गांडीव धनुष धारी पांडव अर्जुन के पुत्र सुभद्रा नंदन अभिमन्यु का नाम भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
महाभारत में जिस अभूतपूर्व भारत महा समर का विवरण आया है उस में वीर अभिमन्यु का योगदान निश्चित ही अनूठा है। उसने अपने जीवन के सोलह वसंत भी नहीं देखे थे कि युद्ध प्रारंभ हो गया। उसका विवाह राजा विराट की सुंदरी और विदुषी पुत्री उत्तरा से हो चुका था और पुत्र की प्रतीक्षा थी।
पिता की ओर से अभिमन्यु को एवं माता की ओर से यदुवंश की संतति था।
इन दो महान राजवंशों के मिलने से ऐसी अद्भुत प्रतिभा का जन्म लेना सहज ही था। महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में वर्णन आता है चंद्रमा के महा तेजस्वी और प्रतापी पुत्र जिनका नाम वर्चा है वहीं पुरुष अर्जुन के पुत्र होकर अन्य नाम से विख्यात हुए। उन्होंने क्षत्रिय धर्म के अनुसार ऐसा युद्ध किया जैसा दूसरा कोई पुरुष कभी नहीं कर सका था। उन धर्मात्मा महारथी अभिमन्यु ने अपना कार्य पूरा करके चंद्रमा में ही प्रवेश कर लिया।
महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु ने वीरता शौर्य एवं युद्ध कला का जो आश्चर्यजनक प्रदर्शन किया और युद्ध के 13 दिन तक जो पराक्रम दिखाया इसका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है-:
युद्ध का पहला दिन
अपने भाइयों एवं सेनापति धृष्टद्युम्न के साथ उसने कौरव योद्धाओं से भारी युद्ध किया, उसने कौशल नरेश बृहद बल एवं भीष्म सहित अनेक महारथियों को घायल करके उनके रथों के ध्वज काट फेंके। भीष्म के साथ जूझते हुए विराट पुत्र श्वेत की भी अभिमन्यु ने सहायता की।
युद्ध का दूसरा दिन
कौरव सेनापति भीष्म पितामह का सामना पांडवों ने क्रौंच व्यूह बनाकर किया। अभिमन्यु ने दाहिने पक्ष का भार संभाला। पहले तो उसने भीष्म के विरुद्ध अपने पिता अर्जुन को सहयोग दिया और फिर अनेक कौरव वीरों को घायल करते हुए दुर्योधन के वीर पुत्र लक्ष्मण से बराबरी का युद्ध किया।
युद्ध का तीसरा दिन
कौरवों के गरुड़ व्यूह का सामना पांडवों ने अर्धचंद्र व्यूह बनाकर किया।
अभिमन्यु और सात्यकी ने मिलकर शकुनि के नेतृत्व में लड़ रही गांधार देश की सेना का भारी संहार किया।
युद्ध का चौथा दिन
इस दिन कौरवों ने व्याल एवं पांडवों ने क्रौंच व्यूह बनाया। अपने पिता अर्जुन के सहयोगी के रुप में उसने अश्वत्थामा भूरिश्रवा शल्य और चित्रसेन जैसे महारथियों को भारी टक्कर देकर शत्रुओं के पक्षधर कैकयों, त्रिगर्तों और मद्रों की घेराबंदी को तोड़ दिया।
इसके उपरांत उसने भीम की युद्ध में सहायता की।
युद्ध का पांचवा दिन
इस दिन कौरव मकर व्यूह में और पांडव श्येन व्यूह में आमने-सामने थे।
अभिमन्यु ने सात्यकिऔर चेकितान को साथ लेकर शाल्वों तथा कैकयों पर भारी आक्रमण किया।
उसने चित्रसेन पुरुमित्र और सत्यव्रत नामक शत्रु वीरों को घायल किया। घायल होने के उपरांत भी उसने दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण से रोमांचकारी एवं दर्शनीय युद्ध किया।
युद्ध का छठा दिन
इस दिन पांडव सेना मकर व्यूह एवं कौरव सेना क्रौंच व्यूह में सज्जित खड़ी थी। अपने व्यूह की ग्रीवा पर डटे अभिमन्यु ने चित्रसेन एवं विकर्ण से भारी युद्ध किया।
युद्ध का सातवां दिन
