पाकिस्तान में अनेक मंदिर हैं जो आज बहुत खस्ताहाल में है। पाकिस्तान सरकार ने कई बार कहा है सनातन धर्म से जुड़े कुछ ऐतिहासिक स्थलों और मंदिरों को ठीक करा कर पर्यटन की दृष्टि से उन्हें विकसित किया जाएगा पर अब तक कुछ नहीं हुआ है।
यहां प्रस्तुत हैं पाकिस्तान के पांच बड़े हिंदू मंदिरों का महत्व और उनका हाल
1. कटास राज मंदिर-:
कटास संस्कृत के कटाक्ष शब्द का अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है आंखें या नेत्र।
कहा जाता है कि सती जी के वियोग में शिव जी ने जब रुदन किया था तो उनके अश्रुओं से धरती पर 2 कुंड बन गए थे। उनमें से एक कुंड पुष्कर में ब्रह्मा सरोवर के रूप में मौजूद है जबकि दूसरा सरोवर कटासराज मंदिर परिसर में मौजूद है। शिवजी के नेत्रों से निकले अश्रु के प्रभाव से बने इस पवित्र सरोवर में स्नान करने से मनुष्य के समस्त रोग दोष दूर हो जाते हैं।सन 1947 में देश के विभाजन की सबसे अधिक मार इस मंदिर और सरोवर पर भी पड़ी। नतो मंदिर का रखरखाव का कोई काम किया गया और न सरोवर का संरक्षण हुआ।पिछले साल एक रिपोर्ट आई थी कि सरोवर का पानी एक सीमेंट कारखाने को दिया जा रहा है। जाहिर है कि पाकिस्तान के लिए इस सरोवर का इससे अधिक और कोई महत्व हो ही नहीं सकता, लेकिन खुद कटासराज मंदिर परिसर का यह सरोवर कितना महत्वपूर्ण है इसे इस के जल से समझा जा सकता है।
अहमद बशीर ताहिर नामक इतिहासविद ने अपनी डॉक्यूमेंट्री में इस बात का जिक्र किया है कि यहां सरोवर का पानी दो रंग का है, एक हरा और दूसरा नीला। जहां सरोवर का पानी हरा है वहां सरोवर की गहराई कम है लेकिन जहां सरोवर का पानी गहरा नीला है वहां सरोवर भी बहुत गहरा है।
लाख उपेक्षा के बाद भी आज इस सरोवर का पानी बहुत स्वच्छ है।
कटासराज मंदिर हिंदुओं के प्रथम तीर्थों में से एक है क्योंकि बताया जाता है कि यहाँ इसी स्थान पर शिव और पार्वती का विवाह हुआ था।महाभारत काल में अपने निष्कासन के दौरान पांडवों ने 4 वर्ष कटास राज में ही बिताए थे।
इसी कटासराज सरोवर के किनारे यक्ष ने युधिष्ठिर से यक्ष-प्रश्न किए थे जो इतिहास में अमर प्रश्न बनकर दर्ज हो गए। पंजाब की राजधानी लाहौर से 270 किलोमीटर की दूरी पर चकवाल जिले में स्थित कटासराज मंदिर परिसर में स्वयंभू शिवलिंग है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आदिकाल से वहां स्थित है। पांडवों ने इसी शिवलिंग का पूजन किया था और वर्तमान समय में भी यह शिवलिंग उपेक्षित ही सही पर अपने स्थान पर अडिग है। शिव मंदिर के अलावा कटास राज परिसर में राम मंदिर और अन्य देवी देवताओं के मंदिर भी हैं जिन्हें सात घरा मंदिर परिसर कहा जाता है। मंदिर परिसर में हरी सिंह नलवा की प्रसिद्ध हवेली भी है।
2.हिंगलाज माता का मंदिर-:
कटासराज मंदिर परिसर के अलावा पाकिस्तान में अनादि काल से जो धार्मिक स्थल सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है वह हिंगलाज माता का मंदिर है।भारतीय उपमहाद्वीप में क्षत्रियों की कुलदेवी के रूप में विख्यात हिंगलाज भवानी माता का मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि आदिशक्ति का
