मंगलवार, 15 सितंबर 2020

नए मनुष्य के लिए नई शिक्षा -ओशो भाग-1

अतीत में जो शिक्षा प्रचलित थी वह पर्याप्त नहीं है,अधूरी है, सतही है। वह सिर्फ ऐसे लोग निर्मित करती है जो रोजी-रोटी कमा सकते हैं, लेकिन जीवन के लिए वह कोई अंतर्दृष्टि नहीं देती।वह न केवल अधूरी है बल्कि घातक भी है क्योंकि वह प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा गहरे में हिंसक होती है और प्रेम रहित लोगों को पैदा करती है। उनका पूरा प्रयास होता है कि जीवन में कुछ पाना है- नाम,कीर्ति सब तरह की महत्वाकांक्षाऐं। स्वभावतः उन्हें लड़ना पड़ता है और उसके लिए संघर्षरत रहना पड़ता है। उससे उनका आनंद और उनका मैत्री भाव खो जाता है।
लगता है जैसे हर व्यक्ति पूरे विश्व के साथ  लड़ रहा है।
शिक्षा अब तक लक्ष्य की ओर उन्मुख रही है। तुम क्या सीख रहे हो यह महत्वपूर्ण नहीं है; साल दो साल बाद जो परीक्षा होगी वह महत्वपूर्ण है।
वह भविष्य को महत्वपूर्ण बनाती है- वर्तमान से भी अधिक महत्वपूर्ण।
वह भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाती है और यही तुम्हारी जीवन शैली बन जाती है।
तुम हमेशा इस क्षण को उसके लिए समर्पित करते हो, जो अभी मौजूद ही नहीं है।उससे जीवन में  गहन रिक्तता पैदा हो जाती है।
मेरे विचार से शिक्षा के 5 आयाम होने चाहिए-
पहला आयाम- भाषाओं का ज्ञान
दूसरा आयाम- वैज्ञानिक विषयों की खोज
तीसरा आयाम- जीने की कला
चौथा आयाम- कला और सृजनात्मकता  पांचवा और सबसे महत्वपूर्ण आयाम- मरने की कला

