मंगलवार, 8 जनवरी 2019

गो-सेवा के नाम पर खुली दुकानों और उनके एजेंटों को सादर समर्पित...!!😊

कहाँ सो गए गोरक्षक दल...!!

गाय तड़पती भूखी प्यासी।
आंखों में वो लिए उदासी।।
चारे को भटकें वो दर दर,
राहत उनको नहीं जरा सी।।
वो लाचार न जानें छल-बल।। कहाँ सो गए...!!

खेत रौंदतीं, डंडे खातीं।
बल्लम घोंप भगायी जातीं।।
खूंटे पर आ कर जब रुकतीं,
घर वालों को दूध पिलातीं।।
सुबह निकाली जातीं बेकल।। कहाँ सो गए..!!

बूढ़ी गाय बेच हम आते।
हत्या से भी हमीं बचाते।।
कष्ट भरा जीवन हैं जीतीं,
चारा तक तो खिला न पाते।।
तडप तड़प कर मरतीं घायल।। कहाँ सो गए...!!

कोई गाड़ रहा धरती में।
कहीं घिरी हैं .....कहीं बंधी हैं।।
माँ के प्रति व्यवहार उचित है...???
शर्म नहीं आती किंचित है...???
भूल गए क्या तुम अपना बल...??? कहाँ सो गए...!!

गोमाता हम जिसको कहते।
उसका जीवन बीते सहते...!!
आंखों से आंसू क्यों उसकी,
हम सबके रहते ....भी ...बहते।।
शेष बचा बातों का 'कौशल'..!! कहाँ सो गए...!!

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