...श्रृंखला *संघ-सेवा-साधना* का अंतिम लेख प्रस्तुत है...!!
एक बार भंडावद गाँव में सभी कुए सूख गए, केवल तहसील कार्यवाह गिरिराज जी गुप्ता के कुए में ही पानी था |
उन्होंने गाँव वालों से कहा कि मैं पानी दूंगा तो सबको बिना भेदभाव और छुआछूत के, अन्यथा किसी को नहीं |
कुछ मजबूरी कुछ परिवर्तन की लहर, पूरे गाँव ने इसे स्वीकार किया और अब तो गाँव का मंदिर भी समाज के हर वर्ग के लिये खुल चुका है |
इस प्रकार संघ की एक शाखा के कारण बिना अछूत उद्धार की डुगडुगी बजाये एक गाँव का रूपांतर हो गया |
मृत्यु उपरांत भी गुरू दक्षिणा -
स्व. डाक्टर बनाबारीलाल सुलोदिया होम्योपेथी पद्धति से उपचार करने बाले चिकित्सक एवं आदर्श स्वयंसेवक थे !
संघ की ओर से जो भी दायित्व उन्हें दिया जाता उसे बड़ी तन्मयता एवं लगन से पूर्ण करने का प्रयत्न करते !
सीहोर नगर की पिछड़ी बस्ती में चलने बाले निशुल्क चिकित्सालय का संचालन भी वे ही देखते थे !
७८ वर्ष की आयु में वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए ! उन्हें लगने लगा कि जीवन की अंतिम घड़ी निकट ही है !
उस समय गुरू पूजन उत्सव को तीन माह का समय था ! सुलोदिया जी को लगा कि पूजन उत्सव के पूर्व कहीं जीवन लीला पूर्ण हो गई तो जीवन की अंतिम घड़ी में गुरू दक्षिणा करने से वंचित ना रह जाऊं !
उन्होंने जिला कार्यवाह शिवरतन पुरोहित को बुलाबाया और गुरू दक्षिणा की संकल्पित राशि उन्हें सोंपते हुए कहा कि -"अगर गुरू पूजन उत्सव तक जीवित रहा तो प्रत्यक्ष उपस्थित होकर गुरू दक्षिणा करूंगा ही, किन्तु यदि उत्सव के पूर्व भगवान का बुलावा आ जाए तो आप यह राशि ध्वज के सम्मुख अर्पित कर देना"!
गुरू पूजन उत्सव के दो दिन पूर्व ही उनका शरीर शांत हो गया ! सुलोदिया जी की अंतिम इच्छा बताते हुए जिला कार्यवाह जी ने उनके द्वारा दी गई राशि ध्वज के सम्मुख अर्पित की !
सुलोदिया जी द्वारा अंतिम समय में भी स्वयंसेवक भाव को जागृत रखने के इस उदाहरण ने सभी को श्रद्धावनत कर दिया !
भोपाल के आद्य स्वयंसेवक श्री शंकर लाल शर्मा अपने परिवार के साथ अत्यंत निर्धनता में जीवन निर्वाह करते थे ! उन्होंने स्थानांतरित होने के बाद संघकार्य के लिए म.प्र.वि.म. की शासकीय सेवा छोड़ दी थी !
स्वयंसेवकों ने उनके जीर्ण शीर्ण भवन की मरम्मत हेतु धन संग्रह किया और उनके न कहने के बाद भी उसे बनबा दिया ! तू डाल डाल तो मैं पात पात ! बनने के बाद शंकर लाल जी कहने लगे कि मैं मकान में जाऊंगा ही नहीं ! बड़ी मुश्किल से मकान में गए तो इस शर्त पर कि मकान अब संघ का है, मैं किराया दूंगा !
एम.एल.ए. रेस्ट हाऊस में सर्विस कर किराया भुगतान करने लगे !
पी.एच.डी. तथा अर्थ शास्त्र के विभागाध्यक्ष रहे श्री प्रभाकर पाटनकर ६०-६१ में नगर प्रचारक बनकर आये !
विभीषण सिंह जी के साथ साईकिल से ही सब महाविद्यालयों में जाते और अपने प्रभावी व्यक्तित्व से सबको प्रभावित कर संघ से जोडते !
उस समय एक साथ तीन पी.एच.डी. संघ कार्य में जुटे हुए थे ! श्री पाटनकर के अतिरिक्त श्री हरिभाऊ वाकणकर तथा उज्जैन के श्री नन्द कुमार गर्ग !
भीम वेटिका में खाना खाते समय वाकणकर जी आलू को धुप से गरम वालू में दबाकर रख देते थे और मुलायम होने पर उदरस्थ कर लेते थे ! इन्ही श्री वाकणकर जी ने बाद में संस्कार भारती की भी स्थापना की।
विहारी लाल जी लोकवानी टाऊन एवं कंट्रीप्लानिंग में डायरेक्टर रहते हुए संघ कार्य कर रहे थे ! स्थानान्तरण होने पर त्यागपत्र देकर उन्होंने संघ कार्य जारी रखा !
क्षेत्र प्रचारक रहे श्री गोपाल जी व्यास भी भिलाई में शासकीय सेवा छोड़कर प्रचारक निकले !.........!!
******************************************राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ का समग्र इतिहास ऐसे अनंत उदाहरणों से भरा पड़ा है। इस एक झलक के द्वारा संघ की बलिदानी भाव परंपरा से संक्षिप्त रूप में अवगत कराने का प्रयास किया है।....😊 धन्यवाद😊..!!
