विदुर नीति महाभारत में वर्णित एक अद्भुत नीति ग्रन्थ है। इसके एक एक श्लोक में ज्ञान एवं चिंतन के अद्भुत अमृत कणों के समावेश किया गया है। यद्यपि यह धृतराष्ट्र को सन्मार्ग पर लाने के लिए कही गयी है पर यह कालजयी चिंतन सदैव ही प्रासंगिक है। संस्कृत भाषा एवं क्लिष्ट भाषानुवाद के कारण यह सर्व ग्राह्य नहीं हो पाती है। इस सम्पूर्ण विदुर नीति को हमने खड़ी बोली के उन छंदों में बांधने का एक बाल- प्रयास किया है, जिन छंदों का प्रयोग प्राचीन स्वांग-भगत-नौटंकी शैली में होता रहा है। ये हैं-दोहा,रोला, चौबोला,दौड़ व तबील आदि...!! प्रबुद्ध जन इसमें समालोचनात्मक टिप्पणी देंगे तो हमें इन्हें सुधारने सीखने का और अवसर मिलेगा। दूसरी श्रृंखला के रूप में इसे प्रारम्भ कर रहे हैं अपने सभी प्रिय मित्र गणों के स्नेह प्रेम आशीर्वाद की अपेक्षा के साथ....💐💐 जय श्री राधे राधे
प्रथम-अध्याय
1.द्वारपाल से विदुर को,बुलवाते धृतराष्ट्र।
काम बिगड़ता दिख रहा खतरे में है राष्ट्र।।
(छंद दोहा)
खतरे में है राष्ट्र,विदुर उसको सम्हाल पावेंगे।
कुरुवंशी उपकार मान कर यश कीरति गावेंगे।।
दूत विदुर से जाकर बोला,नृप दरबार लगाते।
कुछ सलाह लेनी है जिस कारण हैं तुम्हें बुलाते।। (छंद चौबोला)
शीघ्र दरबार पधारें, शोक से उन्हें उबारें,
एक बार सम्मुख जा कर कुछ नीति विचार उचारें।। (छंद दौड़)
कह रहे हैं विदुर तुम ही आगे चलो,
पीछे पीछे तुम्हारे ही आता हूँ मैं।
भाई पर कष्ट की जो घड़ी आ पड़ी,
कृष्ण-किरपा से उसको हटाता हूँ मैं।।
है समय देश पर ये मुसीबत भरा,
इस बुराई को जड़ से मिटाता हूँ मैं।
नीति से ज़िंदगी में,नहीं कुछ बड़ा
न्याय और धर्म जा कर बताता हूँ मैं।।
(छंद तबील)
2.द्वारपाल सुन बात यह गया नृपति दरबार।
विदुर आ रहे हैं यहां, कह के किया 'जोहार'।
(दोहा-छंद)
कह के किया जोहार, विदुर चरणों के दर्शन चाहें। महाराज उनको आज्ञा दें अपना प्रेम निबाहें।।
कहन लगे धृतराष्ट्र, विदुर जब चाहे यहां पधारे
महा ज्ञान के रूप सदा ही खुले हृदय के द्वारे।।(रोला-छंद)
विदुर हैं सबसे काबिल।
विदुर से जुड़ा हुआ दिल।।
खुशी होगी उनसे मिल।।
मुझसे मिलनेमें उनको हैनहीं कभी-भी मुश्किल।।
(दौड़-छंद)
तुमको भीतर बुलाते हैं राजा अभी
जा के अंतः भवन में ही मिल आइए।
कर नमन भ्रात को, बोले ज्ञानी विदुर
याद कैसे किया, मुझको बतलाइए।।
है जो आशीष मुझको मिला आपसे,
काम क्या मैं करूं मुझसे कह जाइए।
आजकल हाल क्या है महाराज का,
है भला या बुरा मुझको समझाइए।।
(तबील छंद)
3.संजय ने आकर मुझे बातें कहीं कठोर।
वचन युधिष्ठिर के यहां गूंजेंगे हर ओर।
(दोहा-छंद)
गूंजेंगे हर ओर यहां जब कल दरबार लगेगा।
धर्म युक्त उन वचनों को सारा दरबार सुनेगा।।
यह विचार ही आज मेरे अंगों को अधिक जलाते। एक युधिष्ठिर घूम रहा,आंखों में आते जाते।।
(रोला-छंद)
मुझे कुछ राह दिखाओ।
ज्ञान की बात बताओ।।
चित्त मेरा सुलझाओ।।
धर्म ज्ञान और राजनीति की गंगा यहां बहाओ।।
(दौड़-छंद)
चिंता से चित्त मेरा जला जा रहा,
नींद आंखों से मानो हवा हो गई।
किसमें कल्याण है, क्या भला या बुरा,
बुद्धि निर्णय की मेरी कहीं खो गई।।
मात्र तुम जानते ज्ञान और नीति को,
धर्म चिंतन में सबसे बड़े हो तुम्ही।
जिंदगी में कहां भूल हमसे हुई
निर्णयों में कहां रह गई है कमी।।
(तबील छंद)
4.सभी इंद्रियों हैं विकल अति अशांत है चित्त।
दोष मुझे सब दे रहे, मैं ही बना निमित्त।।
(छंद दोहा)
मैं ही बना निमित्त , दोष मेरे ही सिर पर सारा।
किस से दुख बतलाऊँ, मेरा कोई नहीं सहारा।। चिंतामन में यही कि यह, संसार मुझे धिक्कारे।
मेरे कारण अनुज पुत्र, फिरते हैं मारे मारे।।
( छंद रोला)
विदुर तब आगे आए,
नीति के वचन सुनाए,
नृपति बहु विधि समझाये।
जग में जीवन जीने के बहु-पंथ सहज बतलाए।।
(छंद दौड़)
रात में जागता चोर या लम्पटी,
या लुटेरा जगे लूट की घात में।
वासना कीट कामुक भी जागा करें
हीन धन से हुआ, तो जगे रात में।।
आपने भी कहीं कुछ गलत है किया,
हक किसी का कहीं छीन तो ना लिया।
दोष ऐसा ही कोई बना आपसे,
नींद से मुक्त आंखों को जिसने किया।।
(तबील)
5.कहन लगे धृतराष्ट्र- "तुम धीर,भक्त, विद्वान।
बातें कुछ ऐसी कहो, जिससे हो कल्याण।
(छंद दोहा)
जिससे हो कल्याण धर्मयुत उत्तम वचन सुनाओ। राजवंश के माननीय! मुझको सुख शांति दिलाओ।। कहें विदुर-"महाराज! युधिष्ठिर हैं गुणज्ञ और ज्ञानी।
तीन लोक स्वामी बन सकते उनकी कदर न जानी।
(छंद रोला)
भेज दीन्हे वो वन में,
रहम नहीं आया मन में,
संत मन कर्म वचन में।
अंधे थे, पहचान न पाए, विष घोला जीवन में।।
(छंद दौड़)
धर्म के आप ज्ञाता महाराज हो,
अंधी आंखों से सच को मिटाने लगे।
पुत्र के मोह में भाव विपरीत रख,
