भविष्य में इतिहास के पन्ने केवल उन लोगों से भरे होने चाहिए जिन्होंने इस पृथ्वी ग्रह के सौंदर्य को बढ़ाने में योगदान दिया है।
जैसे- गौतम बुद्ध,सुकरात, जलालुद्दीन रूमी जे.कृष्णमूर्ति,वाल्टर व्हिटमैन, उमर खय्याम, लियो टॉलस्टॉय, मैक्सिम गोरकी,रविंद्र नाथ टैगोर जैसे महान रहस्यवादी विचारक कवि एवं साहित्यकार।
हम अपनी विरासत की भव्यता की शिक्षा दें और जो लोग अब तक ऐतिहासिक दृष्टि से महान माने गए हैं जैसे एडोल्फ हिटलर,मुसोलिनी नेपोलियन, चंगेज खान आदि का उल्लेख केवल टिप्पणियों में हो। उनका स्थान सिर्फ टिप्पणियों में या परिशिष्ट में होना चाहिए। साथ में यह साफ स्पष्टीकरण हो कि या तो यह लोग विक्षिप्त थे या हीनता की ग्रंथि अथवा किसी मानसिक विकार से पीड़ित।
हमें आने वाली पीढ़ियों को इस बात से अवगत करा देना चाहिए कि हमारे अतीत का एक अंधेरा पहलू रहा है जो पूरे अतीत पर हावी रहा है,लेकिन अब उस पहलू के लिए कोई जगह नहीं है।पहले आयाम में भाषाएं भी सम्मिलित हैं। संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 2 भाषाएं तो सीखनी ही चाहिए। एक उसकी मातृभाषा और दूसरी अंग्रेजी जो कि अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान की भाषा है। इन भाषाओं को टेलीविजन आदि के माध्यम से सही ढंग से सीखा जा सकता है,बोलने का अंदाज व्याकरणआदि हर चीज आदमी से अधिक सही ढंग से सिखाई जा सकती है। हम विश्व में एक बंधुता का वातावरण तैयार कर सकते हैं। भाषा लोगों को जोड़ती है और भाषा तोड़ती भी है।
इस समय अंतरराष्ट्रीय भाषा एक भी नहीं है,इसके लिए हमारे पूर्वाग्रह जिम्मेदार है। अंग्रेजी में पूरी क्षमता है क्योंकि पूरे विश्व भर में बहुत बड़े पैमाने पर ज्यादातर लोग इसे जानते हैं।
दूसरा आयाम है वैज्ञानिक विषयों की खोज- यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वास्तविकता का आधा अंग है, बाहरी वास्तविकता का।
वे भी टेलिविज़न और कंप्यूटर द्वारा सिखाई जा सकती हैं परंतु यह भी अधिक जटिल है। इसलिए मानव मार्गदर्शक की ज्यादा जरूरत होगी। तीसरा आयाम वह होगा जिसकी आज की शिक्षा में बेहद कमी है,और वह है जीने की कला।
लोग यह माने बैठे हैं कि वे प्रेम जानते हैं किन्तु वह नहीं जानते, और जब तक वे जानने लगते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। प्रत्येक बच्चे को सिखाया जाए कि अपने क्रोध घृणा और हिंसा को प्रेम में कैसे रूपांतरित किया जाए।तीसरे आयाम का एक महत्वपूर्ण अंग होगा, हास्य व्यंग की समझ।
हमारी तथाकथित शिक्षा लोगों को उदास और गंभीर बनाती है और अगर तुम्हारे जीवन का एक तिहाई हिस्सा विश्वविद्यालय में उदास पर गंभीर होने में व्यतीत हो जाए तो वह तुम्हारे भीतर गहरा खुद जाता है।
तुम हंसी की भाषा भूल जाते हो और जो आदमी हंसी की भाषा भूल जाता है वह जीवन का बहुत कुछ भूल जाता है। तो प्रेम,हंसी और जीवन के आश्चर्य व रहस्य से परिचय, वृक्षों पर चहकते हुए इन पक्षियों का संगीत अनसुना न रह जाये।
इन वृक्षों फूलों और सितारों का तुम्हारे हृदय के साथ कोई नाता जुड़ना चाहिए। यह सूर्योदय और सूर्यास्त केवल बाह्य घटनाएं नहीं होनी चाहिए,वे कुछ आंतरिक भी होनी चाहिये। जीवन के प्रति आदर तीसरे आयाम की बुनियाद होना चाहिए क्योंकि लोग जीवन के प्रति इतने अनादर से भरे हैं।
चौथा आयाम होना चाहिए कला और सृजनात्मकता चित्रकला संगीत हस्तकला कविता पत्थर तोड़ने का काम जो भी सृजनात्मक है वह सब सृजनात्मकता के सब क्षेत्रों से उन्हें अवगत कराना चाहिए,फिर विद्यार्थी चुनाव कर सकते हैं ।
