1. एकता, स्वतंत्रता, समानता रहे
एकता, स्वतंत्रता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥धृ॥
कण्ठ हैं करोड़ों, गीत एक राष्ट्र का
रंग हैं अनेक, चित्र एक राष्ट्र का
रूप हैं अनेक, भाव एक राष्ट्र का
शब्द हैं अनेक, अर्थ एक राष्ट्र का
चेतना, समग्रता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥१॥
विकास में विवेक स्वप्न एक राष्ट्र का
योजना अनेक, ध्यान एक राष्ट्र का
कर्म हैं अनेक, लक्ष्य एक राष्ट्र का
पंथ हैं अनेक, धर्मं एक राष्ट्र का
सादगी, सहिष्णुता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥२॥
जाति हैं अनेक, रक्त एक राष्ट्र का
पंक्ति हैं अनेक, लेख एक राष्ट्र का
गाँव हैं अनेक, अंग एक राष्ट्र का
किरण हैं अनेक, सूर्य एक राष्ट्र का
जागरण, मनुष्यता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥३॥
2. हम युवा हैं हम करें मुश्किलों का सामना
हम युवा हैं हम करें मुश्किलों का सामना
मातृभूमि हित जगे है हमारी कामना ॥धृ॥
संस्कृति पली यहाँ पुण्यभू जो प्यारी है
जननी वीरों की अनेक भरतभू हमारी है
ऐसा अब युवक कहाँ दिल मे ज़िसके राम ना ॥१॥
ज्ञान के प्रकाश की ले मशाल हाथ में
शील की पवित्रता है हमारे साथ में
एकता के स्वर उठे छूने को ये आसमाँ ॥२॥
आँधियों में स्वार्थ की त्यागदीप ना बुझे
मातृभू को प्राण दूँ याद है शपथ मुझे
मैं कहाँ अकेला हूँ साथ है ये कारवाँ ॥३॥
ये कदम हजारों अब रुक ना पाएँगे कभी
मंजिलों पे पहुंचकर ही विराम ले सभी
ध्येय पूर्ति पूर्व अब रुक ना पाये साधना ॥४
3.
बढें निरंतर हो निर्भय,गूँजे भारत की जय-जय ।।धृ।।
याद करें अपना गौरव याद करें अपना वैभव
स्वर्णिम युग को प्रकटाएँगे, मन में धारें दृढ निश्चय ।।१।।
वीरव्रती बनकर हुँकारें,जन-जन का सामर्थ्य बढ़ाएँ ।
दशों दिशा से ज्वार उठेगा,चीर चलेंगे घोर प्रलय ।।२।।
कर्म समर्पित हो हर प्राण,यश अपयश पर ना हो ध्यान ।
व्यमोही आकर्षण तज दें,आलोकित हो शील विनय ।।३।।
सृजन करें नव शुभ रचनाएँ, सत्य अहिंसा पथ अपनाएँ ।
मंगलमय हिंदुत्व सुधा से, छलकाएँगे घट अक्षय ।।४।।
4.
चलो जलाएँ दीप वहाँ, जहाँ अभी भी अंधेरा है ॥धृ॥
स्वेच्छाचारी मुक्तविहारी युवजन खाए ठोकर आज ।
मैं और मेरा व्यक्ति केन्द्रित विचार मन मे करता राज ।
नष्ट-भ्रष्ट परिवार तन्त्र ने डाला अब यहाँ डेरा है ॥१॥
सुजला सुफला धरती माँ को मानव पशुओं ने लूटा ।
पृथ्वी माँ हम बच्चे उसके, किया भाव यह सब झूठा ।
भौतिकता की विषवेला ने अखिल विश्व को घेरा है ॥२॥
नही डरेंगे, नही रुकेंगे, बढते जाएँ आगे हम ।
परिवर्तन की पावन आँधी लाकर ही हम लेंगे दम ।
संघ शक्ति के रूप में देखो अब हो रहा सवेरा है ॥३॥
5.
यह कल-कल छल-छल बहती, क्या कहती गंगा धारा ?