उनके हक को ही झूठा बताने लगे।
राज्य उनका लिया,जो दया धर्म की-
मूरती और पराक्रम की जो खान थे।
क्रूर थे वो नहीं, पूजते आपको
आप की चालबाजी से अनजान थे।।
(छंद तबील)
6.सद्गुण के कारण सहे, चुप से सभी कलेश।
प्रेम न वो झूठा रखें, आदर करें विशेष।।
(दोहा छंद)
आदर करें विशेष,आप से कपट द्वेष नहीं मन में। किंतु विष भरा कर्ण शकुनि दुर्योधन दुशासन में।। आप चाहते यश वैभव दुष्टों का पकड़ सहारा।
राज्य भार इनको देकर अपना भवितव्य बिगाड़ा।।
(रोला छंद)
सुनो गुण पंडित जन के,
आत्मज्ञानी चिंतन के,
कर्म उद्योगी तन के।
दुख सहन कर धर्म बचावें पंडित प्रिय जनजन के।
(दौड़ छंद)
अच्छे कामों को करता, बुरे काम से-
दूर रहता है, श्रद्धा से जो है भरा।
ईश की शक्ति को मानता है सदा,
वो ही पंडित जिसे ईश का आसरा।।
जिसका पुरुषार्थ स्थिर है पंडित वही
हर्ष उद्दंडता गर्व से ना डिगे।
क्रोध लज्जा से पुरुषार्थ जिसका कभी,
ना गिरे, भाग अवनति का चित ना जगे।।
(तबील छंद)
7.निज कर्तव्य सलाह और, गोपन रखे विचार।
सिद्धि पूर्व जाने नहीं, पंडित का व्यवहार।
(दोहा छंद)
पंडित का व्यवहार सिद्धि से पूर्व न कोई जाने। पंडित क्या करने वाला है, कोई ना पहचाने।।
लौकिकबुद्धि धर्म और धन का करे अनुसरण
अनु दिन।
भोग त्याग,पुरुषार्थ वरण ही है पंडित का चिंतन।।
(रोला छंद)
दीनता या संपत्ति,
प्रेम अनुराग विरक्ति,
ग्रीष्म-सर्दी की शक्ति।
यह बातें पंडित के जीवन का अवरोध न बनती।।
(दौड़ छंद)
ज्ञान से युक्त जिनका हृदय है सदा
काम करने कि जिन को सदा चाह है।
काम करते हैं शक्ति लगाकर तथा
छोटी बातों की भी उनको परवाह है।।
बात को देर तक,सुनते हैं ध्यान से,
शीघ्र समझें तथा कार्य को साध लें।
व्यर्थ बातें किसी के लिए ना करें,
सच्चे पंडित हृदय ज्ञान से बांध लें।।
(तबील छंद)
8.दुर्लभकी नहींकामना,नहीं विगतका शोक।
डरते नहीं विपत्तिसे,रखते मन पर रोक।।
(दोहा)
रखते मनपर रोक समयको व्यर्थन जाने देते।
प्रथम हृदयमें निश्चयकर जबकार्य शुरू कर लेते।।
एक बार जोकार्य शुरूहो फिर ना उसको रोकें।
उन्नतिके शुभकार्यकरे, सज्जनको कभी न टोकें।।
(रोला)
रखे रुचि श्रेष्ठ कर्म में,
सदा रत है स्वधर्म में,
भाव रखते सुकर्म में।
भूले से भी लिप्त नहोता जिनका मन अधर्म में।।
(दौड़)
उनका आदर करो,हर्ष करते नहीं
और अनादर से संताप करते नहीं।
गंग की धार सा रखते निर्मल हृदय,
चित्त में क्षोभ के भाव भरते नहीं।।
हर पदारथ का ज्ञान उनको होता सदा,
काम करने की विधि के वह ज्ञाता बड़े।
संकटों में उपायों के ज्ञाता रहें,
पंडितों की सभा में हैं आगे खड़े।।
(तबील)
9.जिनकी वाणीका कभीरुकता नहीं प्रवाह।
तर्क निपुण प्रतिभाभरी, पंडित की हर राह।।
(दोहा)
पंडितकी हर राह, बातकरनेकी विधि वह जाने।
अर्थ भाव का रखें ज्ञान,जग उसको पंडित माने।।
विद्या जिसकी बुद्धियुक्त हो, बुद्धिजुड़े विद्या से।
मर्यादा लांघे नहीं पंडित,आदृत हो प्रतिभा से।।
(रोला)
गर्व, बिन-ज्ञान करे जो,
बिना श्रम व्यर्थ मरे जो.
पराया कर्म करे जो।
वो मूरख है, निर्धनता में ऊंची चाह रखे जो।।
(दौड़)
मित्र के संग करे जो असद आचरण,
चाहने वालों को त्याग देता सदा।
जो न चाहे उसे, उसके पीछे लगे,
वैर बलवान से, मुफ्त की आपदा।।
शत्रुओं को बनाता है अपना हितू,
और हितैषी को जो शत्रु है मानता।
मूढ़ होता वही, काम करता बुरे,
शत्रु और मित्र अंतर न पहचानता।।
(तबील)
10.कार्य शीघ्र जो हो सके उनमें करता देर।
सभी जगह संदेह रख, बढे काम का ढेर।।
(दोहा)
बढे काम का ढेर, मूढ़ का काम बने फैलारा।
विमुख श्राद्ध-पूजन से,है शब्दों का नहीं सहारा।। बिना बुलाए आ जाए, बिन-पूछे बात बताता।
सहज करें विश्वास बिना मांगे सलाह दे जाता।।
(रोला)
स्वयं जो दोषी होता,
दोष दूजों पर ढोता,
कटु वचन से विष बोता।
हो असमर्थ क्रोध करता, मूरख जीवन भर रोता।।
(दौड़)
बल को जाने बिना काम करने लगे,
धर्म और अर्थ का लाभ पाता नहीं।
इच्छा उसकी करे, जिसका पाना बुरा,
मूढ़ बुद्धि कभी सुख वो पाता नहीं।
करता आराधना शून्य की ही सदा,
और कृपण की शरण में जो आकर पड़े।
हर अनधिकारी को देता उपदेश जो,
उस से बढ़कर न मूरख जगत में बड़े।।
(तबील)
11.धन विद्या ऐश्वर्य का रखे न मन अभिमान।
सरल संत चित् सहज जो, सच्चा पंडित मान।।
(दोहा)
सच्चा पंडित मान, करे जो आश्रित जन का पोषण। उत्तम भोजन वस्त्र अकेले, यह आश्रितका शोषण।। एक पाप करता तो उससे बीसों मौज उड़ाते।
मौज उड़ाते वो बच जाते कर्ता पाप कमाते।।
(रोला)
कोई इक बाण चलाये,
निशाने पर लग जाए,
चूक भी शायद जाए।
बुद्धिमान हो यदि कु-बुद्धि तो देश नष्ट हो जाए।।
(दौड़)
एक बुद्धि से दो कार्य निश्चय करे,
करना क्या है उचित?क्या है करना नहीं?