कौरव सेना के मंडल व्यूह का उत्तर पांडव सेना ने वज्र व्यूह बनाकर दिया।इस दिन हुए भयानक युद्धमें अभिमन्यु ने पुनः चित्रसेन विकर्ण दुरमर्षण आदि वीरों का दृढ़ता पूर्वक सामना किया।
युद्ध का आठवां दिन
आज पांडव सेना श्रृंगाटक व्यूह में थी। पहले अभिमन्यु ने भीमसेन एवं सात्यकि के साथ मिलकर युद्ध किया।आज का दिन वास्तव में घटोत्कच के शौर्य और उसके मायावी युद्ध का था, किंतु कौरवों की ओर से लड़ रही राजा भगदत्त के हाथी ने इस दिन भारी तूफान मचाया। अभिमन्यु ने बड़ी मुश्किल से पांडव सेना की उससे रक्षा की। इसके बाद अभिमन्यु का राजा अम्बष्ट से भीषण युद्ध हुआ। अम्बष्ठ की तलवार का वार वह साफ-साफ बचा गया।
युद्ध का नौवां दिन
इस दिन कवचबद्ध पांडव वीरों ने कौरव सेना के सर्वतोभद्र व्यूह को चुनौती दी। कौरवों के पक्ष में राक्षस राज अलमबुश के आक्रमण को अभिमन्यु ने निष्फल बनाकर द्रोपदी के पांच पुत्रों की रक्षा की। अलम्बुष की पराजय होते ही उसने चित्ररथ को भारी टक्कर दी।
इस बीच भीष्म के प्रलयंकारी आक्रमण ने पांडव सेना के छक्के छुड़ा दिए। स्वयं श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा भूलकर भीष्म की ओर चक्र सहित लपक पड़े किन्तु अर्जुन ने बड़ी कठिनाई से उन्हें संयमित किया।
युद्ध का दसवां दिन
इस दिन शिखंडी को आगे करके पांडव वीरों ने भीष्म पर भारी आक्रमण किया। कांबोजराज सुदक्षिण से अभिमन्यु ने भारी युद्ध किया। इसके बाद उसने कौरव राज दुर्योधन की छाती और भुजाओं को अपने बाणों से चोट ग्रस्त कर दिया। इसके पश्चात उसने कौशल नरेश बृहद बल को अच्छी टक्कर दी। इसी समय पांडवों को अब तक के युद्ध की सबसे बड़ी जीत मिली।
अत्यंत भीषण युद्ध में भीष्म पितामह घायल होकर युद्ध से अलग हो गए। और शरशैया पर धराशाई हो गए।
कर्ण के प्रस्ताव पर द्रोणाचार्य को नया सेनापति बनाया गया।
युद्ध का 11 वां और 12 दिन
भीष्म के उपरांत युद्ध बड़ा ही क्रूर और भयानक होता चला गया। द्रोणाचार्य ने
पांडव पक्ष का भारी संहार किया। इस दिन अभिमन्यु का राजा पौरव जयद्रथ और शल्य से भीषण युद्ध हुआ।
यह योद्धा अभिमन्यु के हाथों मरते-मरते बचे। द्रोणाचार्य के गरुड़ व्यूह का जवाब पांडवों ने मंडलाग्र व्यूह द्वारा दिया गया। द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर पर आक्रमण करके उनके सहयोगी वीर सत्यजीत शतानीक , दृढ़सेन, क्षेम, वसुदान तथा पांचाल सेन शिव वरदान तथा पांचाल राजकुमार आदि का वध कर दिया।
भयग्रस्त पांडव पक्ष पर भगदत्त और उसकी हाथी ने भी खूब कहर बरपाया। इसी बीच संशप्तको से हो रहे भारी युद्ध को अधूरा छोड़ कर अर्जुन वहां आ गए। और उन्होंने भगदत्त, उसके पर्वताकार हाथी, वृषक अचल और कर्ण के भाइयों को मारकर कौरव सेना को पीछे छोड़ दिया पांडवों का पक्षधर नील अश्वत्थामा के हाथों मारा गया
तेरहवें दिन का युद्ध
महाभारत के इतिहास में युद्ध का 13वां दिन अभिमन्यु की वीरता और कौरव पक्ष के महारथियों की कायरता के लिए सदैव जाना जाएगा। पांडव वीर अर्जुन संशप्तक गणों की सेनाओं से निर्णायक युद्ध करने युद्ध की मुख्य भूमि से काफी दूर निकल गए थे।
ऐसा द्रोणाचार्य की योजना के अनुसार हुआ था। उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर किसी एक पांडव महारथी के वध की पूर्व घोषणा करके चक्र व्यूह बनाया। इस विकट व्यूह का भेदन श्री कृष्ण, प्रद्युम्न, अर्जुन, अभिमन्यु या स्वयं द्रोणाचार्य कर सकते थे ।इस चुनौती का सामना करने के लिए युधिष्ठिर ने अभिमन्यु को चुना।
