को पकड़ो, तुमको इमला नई पढाता है।।
यारो सुनो, परेशानी ये दो चुटकी में भागेगी।
जिस दिन वृन्दाबन की जनता कड़ी नींद से जागेगी।।
जब तक उतर सड़क पर तुम इनके कुरते ना फाडोगे।
तब तक इस 'जंगल' से तुम 'तिनका' तक नहीं उखाड़ोगे।।
( वैसे मैं कहना तो कुछ और ही चाह रहा था ....माफ़ करें )
उस दिन फिर से झूम उठेगा, ब्रज वृन्दाबन का जन जन।
जिस दिन शांत सुरक्षित सुरभित होगा मेरा वृन्दाबन।।

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