१९४६-४७ में ग्वालियर के श्री गोपाल राव टेम्बे जी मुरैना के जैन विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त हुए थे !
उस विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ने बाला केवल एक ही विद्यार्थी था ! प्राचार्य के सहयोगी रुख के कारण बह भी टेम्बे जी के आवास पर ही आकर पढ़ जाया करता था !
इस कारण टेम्बे जी को विद्यालय जाना ही नही पड़ता था और उन्हें संघ कार्य के लिये पर्याप्त समय उपलव्ध हो जाता था !
टेम्बे जी ने प्रयत्न पूर्वक सायं शाखा प्रारम्भ की !
जाहर सिंह शर्मा जैसे जोशीले नौजवान को आधार बनाकर टेम्बे जी ने काम शुरू किया ! जाहरसिंह जी के परिवार का आढत का काम था, जिसके कारण उनके परिवार का मुरैना में अच्छा प्रभाव था ! इसी दौरान रामप्रकाश भट्टजीबाले, उनके दोनों भाई तथा गेंदालाल गोलस, जोटाईबाले केदारनाथ भी स्वयंसेवक बने !
टेम्बे जी दंड और खड्ग में सिद्ध हस्त थे ! इसी कारण शाखा में आने बाले स्वयंसेवकों की संख्या निरंतर बढ़ती ही गई !
टेम्बे जी ने अपने रहने के लिये जो आवास बनाया, बही मुरैना का पहला कार्यालय बना !
देश भर के संघ कार्यालयों के इतिहास में यह सबसे अनूठा था !
लोहिया बाज़ार में बाबूलाल छंगाराम के मकान में ग्राउंड फ्लोर पर दूकाने थी तथा पहली मंजिल पर रुई का गोदाम तथा दूसरी मंजिल पर एक कमरा था ! उस गोदाम में आग लग जाने कारण ऊपर जाने बाली सीढी पूरी तरह टूट गई थी !
तीसरी मंजिल पर जाना किसी पहाडी पर चढ़ने के समान था ! तीसरी मंजिल का बही कमरा स्वयंसेवक होने के नाते गृह स्वामी बाबूलाल जी ने टेम्बे जी को बिना किराए के दे रखा था !
टेम्बे जी ने कमरे तक पहुँचने के लिये एक रस्सा सीढी के पास बांध दिया था ! उस रस्से के सहारे ही बचीखुची सीढियों पर पाँव टिकाते उस आवास तक पहुँचना सम्भव हो पाता था !
यही था उनका आवास और मुरैना का पहला संघ कार्यालय !
सन १९५७ में सर्व प्रथम श्री कृष्ण कुमार जी अष्ठाना, श्री राजेन्द्र गुप्ता और राम प्रकाश गुप्ता(सर्राफ) ने जयपुर से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग किया !
कुछ तो मुरैना में संघ कार्य बिलम्ब से शुरू हुआ और कुछ यह इलाका दस्यु प्रभावित भी रहा, इस कारण संघ शिक्षा वर्ग जाने का सिलसिला कुछ बिलम्ब से शुरू हुआ !
अष्ठाना जी को भी बिना परिवार की अनुमति लिये कालेज टूर का बहाना बनाकर ही प्रथम वर्ष जाना पडा ! मार्गव्यय के लिये भी मित्रों से उधार लेकर व्यवस्था की ! किन्तु अगले वर्ष १९५८ में उनकी दृढ इच्छा देखकर पिताजी ने अनुमति तो दे दी किन्तु आवश्यक व्यय इस बार भी बाबूलाल जी गुप्ता से उधार लेकर ही सम्भव हुआ !
१९५९ में अष्ठाना जी अडोखर में शिक्षक नियुक्त हो चुके थे ! विगत दो वर्षों में ली गई उधारी भी पटाई जा चुकी थी, किन्तु बहिन की शादी के लिये प्रयत्न पहले करने की पिताजी की इच्छा थी !
सहकर्मी चिकटे जी और ग्वालियर के तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री मिश्रीलाल जी तिवारी जी के साथ तृतीय वर्ष करने के संकल्प के कारण अष्ठाना जी इस बार भी जैसे तैसे पिताजी के कहे वाक्य "जैसा ठीक समझो करो" को अनुमति मानकर नागपुर रवाना हो ही गए !
सन १९६२-६३ में प.पू.सर संघ चालक श्री गुरूजी का मुरैना प्रवास हुआ !