सिर जहां गिरा वहीं पर हिंगलाज माता का मंदिर स्थापित हो गया। हिंगलाज भवानी माता का मंदिर बलूचिस्तान के त्यारी जिले के हिंगोल नेशनल पार्क में हिंगोल नदी के किनारे स्थित है। कोटा-कराची मार्ग पर मुख्य हाईवे से करीब 1 घंटे की पैदल दूरी पर हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान के प्रमुख शहर कराची से 250 किलोमीटर दूर है।बंटवारे के बाद से यहां आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या भले ही बहुत कम हो गई हो लेकिन यह मंदिर आज भी स्थानीय बलोच वासियों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।
इस मंदिर के सालाना जलसे या मेले में केवल हिंदू ही नहीं आते बल्कि मुसलमान भी आते हैं जो श्रद्धा से हिंगलाज माता मंदिर को 'नानी का मंदिर' या फिर 'नानी का हज' कहते हैं।
नानी शब्द संस्कृत के ज्ञानी का अपभ्रंश है जो ईरान की देवी अनाहिता का भी दूसरा नाम है। हिंगलाज माता मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां गुरु नानक देव भी दर्शन के लिए आए थे। हिंगलाज माता मंदिर एक विशाल पहाड़ के नीचे पिंडी के रूप में विद्यमान है जहां माता के मंदिर के साथ-साथ शिवजी का त्रिशूल भी रखा गया है।
हिंगलाज माता के लिए हर साल मार्च-अप्रैल महीने में लगने वाला मेला न केवल हिंदुओं में बल्कि स्थानीय मुसलमानों में भी बहुत लोकप्रिय है। ऐसा कहा जाता है कि दुर्गम पहाड़ी और उसके नदी के किनारे स्थित माता हिंगलाज का मंदिर दोनों धर्मावलंबियों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।
3. गोरी मंदिर-:
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में थारपारकर जिले में स्थित गौरी मंदिर पाकिस्तान में स्थित हिंदुओं का एक और महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। पाकिस्तान में सबसे अधिक हिंदू इसी थारपारकर जिले में रहते हैं जो मूल रुप से बनवासी हैं। इन्हें पाकिस्तान में थारी हिंदू कहा जाता है। थारपारकर में इन थारी हिंदुओं की आबादी कुल आबादी का करीब 40% है।
गौरी मंदिर मुख्य रूप से जैन मंदिर है लेकिन अब इस मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित है। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पारसनाथ जी की मुख्य मूर्ति अब वहां से हटाकर मुंबई में स्थापित की जा चुकी है जिन्हें गोदीजी पाश्र्वनाथ कहते हैं। मूल रूप से जैन धर्म को समर्पित यह मंदिर अपने स्थापत्य के लिहाज से बेजोड़ है और समझा जाता है कि इस मंदिर का स्थापत्य और माउंट आबू मंदिर परिसर का स्थापत्य एक ही शैली का है।
इस मंदिर का निर्माण मध्य काल में किया गया था हालांकि पाकिस्तान में जैन धर्म के अनुयाई नाम मात्र के बचे लेकिन इस मंदिर परिसर में स्थानीय भील और थारी हिंदू पूजा उपासना करते हैं।
4 मरी सिंधु मंदिर-:
मरी इंडस के नाम से मशहूर यह मंदिर परिसर पहली शताब्दी से पांचवी शताब्दी के बीच बनाया गया है। मरी उस वक्त गांधार प्रदेश का हिस्सा था और चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी मरी का जिक्र यह कहते हुए किया है कि इस पूरे इलाके में हिंदू और बौद्ध मंदिर खत्म हो रहे हैं। यदि पाकिस्तान और दुनिया के आधुनिक इतिहासकार मानते हैं मरी के मंदिर सातवीं शताब्दी के बाद के हो सकते हैं क्योंकि इन मंदिरों के स्थापत्य में कश्मीर की स्थापत्य शैली स्पष्ट रूप से दिखाई देती है जो कि इस क्षेत्र में इस्लामिक आक्रमण के बाद विकसित हुई है।