युग-युग से बहता आता, यह पुण्य प्रवाह हमारा ॥धृ॥
हम इसके लघुतम जल कण, बनते मिटते हैं क्षण-क्षण ।
अपना अस्तित्व मिटाकर, तन मन धन करते अर्पण ।
बढते जाने का शुभ प्रण, प्राणों से हमको प्यारा ॥१॥
इस धारा में घुल मिलकर, वीरों की राख बही है ।
इस धारा में कितने ही, ऋषियों ने शरण ग्रही है ।
इस धारा की गोदी में, खेला इतिहास हमारा ॥२॥
यह अविरल तप का फल है, यह राष्ट्रप्रवाह प्रबल है ।
शुभ संस्कृति का परिचायक, भारत माँ का आँचल है ।
हिंदु की चिरजीवन, मर्यादा धर्म सहारा ॥३॥
क्या इसको रोक सकेंगे, मिटने वाले मिट जाएँ ।
कंकड पत्थर की हस्ती, क्या बाधा बनकर आए ।
ढह जायेंगे गिरि पर्वत, काँपे भूमंडल सारा ॥४॥
5.
अपनी धरती, अपना अम्बर, अपना हिन्दुस्थान ।
हिम्मत अपनी, ताकत अपनी, अपना वीर जवान ॥धृ॥
हिमगिरि शीश मुकुट रत्नारे, सागर जिसकॆ चरण पखारे
गंगा-यमुना की धाराएँ निर्माणों की नीर सँवारे
नई-नई आशाएँ अपनी, अपना हर उत्थान ॥१॥
विमल इंदु की विमल चाँदनी, चंदा सूरज करे आरती
मलयानिल के मस्त झकोरे, चँवर डुलाए तुझे भारती
कण-कण गाए गौरव गाथा, अपना देश महान ॥२॥
नेफा और लद्दाख वतन के दोनों अपने आँगन द्वारे
प्राणों को न्योछावर करते भारत माँ के वीर दुलारे
निशिदिन याद हमें आते हैं वीरों के बलिदान ॥३॥
6.
भारत माँ का मान बढाने बढ़ते माँ के मस्ताने ।
कदम-कदम पर मिल-जुल गाते वीरों के व्रत के गाने ॥धृ॥
ऋषियों के मन्त्रों की वाणी भरती साहस नस-नस में।
चक्रवर्तियों की गाथा सुन, नहीं जवानी है बस में।
हर-हर महादेव के स्वर से विश्व-गगन को थर्राने ॥१॥
हम पर्वत को हाथ लगाकर संजीवन कर सकते हैं,
मर्यादा बनकर असुरों का बलमर्दन कर सकते हैं;
रामेश्वर की पूजा करके जल पर पत्थर तैराने ॥२॥
जरासंध छल-बल दिखला ले, अंतिम विजय हमारी है;
भीम-पराक्रम प्रकटित होगा, योगेश्वर गिरधारी है।
अर्जुन का रथ हाँक रहा जो, उसके हम हैं दीवाने ॥३॥
7.
न हो साथ कोई अकेले बढ़ो तुम सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥धृ॥
सदा जो जगाए बिना ही जगा है अँधेरा उसे देखकर ही भगा है।
वही बीज पनपा पनपना जिसे था घुना क्या किसी के उगाए उगा है।
अगर उग सको तो उगो सूर्य से तुम प्रखरता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥१॥
सही राह को छोड़कर जो मुड़े हैं वही देखकर दूसरों को कुढ़े हैं।
बिना पंख तौले उड़े जो गगन में न सम्बन्ध उनके गगन से जुड़े हैं।
अगर उड़ सको तो पखेरु बनो तुम प्रवरता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥२॥
न जो बर्फ की आँधियों से लड़े हैं कभी पग न उनके शिखर पर पड़े हैं।
जिन्हें लक्ष्य से कम अधिक प्यार खुद से वही जी चुराकर विमुख हो खड़े हैं।
अगर जी सको तो जियो जूझकर तुम अमरता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥३॥
8.