किंतु इससे पूर्व कुछ बातों पर चर्चा आवश्यक है।
एक शिक्षा के अंग की भांति कोई भी परीक्षा नहीं होनी चाहिए किंतु प्रतिदिन प्रत्येक घंटे में शिक्षक निरीक्षण करें, और पूरे वर्ष के दौरान उन्होंने जो टिप्पणी लिखी होगी उससे निर्धारित होगा कि तुम आगे बढोगे या उसी कक्षा में कुछ अधिक समय तक रहोगे।
न कोई अनुत्तीर्ण होगा न कोई उत्तीर्ण होगा,फर्क इतना ही होगा कि कुछ लोगों की गति ज्यादा होगी व कुछ लोगों की थोड़ी कम होगी।
असफलता का ख्याल,हीनता का गहरा भाव पैदा करता है और सफल होने का ख्याल भी एक अलग तरह की बीमारी पैदा करता है, जिसका नाम है-श्रेष्ठता का भाव।
न कोई निकृष्ट है न कोई श्रेष्ठ है।
व्यक्ति सिर्फ स्वयं है-अतुलनीय
इसलिए परीक्षाओं की कोई जगह नहीं होगी।इससे पूरा परिप्रेक्ष्य ही बदलकर भविष्य से वर्तमान में आ जाएगा।तुम  इस क्षण जो ठीक से कर रहे हो वह निर्णायक होगा, साल के अंत में पूछे जाने वाले पांच सवाल नहीं।
इन दो-तीन वर्षों में तुम जिन हजारों चीजों से गुजरोगे, वह हर चीज निर्णायक होगी। तो शिक्षा लक्ष्य केंद्रित नहीं होगी। अतीत में शिक्षक अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि उसे पता था कि वह सब परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुका है।
उसने ज्ञान का संग्रह कर लिया था लेकिन वह परिस्थिति अब बदल गई है। लेकिन समस्या यह है कि परिस्थिति बदल जाती हैं और उसके प्रति हमारे प्रति संवेदन पुराने ही रह जाते हैं।
अब ज्ञान का विस्फोट इतना अधिक हो गया है, इतना विराट और इतना तेज हुआ है कि तुम किसी वैज्ञानिक विषय पर बड़ी किताब नहीं लिख सकते, क्योंकि जब तक तुम्हारी किताब पूरी होगी वह तिथि-बाह्य हो चुकी होगी।
नए तथ्य, नए आविष्कार उसे असंगत कर देंगे तो अब विज्ञान को लेखों पर व पत्रिकाओं पर निर्भर रहना पड़ता है किताबों पर नहीं।
शिक्षक ने  30 साल पहले शिक्षा पाई थी 30 सालों में सब कुछ बदल गया और वह आज भी वही दोहराता रहता है जो उसने 30 साल पहले सीखा था। वह आज तिथि-बाह्य हो गया है और वह अपने विद्यार्थियों को भी तिथि-बाह्य बना रहा है। मेरी दृष्टि में आज शिक्षक के लिए कोई जगह नहीं, शिक्षकों की बजाय आज मार्गदर्शक होंगे।इस फर्क को समझ लेना जरूरी है, मार्गदर्शक तो यही बताएगा कि पुस्तकालय में इस विषय पर नवीनतम जानकारी कहां मिल सकती है। भविष्य में कंप्यूटर अत्यधिक क्रांतिकारी रूप से महत्वपूर्ण सिद्ध होने वाला है। उदाहरण के लिए- विद्यार्थियों को जिस तरह से शिक्षा दी जाती है वह बिल्कुल पुरातन पंथी है,अभी भी वह स्मृति को पुष्ट करने पर निर्भर करता है, और स्मृति पर जितना बोझ ज्यादा डाला जाए,उतनी ही स्पष्टताऔर बुद्धिमत्ता की संभावना कम होती जाती है।
मैं इसे एक बहुत बड़ा अवसर मानता हूं कि सब तरह की जानकारी का संग्रह करने से विद्यार्थियों को मुक्ति मिल सकती है। वे अपने साथ छोटे कंप्यूटर रख सकते हैं जिसमें उनके जरूरत की सभी जानकारी होगी। उससे उनके मस्तिष्क को अधिक ध्यान पूर्ण सुस्पष्ट एवं  निश्चल होने में मदद मिलेगी।
अभी तो उनके मस्तिष्क में व्यर्थ का कूड़ा करकट भरा रहता है।भविष्य में शिक्षा कंप्यूटर और टेलीविजन पर ही केंद्रित होगी क्योंकि पढा हुआ या सुना हुआ इतनी सरलता से खयाल में नहीं रहता है जितना कि देखा हुआ।
कान या अन्य किसी भी साधन की अपेक्षा आंखें कहीं अधिक शक्तिशाली माध्यम है और पढ़ने सुनने में जो बोरियत पैदा होती है वह भी उससे नहीं होती उल्टे टेलीविजन एक आनंद पूर्ण अनुभव बन जाता है।
भूगोल को बड़े ही रंगीन ढंग से पढ़ाया जा सकता है।शिक्षक केवल एक मार्गदर्शक होगा जो तुम्हें उचित चैनल दिखा देगा।तुम्हें कंप्यूटर का उपयोग करना सिखा देगा और यह भी दिखा देगा कि नवीनतम किताब को कैसे खोजना। उसका काम बिल्कुल भिन्न होगा।वह तुम्हें ज्ञान नहीं दे रहा है बल्कि वह तुम्हें समकालीन ज्ञान के प्रति सजग कर रहा है। वह केवल मार्गदर्शक है।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैं शिक्षा को 5 आयामों में बांटता हूं-
पहला आयाम है सूचनात्मक,जैसे इतिहास भूगोल और इस तरह के बहुत से विषय,जिन्हें टेलीविजन और कंप्यूटर द्वारा एक साथ पढ़ाया जा सकता है। लेकिन इतिहास के संबंध में हमें एक आत्यंतिक मूलभूत दृष्टिकोण लेना पड़ेगा अभी तो चंगेज खान,तैमूर लंग नादिरशाह,एडोल्फ हिटलर इत्यादि लोगों से इतिहास बना है।वास्तव में यह हमारा इतिहास नहीं हैं,यह हमारे  दुःस्वप्न हैं। आदमी,आदमी के साथ इतना क्रूर हो सकता है यह ख्याल ही घृणा पैदा करता है।हमारे बच्चों के भीतर ऐसे खयालात नहीं डाले जाने चाहिए।

( शेष दूसरे व अंतिम भाग में)



(दूसरे भाग में जारी)

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