चारों नीति को जो साध कर चल पड़े,
शत्रु मित्र औ उदासीन वश में यहीं।।
पंच इंद्रियजयी, षड गुणों को गहें,
संधि-विग्रह यानासन द्वैधी भाव है।
समाश्रय रूप छह गुण रखे चित्त में,
लगता उसका सदा ही सही दांव है।।
(तबील)
12. जुआ,मद्य,दारागमन, कड़वे वचन, शिकार।
अन्यायी-धन, दंड बहु, सुखी होय निस्तार।
(दोहा)
सुखी होय निस्तार, जहर,पीने वाले को मारे।
शस्त्र लगे जिसको,वह केवल उसको ही संघारे।।
किंतु मंत्र यदि गुप्त न हो, और पहुंच सभीतक जाये।
राजा के संग राष्ट्र, प्रजा तीनों का नाश कराये।।
(रोला)
अकेले करे ना भोजन,
अकेले होए न चिंतन,
अकेले नहीं पथ-गमन।
सभी लोग सोवें तो मत करिए जगने का चिंतन।।
(दौड़)
पार करना हो सागर, तो नौका चले,
सत्य केवल, यहां स्वर्ग-सोपान है।
बाकी सब तो समझ पा रहे हैं इसे,
आपको किंतु अब तक नहीं ज्ञान है।।
है क्षमाशील जो, वो न होता गलत,
एक ही दोष आता सदा ध्यान है।
है क्षमा-भाव युत व्यक्ति, कायर लगे,
चाहे जितना यशस्वी या बलवान है।।
(तबील)
13.क्षमा मनुज की श्रेष्ठता,इसे न माने दोष। असमर्थोंका गुण क्षमा,समरथ का धन-कोश।।
(दोहा)
समरथ का धन-कोश क्षमा है वशीकरण की माया।
क्षमा रत्न जिसके हाथों में, उसने सब कुछ पाया।।
शांति रूप तलवार हाथ में लिए हुए जो चलता।
दुष्ट विफल सब उसके आगे, आगे चले सफलता।।
(रोला)
घास जहां नजर ना आती,
आग खुद ही बुझ जाती,
न किंचित वह बढ़ पाती।
क्षमाहीनता, खुद दूजों संग सबको दोष दिलाती।
(दौड़)
धर्म कल्याणकारी है मारग यहां,
और क्षमा शांति पाने का साधन बड़ा।
विद्या देती है सुख, जिस पे विद्या रहे,
और अहिंसा से संतोष मोती जड़ा।।
मेंढकों को यहां सांप खाता है ज्यों,
ऐसे धरती भी दो को निगल जाएगी।
शत्रु का जो विरोधी न हो राजा, और
देशवासी हो द्विज,इनको ठुकराएगी।।
(तबील)
14.दुष्टों का आदर नहीं,सज्जन से नहीं द्वेष।
वही मनुज इस लोक में,शोभा रखें विशेष।।
(दोहा)
शोभा रखे विशेष, न वाणी कभी कठोर उचारे।
दुष्ट जनों से दूरी रखते वे हैं सबके प्यारे।।
पर स्त्री द्वारा पूजित नर,कभी नहीं स्वीकारे।
गैरों से सम्मानितजन पर, कभी ना खुदको वारे।।
(रोला)
गैर पर प्रेम जताया,
गैर को शीश चढ़ाया,
सहजसंबंध बढ़ाया।
दूजों पर विश्वास किया तो जीवन व्यर्थ गँवाया।।
(दौड़)
पास में धन नहीं चाह ऊंची रखे,
हीन-सामर्थ्य भी, क्रोध कर डालता।
नष्ट कायाको कर दें ये कांटे बड़े,
मूढ़ अनजाने में कष्ट ही पालता।।
वह गृहस्थी, जो कर्मों को है भूलता,
ऐसा साधु, प्रपंचों में जो है पड़ा।
शोभा पाते नहीं दोनों दुनिया में ये,
काम विपरीत,दलदल में करदे खड़ा।।
(तबील)
15.शक्ति युक्त ,कर दे क्षमा,निर्धन हो, दे दान।
ऐसे दो गुणवान का स्वर्गोपरि स्थान।।
(दोहा)
स्वर्गोपरि स्थान,न्याय के धन की दो विकृतियां।सच्चेयाचक को न गाय,औरदे कुपात्र को बछिया।। योग्य पात्र को दान नहीं,जो जन अयोग्य को पाले। धन का यहउपयोग नहीं, शुभकर्म यही है काले।।
(रोला)
धनी हो दान न देवे,
सदा स्वारथ को सेवे,
दरिद हो,चाहे मेवे।
बांध गले पत्थर ऐसे को, जल डुबाय ही देवे।।
(दौड़)
योगधारी यती, ऊर्ध्व पावे गती,
युद्ध में जो मरे उसकी कीरति बढ़ी।
कार्य सिद्धि के हित, श्रेष्ठ मध्यम अधम,
तीन बातें सदा सामने हैं खड़ी।।
श्रेष्ठ उत्तम अधम तीन जन है यहां,
योग्य कामों में इनको लगाए रखें।
दास, सुत और तिया,धन के स्वामी नहीं,
जिसके आधीन ये, वोही फल को चखें।।
(तबील)
16.पर-स्त्री संसर्ग और सुहृद मित्र का त्याग।
पर-धन हरण कुकर्म ये,तीन लगाते आग।।
तीन लगाते आग, काम अरु क्रोध-लोभ जीवन में। आत्म नाश के तीन द्वार का, त्याग रखे चिंतन में।। राज्य-प्राप्ति,सुत-जन्मऔर वरदान किसीसे मिलना शत्रु कष्ट से मुक्ति हो, इससे न किसी की तुलना।
(धृतराष्ट्र)
भक्त सेवक मैं तेरा,
मुझे संकट ने घेरा
हुआ जीवन अंधेरा।
शरणागत का साथ ना छोड़े,यही लक्ष्य हो तेरा।।
(विदुर)
थोड़ी बुद्धि रखे,आलसी हो तथा
जल्दबाजी में जो काम करता रहे।
स्तुति से हो खुश,चापलूसी रखे,
उससे बातें जरूरी कभी ना कहे।।
त्यागने योग्य हैं इनको पहचान लें,
ये सलाहों को लेने के लायक नहीं।
आप ये जान लें, इनसे दूरी रखें,
इन पे अंधा भरोसा तो करना नहीं।।
(तबील)
17.घर में रहने चाहिए चार भांति के लोग।
ऊंचे-कुल का व्यक्ति औ धन से हुआ वियोग।।
(दोहा)
धन से हुआ वियोग और संतानहीन जो बहिना। निर्धन-मीत,कुटुंबी-बूढ़ा सदा संग ही रहना।।
प्रश्न इंद्र ने किया बृहस्पति ने उत्तर जो दीन्हा।
चार कर्म तत्काल फलद है जिन्हें इंद्र ने चीन्हा।।
(रोला)
श्रेष्ठ संकल्प बताया
इंद्र के मन को भाया
बृहस्पति ने समझाया।
बुद्धि शक्ति नम्रता इंद्र के हिरदै सहज समाया
(दौड़)
देव संकल्प और बुद्धि की शक्ति जो,
ज्ञानियों पे प्रभावी हमेशा रहे।
ज्ञान जिसको मिले, नम्रता साथ हो,
पापियों का विनाशी, ये दुनिया कहे।।
चार कामों को जानो जरा ठीक से,
गर वो होवें सही, दूर भय को करें।
किंतु उनको सही से न कर पाए जो,
घोर संकट घिरें,जीते जी वो मरें।।
(तबील)
18. अग्निहोत्र नियमित तथा रखें मौन सम्मान। आदर युत स्वाध्याय हो,और यज्ञानुष्ठान।।
(दोहा)
और यज्ञानुष्ठान, पंच अग्नि की करिए सेवा।
