रविवार, 20 जनवरी 2019

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ...!!😊😊 सेवा साधना समर्पण...!!(भाग-6)

1.
* सन १९७५ में आपातकाल के समय अनेकों स्वयंसेवक जेलों में बंद थे |
आम तौर पर जेल में बंद लोग कुछ स्वार्थी हो जाते हैं, किन्तु संघ स्वयंसेवक तो किसी और ही मिट्टी के बने होते हैं |

भोपाल में स्वयंसेवक जेल के अन्दर भी शाखा लगाते और बाहर के समान ही ६ उत्सवों को मनाते | कारावास की अवधी के दौरान ही गुरू पूर्णिमा आई और उत्सव मनाने की योजना बनने लगी | किन्तु जेल में बंद स्वयंसेवकों के सामने मुख्य प्रश्न था गुरू दक्षिणा का |
किन्तु जहां चाह है वहां राह है | जेल में भोजन सामूहिक ही बनता था तथा उस हेतु जेल मेनुअल के अनुसार एक समय की खुराक हेतु राशि तय थी |
 स्वयं सेवकों ने तय किया कि हम लोग एक समय ही भोजन करेंगे और एक समय भोजन ना करने से जो राशि बचेगी उसे गुरू पूर्णिमा के दिन गुरू दक्षिणा के रूप में ध्वज के सम्मुख अर्पित करेंगे |
 भोपाल जेल के १५० स्वयंसेवक इस योजना में शामिल हुए और इस प्रकार गुरू दक्षिणा कर एक अनोखा आनंद व समाधान प्राप्त किया |


2.
* भोपाल महानगर व्यवस्था प्रमुख बाबू सचदेवा निसंतान थे | घर में केवल वे तथा उनकी पत्नी |
 पत्नी के देहांत के बाद उन्होंने ११ नंबर स्टाप के पास स्थित अपना एम.आई.जी घर सेवा भारती को समर्पित कर दिया | अपने लिए केवल एक कमरा भर रखा |
 बाद में पार्किन्सन के कारण हाथ पैरों में जब कंपन बढ़ गया तो वे अपने रिश्तेदारों के पास महाराष्ट्र चले गए | जहां उनका बाद में स्वर्गवास हो गया |
उनके दिए मकान का उपयोग बाद में सेवा प्रमुख विष्णु जी की प्रेरणा से चार मंजिला छात्रावास बनाकर किया गया |


3.
* इसी प्रकार बैरसिया के स्वयंसेवक चंदर सिंह सामान्य ग्रामीण परिवार के थे | उनके पास ८ एकड़ कृषि भूमि थी | घर में केवल एक स्वयंसेवक पुत्र और पुत्री |
 दुःख की बात यह की एकमात्र पुत्र अर्जुन की विद्युत करेंट से मृत्यु हो गई | पुत्री के विवाह के बाद उन्होंने अपनी आधी जमीन तो पुत्री को दे दी तथा शेष आधी का ट्रस्ट बनाकर तत्कालीन प्रांत प्रचारक श्री शरद जी मेहरोत्रा को सोंप दी | खुद संघ कार्यालय जाकर रहने लगे |
आज उनकी जमीन पर आवासीय सरस्वती शिशु मंदिर संचालित है |

4.
* श्री जगदीश बसंतानी प्रताप जिले की विवेकानंद शाखा के मुख्य शिक्षक हैं |
जनवरी २००९ में उन्हें सुबह ४ बजे मुरैना के एक परिचित ट्रांसपोर्ट व्यवसाई का फोन आया कि व्याबरा वाईपास पर उनके एक ट्रक का एक्सीडेंट हो गया है | उन्हें तो ४०० किमी चलकर बहां पहुँचने में समय लगेगा, किन्तु वसंतानी जी केवल १०० किमी दूरी पर होने के कारण पहले पहुंचकर कुछ मदद कर सकते हैं |
जगदीश जी अपने एक मित्र श्री राजकुमार खीमानी को लेकर तुरंत रवाना हो गए | निजी वाहन होने के कारण केवल सवा घंटे से भी कम समय में वे दुर्घटना स्थल पर पहुँच गए | बहां जाकर उन्होंने देखा कि दो ट्रकों की आमने सामानी भिडंत हुई है तथा ट्रकों में आग लग गई है |
पांच लोग तो स्थल पर ही दम तोड़ चुके थे, जिनमे से तीन तो जलकर कंकाल मात्र दिखाई दे रहे थे | केवल एक व्यक्ति की साँस चल रही थी |
मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मी उस जीवित व्यक्ति को भी मृत तुल्य ही मान रहे थे किन्तु जगदीश जी ने उसे तुरंत भोपाल ले जाकर इलाज कराने की इच्छा व्यक्त की |

 जैसी की परिपाटी है पुलिस कर्मियों ने कागजी खानापूरी इत्यादि औपचारिकताओं में समय लगाना चाहा, किन्तु जगदीश जी ने आनन् फानन में उच्चाधिकारियों से फोन पर चर्चाकर उस घायल व्यक्ति को भोपाल ले जाने की अनुमति प्राप्त कर ही ली |

 वे उस घायल ड्राईवर को लेकर अविलम्ब भोपाल के पीपुल्स हास्पीटल पहुंचे तथा उसे बहां समुचित उपचार प्राप्त हुआ | समय पर उपचार मिल जाने के कारण उस ड्राईवर के प्राणों की रक्षा हुई | उसके परिजनों के आने तक श्री जगदीश वसंतानी जी ने ही सार संभाल की |
 अंततः डेढ़ माह बाद स्वस्थ होकर मौत के मुंह से वापस लौटा वह ड्राईवर अब जगदीश जी के गुण गाता नहीं थकता |


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