स्वतंत्रता संग्राम के एक अज्ञात सेनापति डॉ। हेडगेवार
चिरसनातन अखण्ड भारत की सर्वंग स्वतंत्रता के लिए कटिबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक डॉ। हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे अज्ञात सेनापति थे जिन्होंने अपने और अपने संगठन के नाम से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में अपना तन मन सब माता पिता के चरणों में अर्पित कर दिया था। अपने बाल्यकाल से लेकर जीवन की अंतिम श्वास तक भारत की स्वतंत्रता के लिए जूझते रहने वाले इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने न तो अपनी आत्मकथा लिखी और न ही इतिहास और फिटनेस पत्रों में अपना और अपनी संस्था का नाम प्रकट कर पाने का कोई प्रचलित काण्डा ही अपनाया। डॉ। हेडगेवार तो लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, विपिनचंद्रपाल, क्रांतिकारी नेता त्रलोक्यनाथ, सरदार भगत सिंह, वीर सावरकर, सुभाषचंद्र बोस, रासबिहारी बोस, श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसे स्वतंत्रता स्वतंत्रता सेनानियों की श्रेणी के महापुरुष थे, जिन्हें स्वाधीनता प्राप्ति के बाद सत्ता पर बैठने वाले शासकों ने पूर्णतया दरकिनार कर के स्वतंत्रता संग्राम का पैकेज अपना नाम लिखा लिया। आजाद हिंद फौज, अभिनव भारत, बब्बर खालसा, गदर पार्टी, अनुशीलन समिति, हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना, हिन्दू महासभा, आर्यसमाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी संस्थाओं के योगदान को धता बताकर स्वतंत्रता संग्राम को एक ही नेता और एक ही दल के खाने में जमा कर रहे हैं। कर देना एक राजनैतिक अनैतिकता और ऐतिहासिक अन्याय नहीं तो और क्या है?
उपरोक्त संदर्भ में सबसे अधिक घोर अन्याय उन डॉ। हेडगेवार के साथ हुआ जिन्होंने सशस्त्र क्रांति से लेकर सभी अहिंसक आंदोलनों और सत्याग्रहों में न केवल अग्रणी भूमिका ही प्रभावित अपितु सभी स्वतंत्रता संग्राम को एक निश्चित राष्ट्रवादी दिशा देने का एक भरपूर प्रयास किया। डॉ। हेडगेवार की इस महत्वपूर्ण पार्श्व भूमिका को स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में समझना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस ऐतिहासिक सचाई से कौन इंकार करेगा कि सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात समस्त भारत में तेज गति से हो रहे हिन्दुत्व के जागरण, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुर्नस्थापन, चातुर्दिक क्रांतिकारी गतिविधियों, भारतीयों की स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए उत्कट इच्छा को तोड़कर उसे दिशा भ्रमित कर रही है। नेता एक कट्टरपंथी ईसाई नेता ए.ओ. ह्यूम ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी। ये प्रारम्भिक कांग्रेस अंग्रेज हुकूमत का सुरक्षा कवच (सेफ्टी वाल) थी। अतः अंग्रेजों की इसी कुटिल चाल को विफल करने, भारतीयता को विदेशी और विधायक साजिशों से बचाने और स्वतंत्रता संग्राम को राष्ट्रीय सनातन आधार प्रदान करने के लिए डॉ हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी।
संघ देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों का संगठन रहा है
संघ भारत की सनातन राष्ट्रीय पहचान 'हिन्दुत्व' का सुरक्षा कवच था और है। संघ अर्थात राष्ट्र की सर्वांग स्वतंत्रता और सर्वांग सुरक्षा के लिए देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों का प्रतिद्वंद्वी संगठन। डॉ। हेडगेवार की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि सैन्य पौरुष, ज्ञान विज्ञान, अतुलनीय समृद्धि, गौरवशाली संस्कृति इत्यादि सब कुछ होते हुए भी हम परतंत्र क्यों हुए? परतंत्रता के कारणों को जाने बिना मुक्ति प्राप्ति के सभी प्रयासों का परिणाम अच्छा नहीं होगा, यही हुआ है। सदियों पुराने राष्ट्र का दुखित विभाजन और मध्य-राजनैतिक स्वतंत्रता।
डॉ। हेडगेवार ने तत्कालीन सभी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं और स्वतंत्रता आंदोलनों में भगीपन करने के बाद अपने गहरे मंथन में से यह निष्कर्ष निकालकर स्वतंत्रता सेनानियों, नेताओं, संतों महात्माओं सहित सभी भारतवासियों के सामने रखा। - '' हमारे समाज और देश का पतन मुस्लिम धर्मों या अंग्रेजों के कारण नहीं है। अपितु राष्ट्रीय भावना के शिथिल हो जाने पर व्यक्ति और समष्टि के वास्तविक संबंध बिगड़ने और इस प्रकार की असंगठित व्यवस्था के कारण ही एक समय दिग्विजय का डंका दसों दिशाओं में बजाने वाला हिन्दू (भारतीय) समाज सैकड़ों वर्षों से विदेशियों की आसुरिक सत्ता के नीचे पददलित है। है ''।
डॉ। हेडगेवार मानते थे कि भारत के वैभव, पतन, संघर्ष और उत्थान का इतिहास हिन्दुओं के सामाजिक उतार चढ़ाव के साथ हुआ है।
इसलिए देश को स्वतंत्र रूप से और बाद में स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए देश के बहुसंख्यक प्राचीन राष्ट्रीय समाज हिन्दू को संगठित, प्रतिस्पर्धी, चरित्रवान, स्वदेशी, स्वाभिमानी बनाना अति आवश्यक है। डॉ। हेडगेवार के समान चिंतन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जन्म दिया।

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