अब जाग उठो, कमर कसो, मंजिल की राह बुलाती है
ललकार रही हमको दुनिया , भेरी आवाज़ लगाती है ॥धृ॥
है ध्येय हमारा दूर सही , पर साहस भी तो क्या कम है
हमराह अनेक साथी है, क़दमों में अंगद का दम है
असुरों की लंका राख करे वह आग लगानी आती है ॥१॥
पग-पग पर काँटे बिछे हुए, व्यवहार कुशलता हममें है
विश्वास विजय का अटल लिए, निष्ठा कर्मठता हममें है
विजयी पुरखों की परंपरा, अनमोल हमारी थाती है ॥२॥
हम शेर शिवा के अनुगामी, राणा प्रताप की आन लिए
केशव माधव का तेज लिए, अर्जुन का शरसंधान लिए
संगठन तन्त्र की शक्ति ही वैभव का चित्र सजाती है ॥३॥
9.
शत नमन माधव चरण में,शत नमन माधव चरण में ॥धृ॥
आपकी पीयूष वाणी, शब्द को भी धन्य करती
आपकी आत्मीयता थी, युगल नयनों से बरसती
और वह निश्छल हंसी जो, गूँज उठती थी गगन में ॥१॥
ज्ञान में तो आप ऋषिवर, दीखते थे आद्यशंकर
और भोला भाव शिशु सा, खेलता मुख पर निरन्तर
दीन दुखियों के लिये थी, द्रवित करुणाधार मन में ॥२॥
दु:ख सुख निन्दा प्रशंसा, आप को सब एक ही थे
दिव्य गीता ज्ञान से युत, आप तो स्थितप्रज्ञ ही थे
भरत भू के पुत्र उत्तम, आप थे युगपुरुष जन में ॥३॥
सिन्धु सा गम्भीर मानस, थाह कब पाई किसी ने
आ गया सम्पर्क में जो, धन्यता पाई उसी ने
आप योगेश्वर नये थे, छल भरे कुरुक्षेत्र रण में ॥४॥
मेरु गिरि सा मन अडिग था, आपने पाया महात्मन
त्याग कैसा आप का वह, तेज साहस शील पावन
मात्र दर्शन भस्म कर दे, घोर षडरिपु एक क्षण में ॥५॥
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एकता, स्वतंत्रता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥धृ॥
कण्ठ हैं करोड़ों, गीत एक राष्ट्र का
रंग हैं अनेक, चित्र एक राष्ट्र का
रूप हैं अनेक, भाव एक राष्ट्र का
शब्द हैं अनेक, अर्थ एक राष्ट्र का
चेतना, समग्रता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥१॥
विकास में विवेक स्वप्न एक राष्ट्र का
योजना अनेक, ध्यान एक राष्ट्र का
कर्म हैं अनेक, लक्ष्य एक राष्ट्र का
पंथ हैं अनेक, धर्मं एक राष्ट्र का
सादगी, सहिष्णुता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥२॥
जाति हैं अनेक, रक्त एक राष्ट्र का
पंक्ति हैं अनेक, लेख एक राष्ट्र का
गाँव हैं अनेक, अंग एक राष्ट्र का
किरण हैं अनेक, सूर्य एक राष्ट्र का
जागरण, मनुष्यता, समानता रहे।
देश में चरित्र की महानता रहे, महानता रहे ॥३॥
2. हम युवा हैं हम करें मुश्किलों का सामना
हम युवा हैं हम करें मुश्किलों का सामना
मातृभूमि हित जगे है हमारी कामना ॥धृ॥
संस्कृति पली यहाँ पुण्यभू जो प्यारी है
जननी वीरों की अनेक भरतभू हमारी है
ऐसा अब युवक कहाँ दिल मे ज़िसके राम ना ॥१॥
ज्ञान के प्रकाश की ले मशाल हाथ में
शील की पवित्रता है हमारे साथ में
एकता के स्वर उठे छूने को ये आसमाँ ॥२॥
आँधियों में स्वार्थ की त्यागदीप ना बुझे
मातृभू को प्राण दूँ याद है शपथ मुझे
मैं कहाँ अकेला हूँ साथ है ये कारवाँ ॥३॥
ये कदम हजारों अब रुक ना पाएँगे कभी
मंजिलों पे पहुंचकर ही विराम ले सभी
ध्येय पूर्ति पूर्व अब रुक ना पाये साधना ॥४
3.
