1.
* वरिष्ठ अधिकारियों का आचरण और व्यवहार ही बस्तुतः कार्य विस्तार का आधार होता है |
एसा ही १९४५ का एक अद्वितीय प्रसंग है |
माननीय एकनाथ जी रानाडे ब्यावरा प्रवास पर पधारने बाले थे | शुजालपुर का कार्यक्रम पूर्ण करके ब्यावरा जाने के लिये जब वे बस स्टेंड पहुंचे तो मालूम हुआ कि बस निकल चुकी है तथा अब कोई साधन नही है |
उन दिनों आज की तरह आवागमन के पर्याप्त साधन नही थे | शुजालपुर के कार्यकर्ताओं ने आग्रह किया कि एकनाथ जी शुजालपुर ही रुक जाएँ | किन्तु एकनाथ जी इसे कैसे स्वीकार करते ? उनके आगमन की सूचना हो जाए और वे नहीं पहुंचें, यह उन्हें गवारा नही था |
उन्होंने एक कार्यकर्ता से साईकिल ली और उससे ही ब्यावरा तक की यात्रा की |
2.
* प्रचारकों को कई बार मजेदार अनुभवों से गुजरना पड़ता है |
एसा ही एक अनुभव श्री कमलाकर शुक्ल को राजगढ़ प्रचारक के रूप में अपने प्रथम जीरापुर प्रवास में हुआ |
वे सदा खादी का सफ़ेद धोती कुरता व जाकेट पहनते थे | इसी वेश में जब वे उज्जैन से जीरापुर जाने को निकले तो संयोग से बस की पहली सीट पर जगह मिली |
मार्ग में जब छापीहेडा कस्वा आया तब बस रुकते ही कुछ लोग हार फूल माला लेकर बस में चढ़े और अभिवादन करते हुए शुक्ला जी को मालाएं पहना दीं |
पहले तो इन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि यह सब संघ की परंपरा में नही था, किन्तु फिर सोचा शायद पहली बार आने के कारण यह सत्कार हो रहा है |
वे शांत भाव से स्वागतकर्ताओं के साथ चल दिए | किन्तु जब उन्हें एक मंच पर ले जाकर बैठाया गया तब उनका माथा ठनका तथा उन्होंने एक कार्यकर्ता को बुलाकर पूछा | तब स्थिति स्पष्ट हुई और मालूम हुआ कि वे लोग इन्हें कांग्रेस का एक नेता समझकर ले आये थे | तब बहां से निकलकर दूसरी बस पकड़कर कमलाकर जी जीरापुर पहुंचे |
3.
* संघ कार्य के कारण समाज जीवन में स्वतः परिवर्तन हो जाता है, इसका उदाहरण है सारंगपुर की यह घटना |
तहसील के मंडावता खंड में १००० आवादी का एक गाँव है झिरी | यहाँ संघ की अच्छी शाखा चलती थी |
गाँव में पीने के पानी की समस्या को दूर करने के लिए स्वयंसेवकों ने प्रयत्न कर नलकूप खुदबाने तथा नलों द्वारा घर घर पानी पहुंचाने की व्यवस्था की |
गाँव में गन्दगी वा कीचड़ ना हो इसलिये जल निकासी की समुचित व्यवस्था की गई | इतना ही नहीं तो घरों से निकले हुए पानी को नालियों द्वारा खेतों तक पहुंचाया गया |
जिस खेत को यह पानी दिया जाता उससे इस पानी का भी शुल्क बसूला जाता | कोई व्यक्ति अगर व्यवस्था भंग करता तो उस पर जुर्माना भी लगता | सब लोग स्वेच्छा से इस व्यवस्था का पालन करते हैं |
* वरिष्ठ अधिकारियों का आचरण और व्यवहार ही बस्तुतः कार्य विस्तार का आधार होता है |
एसा ही १९४५ का एक अद्वितीय प्रसंग है |
माननीय एकनाथ जी रानाडे ब्यावरा प्रवास पर पधारने बाले थे | शुजालपुर का कार्यक्रम पूर्ण करके ब्यावरा जाने के लिये जब वे बस स्टेंड पहुंचे तो मालूम हुआ कि बस निकल चुकी है तथा अब कोई साधन नही है |
उन दिनों आज की तरह आवागमन के पर्याप्त साधन नही थे | शुजालपुर के कार्यकर्ताओं ने आग्रह किया कि एकनाथ जी शुजालपुर ही रुक जाएँ | किन्तु एकनाथ जी इसे कैसे स्वीकार करते ? उनके आगमन की सूचना हो जाए और वे नहीं पहुंचें, यह उन्हें गवारा नही था |
उन्होंने एक कार्यकर्ता से साईकिल ली और उससे ही ब्यावरा तक की यात्रा की |
2.
* प्रचारकों को कई बार मजेदार अनुभवों से गुजरना पड़ता है |
एसा ही एक अनुभव श्री कमलाकर शुक्ल को राजगढ़ प्रचारक के रूप में अपने प्रथम जीरापुर प्रवास में हुआ |
वे सदा खादी का सफ़ेद धोती कुरता व जाकेट पहनते थे | इसी वेश में जब वे उज्जैन से जीरापुर जाने को निकले तो संयोग से बस की पहली सीट पर जगह मिली |
मार्ग में जब छापीहेडा कस्वा आया तब बस रुकते ही कुछ लोग हार फूल माला लेकर बस में चढ़े और अभिवादन करते हुए शुक्ला जी को मालाएं पहना दीं |
पहले तो इन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि यह सब संघ की परंपरा में नही था, किन्तु फिर सोचा शायद पहली बार आने के कारण यह सत्कार हो रहा है |
वे शांत भाव से स्वागतकर्ताओं के साथ चल दिए | किन्तु जब उन्हें एक मंच पर ले जाकर बैठाया गया तब उनका माथा ठनका तथा उन्होंने एक कार्यकर्ता को बुलाकर पूछा | तब स्थिति स्पष्ट हुई और मालूम हुआ कि वे लोग इन्हें कांग्रेस का एक नेता समझकर ले आये थे | तब बहां से निकलकर दूसरी बस पकड़कर कमलाकर जी जीरापुर पहुंचे |
3.
* संघ कार्य के कारण समाज जीवन में स्वतः परिवर्तन हो जाता है, इसका उदाहरण है सारंगपुर की यह घटना |
तहसील के मंडावता खंड में १००० आवादी का एक गाँव है झिरी | यहाँ संघ की अच्छी शाखा चलती थी |
गाँव में पीने के पानी की समस्या को दूर करने के लिए स्वयंसेवकों ने प्रयत्न कर नलकूप खुदबाने तथा नलों द्वारा घर घर पानी पहुंचाने की व्यवस्था की |
गाँव में गन्दगी वा कीचड़ ना हो इसलिये जल निकासी की समुचित व्यवस्था की गई | इतना ही नहीं तो घरों से निकले हुए पानी को नालियों द्वारा खेतों तक पहुंचाया गया |
जिस खेत को यह पानी दिया जाता उससे इस पानी का भी शुल्क बसूला जाता | कोई व्यक्ति अगर व्यवस्था भंग करता तो उस पर जुर्माना भी लगता | सब लोग स्वेच्छा से इस व्यवस्था का पालन करते हैं |


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