पिता,जननी,गुरु,अग्नि,आत्मा पूजित सुखके देवा।। देव,पितृ,मानव,सन्यासी और अतिथि की पूजा। यश पाने का, इससे बढ़कर, है उपाय ना दूजा।।
मित्र,शत्रु,आश्रय दाता और आश्रय पाने वाले, उदासीन,यह पांच सदा पीछे ही रहने वाले।।
(रोला)
पांच ज्ञानेंद्रियां व्यक्ति को साध कर
श्रेय की प्राप्ति के हित बढ़ाएं चलें।
एक इंद्रिय अगर दोषयुत हो गई,
बुद्धि जलधार सी यह बहाए चलें।।
उन्नती चाहते,नींद को कम करें,
ऊंघना और आलस्य भरना नहीं।
देर से काम करने की आदत तजें,
क्रोध करना नहीं और डरना नहीं।।
(तबील)
19.रक्षा करने में यहां जो राजा असमर्थ।
ज्ञान न दें आचार्य जो, इनका जीवन व्यर्थ।।
(दोहा)
इनका जीवन व्यर्थ,कटु वचन कहने वाली नारी। मंत्र उच्चारक नहीं अगर, वह 'होता' है बेकारी।।
(होता-अर्थात यज्ञ कराने वाला पुरोहित)
ग्राम निवास चाहता जो, वो नहीं काम का ग्वाला। जंगल में रहने वाले नाई का पिटे दिवाला।।
(रोला)
सदा इन छह को त्यागें,
न किंचित भी अनुरागें,
कोस भर रहना आगे।
ज्यों सागरका पथिक फ़टे पालोंकी नाव न मांगे।।
(दौड़)
सत्य से,दान से,धैर्य से,और क्षमा-
-भाव रखकर जगत जीत पाओगे तुम।
दोष देखोगे गुण में न तुम, तो सदा
गीत खुशियों के ही रोज गाओगे तुम।।
नित्य नीरोग, धन की प्रचुरता रहे,
स्त्री अनुकूल मन की जो पाओगे तुम।
पुत्र आज्ञा सुनें, धन से विद्या मिले
छह सुखों से जगत जीत जाओगे तुम।।
(तबील)
20. मन में रहते शत्रु छह,काम मोह मद लोभ। क्रोध तथा मात्सर्य से मन में रहता क्षोभ।।
(दोहा)
मन में रहता क्षोभ जितेंद्रिय भी पापी बन जाता। कोटि अनर्थ उपजते सँग में, मनुज नष्ट हो जाता।।
छह प्रकार के लोग जीविका छह से सदा कमाते। चोर लूटते उन्हें कि जो,नहिं सावधान रह पाते।।
(रोला)
वेद रोगी को लूटें,
पुरोहित पैसा कूटें,
नारी कामी पर टूटें।
राजा न्याय करें तब लूटें, यह है कड़वी घूँटें।।
(दौड़)
ज्ञानी की जीविका, मूर्खों से चले,
सारे जग में यही नीति का सार है।
गाय-सेवा औ विद्या, तिया, खेती, देखे बिना
होती बिल्कुल ही बेकार है।।
शूद्र को संग ले कर रहे घूमता,
ऐसा मानव पतित रूप होता यहां।
कर्म पर दृष्टि रख काम करता रहे,
दाने सुख के हृदय में पिरोता यहां।।
(तबील)
21. छह प्राणी जग में रखें,बस मतलब से काम।
काम बने तो त्याग दें, भाव नहीं निष्काम।।
(दोहा)
भाव नहीं निष्काम, विवाहितसुत,छोड़े माता को। शिक्षा पूरी हुई, त्यागता शिष्य गुरु ज्ञाता को।। कामवासना छंटे, पुरुष त्यागे फिर प्रिय दारा को। नाव छोड़ता व्यक्ति, पार कर के दुर्गम धारा को।।
रोग मुक्त होकर रोगी फिर अपना वैद्य भुलाए। सेवक याद रहे न कभी,जब कार्य सिद्ध हो जाए।।
(रोला)
छह सुखों को पहचानो,
हृदय में सच्चा मानो,
पूर्णता इनमें जानो।
इन छह सुख को पानेका, दृढ़लक्ष्य हृदयमें ठानो।।
(दौड़)
रोग तन में नहीं, चिंता मन में नहीं,
कर्ज सिर पर चढ़ा जो किसी का नहीं।
अच्छे लोगों से मिलना, बने रात दिन,
जीविका पा रहा देश में जो यहीं।।
मन को अच्छी लगे वृत्ति मन की मिले,
संकटों में न किंचित भी शंका करें।
जो निडर हो- रहें, कर्मयोगी वही,
पूर्ण सुख पाके जीवन को सुरभित करें।।
22.सदा दुःखी पीड़ित रहें, छह प्राणी संसार।
कभी न सुख इनको मिले,जीवन बनता भार।।
(दोहा)
जीवन बनता भार, घृणा ईर्ष्या जो रखने वाला।
असंतोषसे भरा,क्रोध-युत और शंकितमन वाला।।
सदा दूसरों के आश्रित हो, समय बिताने वाला।
सदा दुःखी संतप्त रहे, जग में होता मुंह काला।।
(रोल)
शिकारी और जुआरी,
सदा ताकै परनारी,
न बोलें वचन सम्हारी।
घोर मद्यपी तथा दंड में जो कठोरता धारी।।
(दौड़)
धन को उपयोग जो ढंग से कर ना सकै,
ऐसे सातों को, तत्क्षण ही राजा तजे।
इनसे दूरी रखे तो भलाई बड़ी,
ताज धरती पड़ें, जो थे सिर पे सजे।
आठ ऐसी निशानी बताऊं तुम्हें,
जिनसे भावी विनाशों का भी ज्ञान हो।
दोष ऐसे हैं प्राणी के नाशक बड़े,
वो नृपति,रंक, दानी या धनवान हो।।
(तबील)
23.ब्राह्मण से रख द्वेष जो, संतत करे विरोध।
धन हड़पे जो विप्र का,करे मृत्यु का शोध।।
(दोहा)
करे मृत्यु का शोध,बुराई कर आनंद मनाता।
सुने प्रशंसा कभीन उनकी, मख में उन्हेंभुलाता।।
मांगे कुछ यदि विप्र, हमेशा उनमें दोष निकाले।
बुद्धिमान, इनको अपनी नज़रों से दूर हटा ले।।
(रोला)
मित्र का आकर मिलना,
पुत्र छाती से लगना,
निकट हो सुंदर ललना।
धन पाना,अपनोंमें उन्नति,मुख मधु-वचन निकलना
(दौड़)
हमने चाहा जिसे वो सहज आ मिले,
कीर्ति जग में बढ़े, और सम्मान हो।
आठ बातें यहाँ, हर्ष का सार हैं,
सुख के साधन ये, इनका सदा गान हो।।
ख्याति लाते है जो गुण जगत में सदा,
अष्ट गुण श्रेष्ठ, तुमको बताते हैं हम।
नीति के ये वचन, जग में जाने गए,
ज्ञान के सुप्त तंतु, जगाते हैं हम।।
(तबील)
24.इंद्रिय निग्रह पराक्रम, बुद्धि शास्त्र का ज्ञान। कृतज्ञता और मौन रख, यथाशक्ति दे दान।।
(दोहा)
यथाशक्ति दे दान,श्रेष्ठ कुल के संस्कार सजाते।
यही आठगुण मानवकी इस जगमें ख्याति बढ़ाते।। नेत्र,कर्ण,नासिका,नाभि,मुख,शिश्न,गुदा नौ द्वारे ।वात,पित्त,कफ के खंभों पर काया ईश संभारे।।
(रोला)
पंच ज्ञानेंद्रिय धारे,
आत्म का भवन बना रे!