कुछ ही बातें आवश्यक होनी चाहिए जैसे अंतरराष्ट्रीय भाषा का ज्ञान आवश्यक होना चाहिए, तुम्हारी आजीविका कमाने की क्षमता आवश्यक होनी चाहिए, कोई भी एक सृजनात्मक कला आवश्यक होनी चाहिए। सृजनात्मक कलाओं के पूरे इंद्रधनुष चुन सकते हो क्योंकि जब तक आदमी सृजन की कला नहीं जानता तब तक वह अस्तित्व का अंश नहीं बनता,जोकि सतत सृजन कर रहा है। सृजनात्मक होने से आदमी देवत्व को उपलब्ध हो जाता है।सृजनात्मकता एकमात्र प्रार्थना है।
पांचवा और अंतिम आयाम होगा मरने की कला। इस पांचवें आयाम में ध्यान की सब विधियां होंगी ताकि तुम जान सको कि मृत्यु तो होती ही नहीं। ताकि तुम अपने भीतर के शाश्वत जीवन से परिचित हो जाओ।इसे अत्यंत आवश्यक किया जाना चाहिए क्योंकि हर व्यक्ति को मरना है।इससे कोई बच नहीं सकता और ध्यान के विशाल छाते के नीचे तुम्हें झेन ताओ योग हसीद आदि सभी तरह की संभावना है,आज तक रही है। उनसे परिचित कराया जा सकता है।और आज तक शिक्षा ने इसकी फिक्र नहीं की है। आज की शिक्षा निपट मूढ़ता है। हम कुछ भी अर्थपूर्ण नहीं सिखा रहे, लेकिन सारे संसार में यही निरर्थक शिक्षा प्रचलित है ।फिर वह सोवियत संघ हो कि अमेरिका हो या भारत हो,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी ने अधिक संपूर्ण अधिक समग्र शिक्षा की ओर ध्यान ही नहीं दिया है।
इस अर्थ में करीब-करीब हर व्यक्ति जीवन के वृहत्तर क्षेत्र में अशिक्षित हैं। कुछ लोग ज्यादा अशिक्षित हैं कुछ लोग कम लेकिन हर कोई अशिक्षित है। अतः सुशिक्षित आदमी मिलना असंभव है, क्योंकि संपूर्ण शिक्षा नाम की कोई चीज ही नहीं है।भविष्य में इतिहास के पन्ने केवल उन लोगों से भरे होने चाहिए जिन्होंने इस पृथ्वी ग्रह के सौंदर्य को बढ़ाने में योगदान दिया है।
जैसे- गौतम बुद्ध,सुकरात, जलालुद्दीन रूमी जे.कृष्णमूर्ति,वाल्टर व्हिटमैन, उमर खय्याम, लियो टॉलस्टॉय, मैक्सिम गोरकी,रविंद्र नाथ टैगोर जैसे महान रहस्यवादी विचारक कवि एवं साहित्यकार।हम अपनी विरासत की भव्यता की शिक्षा दें और जो लोग अब तक ऐतिहासिक दृष्टि से महान माने गए हैं जैसे एडोल्फ हिटलर,मुसोलिनी नेपोलियन, चंगेज खान आदि का उल्लेख केवल टिप्पणियों में हो। उनका स्थान सिर्फ टिप्पणियों में या परिशिष्ट में होना चाहिए। साथ में यह साफ स्पष्टीकरण हो कि या तो यह लोग विक्षिप्त थे या हीनता की ग्रंथि अथवा किसी मानसिक विकार से पीड़ित।
हमें आने वाली पीढ़ियों को इस बात से अवगत करा देना चाहिए कि हमारे अतीत का एक अंधेरा पहलू रहा है जो पूरे अतीत पर हावी रहा है,लेकिन अब उस पहलू के लिए कोई जगह नहीं है।पहले आयाम में भाषाएं भी सम्मिलित हैं। संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 2 भाषाएं तो सीखनी ही चाहिए। एक उसकी मातृभाषा और दूसरी अंग्रेजी जो कि अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान की भाषा है। इन भाषाओं को टेलीविजन आदि के माध्यम से सही ढंग से सीखा जा सकता है,बोलने का अंदाज व्याकरणआदि हर चीज आदमी से अधिक सही ढंग से सिखाई जा सकती है। हम विश्व में एक बंधुता का वातावरण तैयार कर सकते हैं। भाषा लोगों को जोड़ती है और भाषा तोड़ती भी है।
इस समय अंतरराष्ट्रीय भाषा एक भी नहीं है,इसके लिए हमारे पूर्वाग्रह जिम्मेदार है। अंग्रेजी में पूरी क्षमता है क्योंकि पूरे विश्व भर में बहुत बड़े पैमाने पर ज्यादातर लोग इसे जानते हैं।
