परमवीर वाटिका के प्रथम पुष्प ..!!
मेजर सोमनाथ शर्मा- 1947
सादर नमन...…😊
31 जनवरी 1923 को जम्मू में जन्मे मेजर सोमनाथ शर्मा ने 22 फरवरी 1942 को भारतीय सेना में चौथी कुमायूं रेजीमेंट में बतौर कमीशंड अधिकारी प्रवेश लिया। मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित मेजर सोमनाथ शर्मा का फौजी कार्यकाल शुरू ही द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुआ, जब उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया। 3 नवंबर 1947 मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बडगाम मोर्चे पर जाने का आदेश दिया गया। जब दुश्मन के 500 सैनिकों ने तीन तरफ से भारतीय सेना को घेरकर हमला शुरू कर दिया, तब मेजर शर्मा ने दुश्मन बहादुरी से मुकाबला किया।
मेजर की सेना के कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे और काफी कम संख्या में सैनिक बचे थे। मेजर सोमनाथ का बायां हाथ भी चोटिल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं माने। वे मैग्जीन में गोलियां भरकर सैनिकों को देते गए, लेकिन दुर्भाग्य से वे दुश्मन के एक मोर्टार का निशाना बन गए और वीरगति को प्राप्त हुए। अंतिम समय में भी वे अपने सैनिकों का सामना करने के लिए हौसला बढ़ाते रहे। मेजर सोमनाथ परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे।
मेजर सोमनाथ शर्मा- 1947
सादर नमन...…😊
31 जनवरी 1923 को जम्मू में जन्मे मेजर सोमनाथ शर्मा ने 22 फरवरी 1942 को भारतीय सेना में चौथी कुमायूं रेजीमेंट में बतौर कमीशंड अधिकारी प्रवेश लिया। मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित मेजर सोमनाथ शर्मा का फौजी कार्यकाल शुरू ही द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुआ, जब उन्हें मलाया के पास के रण में भेजा गया। 3 नवंबर 1947 मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बडगाम मोर्चे पर जाने का आदेश दिया गया। जब दुश्मन के 500 सैनिकों ने तीन तरफ से भारतीय सेना को घेरकर हमला शुरू कर दिया, तब मेजर शर्मा ने दुश्मन बहादुरी से मुकाबला किया।
मेजर की सेना के कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे और काफी कम संख्या में सैनिक बचे थे। मेजर सोमनाथ का बायां हाथ भी चोटिल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं माने। वे मैग्जीन में गोलियां भरकर सैनिकों को देते गए, लेकिन दुर्भाग्य से वे दुश्मन के एक मोर्टार का निशाना बन गए और वीरगति को प्राप्त हुए। अंतिम समय में भी वे अपने सैनिकों का सामना करने के लिए हौसला बढ़ाते रहे। मेजर सोमनाथ परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे।

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