कांच सी यह काया रे!
इस शरीर रूपी ग्रह को ज्ञानी ही जान सका रे!!
(दौड़)
मद में अंधा,थका,क्रोध से जल रहा,
लोभी,पागल व भूखा औ कामी है जो।
जल्दबाजी करे और सजग ना रहे,
भय से कम्पित है इनकी न संगत करो।
राजा प्रह्लाद ने पुत्र को था कभी,
ज्ञान नीति का उपदेश खुद,जो दिया।
नीति ज्ञाता उसे आज भी मानते,
आगे छंदों में उसको है बतला दिया।।
(तबील)
25.राजा जो सच्चा, करे काम क्रोध का त्याग।
सत पात्रों को दान दे जाने सभी विभाग।।
(दोहा)
जाने सभी विभाग,शास्त्रका हो अति उत्तम ज्ञाता। शीघ्र करे कर्तव्य, स्वयं जग में प्रमाण बन जाता।।
प्रजा जनों का विश्वासी, जो दंड नीति पहचाने।
जब अपराध सिद्ध होवे,तब हीअपराधी माने।
(रोला)
दंड देना है कितना,
अधिक या थोड़ा जितना,
क्षमा किसको है करना।
श्रेष्ठ नृपति को देती लक्ष्मी, सारी निज संरचना।
(दौड़)
दुर्बलों का जो अपमान करता नहीं,
शत्रु से बुद्धियुत करता व्यवहार जो।
युद्ध बलवान से जाके ठाने नहीं,
संकटों से नहीं मानता हार जो।।
श्रेष्ठ राजा वही,वक्त को देखकर,
जो पराक्रम करे,शत्रु को जय करे।
धीरता-वीरता के गुणों को रखे,
शत्रु के चित्त में जो , सदा भय भरे।।
26. आपद में दुख ना करें,सतत करें उद्योग।
सहन करे दुख, तो बने शत्रु नाश का योग।।
(दोहा)
शत्रु-नाश का योग,निरर्थक जो परदेश न रहता। दुष्टों से रखता न मेल, पर-दारा संग न करता।। चोरी और पाखंड, चुगलखोरी से रखता दूरी। मदिरापान कभी न करें, सुख इच्छा होती पूरी।।
(रोला)
क्रोध में कर्म करे ना,
क्रोध में धर्म करे ना,
क्रोध में अर्थ रखे ना।
पूछो तो सच बतलाता, मित्रों से कलह करे ना।
(दौड़)
होवे आदर न तो, क्रोध करता नही,
सब पे रखता दया,दोष-दर्शन नहीं।
जो है स्थिर-विवेकी सहज भाव से,
बढ़ के बातें कभी भी जो करता नहीं।।
उसमें क्षमता नहीं, तो जमानत न दे,
हर विवादों को करता सहन वो सदा,
सबसे पाता प्रशंसा लगे प्रिय सदा,
दूर उससे रहे कष्ट और आपदा।।
(तबील)
27. वेश नहीं उद्दंड सा,नहीं शक्ति की डींग।
नहीं क्रोध में कटु वचन, बढें प्यार की पींग।।
(दोहा)
बढें प्यार की पींग, वैर कीआग न जो भड़काए।
गर्व नहीं, हीनता नहीं, दीनता नहीं दिखलाये।।
"मैं विपत्ति में हूं", ऐसाकह,अनुचितकर्म न करता। आर्यजनों में सर्वश्रेष्ठ वह देवों संग विचरता।।
(रोला)
स्व-सुख में खुशी न माने,
पराया दुख पहचाने,
दुखी को निज सा जाने।
दान किया तो,फिर पछताने के विचार नहीं लाने।।
(दौड़)
दम्भ से मोह मात्सर्य पापों से,
जो राजद्रोही से भी रखता है दूरियां।
चुगली करता नहीं,पागलों,दुर्जनों औ,
मदान्धोंसे भी जो रखे दूरियां।।
वैर रखता नहीं, और विवादों रहित,
जिंदगी जो बिताता वही श्रेष्ठ है।
आचरण सत्य का, भावना सत्य की।
सत्य चिंतन रखे जो,वही श्रेष्ठ है।।
(तबील)
28.सदा जानना चाहता उन्नत लोकाचार।
जाति धर्म चिंतन तथा सही देश व्यवहार।।
(दोहा)
सही देश व्यवहार,भेद उत्तम मध्यम का जाने।
जहां कहीं भी जाए,सभी पर अपनी प्रभुता ठाने।।
आश्रितजन को बांट,अल्पभोजन जोखुद है करता।
अधिकपरिश्रम,अल्पशयन,प्राणीको मिले अमरता।।
(रोला)
लोक व्यवहार संभाले,
धर्म में ह्रदय रंगा ले,
भाव को उच्च उठा ले।
जन-जन का प्रिय हृदयपटल पर अपना डेरा डाले।
(दौड़)
दान पूजन तथा यज्ञ मंगल क्रिया
आचरण नित्य करने के लायक है जो।
कर्म प्रायश्चितों को उचित से करें,
देवताओं के सम,जग के नायक हैं वो।।
मित्रता और विवाहादि सम से करें,
कार्य व्यवहार भी हीन-जन से नहीं।
गुण में आगे हैं जो, उनको आगे रखें,
नीति का भाव हटता है मन से नहीं।।
(तबील)
29.सबकी करे सहायता मित्र याकिअनजान।
दूर रहें संकट तथा,सभी करें सम्मान।।
(दोहा)
सभी करें सम्मान योजना लोग न जिसकी जानें।
जो कुछ वो करना चाहे कोई ना उसे पहचाने।।
रखे मंत्रणा गुप्त, कार्य का करे सही संपादन।
काम बिगड़ता नहीं कभी,जोकरे सत्यका चिंतन।।
(रोला)
शांति सब जग की भजता,
सत्य को कभी न तजता, समादर भाव उपजता।
जाति वर्ग में श्रेष्ठ रत्न सा, पावन रूप दमकता।।
(दौड़)