दूसरा आयाम है वैज्ञानिक विषयों की खोज- यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वास्तविकता का आधा अंग है, बाहरी वास्तविकता का।
वे भी टेलिविज़न और कंप्यूटर द्वारा सिखाई जा सकती हैं परंतु यह भी अधिक जटिल है। इसलिए मानव मार्गदर्शक की ज्यादा जरूरत होगी। तीसरा आयाम वह होगा जिसकी आज की शिक्षा में बेहद कमी है,और वह है जीने की कला।
लोग यह माने बैठे हैं कि वे प्रेम जानते हैं किन्तु वह नहीं जानते, और जब तक वे जानने लगते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है। प्रत्येक बच्चे को सिखाया जाए कि अपने क्रोध घृणा और हिंसा को प्रेम में कैसे रूपांतरित किया जाए।तीसरे आयाम का एक महत्वपूर्ण अंग होगा, हास्य व्यंग की समझ।
हमारी तथाकथित शिक्षा लोगों को उदास और गंभीर बनाती है और अगर तुम्हारे जीवन का एक तिहाई हिस्सा विश्वविद्यालय में उदास पर गंभीर होने में व्यतीत हो जाए तो वह तुम्हारे भीतर गहरा खुद जाता है।
तुम हंसी की भाषा भूल जाते हो और जो आदमी हंसी की भाषा भूल जाता है वह जीवन का बहुत कुछ भूल जाता है। तो प्रेम,हंसी और जीवन के आश्चर्य व रहस्य से परिचय, वृक्षों पर चहकते हुए इन पक्षियों का संगीत अनसुना न रह जाये।
इन वृक्षों फूलों और सितारों का तुम्हारे हृदय के साथ कोई नाता जुड़ना चाहिए। यह सूर्योदय और सूर्यास्त केवल बाह्य घटनाएं नहीं होनी चाहिए,वे कुछ आंतरिक भी होनी चाहिये। जीवन के प्रति आदर तीसरे आयाम की बुनियाद होना चाहिए क्योंकि लोग जीवन के प्रति इतने अनादर से भरे हैं।
चौथा आयाम होना चाहिए कला और सृजनात्मकता चित्रकला संगीत हस्तकला कविता पत्थर तोड़ने का काम जो भी सृजनात्मक है वह सब सृजनात्मकता के सब क्षेत्रों से उन्हें अवगत कराना चाहिए,फिर विद्यार्थी चुनाव कर सकते हैं ।
कुछ ही बातें आवश्यक होनी चाहिए जैसे अंतरराष्ट्रीय भाषा का ज्ञान आवश्यक होना चाहिए, तुम्हारी आजीविका कमाने की क्षमता आवश्यक होनी चाहिए, कोई भी एक सृजनात्मक कला आवश्यक होनी चाहिए। सृजनात्मक कलाओं के पूरे इंद्रधनुष चुन सकते हो क्योंकि जब तक आदमी सृजन की कला नहीं जानता तब तक वह अस्तित्व का अंश नहीं बनता,जोकि सतत सृजन कर रहा है। सृजनात्मक होने से आदमी देवत्व को उपलब्ध हो जाता है।सृजनात्मकता एकमात्र प्रार्थना है।
पांचवा और अंतिम आयाम होगा मरने की कला। इस पांचवें आयाम में ध्यान की सब विधियां होंगी ताकि तुम जान सको कि मृत्यु तो होती ही नहीं। ताकि तुम अपने भीतर के शाश्वत जीवन से परिचित हो जाओ।इसे अत्यंत आवश्यक किया जाना चाहिए क्योंकि हर व्यक्ति को मरना है।इससे कोई बच नहीं सकता और ध्यान के विशाल छाते के नीचे तुम्हें झेन ताओ योग हसीद आदि सभी तरह की संभावना है,आज तक रही है। उनसे परिचित कराया जा सकता है।और आज तक शिक्षा ने इसकी फिक्र नहीं की है। आज की शिक्षा निपट मूढ़ता है। हम कुछ भी अर्थपूर्ण नहीं सिखा रहे, लेकिन सारे संसार में यही निरर्थक शिक्षा प्रचलित है ।फिर वह सोवियत संघ हो कि अमेरिका हो या भारत हो,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी ने अधिक संपूर्ण अधिक समग्र शिक्षा की ओर ध्यान ही नहीं दिया है।
इस अर्थ में करीब-करीब हर व्यक्ति जीवन के वृहत्तर क्षेत्र में अशिक्षित हैं। कुछ लोग ज्यादा अशिक्षित हैं कुछ लोग कम लेकिन हर कोई अशिक्षित है। अतः सुशिक्षित आदमी मिलना असंभव है, क्योंकि संपूर्ण शिक्षा नाम की कोई चीज ही नहीं है।
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