सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता की मांग संघ ने उठाई
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता का उद्देश्य रखा था। 1930 से पहले कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता का नाम तक नहीं लिया। यह दल हाथ में कटोरा लेकर अंग्रेजों से आजादी की भीख मांगता रहा। तो भी डॉक्टर हेडगेवार ने महात्मा गांधी जी के सभी सत्याग्रहों और आंदोलनों में स्वयंसेवकों को भाग लेने की अनुमति दी। गांधी जी के नेतृत्व में आयोजित हुए असहयोग आंदोलन में स्वयं डॉक्टर हेडगेवार ने 6 हजार से अधिक स्वंयसेवकों के साथ सत्याग्रह किया था। उन्हें 9 मास के सश्रम कारावास की सजा हुई थी। इसी प्रकार 1942 में महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में सम्पन्न हुए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन’ में संघ के स्वयंसेवकों ने अपने सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर के आदेशानुसार हजारों की संख्या में भाग लिया था। इतना ही नहीं कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को संघ के कार्यकर्ताओं ने अपने घरों में शरण भी दी थी। उदाहरणार्थ दिल्ली के उस समय के प्रांत संघचालक श्री हंसराज गुप्त के घर में अरुणा आसफ अली और जय प्रकाश नारायण ठहरे थे। यद्यपि इस आंदोलन की घोषणा करने से पूर्व संघ से कोई सलाह मशवरा नहीं किया गया तो भी राष्ट्र के हित में संघ के स्वयंसेवकों ने इसमें भाग लिया और जेलों में यातनाएं भुगतीं।
आजादी के लिए सशस्त्र क्रांति की योजना भी बनाई
डॉक्टर हेडगेवार ने द्वितीय महायुद्ध के मंडराते बादलों को भांप कर देश में एक सशस्त्र क्रांति करने की योजना पर सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर और त्रलोक्यनाथ चक्रवर्ती के साथ एक लम्बी और गहन चर्चा की थी। इसी चर्चा में से सेना में नौजवानों की भर्ती, सेना में विद्रोह और आजाद हिंद फौज के गठन का विचार उत्पन्न हुआ था। सारी योजना तैयार हो गई और काम शुरू हो गया। नौजवान योजनाबद्ध तरीके से फौज में भर्ती हुए। सुभाषचंद्र बोस द्वारा विदेश में जाकर आजाद हिंद फौज का गठन किया गया। इधर अभिनव भारत, हिन्दू महासभा, आर्यसमाज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सभी सशस्त्र क्रांतिकारी संगठनों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बजाने के लिए शक्ति अर्जित करनी प्रारम्भ कर दी। आखिर वह समय आया जब फौज में विद्रोह हुआ और आजाद हिंद फौज भी इम्फाल तक पहुंच गई। अंग्रेजों को भय लगा, इस भयंकर विकट परिस्थिति से निपटने में अपने को असमर्थ पाकर अंग्रेजों ने अपने पहले फैसले को बदलकर 10 महीने पहले ही 15 अगस्त 1947 को देश के विभाजन की घोषणा कर दी। पहले फैसले के अनुसार विभाजन की तिथि 8 जून 1948 थी। यह देश का और स्वतंत्रता सेनानियों का दुर्भाग्य ही था कि कांग्रेस के नेताओं ने महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध 1200 वर्षों से चले आ रहे स्वतंत्रता संग्राम और लाखों बलिदानी हुतात्माओं के ‘‘अखण्ड भारत की सर्वांग स्वतंत्रता’’ के उद्देश्य को ध्वस्त करते हुए देश का विभाजन स्वीकार करके आधी-अधूरी आजादी प्राप्त कर ली। यदि एक वर्ष और ठहर जाते तो स्वतंत्रता भी मिलती और भारत का विभाजन भी न होता। विभाजन के बाद महात्मा गांधी जी ने एक पत्र लिखकर कांग्रेस के नेताओं को सुझाव दिया था कि अब कांग्रेस को समाप्त कर के इसे एक सेवादल में परिवर्तित कर दो। महात्मा गांधी जी की इस इच्छा को ठुकरा दिया गया। उधर संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने स्वयंसेवकों को तेज गति से अपनी शक्ति बढ़ाने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि ‘डॉक्टर हेडगेवार का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ, उनका उद्देश्य था अखण्ड भारत की सर्वांग स्वतंत्रता और सर्वांगीण विकास। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1947 के बाद भी सक्रिय रहा। कश्मीर की सुरक्षा के लिए बीसियों स्वयंसेवकों ने बलिदान दिये। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने श्रीनगर में जाकर अपनी कुर्बानी दी। स्वयंसेवकों ने हैदराबाद और गोवा की स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह और संघर्ष किये और बलिदान दिये।

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