लाज का भाव जो निज नयन में रखे,
श्रेष्ठ सारे जगत में उसे जानिए।
तेज चेहरे पे हो,और हृदय शुद्ध हो,
कांति में सूर्य सम उसको पहचानिए।।
पांडु के पांच सुत इंद्र सम हैं बली
आप से ही पले,मानते आपको।
न्याय करिये उन्हें राज्य देकर स्वयं,
दूर करिए जगत व्याप्त अभिशाप को।।
(तबील)💐💐
(महाभारत विदुर-नीति का द्वितीय अध्याय)💐विदुरनीति (अध्याय-2/30-31) 💐*************************************
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30. कहते हैं धृतराष्ट्र यह, लगी हृदय में आग। चिंता से जलता हुआ, रहा अभी तक जाग।।
रहा अभीतक जाग,मुझे करणीयकार्य समझाओ। धर्म-अर्थमें कुशलतुम्हीं,अबमुझको मार्ग दिखाओ। सोचविचार करो,फिर मुझ को लक्ष्य बताओ मेरा। करो ज्ञान उपदेश,कि मेरे मन में भरा अंधेरा।।
कहो निज हृदय विचारी,
बात हो मंगलकारी,
दिव्य है बुद्धि तुम्हारी।
ऐसे वचन कहो युधिष्ठिर को भी हों हितकारी।।
मेरे मन में अमंगल की शंका भरी,
हर तरफ भय का माहौल दिखता मुझे।
मन से व्याकुल हूं चिंताएं दहका रहीं,
कोई भी तो भरोसा ना दिखता मुझे।।
क्या युधिष्ठिर के मन में? पता तो चले,
बात उसके हृदय की बताओ मुझे।
मोह से मुझको जो ना नजर आ रहा,
बुद्धि बल से तुम्हीं वो दिखाओ मुझे।।
31.कह रहे हैं विदुर- जिसकी चाहो विजय,
उससे हित के वचन को छुपाओ नहीं।
चाहे पूछे ना पूछे, जो कल्याण है,
ऐसी बातें उसे तुम बताओ वहीं।।
बात अच्छी बुरी जैसी उसको लगे,
हो वो मंगल-अमंगल,फिकर ना करो।
गर हो सच्चे हितैषी,तो ये जान लो,
हित की बातों का उससे जिकर तुम करो।।
वचन वही तुमसे कहूं, राजन रखिए ध्यान।
कौरव-कुल कुरुवंश का,होवे हित संधान।
होवे हित संधान, धर्म युत वाणी आज उचारुं। जिससेहो कल्याण आपका,वहीबात हिय धारूँ।। असत उपायों का प्रयोग कर काम जगत में होते। कपट पूर्ण कर्मों के कर्ता, जीवन का सुख खोते।।
न इसमें चित्त लगाएं,
न ऐसी बात बढ़ाएं,
वंश का नाश बचाएं।
माया-ममता-मोह त्याग, श्रीहरि में ही रम जाएं।।
32.श्रेष्ठ उपायों से अगर, पूर्ण ना होता काम।
ग्लानि न किंचित कीजिए, और न ले विश्राम।।
और न ले विश्राम नई ताकत लेकर जुट जाएं।
मन में हो विश्वास अटल तब नई सफलता पाएं।। किस कारण यह कार्य हो रहा अपने हृदय विचारें। खूब सोचकर किसी काम में अपने पांव उतारें।।
काम का प्रतिफल जाने,
कार्य उन्नति पहचाने,
लक्ष्य भी ऊंचा ठाने।
कार्य सिद्धि सुख उसे मिले, जो करता नहीं बहाने।।
लाभ-हानी, खजाने की हालत तथा,
अपनी ताकत की, रखता जो पहचान है।
दंड देना किसे? किसको माफी मिले?
देश के संकटों का जिसे ज्ञान है।।
जानता और समझता ये बातें सभी,
राज्य पाने का उसको ही अधिकार है।
नीति नियमों से कोरा,जो राजा बने,
उसका हटना ही जनता पर उपकार है।।
33.राज्य मुझे मिल ही गया,बदलूँ नहीं स्वभाव।
अहंकार वश जो करे,यह अनुचित बर्ताव।।
यह अनुचित बर्ताव-भले उसका धन जाय न मापा।
नष्ट करे सम्पत्ति,कि जैसे सुंदर रूप बुढापा।।
चारा लगे हुए कांटे को मछली मुंह तक लाती।
किंतु क्रूरपरिणाम,बाद का,किंचित समझ न पाती।।
स्वयं की उन्नति चाहे,
धर्म यह सतत निबाहे,
सोच कर भोजन खाये।
खाद्य वस्तु ऐसी ही खाये,जिसको सहज पचाये।।
पेड़ से फल को कच्चा ही जो तोड़ ले,
स्वाद फल के रसों का,न ले पायेगा।
वृक्ष को लाभ उससे मिलेगा नहीं,
वृक्ष-नाशक ही वह मूढ़, कहलायेगा।।
वक्त पर जो पके उसका आनंद ले,
स्वाद फल का व रस का भी पाता रहे।
वृक्ष भी खुश रहे,बीज भी खुश रहे,
और नए वृक्ष भी, वो लगाता रहे।।
34.मधु आस्वादन भी करें,भ्रमर पुष्प आकृष्ट।
राजा धन तो ले,मगर,न हो प्रजा को कष्ट।।
न हो प्रजा को कष्ट, प्रजा की करनी उसको रक्षा। ज्यों भौंरा फूलों का रक्षक, भौंरे से ले शिक्षा।।
एक फूल को तोड़े माली,जड़ को कभी ना काटे। राजा भी जनता के धन को,जनता में ही बांटे।।
न काटे जड़ जनता की,
चले निर्णय की चाकी,
दृष्टि राखें विपदा की।
जनताके हित-हेतु, न रक्खें कोर-कसर कुछबाकी।।
काम ये क्यों करूं? लाभ क्या है मेरा?
और अगर ना करूं हानि होगी नहीं!