ग्वालियर जिले के स्वयं सेवकों को भी इसमें सम्मिलित होना था ! इस कारण अनेक धर्मशालाओं तथा सार्वजनिक स्थानों पर आवास व्यवस्था की गई ! कार्यक्रम के लिये पंचायती धर्मशाला का अहाता तय हुआ !
कई दिन तक ठेलों से मिट्टी आदि डालकर स्थान को समतल बनाया गया तथा सामर्थ्य भर सजाया संवारा गया ! किन्तु तभी आई भीषण वारिश ने मैदान में बिछाई गई मिट्टी को कीचड़ में बदल दिया ! बैठने लायक स्थान भी नहीं बचा ! दोपहर बाद वर्षा थमने पर धर्मशाला की छत पर कार्यक्रम किया गया !
बौद्धिक से १५ मिनट पूर्व स्वयंसेवकों को कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने की सूचना थी ! किन्तु बसती गृह की अधिक दूरी तथा स्थान ढूँढने में कठिनाई होने के कारण ग्वालियर के कुछ स्वयं सेवकों को बिलम्ब हो गया !
प्रवेश द्वार पर व्यवस्था में तैनात कार्यकर्ताओं ने उन्हें प्रवेश नहीं दिया !
प्रांत प्रचारक केशवराव जी गोरे ने नगर कार्यवाह श्री कृष्ण कुमार अष्ठाना जी से कहा की "तुम चाहो तो बाहर खड़े स्वयं सेवकों को अन्दर आने की अनुमति दे सकते हो ! अभी श्री गुरू जी के आने में समय है !
इन लोगों से बाद में बात करेंगे !
कार्यकर्ता को गढ़ने में बहुत समय लगता है , तोड़ने का काम तो एक झटके में हो जाता है !"
अष्ठाना जी ने द्वार खुलवा दिया और गोरे जी द्वारा कहे गए शब्दों को सूक्ति वाक्य के रूप में ह्रदय में बसा लिया !
गोरे जी चाहते तो स्वयं द्वार खुलबा सकते थे किन्तु व्यवस्था की जिम्मेदारी देख रहे अष्ठाना जी से ही यह कार्य करबाना उचित समझा !
यही पद्धति है संघ की ! स्वयं को पीछे रखकर कार्यकर्ता को गढ़ने की.....(जारी) 😊😊😊
उस विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ने बाला केवल एक ही विद्यार्थी था ! प्राचार्य के सहयोगी रुख के कारण बह भी टेम्बे जी के आवास पर ही आकर पढ़ जाया करता था !
इस कारण टेम्बे जी को विद्यालय जाना ही नही पड़ता था और उन्हें संघ कार्य के लिये पर्याप्त समय उपलव्ध हो जाता था !
टेम्बे जी ने प्रयत्न पूर्वक सायं शाखा प्रारम्भ की !
जाहर सिंह शर्मा जैसे जोशीले नौजवान को आधार बनाकर टेम्बे जी ने काम शुरू किया ! जाहरसिंह जी के परिवार का आढत का काम था, जिसके कारण उनके परिवार का मुरैना में अच्छा प्रभाव था ! इसी दौरान रामप्रकाश भट्टजीबाले, उनके दोनों भाई तथा गेंदालाल गोलस, जोटाईबाले केदारनाथ भी स्वयंसेवक बने !
टेम्बे जी दंड और खड्ग में सिद्ध हस्त थे ! इसी कारण शाखा में आने बाले स्वयंसेवकों की संख्या निरंतर बढ़ती ही गई !
टेम्बे जी ने अपने रहने के लिये जो आवास बनाया, बही मुरैना का पहला कार्यालय बना !
देश भर के संघ कार्यालयों के इतिहास में यह सबसे अनूठा था !
लोहिया बाज़ार में बाबूलाल छंगाराम के मकान में ग्राउंड फ्लोर पर दूकाने थी तथा पहली मंजिल पर रुई का गोदाम तथा दूसरी मंजिल पर एक कमरा था ! उस गोदाम में आग लग जाने कारण ऊपर जाने बाली सीढी पूरी तरह टूट गई थी !
तीसरी मंजिल पर जाना किसी पहाडी पर चढ़ने के समान था ! तीसरी मंजिल का बही कमरा स्वयंसेवक होने के नाते गृह स्वामी बाबूलाल जी ने टेम्बे जी को बिना किराए के दे रखा था !