आधुनिक अन्वेषण शास्त्री मरी के मंदिर समूह को साल्ट रेंज टेंपल्स भी कहते हैं।इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी कहता है यह मंदिर राजपूतों द्वारा बनवाये गये हो सकते हैं जिन्होंने यहां शासन किया था। मरी के मंदिर न सिर्फ अति प्राचीन है बल्कि स्थापत्य की अद्भुत मिसाल भी है, लेकिन पाकिस्तान में अब उपेक्षा का शिकार होकर यह मंदिर लगभग खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
5. शारदा पीठ-:
महादेवी शारदा के बिना कश्मीर का कोई अस्तित्व नहीं था लेकिन अब ऐसा नहीं है अब कश्मीर तो है लेकिन वहां देवी शारदा का ही कोई अस्तित्व नहीं है। सनातन धर्म शास्त्र के अनुसार भगवान शंकर ने सती के शव के साथ जो तांडव किया था उसमें सती का दाहिना हाथ इसी पर्वतराज हिमालय की तराई कश्मीर में गिरा था। शारदा गांव में यह मंदिर कब अस्तित्व में आया इसका कोई इतिहास नहीं है, लेकिन अब भारतीय नियंत्रण रेखा से केवल 17 मील दूर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के शारदा गांव में मंदिर के नाम पर यहां सिर्फ भग्नावशेष बचे हैं। शारदा पीठ का महत्व इसलिए भी है कि यह 52 शक्तिपीठों में नहीं बल्कि 18 महा शक्तिपीठों में से एक है। शारदा पीठ में पूजा और पाठ दोनों होता था। यह श्री विद्या साधना का सबसे उन्नत केंद्र था। शैव संप्रदाय के जनक कहे जाने वाले शंकराचार्य और वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य दोनों ही यहां आए और दोनों ने ही दो महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की। शंकराचार्य यहीं सर्वज्ञ पीठ पर बैठे तो रामानुजाचार्य ने यहीं पर श्री विद्या का भाष्य प्रवर्तित किया।पंजाबी भाषा की गुरुमुखी लिपि का उद्गम शारदा लिपि से ही होता है। ऐसे और भी न जाने कितने अचरज इस मंदिर और विद्या केंद्र से जुड़े थे।
विदेशों के कुछ शिवलिंग और देव मूर्तियां इस प्रकार हैं-:
काशी के श्री बेचू सिंह शाम्भव ने शिव निर्माल्य रत्नाकर नाम का एक ग्रंथ लिखा था जो अब अप्राप्य हो गया है।
ग्रंथ की प्रस्तावना में फ्रांस के लुई नामक विद्वान के ग्रंथों के आधार पर अनेक देशों के शिवलिंग पूजन का वर्णन है। उस वर्णन का संक्षिप्त सार नीचे दिया जा रहा है, वर्तमान समय में इस वर्णन में आई मूर्तियों की स्थिति क्या है इसका पता नहीं।
1. इजिप्ट मिस्र के मेफिस और असीरस नामक स्थानों में नंदी पर विराजमान त्रिशूल हस्त व्याघ्र चर्माम्बर धारी शिव की अनेक मूर्तियां है। स्थानीय लोगों उनको दूध से स्नान कराते हैं और उन पर बेलपत्र चढ़ाते हैं।
2.तुर्किस्तान के बाबिलन नगर में 1200 फुट का एक महा शिवलिंग है जो सम्भवतः संसार में सबसे बड़ा शिवलिंग है।
3.इसी प्रकार हेद्रपॉलिस नगर में एक विशाल मंदिर है जिसमें 300 फुट ऊंचा शिवलिंग है।
4.मुसलमानों के तीर्थ मक्का में मक्केश्वर लिंग है जिसे काबा कहा जाता है। वहां के जमजम नामक कुएं में भी एक शिवलिंग है, जिसकी पूजा खजूर की पत्तियों से होती है।
5.पंचशेर और पंचवीर नाम से अफरीदिस्तान, चित्राल, काबुल, बल्ख, बुखारा आदि में शिवलिंग ही पूजित होता है।
(कल्याण तीर्थांक से साभार)
कटासराज मंदिरशारदा पीठहिंगलाज भवानी गोरी मंंदिर
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