एक बार भंडावद गाँव में सभी कुए सूख गए, केवल तहसील कार्यवाह गिरिराज जी गुप्ता के कुए में ही पानी था |
उन्होंने गाँव वालों से कहा कि मैं पानी दूंगा तो सबको बिना भेदभाव और छुआछूत के, अन्यथा किसी को नहीं |
कुछ मजबूरी कुछ परिवर्तन की लहर, पूरे गाँव ने इसे स्वीकार किया और अब तो गाँव का मंदिर भी समाज के हर वर्ग के लिये खुल चुका है |
इस प्रकार संघ की एक शाखा के कारण बिना अछूत उद्धार की डुगडुगी बजाये एक गाँव का रूपांतर हो गया |
मृत्यु उपरांत भी गुरू दक्षिणा -
स्व. डाक्टर बनाबारीलाल सुलोदिया होम्योपेथी पद्धति से उपचार करने बाले चिकित्सक एवं आदर्श स्वयंसेवक थे !
संघ की ओर से जो भी दायित्व उन्हें दिया जाता उसे बड़ी तन्मयता एवं लगन से पूर्ण करने का प्रयत्न करते !
सीहोर नगर की पिछड़ी बस्ती में चलने बाले निशुल्क चिकित्सालय का संचालन भी वे ही देखते थे !
७८ वर्ष की आयु में वे गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए ! उन्हें लगने लगा कि जीवन की अंतिम घड़ी निकट ही है !
उस समय गुरू पूजन उत्सव को तीन माह का समय था ! सुलोदिया जी को लगा कि पूजन उत्सव के पूर्व कहीं जीवन लीला पूर्ण हो गई तो जीवन की अंतिम घड़ी में गुरू दक्षिणा करने से वंचित ना रह जाऊं !
उन्होंने जिला कार्यवाह शिवरतन पुरोहित को बुलाबाया और गुरू दक्षिणा की संकल्पित राशि उन्हें सोंपते हुए कहा कि -"अगर गुरू पूजन उत्सव तक जीवित रहा तो प्रत्यक्ष उपस्थित होकर गुरू दक्षिणा करूंगा ही, किन्तु यदि उत्सव के पूर्व भगवान का बुलावा आ जाए तो आप यह राशि ध्वज के सम्मुख अर्पित कर देना"!
गुरू पूजन उत्सव के दो दिन पूर्व ही उनका शरीर शांत हो गया ! सुलोदिया जी की अंतिम इच्छा बताते हुए जिला कार्यवाह जी ने उनके द्वारा दी गई राशि ध्वज के सम्मुख अर्पित की !
सुलोदिया जी द्वारा अंतिम समय में भी स्वयंसेवक भाव को जागृत रखने के इस उदाहरण ने सभी को श्रद्धावनत कर दिया !
भोपाल के आद्य स्वयंसेवक श्री शंकर लाल शर्मा अपने परिवार के साथ अत्यंत निर्धनता में जीवन निर्वाह करते थे ! उन्होंने स्थानांतरित होने के बाद संघकार्य के लिए म.प्र.वि.म. की शासकीय सेवा छोड़ दी थी !
स्वयंसेवकों ने उनके जीर्ण शीर्ण भवन की मरम्मत हेतु धन संग्रह किया और उनके न कहने के बाद भी उसे बनबा दिया ! तू डाल डाल तो मैं पात पात ! बनने के बाद शंकर लाल जी कहने लगे कि मैं मकान में जाऊंगा ही नहीं ! बड़ी मुश्किल से मकान में गए तो इस शर्त पर कि मकान अब संघ का है, मैं किराया दूंगा !
एम.एल.ए. रेस्ट हाऊस में सर्विस कर किराया भुगतान करने लगे !
पी.एच.डी. तथा अर्थ शास्त्र के विभागाध्यक्ष रहे श्री प्रभाकर पाटनकर ६०-६१ में नगर प्रचारक बनकर आये !
विभीषण सिंह जी के साथ साईकिल से ही सब महाविद्यालयों में जाते और अपने प्रभावी व्यक्तित्व से सबको प्रभावित कर संघ से जोडते !
उस समय एक साथ तीन पी.एच.डी. संघ कार्य में जुटे हुए थे ! श्री पाटनकर के अतिरिक्त श्री हरिभाऊ वाकणकर तथा उज्जैन के श्री नन्द कुमार गर्ग !
भीम वेटिका में खाना खाते समय वाकणकर जी आलू को धुप से गरम वालू में दबाकर रख देते थे और मुलायम होने पर उदरस्थ कर लेते थे ! इन्ही श्री वाकणकर जी ने बाद में संस्कार भारती की भी स्थापना की।
विहारी लाल जी लोकवानी टाऊन एवं कंट्रीप्लानिंग में डायरेक्टर रहते हुए संघ कार्य कर रहे थे ! स्थानान्तरण होने पर त्यागपत्र देकर उन्होंने संघ कार्य जारी रखा !
क्षेत्र प्रचारक रहे श्री गोपाल जी व्यास भी भिलाई में शासकीय सेवा छोड़कर प्रचारक निकले !.........!!
******************************************राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ का समग्र इतिहास ऐसे अनंत उदाहरणों से भरा पड़ा है। इस एक झलक के द्वारा संघ की बलिदानी भाव परंपरा से संक्षिप्त रूप में अवगत कराने का प्रयास किया है।....😊 धन्यवाद😊..!!


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