बढें निरंतर हो निर्भय,गूँजे भारत की जय-जय ।।धृ।।
याद करें अपना गौरव याद करें अपना वैभव
स्वर्णिम युग को प्रकटाएँगे, मन में धारें दृढ निश्चय ।।१।।
वीरव्रती बनकर हुँकारें,जन-जन का सामर्थ्य बढ़ाएँ ।
दशों दिशा से ज्वार उठेगा,चीर चलेंगे घोर प्रलय ।।२।।
कर्म समर्पित हो हर प्राण,यश अपयश पर ना हो ध्यान ।
व्यमोही आकर्षण तज दें,आलोकित हो शील विनय ।।३।।
सृजन करें नव शुभ रचनाएँ, सत्य अहिंसा पथ अपनाएँ ।
मंगलमय हिंदुत्व सुधा से, छलकाएँगे घट अक्षय ।।४।।
4.
चलो जलाएँ दीप वहाँ, जहाँ अभी भी अंधेरा है ॥धृ॥
स्वेच्छाचारी मुक्तविहारी युवजन खाए ठोकर आज ।
मैं और मेरा व्यक्ति केन्द्रित विचार मन मे करता राज ।
नष्ट-भ्रष्ट परिवार तन्त्र ने डाला अब यहाँ डेरा है ॥१॥
सुजला सुफला धरती माँ को मानव पशुओं ने लूटा ।
पृथ्वी माँ हम बच्चे उसके, किया भाव यह सब झूठा ।
भौतिकता की विषवेला ने अखिल विश्व को घेरा है ॥२॥
नही डरेंगे, नही रुकेंगे, बढते जाएँ आगे हम ।
परिवर्तन की पावन आँधी लाकर ही हम लेंगे दम ।
संघ शक्ति के रूप में देखो अब हो रहा सवेरा है ॥३॥
5.
यह कल-कल छल-छल बहती, क्या कहती गंगा धारा ?
युग-युग से बहता आता, यह पुण्य प्रवाह हमारा ॥धृ॥
हम इसके लघुतम जल कण, बनते मिटते हैं क्षण-क्षण ।
अपना अस्तित्व मिटाकर, तन मन धन करते अर्पण ।
बढते जाने का शुभ प्रण, प्राणों से हमको प्यारा ॥१॥
इस धारा में घुल मिलकर, वीरों की राख बही है ।
इस धारा में कितने ही, ऋषियों ने शरण ग्रही है ।
इस धारा की गोदी में, खेला इतिहास हमारा ॥२॥
यह अविरल तप का फल है, यह राष्ट्रप्रवाह प्रबल है ।
शुभ संस्कृति का परिचायक, भारत माँ का आँचल है ।
हिंदु की चिरजीवन, मर्यादा धर्म सहारा ॥३॥
क्या इसको रोक सकेंगे, मिटने वाले मिट जाएँ ।
कंकड पत्थर की हस्ती, क्या बाधा बनकर आए ।
ढह जायेंगे गिरि पर्वत, काँपे भूमंडल सारा ॥४॥
5.
अपनी धरती, अपना अम्बर, अपना हिन्दुस्थान ।
हिम्मत अपनी, ताकत अपनी, अपना वीर जवान ॥धृ॥
हिमगिरि शीश मुकुट रत्नारे, सागर जिसकॆ चरण पखारे
गंगा-यमुना की धाराएँ निर्माणों की नीर सँवारे
नई-नई आशाएँ अपनी, अपना हर उत्थान ॥१॥
विमल इंदु की विमल चाँदनी, चंदा सूरज करे आरती
मलयानिल के मस्त झकोरे, चँवर डुलाए तुझे भारती
कण-कण गाए गौरव गाथा, अपना देश महान ॥२॥
नेफा और लद्दाख वतन के दोनों अपने आँगन द्वारे
प्राणों को न्योछावर करते भारत माँ के वीर दुलारे
निशिदिन याद हमें आते हैं वीरों के बलिदान ॥३॥
6.