कर्म करने से पहले विचारें इसे,
काम वो ही करें, दिल को लगता सही।।
व्यर्थ के काम ऐसे भी होते हैं,जो
काम करने का आनंद देते नहीं।
शक्ति पुरुषार्थ को खींच लेते वृथा,
शांति आनंद सुख छीन लेते यहीं ।।
35.क्रोध निरर्थक है, तथा निष्फल जिसका प्रेम। ऐसा राजा है वृथा, नहीं प्रजा का क्षेम।।
नहीं प्रजा का क्षेम, प्रजाभी उसको तनिक नचाहे। जैसे कोई नारी, नपुंसक पति को नहीं निबाहे।। जिस कारजका मूल अल्पहो लेकिन फलहो उत्तम।
विघ्न नआने देता ज्ञानी,करे कार्य को सक्षम।।
प्रेमयुत दृष्टि उठाए,
प्यार जनता का पाए,
प्रजा उस पर ललचाए।
प्रेम प्रजासे करे नृपति, सबका अपना बनजाए।।
पेड़ फूले फले,किंतु फल ही ना दे,
ऐसे तरुवर का कोई नहीं काम है।
फल भी दे किंतु, काया से कांटे चुभें,
उस से मिलता किसी को न विश्राम है।।
श्रेष्ठ राजा का गुण भी यही जान लें,
सकते चाहे न हो, पर दिखाये बहुत।
दंड का भय,सभी पर बनाए रखे,
जो खिलाए नहीं और न खाए बहुत।।
(तबील)
36.रखता हो सामर्थ्य, पर करे न ज्यादा दान।
सहज सुलभ सबको न हो, बचे तभी सम्मान।।
बचे तभी सम्मान कि जब जनता से किंचित दूरी। किंतु ध्यान भी रखें सभीका, बने न वो मजबूरी।।मन वाणी और कर्म नयन से,रखे प्रसन्न प्रजा को। वही प्रजा रखती प्रसन्न,फिर अपने उस राजा को।।
सभी डरते हों जिससे,
हिरण ज्यों डरे व्याध से,
प्रजा नहिं जुड़ती उससे।
प्रजा त्याग देती तो रहते, बस राजा के किस्से।।
बाप दादा से जो राज मिलता, उसे
भ्रष्ट कर देता, जो न्याय करता नहीं।
कर्म करता कुटिल,राज दूषित करे,
जैसे आंधी में उड़ जाते बादल कहीं।।
सज्जनों का धरम, राज्य उन्नत करे,
धान्य से पूर्ण धरती वहां की रहे।
राज्य का बढ़ता ऐश्वर्य बढ़ता रहे,
राज्य में धर्म संपति की गंगा बहे।।
37.चर्म सिकुड़ता है अगर नीचे जलतीआग।
नृप त्यागे निज धर्म को,यह अधर्म का याग।।
यह अधर्म का याग, कार्य वह अपनेलिए सुरक्षक। वही कार्य पर-राष्ट्र हेतु, बनजाता सदा विनाशक।। राज्य धर्म से करें प्राप्त, फिर धर्म युक्त हो रक्षा। धर्म मूल युत राज्य लक्ष्मी, देती स्वयं सुरक्षा।।
लक्ष्मी साथ न छोड़े,
साथ राजा के दौड़े,
न स्वामी उसको छोड़े।
धर्म तथा धन का संयोजन,सभी अमंगल तोड़े।।
बात करता निरर्थक जो बच्चा कोई,
चाहे पागल यह बकवास कोई करे।
तत्व की बात उससे भी ले लें कि ज्यों,
पत्थरों से कोई घर में सोना भरे।।
दाने-दाने को चुन के उदर ज्यों भरे,
उच्छ-वृत्ति से जीवन जो पाले कोई।
भाव-युत ज्ञान की बातें, संचित करो,
जैसे सागर से मोती उठा ले कोई।।
38.गाय गंध से देखती नयन विप्र के वेद।
गुप्तचरों से देखता नृप शासन के छेद।।
नृप शासन के छेद,गाए वह ज्यादा कष्ट उठाती।
दूध दुहे जाने पर जो,है ज्यादा लात चलाती।।आसानी से दुही जाए, वह गाय सभी की प्यारी।धातु सहज मुड़ जाए तो क्यों अग्नि की तैयारी।।
काठ जो खुद झुक जाए,
कोई क्यों उसे झुकाए,
बात को सहज बनाए।
बुद्धिमानहै वही किजो बलको नहींअकड़ दिखाये।।
जंतु पशुओं का रक्षक है बादल तथा,
मंत्री अपने नृपति का सहायक रहे।
वेद ब्राह्मण के बंधु हैं यह जानिए,
पत्नी का बंधु पति साथ हरदम रहे।।
धर्म रक्षक सदा सत्य को मान लो,
योग से विद्या बल की सुरक्षा रहे।
स्वच्छता, रूप-रक्षक सदा से रही,
और सदाचार से कुल की रक्षा रहे।
39.रक्षित रहे अनाज,यदि राखो उसको तोल।
घोड़ा फेरा जाए तो,बढ़ता उसका मोल।।
बढ़ता उसका मोल,गाय भी दृष्टि रखे से रक्षित।
मैले वस्त्र करे धारण, स्त्री का शील सुरक्षित।। सदाचार से हीन मनुज का ऊंचा कुल मत मानो। सदाचारयुत नीचे कुल भी मनुज श्रेष्ठतम जानो।।
पराए धन से जलता,
रूप गुण उसे न फलता,
पराक्रम का रवि ढलता।
द्रोह डाहसे जले किजिसके हृदय,रोग यह पलता।।
काम,करने के किंचित जो लायक ना हो,
काम ऐसा कभी तुम तो करना नहीं।
कार्य करणीय है,उसमें आलस न हो,
काम करने में किंचित पिछड़ना नहीं।।
काम होने से पहले सभी जान लें,
ऐसी हालत से बच के रहा कीजिए।
मन को कर दे भ्रमित, चित्त अस्थिर रहे,
मद्य-मादक पदारथ,नहीं पीजिये।।
40.विद्या धन और उच्च कुल,ये मद के आधार।
किंतु श्रेष्ठजन हेतु ये,आत्म दमन के द्वार।।
आत्म दमन के द्वार, करें यदि सज्जन जरा बढ़ाई।
दुष्ट स्वयं को मान सुधी, फिर बन जाते दुखदाई।। संत सदा से रहे मनस्वी जन का एक सहारा।
संतों की सेवा हित तत्पर, संतो का गुरुद्वारा।।
सुजन को संत संभाले,
दुष्ट को भी वह पाले,
दुष्ट निज बैर निकाले।
सज्जन सीधे रहें, दुष्ट चलते सर्पों सी चालें।।
श्रेष्ठ वस्त्रों में कोई चला आए तो,
जीत लेता सभा का हृदय प्यार से।
स्वाद चाहे मधुर,गौ की सेवा करें,
इच्छा पूरी करे दूध की धार से।
मार्ग पर जीत पाने की इच्छा जिसे,
जीतता वो सवारी के उपहार से।
शील से भरा जिस मनुज का हृदय,
सारा जग जीत लेगा वो अधिकार से।।
41.जग में पुरुषों के लिए होता शील प्रधान।
शील-हीन को ना मिले, जीवन धन सम्मान।।
जीवन धन सम्मान, नष्टहो पशुवत जीवन होता। शील-विनय से हीन मनुज इस जगमें सर्वस् खोता। धनी पुरुष मांसाहारी, तो मध्यम गोरस भावै।
और दरिद्री,तेल युक्त भोजन से काम चलावै।।
भूख अमृत निर्धन का,
स्वाद बढ़ता भोजन का,
धनी को मिले न मन का।
धनी न पावै भोजन सुख,पर बड़ा पेट निर्धन का।।
निम्न कोटी के लोगों को रोजी का डर,
मध्य श्रेणी को, मरने से भय मानिए।
श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान होवे अगर,
उनको वो मृत्यु से भी बड़ा जानिये।।
मद्य का जो नशा सो तो है ही बुरा,