टेम्बे जी ने कमरे तक पहुँचने के लिये एक रस्सा सीढी के पास बांध दिया था ! उस रस्से के सहारे ही बचीखुची सीढियों पर पाँव टिकाते उस आवास तक पहुँचना सम्भव हो पाता था !
यही था उनका आवास और मुरैना का पहला संघ कार्यालय !
सन १९५७ में सर्व प्रथम श्री कृष्ण कुमार जी अष्ठाना, श्री राजेन्द्र गुप्ता और राम प्रकाश गुप्ता(सर्राफ) ने जयपुर से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग किया !
कुछ तो मुरैना में संघ कार्य बिलम्ब से शुरू हुआ और कुछ यह इलाका दस्यु प्रभावित भी रहा, इस कारण संघ शिक्षा वर्ग जाने का सिलसिला कुछ बिलम्ब से शुरू हुआ !
अष्ठाना जी को भी बिना परिवार की अनुमति लिये कालेज टूर का बहाना बनाकर ही प्रथम वर्ष जाना पडा ! मार्गव्यय के लिये भी मित्रों से उधार लेकर व्यवस्था की ! किन्तु अगले वर्ष १९५८ में उनकी दृढ इच्छा देखकर पिताजी ने अनुमति तो दे दी किन्तु आवश्यक व्यय इस बार भी बाबूलाल जी गुप्ता से उधार लेकर ही सम्भव हुआ !
१९५९ में अष्ठाना जी अडोखर में शिक्षक नियुक्त हो चुके थे ! विगत दो वर्षों में ली गई उधारी भी पटाई जा चुकी थी, किन्तु बहिन की शादी के लिये प्रयत्न पहले करने की पिताजी की इच्छा थी !
सहकर्मी चिकटे जी और ग्वालियर के तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री मिश्रीलाल जी तिवारी जी के साथ तृतीय वर्ष करने के संकल्प के कारण अष्ठाना जी इस बार भी जैसे तैसे पिताजी के कहे वाक्य "जैसा ठीक समझो करो" को अनुमति मानकर नागपुर रवाना हो ही गए !
सन १९६२-६३ में प.पू.सर संघ चालक श्री गुरूजी का मुरैना प्रवास हुआ !
ग्वालियर जिले के स्वयं सेवकों को भी इसमें सम्मिलित होना था ! इस कारण अनेक धर्मशालाओं तथा सार्वजनिक स्थानों पर आवास व्यवस्था की गई ! कार्यक्रम के लिये पंचायती धर्मशाला का अहाता तय हुआ !
कई दिन तक ठेलों से मिट्टी आदि डालकर स्थान को समतल बनाया गया तथा सामर्थ्य भर सजाया संवारा गया ! किन्तु तभी आई भीषण वारिश ने मैदान में बिछाई गई मिट्टी को कीचड़ में बदल दिया ! बैठने लायक स्थान भी नहीं बचा ! दोपहर बाद वर्षा थमने पर धर्मशाला की छत पर कार्यक्रम किया गया !
बौद्धिक से १५ मिनट पूर्व स्वयंसेवकों को कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने की सूचना थी ! किन्तु बसती गृह की अधिक दूरी तथा स्थान ढूँढने में कठिनाई होने के कारण ग्वालियर के कुछ स्वयं सेवकों को बिलम्ब हो गया !
प्रवेश द्वार पर व्यवस्था में तैनात कार्यकर्ताओं ने उन्हें प्रवेश नहीं दिया !
प्रांत प्रचारक केशवराव जी गोरे ने नगर कार्यवाह श्री कृष्ण कुमार अष्ठाना जी से कहा की "तुम चाहो तो बाहर खड़े स्वयं सेवकों को अन्दर आने की अनुमति दे सकते हो ! अभी श्री गुरू जी के आने में समय है !
इन लोगों से बाद में बात करेंगे !
कार्यकर्ता को गढ़ने में बहुत समय लगता है , तोड़ने का काम तो एक झटके में हो जाता है !"
अष्ठाना जी ने द्वार खुलवा दिया और गोरे जी द्वारा कहे गए शब्दों को सूक्ति वाक्य के रूप में ह्रदय में बसा लिया !
गोरे जी चाहते तो स्वयं द्वार खुलबा सकते थे किन्तु व्यवस्था की जिम्मेदारी देख रहे अष्ठाना जी से ही यह कार्य करबाना उचित समझा !
यही पद्धति है संघ की ! स्वयं को पीछे रखकर कार्यकर्ता को गढ़ने की.....(जारी) 😊😊😊


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