भारत माँ का मान बढाने बढ़ते माँ के मस्ताने ।
कदम-कदम पर मिल-जुल गाते वीरों के व्रत के गाने ॥धृ॥
ऋषियों के मन्त्रों की वाणी भरती साहस नस-नस में।
चक्रवर्तियों की गाथा सुन, नहीं जवानी है बस में।
हर-हर महादेव के स्वर से विश्व-गगन को थर्राने ॥१॥
हम पर्वत को हाथ लगाकर संजीवन कर सकते हैं,
मर्यादा बनकर असुरों का बलमर्दन कर सकते हैं;
रामेश्वर की पूजा करके जल पर पत्थर तैराने ॥२॥
जरासंध छल-बल दिखला ले, अंतिम विजय हमारी है;
भीम-पराक्रम प्रकटित होगा, योगेश्वर गिरधारी है।
अर्जुन का रथ हाँक रहा जो, उसके हम हैं दीवाने ॥३॥
7.
न हो साथ कोई अकेले बढ़ो तुम सफलता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥धृ॥
सदा जो जगाए बिना ही जगा है अँधेरा उसे देखकर ही भगा है।
वही बीज पनपा पनपना जिसे था घुना क्या किसी के उगाए उगा है।
अगर उग सको तो उगो सूर्य से तुम प्रखरता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥१॥
सही राह को छोड़कर जो मुड़े हैं वही देखकर दूसरों को कुढ़े हैं।
बिना पंख तौले उड़े जो गगन में न सम्बन्ध उनके गगन से जुड़े हैं।
अगर उड़ सको तो पखेरु बनो तुम प्रवरता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥२॥
न जो बर्फ की आँधियों से लड़े हैं कभी पग न उनके शिखर पर पड़े हैं।
जिन्हें लक्ष्य से कम अधिक प्यार खुद से वही जी चुराकर विमुख हो खड़े हैं।
अगर जी सको तो जियो जूझकर तुम अमरता तुम्हारे चरण चूम लेगी ॥३॥
8.
अब जाग उठो, कमर कसो, मंजिल की राह बुलाती है
ललकार रही हमको दुनिया , भेरी आवाज़ लगाती है ॥धृ॥
है ध्येय हमारा दूर सही , पर साहस भी तो क्या कम है
हमराह अनेक साथी है, क़दमों में अंगद का दम है
असुरों की लंका राख करे वह आग लगानी आती है ॥१॥
पग-पग पर काँटे बिछे हुए, व्यवहार कुशलता हममें है
विश्वास विजय का अटल लिए, निष्ठा कर्मठता हममें है
विजयी पुरखों की परंपरा, अनमोल हमारी थाती है ॥२॥
हम शेर शिवा के अनुगामी, राणा प्रताप की आन लिए
केशव माधव का तेज लिए, अर्जुन का शरसंधान लिए
संगठन तन्त्र की शक्ति ही वैभव का चित्र सजाती है ॥३॥
9.
शत नमन माधव चरण में,शत नमन माधव चरण में ॥धृ॥
आपकी पीयूष वाणी, शब्द को भी धन्य करती
आपकी आत्मीयता थी, युगल नयनों से बरसती
और वह निश्छल हंसी जो, गूँज उठती थी गगन में ॥१॥
ज्ञान में तो आप ऋषिवर, दीखते थे आद्यशंकर
और भोला भाव शिशु सा, खेलता मुख पर निरन्तर
दीन दुखियों के लिये थी, द्रवित करुणाधार मन में ॥२॥
दु:ख सुख निन्दा प्रशंसा, आप को सब एक ही थे
दिव्य गीता ज्ञान से युत, आप तो स्थितप्रज्ञ ही थे
भरत भू के पुत्र उत्तम, आप थे युगपुरुष जन में ॥३॥
सिन्धु सा गम्भीर मानस, थाह कब पाई किसी ने
आ गया सम्पर्क में जो, धन्यता पाई उसी ने
आप योगेश्वर नये थे, छल भरे कुरुक्षेत्र रण में ॥४॥
मेरु गिरि सा मन अडिग था, आपने पाया महात्मन
त्याग कैसा आप का वह, तेज साहस शील पावन
मात्र दर्शन भस्म कर दे, घोर षडरिपु एक क्षण में ॥५॥
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