धन का मद उससे बढ़कर बताया गया।
मद्यपी को कभी होश आता भी है,
धन के मद से गिरा, भ्रष्ट पाया गया।।
42. इंद्रिय संयम के बिना जीव पा रहे कष्ट।
ज्यों सूरज के तेज में नभ के तारे नष्ट।।
नभ के तारे नष्ट,सूर्य के सम्मुख जैसे हारे।
इंद्रियसे जो थका, काम जोकरता बिनाविचारे।।पांचइंद्रियोंका सुख जिसको घुटनोंपर ले आता। शुक्लपक्ष चंदा जैसा दुख, बढ़ता चढ़ता जाता।।
हृदय को जीत न पाया,
विषय-सुख ने भरमाया,
स्वामिनी,जिसकी काया।
मंत्री नहीं अधीन हुए तो, शत्रु जीत नहीं पाया।।
चित्त पर है नियंत्रण नहीं किंतु जो,
आत्म ऊपर विजय कामनाएं करे।
मूढ़ है मंद प्राणी अभागा बड़ा,
उसका अपना उसे दूर खुद से करे।।
मन को दुश्मन समझ जीत लेता है जो,
उसको जग में हमेशा ही सम्मान है।
है जितेंद्रिय तथा एक निष्ठा से युत,
ज्ञान पूरित वही सच्चा विद्वान है।।
43.इंद्रिय मन का हो जयी,अपराधी को दंड।
जांच परख कारज करें,लक्ष्मी रहे अखंड।।
लक्ष्मी रहे अखंड, दिव्य रथ है मानव की काया।
बुद्धि सारथी, इंद्रिय घोड़े, जो वश में कर पाया।। धीर चतुर और सावधान वह रथी विशेष निराला। मन तुरंग काबू करने वाले ने, सफर संभाला।।
होय बेकाबू घोड़ा,
सवारी को ले दौड़ा,
दिशा उल्टी पर मोड़ा।
इंद्रिय वश में नहीं मनुज, मरता है थोड़ा-थोड़ा।।
वश में इंद्रिय नहीं बुद्धि के फेर में ,
अर्थ अनरथ का अंतर समझ से परे।
बात बेकार हो, उसको समझे बड़ा,
सुख की आशा करे,जीव दुख से डरे।।
धर्म और अर्थ त्यागे वो मूरख मनुज,
इंद्रियों की गुलामी में जीवन रतन-
खो गया है परम ज्ञान परिवार सुख,
खो गई शांति मन प्राण ऐश्वर्य धन।।
44. धन का मालिक हो मगर, इंद्रिय रखे गुलाम। इंद्रिय जया ना कर सके नष्ट होंय धन धाम।।
नष्ट होंय धन-धाम, बुद्धि मनइंद्रिय जिसे नचावे। मूढ़ नराधम निज आतम का, रूप जान नहीं पावें।। मन बुधि इंद्रिय जयी आत्म का तत्व सही पहचाने। आत्मा बंधु, शत्रु भी आतम,परम सत्य वह जाने।।
विजय खुद पर जो पाई,
आतमा बंधु बनाई,
उसीसे सब सुख भाई।
आत्म-नियंत्रण नहीं अगर,तो आत्माही दुःखदाई।। जाल काटे अगर, कोई मछली फंसे,
जाल में एक पल को वो रह ना सके।
काम और क्रोध में जब कहीं मन जुड़े,
ज्ञानके तेजको फिर वो सह ना सके।।
धर्म और अर्थ का कोश जिसको मिले,
सुख तथा ओज से वह भरा ही रहे।
पांच इंद्रिय जो रिपुसम हृदय में बसें,
जो इन्हें जीत ले,जग विजेता कहे।।
45.साधु संत यदि ना रखें इंद्रिय पर अधिकार। राज्य-भोग की चाहना उपजे बारंबार।
उपजे बारंबार, चित्त सुख सुविधा को ललचावै। इंद्रिय सुख की चाह, संत मुनिजन को नाच नचावै।। दुष्ट पुरुष अपने वचनों का मान नहीं रख पावै।
धर्महीन अरु दान धैर्य से हीन अधम कहलावै।।
मूर्ख देता है गाली,
ज्ञान सम्मुख वह खाली,
मूर्ख रहता बेख्याली,
गाली बनती पाप, क्षमा है मुक्ति कराने वाली।
दुष्ट हिंसा के बल पे सताता फिरे,
न्याय करता है राजा उसी दंड से।
नारियों के लिए सेवा उनका है बल,
और क्षमा भाव ऊंचा है पाखंड से।।
बोलने पे नियंत्रण है मुश्किल जरा,
मुंह से कुछ अटपटा तो निकल जाएगा।
किंतु,सुंदर अलंकृत-वचन भी यहां,
कोई कब तक लगातार कह पाएगा??
46. पापा चारी दुष्ट का करें नहीं यदि त्याग। निरपराध को निगलती,यही पाप की आग।।
यही पापकी आग कि लकड़ी
सीली भी जल जावे।
सूखी जलती लकड़ी के, जब
अधिक निकट वह आवे।।
पांच विषय की पांच इंद्रियां,
मोह ग्रसित हो जावें।
विपद जाल में फंसे मनुज की,
बुद्धि भ्रमित हो जावें।।
सरलता रहे ह्रदय में,
नहीं जीवे जो भय में,
सत्य भाषण निश्चय में।
इंद्रिय दमन पुष्टि पावनता,जीवन के संचय में।।
सत्य का जो पुजारी, हो चंचल नहीं,
धर्म के रूप मुश्किल निभा जाएगा।
दोष दूजों को देते नहीं एक पल,
मन में दुख होगा उसको छिपा जाएगा।
ज्ञान की ना कमी खिन्नता भी नहीं,
बात मुंह में जो आई,बता जाएगा।
बात करता तो उससे मुकरता नहीं,
श्रेष्ठता के कुसुम वो खिला जाएगा।।
47.मधुर बात करती सहज,श्रोताका कल्याण।
कटु वाणी पीड़ित करे,जैसे तीखा बाण।।
जैसे तीखा बाण लगे,वृक्षों पर चले कुल्हाड़ी।
कटुवाणी पलमें उजाड़ती मनकी बगिया बाड़ी।।
घोर शस्त्र से बिंधाहुआ जैसे-तैसे बच जाता।
किंतु कटुवचन का कांटा,दिलके अंदर धंसजाता।। बाण सम है कटु वाणी,
मर्म पर चोट लगानी,
रात-दिन घुटन बढ़ानी।
सज्जन ज्ञानी वही किजो बोले नकभी कटुवाणी।।
देव जिसको पराजय दिलाना चहें,
बुद्धि पहले ही उसकी हरी जाएगी।
बुद्धि जिसकी हरी जारही,दृष्टि उसकी
हमेशा नीचाई पे ही जाएगी।।
है विनाशक समय आ चुका बुद्धि का,
बुद्धि कुछ भी तो अच्छा न कर पाएगी।
न्याय,अन्याय जैसा लगेगा उसे,
फर्क, उसकी ये बुद्धि न कर पाएगी।।
48.पुत्र आपके मानते,भाई संग विरोध।
यद्यपि पांडव जन कभी, करें नहीं प्रतिरोध।।
करें नहीं प्रतिरोध,
बुद्धि ही बनी इन्हें दुखदाई।
है कटुता भर चुकी नयन में,
सच ना पड़े दिखाई।।
राजलक्ष्मी युक्त जिसे त्रिभुवन का राजा जानो। शासक पद के योग्य युधिष्ठिर उसे आप पहचानो।।
धर्म तत्वों का ज्ञाता,
बुद्धि बल से भी नाता,
स्वयं का भाग्य विधाता।
भाग्यवान और योग्य कुशल,
पितरों को भी सुखदाता।।
धर्म पालन का चिंतन करे वह सदा,
धर्म कारण दुखों को वो सहता रहा।
हर अनाचार उसके ही संग में हुआ,
पर पलटकर वचन एक भी ना कहा।।
सौम्यता उसके नस नस में बहती रही,
घोर अपमान पल-पल है उसने सहा।
इतनी बातों से पत्थर दहकने लगे,
पर दया सिंधु उसके हृदय में बहा।।
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