अभिमन्यु चक्र व्यूह का भेदन तो कर सकता था किंतु उससे बाहर निकलना नहीं जानता था। अतः यह तय हुआ कि अभिमन्यु के पीछे पीछे अत्यंत शक्तिशाली पांडव सेना भी चक्र व्यूह में प्रवेश करके उसकी रक्षा करेगी,लेकिन यह योजना सफल नहीं हो पाई।अभिमन्यु ने व्यूह को भेद कर उसमें प्रवेश तो ले लिया किंतु उस दिन शिव कृपा से अजेय जयद्रथ ने भारी युद्ध कौशल का परिचय देकर तोड़े गए द्वार को बंद कर दिया और पांडव सेना उस में प्रवेश नहीं कर पाई।
विशाल व्यूह में अभिमन्यु कौरव महारथियों द्वारा घेरा जाकर उन सब से अकेला ही जूझने लगा। उसने घायल सिंह की भांति शत्रु पर आक्रमण करके क्रमशः अश्मक पुत्र राजकुमार, शल्य के एक अनुज, कर्ण के एक भाई,वसातीय, सत्यश्रवा रूक्मरथ ,दुर्योधन पुत्र लक्ष्मण, क्राथ पुत्र वृंदारक, बृहदबल, कर्ण के छह मंत्री, भोज ,शत्रुंजय, चंद्रकेतु मेघवेग, सुवर्चा आदि योद्धाओं को मार डाला। साथ ही उसने द्रोण कृपाचार्य दुर्योधन का शल्य दुशासन आदि योद्धाओं को लहूलुहान कर दिया। कौरव महारथियों ने जब उसके सारथी अस्त्र-शस्त्र घोड़ों और रथ आदि को नष्ट कर दिया तो उसने रथ के चक्र (पहिये) से अपना बचाव और आक्रमण प्रारंभ कर दिया।
चक्र कटने पर उसने एक गदा द्वारा कालकेय एवं दस वसातीय रथी आदि को मार डाला।
इसी समय दुशासन के पुत्र ने उस पर पीछे से गदा का वार किया और द्रोण कर्ण आदि छह महारथियों ने उस पर निहत्थी स्थिति में ही घेर कर अधर्म पूर्वक उसका वध कर दिया।
पांडवों की सेना पर वज्रपात हो गया और कौरव पक्ष आनंद से झूम उठा।
उन्हें यह ज्ञात ही नहीं था उनकी मृत्यु उनके कितना निकट आ चुकी थी।
अर्जुन ने अभिमन्यु की हत्या का जिस प्रकार बदला लिया वह इतिहास का हिस्सा है। भारतीय इतिहास में अमर रहेगा कि अभिमन्यु एक अद्वितीय रण बांकुरा शूरवीर था। उसमें जन्मजात प्रतिभा थी। उसने अपनी माता के गर्भ में ही चक्र व्यूह भेदने की विधि अपने महान धनुर्धर पिता से सीख ली थी। जन्म के उपरांत उसने अपने गुरुजनों से गदा तोमर शक्ति चक्र आदि अस्त्र शस्त्रों के संचालन का उत्तम प्रशिक्षण ले रखा था। वह ओज बल एवं साहस का धनी था। अपने स्वजनों का वह दुलारा और अपार यश का स्वामी था।
अपनी पत्नी उत्तरा का वह सिरमौर था। युद्ध कौशल एवं दिव्य अस्त्रों के संचालन में वह दूसरा अर्जुन ही था।
वह आज्ञाकारी एवं बलिदानी था। उसकी मृत्यु के समय उसकी पत्नी उत्तरा की कोख में उसका पुत्र परीक्षित पल रहा था जो कालांतर में पांडवों का एकमात्र उत्तराधिकारी बना।
किंतु क्या महाभारत युद्ध और अभिमन्यु जैसे प्रतापी वीर का बलिदान सार्थक था? यह सही है कि पांडव पक्ष ने कौरवों के शोषण अन्याय अधर्म और अतिवाद का प्रतिरोध किया जो कि उन्हें करना भी चाहिए था किंतु युद्ध में भारत के जनधन की जो अपार क्षति हुई वह अपूरणीय थी और रहेगी। किसी देश के लाडले युवा, तेजस्वी बुद्धिमान व ओजस्वी एवं शक्तिशाली योद्धा बने यदि यह आवश्यक है तो यह भी जरूरी है कि वे एकताबद्ध रहें और अन्याय शोषण अनीति एवं मदान्धता से दूर रहे।
(कल्याण से साभार)
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